काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 203, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
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सुश्रुत, कश्यप, आश्विन, आत्रेय, भेड, पराशर, हारीत तथा जतूकर्ण आदियों के वचन भी दिये हुए हैं। भैषज्योपक्रमणीय नाम होने पर भी इसमें ओषधियों का उल्लेख नहीं है'। इस विवरण के अनुरूप पुस्तक नेपाल राजकीय पुस्तकालय के उन्हीं द्वारा तैयार करके प्रकाशित किये हुए पुस्तकों के सूचीपत्र (Index) में भी नहीं दी हुई है। उससे बाहर भी यत्नपूर्वक ढूंढने पर ऐसी काश्यपसंहिता नहीं मिली है। परन्तु ज्वरनिदान आदि के विषय में नाना ऋषियों के वचनों का संग्रहस्वरूप प्राचीन ताडपत्रीय ज्वरसमुच्चय नाम का वैद्यक ग्रन्थ नेपाल में अन्यत्र भी मिलता है तथा मेरे पास भी है, जिसमें ज्वर के विषय में बहुत से काश्यप, चरक, सुश्रुत, आश्विन, भेड आदि के वचन दिये हुए है। काश्यपसंहिता के खिल भाग में आये हुए 'शृणु भार्गव तत्त्वार्थं सन्निपातविशेषणम्' आदि वचनों के मिलने से इसमें भार्गव तथा कश्यप का संवाद प्रकट होता है। उसके विवरण में आदि (प्रारम्भ) में भैषज्योपक्रमणीय के उल्लेख होने से, परन्तु ज्वरसमुच्चय में इसके अभाव होने से, काश्यपसंहिता के खिलभाग के तृतीय अध्याय का नाम भैषज्योपक्रमणीय होने से संभवतः प्रारम्भ के आठ पृष्ठों में काश्यपसंहिता के खिलभागान्तर्गत भैषज्योपक्रमणीय अध्याय भी उसमें जोड़ दिया गया हो। इस प्रकाशित काश्यपसंहिता में चरक, सुश्रुत आदियों के वचन नहीं दिये हैं। इस प्राचीन पुस्तक में अर्वाचीन चरक आदि के नामों का उल्लेख होना भी नहीं चाहिये। इसमें ज्वर प्रकरण तथा ओषधियों का विषय भी नहीं है। इस प्रकार उनकी दृष्टि में आया हुआ वह ग्रन्थ सर्वांश रूप से यह काश्यपसंहिता नहीं हो सकती अपितु इस संहिता के भैषज्योपक्रमणीय अध्याय के कुछ पृष्ठों को मिलाकर उक्त विवरण वाला ज्वरसमुच्चय अथवा इसी प्रकार का कोई प्राचीन संग्रहात्मक अन्य ग्रन्थ होगा।
इस उपलब्ध ताडपत्र पुस्तक की आकृति २१-१/२×२-१/४ है। प्रत्येक पृष्ठ में ६ पंक्तियां है। सबसे प्रारम्भ का पृष्ठ २९ और अन्तिम पृष्ठ २६४ है। तथा बीच-बीच में भी बहुत से पृष्ठ विलप्त हैं। इस उपलब्ध पुस्तक के आदि, अन्त तथा मध्य के भी स्थान-स्थान पर खण्डित होने के कारण बहुत प्रयत्न करने पर भी खण्डित पृष्ठ तथा प्रतीकों की प्राप्ति नहीं हो सकी है। लुप्त पत्रों का संकेत मुद्रित पुस्तक के प्रथम पृष्ठ की पादटिप्पणी (Foot note) में कर दिया गया है। ग्रन्थ के आदि के १०-१२ अध्याय खण्डित हैं तथा अन्त में भी खिल भाग के ८० में से केवल २५ अध्याय तक ही होने से उसके बाद का भाग भी खण्डित है। शेष बचे हुए पृष्ठों में से भी बहुत से अंश पूरे नहीं हैं इसलिये स्थान-स्थान पर विलुप्त पंक्ति, शब्द तथा अक्षर आदि को प्रकाशित करते हुए बिन्दुमाला द्वारा दिखाया गया है। इसकी लिपि प्राचीन होने पर भी बहुत से स्थानों पर लेखभेद होने से एक ही समय में दो लेखकों ने मिलकर खण्डरूप में इस मूल पुस्तकी पूर्ति की होगी, ऐसा प्रतीत होता है। इस पुस्तक के उपक्रम तथा उपसंहार के लुप्त होने के कारण उसके द्वारा ज्ञातव्य विषयों का कुछ भी ज्ञान नहीं हो सकता। अन्तिम भाग के न मिलने से उसके लेख के समय के विषय में भी कुछ नहीं मिलता। परन्तु फिर भी इसकी लिपि की आकृति, अक्षरों द्वारा निर्दिष्ट पृष्ठों के अङ्क (संख्या), कहीं-कहीं अध्याय और श्लोकों की संख्या तथा ताडपत्र की लम्बाई और चौड़ाई को देखकर यह अनुमान किया जा सकता है कि इस पुस्तक का लेख सात आठ सौ वर्ष पूर्व का है। परन्तु इस आदर्श पुस्तक में भी अक्षरों के लुप्त होने से तथा कहीं-कहीं बिना अक्षरों के अधूरे ही स्थलों के मिलने से यह आदर्श मूल पुस्तक भी इस प्रकार की जराजीर्ण तथा प्राचीन प्रतीत होती है। पुस्तक की आकृति के ज्ञान के लिये मूल पुस्तक के दो पृष्ठों की प्रतिच्छाया (Reproduction) भी साथ में दे दी गई है।
कश्यप सम्बन्धी विमर्श—प्राचीन वैद्यक ग्रन्थों में से हमारे सामने सुश्रुत संहिता, चरक संहिता, तथा नवोपलब्ध काश्यपसंहिता, ये जो तीन महान आर्ष ग्रन्थ हैं। उसमें सुश्रुतसंहिता में धन्वन्तरि तथा चरक संहिता में पुनर्वसु आत्रेय की तरह काश्यपसंहिता में कश्यप मूल उपदेशक हैं। इस ग्रन्थ के उपक्रम तथा उपसंहार भाग के खण्डित होने के कारण इस कश्यप का विशेष परिचय न मिलने पर भी संहिता के कल्पस्थान के संहिताकल्प नामक अध्याय में ही निम्न विवरण मिलता है—