काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 208, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| १९४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकियं तन्त्रम् |
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हुआ वह भाग कश्यप ने ऋग्वेद में खिलरूप से प्रविष्ट किया हो फिर कालक्रम से च्युत होकर पीछे संभवतः विलुप्त भी हो गया हो । आगे निर्दिष्ट काश्यपसंहिता नाम से मिलने वाली एक अन्य संहिता में निम्न श्लोक दिया है—
ऋग्वेदस्योपवेदाङ्गं काश्यपं रचितं सुरा । लक्षग्रन्थं महातेजः अमेयं मम दीयताम् ।।
उपर्युक्त श्लोक द्वारा वर्णित ऋग्वेद के उपवेद रूप तथा लक्षग्रन्थात्मक यह काश्यपदर्शन भी संभवतः उसी विलुप्त काश्यप संहितारूप एक हजार सूक्तों की ओर लक्ष्य करता है । यह भी संभव हो सकता है कि खिलरूप में अवस्थित स्वदृष्ट सहस्र तथा इसी प्रकार के अन्य परदृष्ट सूक्तों की संहिता बनाकर कश्यपाचार्य ने शिष्योपक्रमणीय अध्याय में आयुर्वेद को पंचम वेद माना है उसी खिलरूप में अवस्थित आयुर्वेद विषय का ज्ञान कराने वाली कश्यप की महासंहिता को ही वृद्धजीवक ने संक्षिप्त करके तन्तरूप से उपस्थित किया प्रतीत होता है । अस्तु, कुछ भी हो इतना तो स्पष्ट है कि यह उप, लभ्यमान काश्यपसंहिता वेदरूपी मूल महावृक्ष का ही संक्षिप्त रूप है ।
इस प्रकार इस संहिता के कल्पाध्याय के लेख¹ से तथा ग्रन्थ के बीच-बीच में आये हुए पदविशेषों से स्पष्ट है कि इस संहिता का आचार्य कश्यप नाम वाला, आहिताग्नि (जिसने अग्नि का आधान किया हुआ है), वेद-वेदान्तों का पारदृष्टा प्रजापतिस्थानीय तथा गङ्गाद्वार निवासी मारीच कश्यप ही है । चरक संहिता के मूल आचार्य आत्रेय का जैसे पुनर्वसु विशेषण है वैसे ही इस संहिता के आचार्य कश्यप का भी मारीच विशेषण है ।
कौमारभृत्य विषयक इस संहिता के लेख से भी मारीच कश्यप तथा वृद्धकाश्यप दो भिन्न-भिन्न आचार्य प्रतीत होते हैं । जिससे मारीच कश्यप के उपदेशस्वरूप इस संहिता के वमनविरेचनीय प्रकरण में दूसरे आचार्यों के मतों में पहले वृद्धकाश्यप के मत का निर्देश करके अन्त में 'अथ कश्यपोऽब्रवीत्' द्वारा अपने (कश्यप के) मत को स्पष्टरूप में दिया होने से मारीच कश्यप ही इस संहिता का उपदेष्टा, तथा वृद्धकाश्यप इससे भिन्न अन्य आचार्य प्रतीत होते हैं । प्रत्येक अध्याय के प्रारम्भ में जो 'इति ह स्माह कश्यपः' दिया है वह भी इसी को सूचित करता है । इस कश्यप ऋषि को भी कहीं-कहीं जो वृद्ध लिखा है वह ज्ञानवृद्ध या वयोवृद्ध की दृष्टि से लिखा है । खिलभाग में एक स्थान पर 'वृद्धकाश्यपीयायां संहितायाम्' जो लिखा है वह सम्भवतः प्रक्षिप्त है । अथवा चरकसंहिता के पिछले भाग में जिस प्रकार कृष्णात्रेय आदि के मतों का उल्लेख है उसी प्रकार वृद्धजीवक के बनाये हुए खिलभाग में वृद्धकाश्यप नामक अन्य आचार्य का उल्लेख होने से संभवतः 'वृद्धकाश्यपीयायाम्' लिखा हो ।
महाभारत के तक्षक²दंशोपाख्यान में शापग्रस्त राजा परीक्षित को काटने के लिये जाते हुए तक्षक तथा राजा के प्रतीकार के लिये आने वाले महर्षि काश्यप के परस्पर मार्ग में मिलने से उनका संवाद मिलता है । यह मारीच शब्द से रहित काश्यप ऋषि विषहर विद्या में निपुण कश्यप-परम्परागत भिन्न ही व्यक्ति प्रतीत होता है ।
डल्लन ने सुश्रुत की ³व्याख्या में काश्यप नाम से तथा माधवनिदान की मधुकोश ⁴व्याख्या में वृद्धकाश्यप नाम से दो श्लोक दिये हुए है । वे श्लोक अगदतन्त्र विषयक होने से ये काश्यप तथा वृद्धकाश्यप भी भिन्न ही अगदतन्त्र के आचार्य प्रतीत होते हैं ।
पाणिनि द्वारा 'तृषिमृषिकृषेः काश्यपस्य' (१/२/२५) तथा 'नोदात्तस्वरितोदयमगार्य्यकाश्यपगालवानाम्' (८/४/६७) इन सूत्रों में प्राचीन वैयाकरणों की गिनती में दिया काश्यप भी अन्य ही प्रस्थानान्तरीय विद्वान् प्रतीत होता है । शिल्पाचार्य के रूप में कश्यप का निर्देश तैत्तिरीय ⁵संहिता में आया हुआ है ।
काश्यपसंहिता ⁶नाम की उमा महेश्वर संवाद रूप चिकित्सा विषयक एक अन्य भी छोटी सी पुस्तक तञ्जोर के पुस्तकालय में (नं. १०७८०) है, जिसके पूर्वार्ध भाग का प्रतिलेख श्री वैद्यवर यादव जी द्वारा मुझे भी प्राप्त हुआ है ।
१. १. टि. उपो. संस्कृत पृ. २५ देखें। २ से ६ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. २६ देखें ।