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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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१८८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

उपसंहार (समाप्ति) तथा बीच-बीच में भी इसमें बहुत से त्रुटित अंश एवं अशुद्धियां हैं। आजकल एक हजार वर्ष पूर्व की ताडपत्रों पर लिखी हुई ज्वरसमुच्चय नामक पुस्तक मिली है जिसमें आश्विन, भरद्वाज आदियों की तरह भेड के भी केवल ज्वरप्रकरण के बहुत से वचन उद्धृत किये गये हैं। उनमें से उपलब्ध मुद्रित भेडसंहिता में केवल दो तीन श्लोक ही मिलते हैं। उसके अन्य श्लोक इसमें नहीं मिलते हैं। इस प्राचीन पुस्तक में इतने श्लोकों के भी मिलने से यह संहिता प्राचीन नहीं है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। परन्तु उसी ज्वरप्रकरण में भेड नाम से उद्धृत अन्य श्लोक, तन्त्रसार नामक अन्य संग्रह ग्रन्थ में भेडसंहिता नाम से दिये हुए अन्य प्रकरण के श्लोक तथा इसी प्रकार टीकाकारों द्वारा स्थान-स्थान पर भेड नाम से उद्धृत १ श्लोक भी इस मुद्रित भेडसंहिता में प्रायः नहीं मिलते है। इस वृद्धजीवकीय तन्त्र (काश्यपसंहिता) में बस्तिकर्म के समय का निर्देश करते हुए 'षड्वर्षप्रभृतीनां तु भेड' द्वारा भेड के मत में ६ वर्ष के बाद बस्तिकर्म का विधान बताया है। परन्तु उपलब्ध भेडसंहिता में 'बालानाामथवृद्धानां युवमध्यमयोस्तथा। स्वस्थानामातुराणां च बस्तिकर्म प्रशस्यते' द्वारा सर्वसाधारण के लिये बस्ति का विधान दिया है। यह परस्पर विरोध है। इस प्रकार भिन्न ग्रन्थों में भेड के नाम से मिलने वाले वचनों के यहां न मिलने से यह भेडसंहिता बहुत से अंशों से विच्छिन्न तथा सन्देहास्पद प्रतीत होती है। इन्हीं विच्छिन्न अंशों के न मिलने तथा चरक सुश्रुत के समान इसमें विषय निरूपण को अस्पष्टता के कारण ही वाग्भट ने भी निम्न श्लोक द्वारा भेड के विषय में कटाक्ष किया है—

ऋषिप्रणीते भक्तिश्चेन्मुक्त्वा चरकसुश्रुतौ । भेडाद्याः किं न पठ्यन्ते तस्माद् ग्राह्यं सुभाषितम् ।।
(अष्टाङ्गहृदये उ. तं. अ. ४०)

हारीतसंहिता—प्रायः इसी के अनुरूप दो तीन सौ वर्ष पूर्व लिखित हारीत संहिता भी प्रकाशित हुई आजकल मिलती है। इसमें प्राचीन आर्ष लेख की छाया न होकर केवल साधारण संग्रह मात्र होने से यह न तो प्राचीन तथा न आर्ष ही प्रतीत होती है। प्राचीन ज्वरसमुच्चय नामक पुस्तक में हारीत नाम से उद्धृत बहुत से श्लोक दिये हैं। अन्य ग्रन्थों में भी स्थान स्थान पर हारीत के वचन उद्धृत किये गये हैं। परन्तु वे वचन उपलब्ध हारीतसंहिता में न मिलने से किसी अन्य ही प्राचीन हारीतसंहिता की पूर्वस्थिति का अनुमान होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि संभवतः प्राचीन हारीतसंहिता के लोप को देखकर उस (हारीत) के नाम से स्थिर रखने के लिये पीछे होने वाले किसी विद्वान ने हारीत के नाम से इस ग्रन्थ की रचना की हो ?।

नवोपलब्ध काश्यपसंहिता—अत्यन्त प्राचीन काल से प्रसिद्ध चरक सुश्रुत संहिताएँ तथ अभी (वर्तमान समय में) मिली हुई भेडसंहिता की अपेक्षा उपलब्धि (प्राप्ति) की दृष्टि से चौथे नम्बर पर होती हुई भी प्राचीन आर्ष लेख, विषय की गम्भीरता तथा सारयुक्त होने की दृष्टि से चरक तथा सुश्रुत की समकक्ष कौमारभृत्य विषय की यह प्राचीन काश्यपसंहिता प्रतिकूल दैव के कारण बहुत समय तक विलुप्त रहकर फिर सौभाग्य से कहीं दबी हुई जीर्णशीर्ण अवस्था में प्राचीन ताडपत्र की पुस्तक के रूप में प्राण शेष तथा स्थान-स्थान पर खण्डित अंशों से युक्त वृद्धजीवकीय तन्त्र रूप में अब मिली है। करालकाल के द्वारा इसके अवयवों के खण्डित हो जाने पर शेष अवयवों द्वारा भी अपने विषय की गम्भीरता को प्रकट करती हुई तथा नाम से भी लुप्त हुई इस प्राचीन आर्ष संहिता का मिलना भी विद्वानों के लिये सन्तोष का ही विषय है।

पहले किसी समय नेपाल देश में आकर विद्वद्वर महामहोपाध्याय श्रीयुत पण्डित हरप्रसाद शास्त्री ने निम्न विवरणसहित काश्यपसंहिता का उपलब्धि वृत्तान्त Report on the Search of Sanskrit Manuscripts (1895 to-1900) नामक पत्र में प्रकाशित किया था तथा उस विवरण को जूलियस जौली नामक विद्वान् ने मैडिसन की पुस्तक में भी दिया है—'नेपाल में मुझे काश्यप भार्गवसंवाद रूप वैद्यक विषय की ३८ पृष्ठों की अपूर्ण प्राचीन काश्यपसंहिता मिली है जिसके प्रारम्भ में भेषज्योपक्रमणीय में आठवें पृष्ठ से ज्वर निदान दिया हुआ है। इसमें चरक,

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