भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद१९१

है कि बोधायन आदि के लेख के अनुसार मूल कश्यप ही मरीचि का पुत्र होने से मारीच है। ¹मत्स्य पुराण के गोत्रप्रवरों के वर्णन में मरीचि के पुत्र कश्यप का मूलगोत्र प्रवर्त्तक के रूप में निर्देश करके उसकी सन्तति में अवान्तरगोत्रों के प्रवर्त्तक की दृष्टि से मरीच के पुत्र कश्यपों का पुनः निर्देश किया है। गोत्र प्रवरों के विषय का संग्रहकर्त्ता ²कमलाकर (१७ शताब्दी) भी मात्स्योक्त कश्यपों का उल्लेख करता हुआ 'अथ कश्यपाः' द्वारा कश्यप परम्परागत अन्य गोत्रप्रवर्तक एक मारीच (मरीच के पुत्र) ऋषि का एकवचनान्त शब्द द्वारा निर्देश करता है। कश्यप परम्परागत होने से इस मारीच का भी कश्यप होना संगत है। इस प्रकार कश्यप परम्परागत एक दूसरा भी मारीच कश्यप हुआ है-ऐसा ज्ञात होता है। ³चरक के प्रारम्भ में एकत्रित महर्षियों का वर्णन करते हुए पहले कश्यप का पृथक् निर्देश करके फिर 'मारीचिकश्यपौ' इस द्विवचनान्त पद द्वारा मारीचि तथा काश्यप का पृथक् निर्देश मिलता है। इस प्रकार कश्यप, काश्यप तथा मारीचि तीन भिन्न-भिन्न व्यक्ति प्रतीत होते हैं।

इस काश्यपसंहिता में प्रत्येक अध्याय के प्रारम्भ तथा अन्त में 'इति ह स्माह कश्यपः' तथा कहीं-कहीं बीच में भी 'इत्याह कश्यपः' 'इति कश्यपः' 'कश्यपोऽब्रवीत्' इत्यादि द्वारा बहुत से स्थानों पर कश्यप⁴ शब्द से आचार्य का उल्लेख किया है। कहीं-कहीं ⁵मारीच शब्द द्वारा भी निर्देश किया है। पूर्वापर वाक्यों को देखते हुए कश्यप ही मारीच तथा मारीच ही कश्यपरूप से दिखाई देने से इस ग्रन्थ का आचार्य मारीच कश्यप मालूम होता है। तथा सर्वत्र एक वचनान्त मारीच तथा कश्यप शब्द द्वारा व्यवहृत होने से स्पष्टरूप से वह एक व्यक्ति प्रतीत होता है। आत्रेयसंहिता के वातकलाकलीय अध्याय में भगवान् आत्रेय के द्वारा वार्योविद के साथ संवाद करते हुए मारीचि का वर्णन करने से मारीच तथा वार्योविद की समकक्षता प्रतीत होती है। इस काश्यपसंहिता के निम्न प्रसङ्ग द्वारा भी इस संहिता के आचार्य मारीच का वार्योविद का समकालीन होना प्रकट होता है—

इति वार्योविदायेदं महीपाय महानृषिः। शशंस सर्वमखिलं बालानामथ भेषजम्।।

अर्थात् वार्योविद नामक राजा के लिये ऋषि कश्यप ने बालकों की सम्पूर्ण औषधियों का उपदेश किया।

आत्रेय संहिता में पीछे शारीर निर्वृत्ति (शरीर के अङ्गों के गर्भ में प्रकट होने) के विषय में विचार करते हुए 'विप्रतिपत्तिवादास्त्वत्र बहुविधाः सूत्रकारिणामृषीणां सन्ति' (अर्थात् शास्त्रकर्ता ऋषियों के बहुत से एक दूसरे से विरुद्ध वाद हैं-भिन्न-भिन्न मत हैं) इत्यादि वाक्य द्वारा पूर्व आचार्यों के मतों का निर्देश करते हुए 'कश्यपः 'सर्वाङ्गिनिर्वृत्तिः' इस विशेष पाठ द्वारा आत्रेय ने कश्यप के सर्वाङ्गिनिर्वृत्तिवाद (सब अङ्गों का साथ-साथ उत्पन्न होना) को चरमपक्ष के रूप में दिया है। इस काश्यपसंहिता में भी निम्न श्लोक द्वारा अपने आचार्य मारीच कश्यप का सर्वाङ्गिनिर्वृत्तिवाद मिलता है—


१. १ से ५ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. २१-२२ देखें।
२. मुद्रित चरक पुस्तक में विप्रतिपत्तिवाद के वर्णन में 'परोक्षत्वादचिन्त्यमिति मारीचिः कश्यपः, युगपत्सर्वाङ्गिनिर्वृत्तिरिति धन्वन्तरिः' इस पाठ के मिलने से तथा सुश्रुतसंहिता में भी धन्वन्तरि के इसी सिद्धान्त के मिलने से सर्वाङ्गिनिर्वृत्ति वाद धन्वन्तरि का तथा अचिन्त्यवाद कश्यप का प्रतीत होता है। संभव है इस विषय में धन्वन्तरि का भी यही सिद्धान्त हो किन्तु एक हस्तलिखित चरक की पुस्तक में 'कश्यपः सर्वाङ्गिनिर्वृत्तिः' द्वारा कश्यप का सर्वाङ्गिनिर्वृत्तिवाद का पाठ मिलता है। श्रीयुत गिरीन्द्रनाथ मुखोपाध्याय ने भी काश्यप के निरूपण में अपनी पुस्तक “हिस्ट्री ऑफ इण्डियन मेडिसिन” भाग प्रथम पृष्ठ १७९ पर यही पाठ दिया है। वार्योविद के सहभावी मारीच कश्यप के इस संहिता के आचार्य होने से और आत्रेय संहिता में आया हुआ कश्यप भी वही होने से इस काश्यपसंहिता में आये हुए 'सर्वेन्द्रियाणि गर्भस्य' इत्यादि वाक्य द्वारा सर्वाङ्गिनिर्वृत्तिवाद के सिद्धान्तरूप से दिये होने से तथा उसमें अचिन्त्यवाद के न मिलने से विरुद्ध सिद्धान्तों के अभाव के औचित्य की दृष्टि से कश्यप के सर्वाङ्गिनिर्वृत्तिवाद वाला पाठ की उचित प्रतीत होता है। संभवतः इसमें पूर्वापर पदों के पाठ में उलटफेर हो गया है।