काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
'दक्षयज्ञे वधत्रासाद् ...... निखिलेन ते' (श्लो. १४-२८)
अर्थात् दक्ष के यज्ञ में उत्पन्न हुई अव्यवस्था से उत्पन्न प्राचीन नाना रोगों से पीड़ित प्राणियों के उद्धार की दृष्टि से पितामह ब्रह्मा की सहायता तथा तपोबल से महर्षि कश्यप ने इस महान् तन्त्र का निर्माण करके ऋषियों को उपदेश दिया। सर्वप्रथम इस विस्तृत तन्त्र को ग्रहण करके ऋचीक के पुत्र जीवक नाम वाले एक बालमुनि ने इसका संक्षिप्त रचना के रूप में परिणत कर दिया। परन्तु बालजल्पित (बालक का वचन) कहकर जब अन्य ऋषियों ने इसे स्वीकार नहीं किया तब उसी समय सब ऋषियों के देखते-देखते कनखल स्थित गङ्गा के कुण्ड में डुबकी लगाकर क्षण भर में वलिपलितयुक्त (झुर्रियों तथा सफेद बालों से युक्त) वृद्ध रूप में परिणत हो गया। इस चमत्कार के कारण विस्मित हुए मुनियों ने वृद्ध आकृति वाले उस बालक का वृद्धजीवक नाम रखकर तथा उसे उत्तम वैद्य मानकर उसके तन्त्र को स्वीकार कर लिया। उसके बाद लुप्त हुए इस तन्त्र को भाग्यवश अनायास नामक किसी यक्ष ने प्राप्त करके लोककल्याण के लिये इसकी रक्षा की। इसके बाद वृद्धजीवक के ही वंश में उत्पन्न हुए वेद वेदाङ्ग के ज्ञाता, तथा शिवकश्यप के भक्त वात्स्य नामक विद्वान् ने अनायास को प्रसन्न करके उससे इस तन्त्र को प्राप्त करके कीर्ति, धर्म तथा लोककल्याण के लिये अपनी बुद्धि तथा श्रम से उसका प्रतिसंस्कार करके उसे प्रकाशित किया। तथा इसके आठ स्थानों में न आये विषयों को खिलस्थान के रूप में इसमें जोड़ दिया। इस प्रकार का इसका वृत्तान्त मिलता है।
वैदिक समय में भी मन्त्र ब्राह्मण आदियों में कश्यप और काश्यप नाम वाले अनेक महर्षियों तथा अन्य ग्रन्थों में भी इस नाम के अनेक विद्वानों का उल्लेख मिलता है। इनमें से कौनसा कश्यप इस कौमारभृत्य संहिता का मूल आचार्य है जिसके उपदेश को वृद्धजीवक ने ग्रहण किया यह विचारणीय विषय है। अत्रि, कश्यप आदि के गोत्रप्रवर्तक मूल आचार्य के रूप में मिलने से कश्यप शब्द से मूल कश्यप तथा काश्यप शब्द से कश्यप गोत्र में होनेवाले व्यक्ति का सामान्य रूप से बोध होता है। गोत्र प्रवरों (पुरोहित का गोत्र) के निर्देश करने वाले आचार्यों के लेख के अनुसन्धान में बोधायन (धर्मसूत्रकार-समय लगभग ४ थी शती ई. पू.) ने मूलगोत्र के प्रवर्तक केवल एक आचार्य में कश्यप तथा अन्यों के लिये काश्यप शब्द का व्यवहार उचित होने पर भी 'कश्यपान् व्याख्यास्यामः' द्वारा प्रारम्भ करके उस गोत्र वाले तथा अन्य गोत्र प्रवर्तकों का विभाग पूर्वक निर्देश करके अन्त में 'इत्येते निध्रुवाः कश्यपाः' द्वारा समाप्त करके काश्यप गोत्र वाले तथा अन्य गोत्र के पर्वतों का काश्यप शब्द से व्यवहार उचित होने पर भी कश्यप शब्द से ही व्यवहार किया गया है। आपस्तम्ब¹ आश्वालायन तथा कात्यायन आदि में भी इसी प्रकार के उल्लेख मिलते हैं। बहुत व्यक्तियों के निर्देश होने पर गोत्र² प्रत्यय का लोप होकर 'कश्यपाः' यह व्यवहार सम्भव होने पर भी शतपथ³ ब्राह्मण में 'हरितः कश्यपः', 'शिल्पः कश्यपः', 'नैध्रुविः कश्यपः' इत्यादि द्वारा हरित आदि परम्पर विभिन्न एक-एक व्यक्ति का भी कश्यप शब्द से निर्देश किया है। इस प्रकार प्राचीन काल में कश्यपगोत्र वाले व्यक्तियों का काश्यप शब्द के समान व्यक्तिविशेष के लिये कश्यप शब्द का व्यवहार भी प्रायः देखा गया है। इस प्रकार बोधायन आदि के लेख से मूल कश्यप के समान उस परम्परा वाले अन्य कश्यप के लिये भी कश्यप शब्द आता है। परन्तु कश्यप के सम्प्रदाय में बोधायन आदि द्वारा अन्य मारीच के निर्देश न होने से तथा अन्यत्र वैदिक संहिताओं में कश्यप का मरीचि के पुत्ररूप में मिलने से यह कहा जा सकता
१. अथ कश्यपानां त्र्यार्षेयः काश्यपावत्सारनैध्रुवेति। (आपस्तम्बप्रवरकाण्डे)
कश्यपानां काश्यपावत्सारासितेति। (आश्वलायनप्रवरकाण्डे)
कश्यपान् व्याख्यास्यामः। (कात्यायनलौगाक्षिप्रवरकाण्डे)
२. अनृष्यानन्तर्ये विदादिभ्योऽञ् ४/१/१०४ यञञोश्च २/४/९४ (पाणिनिसूत्रे)
३. हरितात् कश्यपाद्धरितः कश्यपः शिल्पात् कश्यपाच्छिल्पः कश्यपः कश्यपान्नैध्रुवेः कश्यपो नैध्रुविः। (शतपथवंशब्राह्मणे)