काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १९२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् |
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सर्वेन्द्रियाणि गर्भस्य सर्वाङ्गावयवास्तथा। तृतीये मासि युगपन्निर्वर्त्तन्ते यथाक्रमम्।।
इसी प्रकार आत्रेयसंहिता में आत्रेय द्वारा वर्णित मारीच और कश्यप को एक ही मानने से आत्रेय पुनर्वसु द्वारा भी सम्मानपूर्वक निर्देश किये हुए आयुर्वेद के आचार्य राजर्षि वायोर्विद का समकालीन मारीच कश्यप ही इस संहिता का उपदेष्टा प्रतीत होता है। इस संहिता तथा बोधायन आदिके लेख में मारीच शब्द व्यवहृत किया गया है। मरीचि शब्द से अपत्य अर्थ में अण् प्रत्यय करके मारीच शब्द बनता है। आत्रेय संहिता में ‘धौम्यो मारीचिकाश्यपौ, मारीचिरुवाच, मारीचिः कश्यपः’ इत्यादि इकारान्त पाठों के मिलने पर भी मरीचि शब्द के बहादिगण में पाठ होने से तथा वायोर्विद के समकालीन होने से इञ् प्रत्यय होकर मारिचि शब्द भी मारीच शब्द का पर्याय ही है। अत इञ् (४/१/९५) सूत्र द्वारा मारीच शब्द से मारिचि शब्द बनने पर भी मारीच तथा मारिचि के साथ वायोर्विद का साहचर्य संभव है।
इस प्रकार पूर्वोक्तानुसार मारीच तथा कश्यप इन दोनों नामों का व्यवहार संभव होने से इस संहिता के शिष्योपक्रमणीयाध्याय में इन्द्र द्वारा विद्या प्राप्त किये हुए कश्यप, अत्रि आदि के शिष्य तथा पुत्रों द्वारा इस विद्या के प्रचार के उल्लेख से बोधायन आदि में कहा हुआ मरीचि पुत्र मूलकश्यप इस संहिता का आचार्य हो सकता है। तथा सतयुग और त्रेतायुग के बीच में उत्पन्न हुए रोगों से प्राणियों के कष्टों को दूर करने के लिये कश्यप ने इस संहिता का निर्माण किया जिसका वृद्ध जीवकतन्त्र नामक संक्षिप्तरूप कलियुग में विलुप्त होकर पुनः वात्स्य द्वारा प्राप्त करने संस्कार किया गया—संहिता कल्पाध्याय के इस लेख के अनुसार तथा आत्रेय के लेख में कांकायन आदि के समकालीन मारीचिकश्यप के मिलने से मात्स्योक्त कश्यप परम्परा वाले द्वितीय मारीच का भी इस संहिता का आचार्य होना संभव है। इस विषय में निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता। मात्स्योक्त द्वितीय मारीच कश्यप को यद्यपि निश्चय पूर्वक मूल कश्यप परम्परा वाला नहीं कहा जा सकता तो भी अवान्तर गोत्र वाला होने पर भी मन्त्रद्रष्टाओं के प्रवर्त्तक का ही उल्लेख होने से वह भी प्राचीन ही होना चाहिये। संहितातल्पाध्याय में कलियुग में लुप्त हुए वृद्धजीवकतन्त्र का यक्ष से प्राप्त करके वात्स्य द्वारा उसका संस्कार किये जाने के उल्लेख मिलने से वृद्धजीवकतन्त्र की भी मूलभूत काश्यपसंहिता का समय उससे भी प्राचीन होने से संहिताकार कश्यप का समय प्राचीन ही सिद्ध होता है। पाणिनि के मत में विदादिगणमें प्रविष्ट हुए कश्यप शब्द से बहुत्व अर्थ में ही गोत्र प्रत्यय के लुक् (लोप) का विधान है परन्तु वंशब्राह्मण आदि में उससे विपरीत एक व्यक्ति के लिये भी कश्यप शब्द का व्यवहार मिलने से यहां काश्यप के लिये आया हुआ कश्यपशब्द पाणिनि से भी प्राचीन प्रयोग को सूचित करता है।
इस काश्यपसंहिता में धन्वन्तरि का मत दिया होने से परन्तु उसके अनुयायी दिवोदास तथा सुश्रुत के नाम न होने से तथा ¹महाभारत में गुरुदक्षिणा में दिये जाने वाले घोड़ों की प्राप्ति के लिये काशीपति दिवोदास के पास पहुंचने वाले गालव ऋषि को हिमालय की तलहटीमें वायव्य (पश्चिमोत्तर) दिशा में मारीचि कश्यप के आश्रम का निर्देश होने से यह मारीचि कश्यप धन्वन्तरि के बाद परन्तु उसकी चतुर्थ सन्तति दिवोदास के कुछ समय पूर्व या उसके समकालीन हिमालय की तलहटी में आश्रम बनाकर रहता था—ऐसा प्रतीत होता है। इससे इस संहिता में आये हुए आचार्य की ²गङ्गाद्वारनिवासित्व की संगति भी ठीक बैठती है।
अवान्तर गोत्र प्रवर्त्तक मारीच कश्यप को भी यदि इस संहिता का आचार्य माना जाय तो चरक के उपक्रममें मारीचि तथा कश्यप से भिन्न प्राचीन कश्यप के मिलने से तथा इस संहिता में भी इन्द्र के शिष्य कश्यप द्वारा अपनी सन्तति में आयुर्वेद विद्या के प्रचार के उल्लेख होने से अत्रि, भृगु आदि के साहचर्य से मूलकश्यप से ही यह विद्या मारीच कश्यप में गई प्रतीत होती है। इस प्रकार परम्परागत मारीच ने इस संहिता का निर्माण किया प्रतीत होता है। इसीलिये वमनविरेचनीयाध्याय में वृद्ध काश्यप का मत देकर ‘अथ कश्यपोऽब्रवीत्’ द्वारा जो अपना मत दिया है वह बाद में होने
१. १-२ तक की टिप्पणी उपो. संस्कृत पृ. २३ देखें।