काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 207, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १९३
वाले मारीच कश्यप के लिये ही संभव है न कि मूलकश्यप के लिये। अन्य आचार्यों के मतों को देकर अन्त में नामोल्लेख सहित अपने मत के प्रतिपादन करने की प्राचीन शैली कौटलीय अर्थशास्त्र तथा आत्रेयसंहिता में भी दिखाई देती है। 'इति ह स्माह कश्यपः' इस वाक्य द्वारा प्रारंभ किये हुए अध्याय के बीच में भी अन्य आचार्यों के मतों के बिना भी कहीं-कहीं जो 'इति कश्यपः' 'इत्याह कश्यपः' आदि वाक्य आये हुए हैं वे नये एवं विशेष अर्थ को सूचित करने की दृष्टि से भी संभवतः ग्रन्थकार ने अपने नामसहित दिये हों, परन्तु मारीच कश्यप की संहिता में 'कश्यपाय स्वाहा' इस प्रकार जो स्वाहाकार देवता के रूप में कश्यप का उल्लेख मिलना है वह प्राचीन कश्यप का ही नाम होना चाहिये इसीलिये मूलकश्यप परम्परा द्वारा ही उसकी सन्तति में इस विद्या के प्रवृत्त होने से पूर्वाचार्य कश्यप के उपदेश को जताने के लिये उसका नाम लेना संभव है।
अस्तु यह कश्यप चाहे मूल व्यक्ति हो और चाहे परम्परागत व्यक्ति हो केवल इतने से ही उसे अर्वाचीन नहीं कहा जा सकता। वैदिक साहित्य में भी मन्त्रद्रष्टा के रूप में इसका उल्लेख है। कात्यायन के ऋक् सर्वानुक्रम सूत्र में कश्यप तथा काश्यपों द्वारा दृष्ट बहुत से सूक्तों में से जातवेद के प्रारंभ के एक ^१हजार सूक्त कश्यप ऋषि प्रणीत बताये गये हैं। उसकी व्याख्या करत हुआ ^२षड्गुरुशिष्य 'अयं मरीचिपुत्रः कश्यपः' ऐसा परिचय देता है। ^३बृहद्देवता में भी इन एक हजार सूक्तों का द्रष्टा कश्यप को ही बताया है। सायनाचार्य ने भी जातवेदस के मन्त्रों में मारीचि कश्यप ऋषि का निर्देश किया है। बभ्रूसूक्त^४ में तो सूत्रकार ने भी स्वयं मारीच कश्यप को ऋषिरूप से स्वीकार किया है। आथर्वण सर्वानुक्रम सूत्र में भी 'पृतनां जितम्' इत्यादि जातवेदस् सूक्त के द्रष्टा मारीचि काश्यप (मारीच, कश्यप) का उल्लेख है।
ऋग्वेद के नवम मण्डल तथा अन्यत्र भी काश्यपावत्सार, काश्यप निध्रुवि तथा मारीच कश्यप द्वारा दृष्ट अनेक सूक्त हैं। जिनका सायन ने भी उसीरूप में विवरण दिया है। उनमें दिव्य ओषधि सोम की अनेक प्रकार से स्तुति की गई है। जातवेदस् के मन्त्र में अग्नि की स्तुति करते हुए भी सोम का विषय आया हुआ है। जातवेदस् के प्रारंभ के एक हजार सूक्त कश्यप ऋषि प्रणीत हैं, ऐसा सर्वानुक्रम सूत्रकार आदि निर्देश करते हैं। उपलब्ध ऋग्वेद में मारीच कश्यप ऋषि द्वारा प्रणीत ये एक हजार सूक्त नहीं मिलते हैं। जातवेदस् में एक ऋचा वाला केवल यही एक सूक्त मिलता है। ^६सर्वानुक्रम सूत्र, ^७बृहद्देवता तथा षड्गुरुशिष्य द्वारा उद्धृत शौनक शाकपूणि आदि के निर्देश में 'जातवेद' तथा 'सयोवृषा' आदि सूक्तों के बीच के ९९९ सूक्तों की विद्यमानता प्रकट होने से यह स्पष्ट है कि इनका लोप हो चुका है। खिलरूप से विद्यमान ये सूक्त वेदों से लुप्त हो चुके हैं ऐसा षड्गुरुशिष्य ने स्पष्ट कहा है। इन विलुप्त मन्त्रों का अनुसन्धान करते हुए सर्वानुक्रम के टीकाकार ^८षड्गुरुशिष्य ने प्रारंभ में एकर्च, तृच, द्यूतृच आदि सहस्रर्च पर्यन्त^९ सूक्तों का निर्देश करके उनकी गिनती करते हुए गणित के अनुसार पांच^१० लाख चार सौ निन्यानबे ऋचाओं के लुप्त होने का संकेत किया है परन्तु ऋग्वेद में एक-एक मन्त्र को बढ़ाकर-सूक्तों में मन्त्रों के विन्यास की रीति कहीं दिखाई नहीं देती है। परन्तु सूत्र तथा बृहद्देवता में इन हजार सूक्तों में एक ऋचा वाले सूक्तों के बाहुल्य का निर्देश है, इस प्रकार उक्त संख्या पूरी नहीं होती। उक्त संख्या के निर्देश की सङ्गति हो, चाहे न हो परन्तु इतना तो स्पष्ट ही है कि इन एक हजार सूक्तों के एकर्च बाहुल्य निर्देश होने से एकर्च (एक ऋचा वाले) सूक्तों के अधिक संख्या में होने पर भी अन्य बह्वृच (बहुत ऋचाओं वाले) सूक्तों का प्रवेश संभव होने से इसमें हजारों मन्त्र थे। कश्यप तथा काश्यप के नाम से उपलब्ध सूक्तों में दिव्यौषधि सोम की स्तुति का वर्णन मिलने से संभवतः अन्य विलुप्त हजारों मन्त्रों में भी प्रायः ओषधियों का ही वर्णन प्रतीत होता है। कश्यप के आयुर्वेद विद्या का आचार्य होने से तथा काश्यपसंहिता में उसकी परम्परा में उस विद्या की अनुवृत्ति होने का तथा महान् आकृति वाली कश्यपसंहिता का पीछे वृद्धजीवक द्वारा संक्षेप किये जाने के उल्लेख होने से संभवतः ये विलुप्त एक हजार सूक्त ही काश्यपसंहितारूप में प्रकट हुए थे। आयुर्वेद के विषयों का प्रतिपादन करता
१. १ से १० तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. २४ देखें।