भारतकोश
संग्रह पर लौटें

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ
१९४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकियं तन्त्रम्

हुआ वह भाग कश्यप ने ऋग्वेद में खिलरूप से प्रविष्ट किया हो फिर कालक्रम से च्युत होकर पीछे संभवतः विलुप्त भी हो गया हो । आगे निर्दिष्ट काश्यपसंहिता नाम से मिलने वाली एक अन्य संहिता में निम्न श्लोक दिया है—

ऋग्वेदस्योपवेदाङ्गं काश्यपं रचितं सुरा । लक्षग्रन्थं महातेजः अमेयं मम दीयताम् ।।

उपर्युक्त श्लोक द्वारा वर्णित ऋग्वेद के उपवेद रूप तथा लक्षग्रन्थात्मक यह काश्यपदर्शन भी संभवतः उसी विलुप्त काश्यप संहितारूप एक हजार सूक्तों की ओर लक्ष्य करता है । यह भी संभव हो सकता है कि खिलरूप में अवस्थित स्वदृष्ट सहस्र तथा इसी प्रकार के अन्य परदृष्ट सूक्तों की संहिता बनाकर कश्यपाचार्य ने शिष्योपक्रमणीय अध्याय में आयुर्वेद को पंचम वेद माना है उसी खिलरूप में अवस्थित आयुर्वेद विषय का ज्ञान कराने वाली कश्यप की महासंहिता को ही वृद्धजीवक ने संक्षिप्त करके तन्तरूप से उपस्थित किया प्रतीत होता है । अस्तु, कुछ भी हो इतना तो स्पष्ट है कि यह उप, लभ्यमान काश्यपसंहिता वेदरूपी मूल महावृक्ष का ही संक्षिप्त रूप है ।

इस प्रकार इस संहिता के कल्पाध्याय के लेख¹ से तथा ग्रन्थ के बीच-बीच में आये हुए पदविशेषों से स्पष्ट है कि इस संहिता का आचार्य कश्यप नाम वाला, आहिताग्नि (जिसने अग्नि का आधान किया हुआ है), वेद-वेदान्तों का पारदृष्टा प्रजापतिस्थानीय तथा गङ्गाद्वार निवासी मारीच कश्यप ही है । चरक संहिता के मूल आचार्य आत्रेय का जैसे पुनर्वसु विशेषण है वैसे ही इस संहिता के आचार्य कश्यप का भी मारीच विशेषण है ।

कौमारभृत्य विषयक इस संहिता के लेख से भी मारीच कश्यप तथा वृद्धकाश्यप दो भिन्न-भिन्न आचार्य प्रतीत होते हैं । जिससे मारीच कश्यप के उपदेशस्वरूप इस संहिता के वमनविरेचनीय प्रकरण में दूसरे आचार्यों के मतों में पहले वृद्धकाश्यप के मत का निर्देश करके अन्त में 'अथ कश्यपोऽब्रवीत्' द्वारा अपने (कश्यप के) मत को स्पष्टरूप में दिया होने से मारीच कश्यप ही इस संहिता का उपदेष्टा, तथा वृद्धकाश्यप इससे भिन्न अन्य आचार्य प्रतीत होते हैं । प्रत्येक अध्याय के प्रारम्भ में जो 'इति ह स्माह कश्यपः' दिया है वह भी इसी को सूचित करता है । इस कश्यप ऋषि को भी कहीं-कहीं जो वृद्ध लिखा है वह ज्ञानवृद्ध या वयोवृद्ध की दृष्टि से लिखा है । खिलभाग में एक स्थान पर 'वृद्धकाश्यपीयायां संहितायाम्' जो लिखा है वह सम्भवतः प्रक्षिप्त है । अथवा चरकसंहिता के पिछले भाग में जिस प्रकार कृष्णात्रेय आदि के मतों का उल्लेख है उसी प्रकार वृद्धजीवक के बनाये हुए खिलभाग में वृद्धकाश्यप नामक अन्य आचार्य का उल्लेख होने से संभवतः 'वृद्धकाश्यपीयायाम्' लिखा हो ।

महाभारत के तक्षक²दंशोपाख्यान में शापग्रस्त राजा परीक्षित को काटने के लिये जाते हुए तक्षक तथा राजा के प्रतीकार के लिये आने वाले महर्षि काश्यप के परस्पर मार्ग में मिलने से उनका संवाद मिलता है । यह मारीच शब्द से रहित काश्यप ऋषि विषहर विद्या में निपुण कश्यप-परम्परागत भिन्न ही व्यक्ति प्रतीत होता है ।

डल्लन ने सुश्रुत की ³व्याख्या में काश्यप नाम से तथा माधवनिदान की मधुकोश ⁴व्याख्या में वृद्धकाश्यप नाम से दो श्लोक दिये हुए है । वे श्लोक अगदतन्त्र विषयक होने से ये काश्यप तथा वृद्धकाश्यप भी भिन्न ही अगदतन्त्र के आचार्य प्रतीत होते हैं ।

पाणिनि द्वारा 'तृषिमृषिकृषेः काश्यपस्य' (१/२/२५) तथा 'नोदात्तस्वरितोदयमगार्य्यकाश्यपगालवानाम्' (८/४/६७) इन सूत्रों में प्राचीन वैयाकरणों की गिनती में दिया काश्यप भी अन्य ही प्रस्थानान्तरीय विद्वान् प्रतीत होता है । शिल्पाचार्य के रूप में कश्यप का निर्देश तैत्तिरीय ⁵संहिता में आया हुआ है ।

काश्यपसंहिता ⁶नाम की उमा महेश्वर संवाद रूप चिकित्सा विषयक एक अन्य भी छोटी सी पुस्तक तञ्जोर के पुस्तकालय में (नं. १०७८०) है, जिसके पूर्वार्ध भाग का प्रतिलेख श्री वैद्यवर यादव जी द्वारा मुझे भी प्राप्त हुआ है ।


१. १. टि. उपो. संस्कृत पृ. २५ देखें। २ से ६ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. २६ देखें ।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १९५

इस पूर्वार्धभाग में नाना वातरोग, ज्वर, ग्रहणी, अतिसार, अर्श, इनके निदान, उनको दूर करने के लिये ओषधियां तथा निदानरूप पापों को दूर करने के लिये रुद्र, शिव, विष्णु आदि की आराधना संक्षेप से दिया हुआ है। इस पूर्वार्ध के अन्त में 'बालरोगस्य' द्वारा प्रारंभ करके निम्न श्लोक दिये हुए हैं—

सर्वाङ्गं मूर्ध्नि कक्षे द्वे श्रोणी द्वे पादबाहुकम् । पिटकं दर्दुरं कण्डूं तिमिरं कृमिसंकुलम् ।। पूयं रक्तं स्रवति च वेदनं शुष्कमङ्गजम् । विदाहं शोषमत्यन्तबालकं पिच्छिपिच्छिलाम् ।। एते गुणविकाराश्च पैत्तरूपं समुद्भवम् । तत्पैत्तनाडीनाशार्थं रास्नादिलेह्यकं तथा ।। ममासं मासत्रयं नित्यं बालपैत्तविनाशकम् । अश्वगन्धिघृतं सेवेद्विडङ्गादिघृतं तथा ।। वाकुचीघृतविख्यातं बालकं पिच्छिलं हरेत् ।

इन श्लोकों के बाद 'इति पार्वतीपरमेश्वरसंवादे काश्यपसंहितायां पूर्वार्द्धं समाप्तम्' द्वारा इसे समाप्त किया गया है। इस संहिता का लेख प्रौढ़ एवं सुसंस्कृत न होने से इसे प्राचीन नहीं कहा जा सकता। उसमें बालभैषज्य का भी मुख्यरूप से वर्णन नहीं है। केवल अन्त में इस विषय के उपरिनिर्दिष्ट श्लोक दिये हैं। वृद्धजीवकीयतन्त्र के साथ इसकी विषय रचना तथा भैषज्य की दृष्टि से बिलकुल भी समानता नहीं है। यह तान्त्रिक प्रक्रियाओं से युक्त भिन्न ही संहिता प्रतीत होती है। तथा इसका उपदेशक भी कश्यप नाम वाला कोई भिन्न ही प्रतीत होता है !

मद्रास प्रदेश में मुद्रित काश्यपसंहिता¹ नाम का अगदतन्त्र विषयक एक अन्य ग्रन्थ भी मिलता है। उसमें गारुडिविद्या (सर्पविद्या), विषनाशक औषधप्रयोग, मान्त्रिकप्रयोग, विषों की भिन्न-भिन्न जातियाँ और भेद तथा दंश आदि का वर्णन है। इस संहिता का लेख डल्लन तथा मधुकोश में उद्धृत अगदतन्त्र विषयक श्लोकों से लेशमात्र भी नहीं मिलता है। इसमें वे दोनों श्लोक भी नहीं दिये हैं। इस प्रकार अगदतन्त्र के ज्ञाता किसी अन्य अर्वाचीन काश्यप का अथवा प्राचीन अगदाचार्य काश्यप के सम्प्रदाय वाले किसी अन्य का ही यह लेख प्रतीत होता है। इस कौमारभृत्य विषयक संहिता में इसकी गन्ध तथा नाम भी नहीं है।

इस प्रकार कश्यप तथा काश्यप शब्दों के भिन्न-भिन्न दिखाई देने से इन उपरिनिर्दिष्ट काश्यपों के प्राचीन होने पर भी विषय के भेद से काश्यपसंहिता नाम से मिलने वाले उपरिनिर्दिष्ट दोनों ग्रन्थों के अर्वाचीन होने से तथा इन काश्यपों के साथ मारीच शब्द का विशेषण न लगा होने से इस कौमारभृत्य संहिता आचार्य मारीचकश्यप नाम वाला भिन्न ही आचार्य प्रतीत होता है। तथा उसकी यह नवोपलब्ध प्राचीन संहिता भी भिन्न ही प्रतीत होती है। कश्यप द्वारा उपदिष्ट होने पर भी तदीयत्व (उस विषयक) बोधक प्रत्यय से समानाधिकरण समास होकर पुंवद्भाव में 'कश्यप की संहिता' इस अर्थ को दृष्टि में रखते हुए इसका काश्यपसंहिता यह नाम उचित ही है।

अष्टाङ्ग हृदय में बालकों के रोगों के प्रतिषेध विषयक अध्याय में वृद्धकश्यप² तथा कश्यप³ नाम से दो औषध योग दिये हुए हैं। वृद्धकश्यप तथा कश्यप का पृथक्-पृथक् निर्देश होने से इस काश्यपसंहिता में वृद्धकश्यपोक्त विषय के न मिलने पर भी कश्यप नाम से दिया हुआ बालकों का ग्रहहर दशाङ्ग धूप धूपप्रकरण में कुछ पाठभेद से मिलता है। कश्यप नाम से दिया हुआ बालकों के यक्ष-राक्षस आदि की बाधाओं को नष्ट करने वाला अभयघृत वाग्भट⁴ में भी दिया है। वस्तुओं तथा रक्षोघ्नत्वादि की समानता से यह वही प्रतीत होता है।

खोटाङ्ग (मध्य एशिया) नामक स्थान के भूगर्भ से बावर मैनुस्क्रिप्ट (Bower manuscript) रूप से प्रसिद्ध नावनीतक नाम का एक प्राचीन वैद्यक⁵ ग्रन्थ अभी मिला है। इस पुस्तक की भोजपत्र पर लिखित प्राचीन लिपि को देखकर


१. टि. १ से ४ उपो. संस्कृत पृ. २७ देखें।
५. यह ग्रन्थ यूरोप तथा लाहौर से भी मुद्रित हुआ है।

१९६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

विद्वानों ने इसे तीसरी चौथी शताब्दी में लिखा हुआ निश्चित किया है¹। ग्रन्थ रचना तो इससे भी प्राचीन होनी चाहिये। इसमें आत्रेय, क्षार पाणि, जातूकर्ण, पराशर, भेड, हारीत, सुश्रुत, काश्यप तथा जीवक आदि के नाम भी दिये हुये हैं। इन प्राचीन आचार्यों की संहिताओं के योगों का इसमें संग्रह होने से परन्तु अष्टाङ्गहृदयोक्त एक भी योग के न होने से यह निबन्ध कश्यप, काश्यप, आत्रेय, सुश्रुत, तथा भेड आदि से पश्चात् तथा वाग्भट से पूर्व का प्रतीत होता है। इसके कौमारभृत्य विषयक १४ वें अध्याय में काश्यप तथा जीवक नाम से कुछ औषध योग दिये हैं। यहां कौमारभृत्य के प्रकरण में जीवक के साथ आया हुआ काश्यप संभवतः इस काश्यप संहिता का आचार्य ही है। स्वार्थ में अण् करके अथवा उस गोत्र के अर्थ में कश्यप का काश्यप शब्द द्वारा भी व्यवहार संभव होने के कश्यप के स्थान पर काश्यप दिया हुआ प्रतीत होता है। वहीं पर निम्न श्लोक दिये हैं जिनमें कश्यप के नाम से गुटिका ओषधियों के रूप में विशेष योग दिया है—

आसवेन सुजातेन बालानां दापयेद्भिषक् । सुखं भवति तेनास्य काश्यपस्य वचो यथा ॥१०॥ तेन कोष्ठगतो वायुः क्षिप्रमेव प्रमुच्यते । शिरोरोगेषु शमनं वमनं चैव शाम्यति ॥११॥ कृमिर्गुदगतो यस्य गुटिकायाः प्रलेपयेत् । तेनास्य सौख्यं भवति काश्यपस्य वचो यथा ॥१२॥ शर्कराक्षौद्रसंयुक्तां पाययीत चिकित्सकः । सुखी भवति तां पीत्वा काश्यपस्य वचो यथा ॥१३॥

नवनीतक में इससे पूर्व के श्लोकों के लुप्त होने से इस गुटिकौषध का क्या स्वरूप है यह नहीं कहा जा सकता। काश्यपसंहिता में स्थान-स्थान पर गुटिकौषधियों की रचना तथा उपयोग दिये हैं, उन्हीं में से किसी एक को लेकर अपने अनुभूत अनुपान विशेष के साथ यहां दिया गया प्रतीत होता है।

प्राचीन रावणकृत बालतन्त्र में काश्यप तथा वृद्धकाश्यप के नाम दिये हैं। इस कौमारतन्त्र में वृद्धकाश्यप के साथ आचार्यरूप में आया हुआ काश्यप भी यही कौमारभृत्याचार्य कश्यप प्रतीत होता है।

ज्वरसमुच्चय नाम का एक प्राचीन ग्रन्थ हैं जिसमें ज्वर के विषय में प्राचीन ऋषियों के वचनों का संग्रह किया गया है। जिसकी एक ताडपुस्तक, लिपि के अनुसार सात-आठ सौ वर्ष पूर्व की तथा दूसरी ४४ नेपाली संवत्सर (ई. प. ९२४) में लिखी हुई मेरे पास है। जब ग्रन्थ का लेख (लिपि) समय ही इतना प्राचीन है तब ग्रन्थ का रचना समय तो इससे भी प्राचीन होना चाहिये। इस ग्रन्थ में कश्यप नाम से बहुत से श्लोक दिये हुए हैं। इन श्लोकों की काश्यपसंहिता में आये हुए श्लोकों से संगति है, इसका पीछे निर्देश किया जायगा। इससे यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि ज्वरसमुच्चय में आया हुआ काश्यप इस संहिता का आचार्य कश्यप ही है। तथा उसमें दिये हुए श्लोक भी इस संहिता से ही लिये गये हैं।

इसी प्रकार सुश्रुत की व्याख्या के निबन्धसंग्रह² अष्टाङ्ग हृदय³ की टीका तथा चरक की चक्रपाणि टीका में कश्यप


१. इस ग्रन्थ की उपलब्धि के विषय में भारतीय इतिहास की रूपरेखा पृ. ९८३ (जयचन्द्र विद्यालंकार) पर लिखा है— सन् १८९० में ब्रिटिश भारतीय सेना के लैफ्टिनेंट बावर नामक एक अफसर को एक दूसरे अंग्रेज के घातक की खोज में घूमते फिरते चीनी तुर्किस्तान के उत्तरपूर्वी छोर की कुचार (कूचा) नामक बस्ती से एक स्तूप के खण्डहरों में से निकाली गई भोजपत्रों पर लिखी एक पोथी मिली। वह अब बावर-पोथी कहलाती है। वह कलकत्ते में डॉ. हार्नली के पास भेजी गई और गुप्त युग ब्राह्मी में लिखी संस्कृत की पोथी निकली। वह वैद्यक का ग्रन्थ है जिसके पहले अंश में लहसुन के गुण बखाने गये हैं। बाबर पोथी अब आक्सफोर्ड में है। उसके पूरे फोटो लिप्यन्तर और अनुवार हार्नली ने आ. स. इ. जि. २२ में प्रकाशित किये हैं—अनुवादक। २. २ से ३ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. २८ देखें।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १९७

नाम से अन्य भी दो तीन श्लोक दिये हुए हैं। परन्तु इस संहिता के बहुत से भागों के खण्डित होने से संभवतः वे श्लोक इस खण्डित भाग में हों ।

पीयूषधारा के गर्भाधानप्रकरण¹ में उक्तं च कश्यपसंहितायां, वर्षद्वादशकादूर्ध्वम्' इत्यादि द्वारा प्रारंभ करके निम्न श्लोक दिया है—

अन्तः पुष्पं भवत्येव पनसोदुम्बरादिवत् । अतस्तु तत्र कुर्वीत तत्सङ्गं बुद्धिमान्नरः ।।

(अर्थात् कटहल तथा गूलर की तरह बारह वर्ष के बाद स्त्री अन्तःपुष्पा होती है, इसलिये उसके साथ बुद्धिमान् पुरुष सङ्ग कर सकता है) ।

उपर्युक्त श्लोक के ज्योतिष के ग्रन्थ में होने से कश्यपसंहिता नाम का अन्य ज्योतिष का ग्रन्थ भी हो सकता है। काश्यपसंहिता के जातिसूत्रीयाध्याय में आये हुए गर्भाधान से संबन्धित विषय के अंशरूप में त्रुटित होने से तथा इस संहिता में आर्ष रचना द्वारा गर्भाधान के विषय का प्रतिपादन किया होने से यह श्लोक संभवतः उस त्रुटित भाग में आया हुआ भी हो सकता है। उस अवस्था में पीयूषधारा में वर्णित कश्यपसंहिता भी संभवतः यही हो ।

जीवक-संबन्धी विचार—पूर्वोद्दिष्ट काश्यपसंहिता के कल्पाध्याय के अनुसार ज्ञात होता है कि कश्यप द्वारा उपदिष्ट महातन्त्र रूपी इस संहिता को कनखल निवासी तथा ऋचीकपुत्र वृद्धजीवक नामवाले किसी महर्षि ने उसे ग्रहण किया तथा संक्षिप्त करके उसे तन्त्ररूप में प्रकाशित किया।

महाभारत के प्रारम्भ में जामदग्नोपाख्यान में ऋचीक नाम के महर्षि का उल्लेख मिलता है। असीरियन् देश के पूर्ववृत्त में भी गालव आदि के नाम की तरह ऋचीक का नाम भी मिलता है। साधक प्रमाणों के अभाव में इस वृद्धजीवक का पिता कौनसा ऋचीक है, यह नहीं कहा जा सकता। पुराण, इतिहास आदि में तथा आत्रेय सुश्रुत आदि प्राचीन वैद्यक ग्रन्थों में भी वृद्धजीवक या जीवक का नाम कहीं भी दिखाई नहीं देता है। परन्तु नावनीतक के कौमारभृत्य प्रकरण में कश्यप के समान ही नाम² ग्रहण पूर्वक छर्दि एवं उरोघात रोग में जीवक की ओषधि का भी उल्लेख होने से तथा बालभैषज्य के विषय एवं काश्यप के साहचर्य से यही वृद्धजीवक प्रतीत होता है। इस वृद्ध जीवक तन्त्र में छर्दि रोग के प्रकरण के खण्डित होने से वह ओषधि यहाँ नहीं मिलती है। उरोघात रोग में ओषधियों का निर्देश करने वाले श्लोक बीच-बीच में खण्डित हैं परन्तु अवशिष्ट भाग में पिप्पली के साथ मिलाकर किसी ओषधि का प्रयोग दिखाई देने से कुछ समानता प्रतीत होती है। सुश्रुत के उत्तर तन्त्र में 'ये च विस्तरतो दृष्टाः कुमाराबाधहेतवः' द्वारा सामान्यरूप से निर्देश करके उसकी व्याख्या करते हुए डल्लन ने 'पार्वतकजीवबन्ध्यकप्रभृतिभिः' द्वारा जिस जीवक का संकेत किया है, कौमारभृत्याचार्यों की श्रेणी में दिया होने से संभवतः वह यही वृद्धजीवक है। चक्रदत्त ने भी जीवक के नाम से सौरेश्वर घृत दिया हुआ है। अन्य टीकाग्रन्थों में भी कुमारों के लिये उपयोगी कास-श्वासनाशक ओषधियाँ जीवक के नाम से उद्धृत मिलती है।

यह वृद्धजीवक कौन है ? इसका अनुसन्धान करने पर हमें भगवान् बुद्ध के समय के महावग्ग नामक पालीग्रन्थ बौद्धजातक तथा तिब्बतीय गाथाओं में 'कुमारभच्च' विशेषण युक्त जीवक नामक किसी प्रसिद्ध वैद्य का वृत्तान्त मिलता है। इसमें कुमारभच्च विशेषण तथा जीवक नामक प्रसिद्ध वैद्य के मिलने से इसके परिचय के लिये महावग्ग नामक बौद्ध पालीग्रन्थ के आठवें अध्याय में निम्न कथानक मिलता है—


१. १ से २ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. २८-२९ देखें ।

१९८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

राजगृह (वर्तमान राजगीर-पटना जिला) में शालावती नाम की किसी वेश्या द्वारा सद्यः प्रसूत बालक को दासी ने शूर्प (छाज) में रखकर बाहर फेंक दिया। राजकुमार अभय उसे देखकर महल में ले आया तथा दासी द्वारा इसका पालन-पोषण किया। 'उत्सृष्टोऽपि जीवति' (छोड़ा हुआ या फेंक दिया जाने पर भी जीवित हैं) इस व्युत्पत्ति के अनुसार इसका नाम जीवक हुआ तथा राजकुमार द्वारा पालन-पोषण किया जाने के कारण पाली भाषा के अनुसार इसका नाम कु (को) मारभच्च (कौमारभृत्य, कुमारभृत) भी हो गया। उसके बाद कालक्रम से वृद्धि को प्राप्त होकर जीविका की दृष्टि से विद्याध्ययन के लिये राजकुमार को बिना कहे ही उसने तक्षशिला जाकर वहां के किसी प्रसिद्ध वैद्य से सात वर्ष तक वैद्यक विद्या का अभ्यास किया। विद्या समाप्ति के बाद आचार्य ने पाथेय बांधकर उसे विदा किया और वह वहां से लौट गया। मार्ग में साकेत (अयोध्या) पहुंचकर सात वर्षों से शिरोवेदना से पीडित किसी सेठानी के घर पहुंचकर उस तरुण वैद्य ने घृत नस्य आदि ओषधियों से उसको स्वस्थ कर दिया तथा सत्कार में मिले हुए धन, दास तथा रथ आदि लेकर राजगृह पहुंचा। उस अर्जित धन को पोषण के प्रत्युपकार रूप में उसने राजकुमार अभय को देना चाहा परन्तु उसने अस्वीकृत करके उसका सम्मान किया तथा राजप्रासाद के अन्दर ही उसका निवास स्थान बनवा दिया। इसके बाद मगध के राजा बिम्बिसार का तीव्र भगन्दर रोग उसने एक ही लेप में अच्छा कर दिया। इससे प्रसन्न होकर राजा ने उसका ५०० स्त्रियों के आभूषणों से सत्कार करके उस तरुण जीवक को अपने अन्तःपुर में रहने वाले प्रमुख बौद्ध भिक्षुओं की भी चिकित्सा की अनुमति प्रदान की। फिर सात वर्षों से शिरोवेदना से पीड़ित एक सेठ को किसी ओषधि से संज्ञाहीन करके कपाल का भेदन करके उसमें से दो कृमियों को निकाल कर पुनः कपाल को सीकर कुछ दिनों में उसे स्वस्थ करके उससे सत्कार रूप में बहुत सा धन प्राप्त किया। उसके बाद राजाज्ञा से बनारस जाकर आन्त्रग्रन्थि (T. B. of Intestinal Glands) रोग से पीड़ित किसी सेठ के लड़के के पेट का भेदन करके उसको स्वस्थ किया। उस सेठ ने भी उसका धन द्वारा बहुत सत्कार किया। उसके बाद राजा की आज्ञा से उज्जायिनी के राजा प्रद्योत के पाण्डुरोग को घृत प्रयोग द्वारा शान्त करने के लिये पहुंचा। घृत को न पीने की इच्छा वाले राजा को जब उसने कषायरूप से घृत का पान करा दिया तो उसे वमन हो गया। तब राजा के डर से पहले से ही तैयार की हुई हथिनी पर सवार होकर भागकर राजगृह लौट गया। औषध प्रयोग द्वारा वमन होने से स्वस्थ हुए राजा ने जीवक के लिये शिवि देश (शोरकोट-मध्य पंजाब) में होनेवाले मृगचर्म आदि की भेंट भेजी। फिर आनन्द तथागत की सूचना से रुग्ण हुए भगवान् बुद्ध को जीवक ने विरेचन के प्रयोग से स्वस्थ किया। प्रद्योत और बनारस के राजा द्वारा दिये हुए मृगचर्म, कम्बल आदि जीवक ने भिक्षुओं के लिये भगवान् तथागत को अर्पित कर दिया।

तिब्ब¹तीय गाथाओं के अनुसार बिम्बसार द्वारा भुजिष्या में उत्पन्न हुए पुत्र को माता ने एक टोकरी में रखकर फेंक दिया। उस बालक का राजकुमार अभय ने पालन-पोषण किया इसलिये उसका नाम कुमारभृत (भृत्य) हो गया। वह भैषज्य विद्या का अभ्यास करके राजकुमार की आज्ञा से कपालभेदन आदि शल्यतन्त्र (Surgery) का विशेष ज्ञान प्राप्त करने के लिये तक्षशिला पहुंचा। वहां शल्यतन्त्र के परम विद्वान् आत्रेय से शिक्षा ग्रहण करके शल्यतन्त्र में अत्यन्त निपुण हो गया, तथा अपने गुरु आत्रेय से भी बढ़ गया। ई. प. ४५० में लिखित बुद्धघोषकृत धम्म²पदव्याख्या में जीवक द्वारा ५०० भिक्षुओं सहित भगवान् बुद्ध के भोजन तथा बुद्ध के पादव्रण की चिकित्सा का निर्देश है। इसके अतिरिक्त सतीगुम्बजातक, संकिच्चजातक तथा चुल्ल³हंसजातक आदि में भी जीवक का निर्देश है।

उसने कभी अम्बपाली नामक उद्यान में एक विहार बनवाकर साढ़े बारह सौ (१२५०) भिक्षुओं के सहित बुद्ध को निमन्त्रित करके उसका सत्कार किया। राजगृह के श्रीगुप्त परिखा (मोहल्लाबस्ती) में उसने किसी स्तूप का भी निर्माण


१. १ से ३ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ३० देखें।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १९९

किया था। इस जीवक के बिम्बसार के पुत्र अजातशत्रु को बुद्ध के दर्शनों के लिये प्रेरित किया था। इत्यादि अन्य भी इस सम्बन्ध की बहुत सी आख्यायिकायें जातक आदि बौद्ध ग्रन्थों में मिलती हैं। इस विषय में बुद्ध$^१$ नामक पुस्तक में श्री Oldenberg नामक विद्वान् तथा श्री $^२$गिरीन्द्रनाथ महोदय ने बहुत कुछ लिखा है। जीवक ने अपने घर के समीप श्रीगुप्त परिखा में एक उद्यान तथा बुद्ध का व्याख्यानचत्वर (व्याख्यान के लिये वेदी-आंगन) बनवाया हुआ था। गृहचत्वर, वृक्ष आदियों के अवशेष के चिह्न वहां आजतक भी विद्यमान हैं ऐसा विल$^३$ महाशय का कहना है।

उपर्युक्त वर्णन के अनुसार प्रसिद्ध जीवक नामक वैद्य बुद्ध तथा बिम्बसार के समकालीन आज से २५०० वर्ष पूर्व (ई. पू. ६००) हुआ प्रतीत होता है।

बौद्धग्रन्थोक्त जीवक का मगध देश के रहने वाले, बिम्बसार द्वारा भुजिष्यां नामक वेश्या में उत्पन्न हुए तथा तरुण वैद्य के रूप में निर्देश किया गया है। उसने बाल्यावस्था के बाद तक्षशिला जाकर वहां के किसी आचार्य से सात वर्ष तक वैद्यविद्या का अध्ययन किया। उसके बाद महावग्ग के अनुसार बौद्धभिक्षुओं के सत्कर्ता वैद्य, तिब्बतीय कथा के अनुसार स्तूपनिर्माता और बाद में तथागत के सम्प्रदाय में प्रविष्ट हुए, तथा मज्झम निकाय के अनुसार बुद्ध के शरणागत तथा उपासक होने की प्रतीति होती है। परन्तु काश्यप संहिता के अनुसार इस ग्रन्थ का आचार्य जीवक कनखलवासी, ऋचीक पुत्र, पांच वर्ष की अवस्था में भी वलि-पलित (झुर्रियों तथा सफेद बालों) के कारण वृद्ध प्रतीत होने वाला, वेदवेदाङ्ग के ज्ञाता तथा आहिताग्नि कश्यप का शिष्य, महर्षियों द्वारा सस्कृत, अपने वंशोद्भव, शिवकश्यप के भक्त तथा वेदवेदाङ्ग के पण्डित प्रतिसंस्कर्ता, वात्स्य का पूर्वपुरुष तथा श्रुति एवं स्मृति के अनुकूल मार्ग का अनुयायी प्रतीत होता है।

बुद्ध सामयिक जीवक के भैषज्यसम्बन्धी वृत्तान्त में राजगृह के सेठ के कपाल तथा वाराणसी के सेठ की आंतों के भेदन का उल्लेख मिलने से वह शल्यतन्त्र का विशेषज्ञ प्रतीत होता है न कि बालरोगों का। शल्यतन्त्र के विद्वान् के रूप में उल्लेख होने मात्र से ही उसकी बालचिकित्सा या अन्य चिकित्साओं में अनभिज्ञता थी, ऐसा मेरा अभिप्राय नहीं है। परन्तु जिस प्रकार शल्यतन्त्राचार्य सुश्रुत का अन्य विषयों के ज्ञान के निर्देश होने पर भी उसकी शल्यतन्त्र के विषय में ही प्रसिद्धि है उसी प्रकार यदि यह भी बालकों के रोगों का विशेषज्ञ था तो तद्विषयक वृत्तान्त अवश्य मिलना चाहिये परन्तु ऐसा नहीं मिलता है। परन्तु इस ग्रन्थ के आचार्य जीवक को तो प्रारम्भ से ही बालरोगों का मुख्यरूप से अनुभव होने से यह स्पष्ट रूप से बालतन्त्र का आचार्य प्रतीत होता है।

बुद्ध के समय काश्यप तथा जीवक की ऐतिहासिक समकालीनता मिलने के कारण इस ग्रन्थ में साथ-साथ आये हुए कश्यप तथा जीवक दोनों बुद्ध के समकालीन तथा बौद्ध ग्रन्थों में आये हुए हैं, ऐसी कल्पना भी उचित नहीं है क्योंकि काश्यप तीनों भाइयों में ज्येष्ठ था तथा वह दार्शनिक और याज्ञिक था। महावग्ग में उसके विषय में मिलता है कि उरुबिल्व ग्राम में बुद्ध ने उसे बौद्धधर्म में दीक्षित किया था फिर उसे देखकर बिम्बसार ने भी बौद्धमत को स्वीकार कर लिया। उसके दार्शनिक होने का उल्लेख मिलता है इस प्रकार उसका न तो वैद्य के रूप में न कौमारभृत्याचार्य के रूप में तथा न मरीचि के पुत्र रूप में ही उल्लेख मिलता है। बौद्ध ग्रन्थोक्त जीवक का तिब्बतीय कथाओं के अनुसार भी तक्षशिला स्थित आत्रेय से अध्ययन का उल्लेख मिलता है न कि मगधदेशीय काश्यप से। इस प्रकार बौद्धकाश्यप एवं कश्यप में बहुत सी असमानतायें होने से तथा केवल नाम मात्र की समानता से ही जीवक के विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता।

इसके अतिरिक्त बौद्धकालीन जीवक का कुमार द्वारा पालन किया जाने के कारण पालीभाषा के अनुसार कुमारभच्च तथा इस ग्रन्थ के आचार्य का कुमार (बाल) रोगों के आचार्य होने के कारण कौमारभृत्य होने से भी दोनों एक नहीं हो


१. १ से ३ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ३० देखें।

१४ का.सं.

२०० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

सकते क्योंकि आयुर्वेद के प्राचीन आठ विभागों में से एक विभाग बालचिकित्सा संबन्धी कौमारभृत्य है उसके ज्ञाता तथा उपदेशक कौमारभृत्य कहलाते हैं। इस प्रकृतग्रन्थ का ‘कौमारभृत्यमष्टानां तन्त्राणामाद्यमुच्यते’ ‘कौमारभृत्यमतिवर्धनमेतदुक्तम्’ इत्यादि ग्रन्थ लेख तथा ‘काश्यपीयसंहितायां कौमारभृत्ये’ इस पुष्पिका लेख से कौमारभृत्य विषयक तथा ‘कौमारभृत्यास्त्वपरे जङ्गमस्थावराश्रयात्। द्वियोनिं ब्रुवते धूपं कश्यपस्य मते स्थिताः’ तथा भिषक्कौमारभृत्यस्तैः इत्यादि वाक्यों द्वारा इस ग्रन्थ के आचार्य कश्यप तथा अन्य वैद्यों का कौमारभृत्यत्व प्रकट होता है। इसके विपरीत बुद्धकालीन जीवक के लिये तो बौद्धग्रन्थों में कुमार अभय द्वारा पालन किया जाने के कारण विद्याध्यन से पूर्व ही कुमारभृत्य शब्द से निर्देश किया गया है, कुमारभृत्य के ज्ञाता के रूप में उसका निर्देश नहीं है। यदि ऐसा होता तो बालचिकित्सा तथा उसके ज्ञाता दोनों का निर्देश क्यों नहीं है। इसके अतिरिक्त यह भी नहीं कहा जा सकता कि कुमार द्वारा पालित जीवक की विशेष विद्या के कारण ही इस प्रस्थान (विभाग) का नाम कौमारभृत्य है क्योंकि प्राचीनकाल से ही इस प्रस्थान का यह नाम सुश्रुत, नावनीतक आदि में मिलता है। तथा न केवल जीवक अपितु किसी भी कुमार द्वारा न पाले गये, पार्वतक बन्धक आदि का भी कौमारभृत्याचार्य के रूप में उल्लेख मिलता है। इस तन्त्र के आचार्य के बौद्धत्व का भी कहीं निर्देश नहीं है। बौद्धविद्वान् की वाणी अथवा लेखनी द्वारा अन्तःकरण से निकली बौद्ध छाया भी इस ग्रन्थ में कहीं भी नहीं मिलती है। इससे प्रतीत होता है कि बौद्धग्रन्थोक्त जीवक तथा इस तन्त्र के आचार्य वृद्धजीवक में बहुत ही भेद हैं।

जैन ग्रन्थों में आये हुए उत्सर्पिणी तथा अवसर्पिणी पद यहां मिलते हैं तथा जैन इतिहास के पर्यालोचन में जीवक नाम के एक प्रसिद्ध पुरुष का उल्लेख मिलता है जिसके श्रुतन्धर राजकुमार, जीवन्धर तथा जीवस्वामी नाम भी हैं। जिसका महापुराण, जीवन्धरचरित्र तथा गद्यचिन्तामणि आदि जैनग्रन्थों में भी वर्णन मिलता है। उस राजकुमार ने अपने पिता की नगरी से निकलकर अपने बाहुबल से शत्रुओं का संहार करके राजपद को प्राप्त किया तथा जैनधर्म स्वीकार किया। अपने द्वारा उपकृत एक गन्धर्व से प्राप्त विषहरण मन्त्र के प्रभाव से इसमें स्पर्शमात्र से विषापहरण शक्ति का निर्देश मिलता है। इस प्रकार इसका न तो वैद्य विद्या के आचार्यत्व का और न कौमारभृत्य के ज्ञाता होने का ही निर्देश मिलता है।

इस वृद्धजीवकीय तन्त्र में वैदिक¹ धर्म से अनुप्राणित अनेक विषय तथा लेख मिलते हैं। इस प्रकार इस ग्रन्थ का आचार्य बौद्ध तथा जैनग्रन्थों में आये हुए जीवक से भिन्न अन्य ही कोई प्राचीन ऋचीक का पुत्र वृद्धजीवक है। ऐसा इस ग्रन्थ से ज्ञात होता है।

वात्स्य निरूपण—इस संहिता के कल्पाध्याय के लेख से यह ज्ञात होता है कि वृद्धजीवकीय तन्त्ररूप में आई हुई तथा काल प्रवाह से लुप्त हुई इस काश्यपसंहिता को अनायास नाम के पक्ष से प्राप्त करके जीवक के वंशवाले, वेदवेदाङ्ग के पण्डित तथा शिवकश्यप के भक्त वात्स्य नामक किसी विद्वान् ने पुनः संस्कृत करके प्रकाशित किया। इस वर्णन से यह जिज्ञासा होती है कि यह वात्स्य कौन है तथा किस समय हुआ है ? इसके विषय में निम्न उल्लेखनीय है।

वत्स गोत्र में उत्पन्न हुए अर्थ के अनुसार वात्स्य यह केवल कुल का नाम है। जीवक का भार्गव के रूप में उल्लेख होने से तथा वत्स के भृगु कुल में उत्पन्न होने का निर्देश होने से जीवकवंश में होने वाले इस प्रतिसंस्कर्ता का वात्स्य होना उचित है। वंश ब्राह्मण आदि में भी ‘वात्स्याद्वात्स्यः’ इस प्रकार वात्स्य का उल्लेख मिलता है। वंशब्राह्मण में वंश नाम से उल्लिखित यही है या कोई दूसरा यह नहीं कहा जा सकता। इस प्रतिसंस्कर्ता वात्स्य का क्या नाम है तथा


१. १ की टि. उपो. संस्कृत पृ. ३१ देखें।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २०१

जीवक की कौन सी सन्तति (पीढ़ी) में यह हुआ है, इस विषय में विशेष कुछ नहीं मिलता है। अनायास नामक यक्ष को प्रसन्न करके उससे इस तन्त्र की प्राप्ति का वर्णन करने से यह प्रतिसंस्कर्ता यक्षजाति की विद्या समृद्धि के समय अपना सत्त्व (होना) प्रकट करता है। यक्ष जातियां प्राचीनकाल से प्रसिद्ध थीं। यक्षों के साथ भारतीयों का परिचय तथा सम्पर्क भी प्राचीन ही है। यक्षों के सम्प्रदाय को बौद्धधर्म से प्राचीन बतलाते हुए श्रीयुत कुमार¹ स्वामी ने यक्षों के विषय में बहुत विवेचन किया है। यह सम्प्रदाय पीछे से बौद्ध तथा जैन सम्प्रदाय के अन्दर मिल गया। प्राचीन बौद्ध तथा जैन ग्रन्थों में भी यक्षों का निर्देश मिलता है। बुद्ध के समय भी भारत में यक्षों की पूजा प्रचलित थी। भारत में इधर-उधर यक्षों की प्राचीन मूर्तियां भी मिलती हैं। न केवल भारत में अपितु रमठ, जागुड, बाह्लीक आदि सीमाप्रान्त के प्रदेशों में भी प्राचीन समय से यक्षों की पूजा का निर्देश मिलता है। किसी की भी अपने जीवन काल में देवता की तरह पूजा नहीं की जाती। बल, वीर्य, विद्या आदि द्वारा समृद्ध जाति का कुछ समय बाद ही देवताओं की तरह पूजा एवं सम्मान सम्भव है। वात्स्य ने जिस यक्ष से इस विलुप्त तन्त्र को प्राप्त किया था उस अनायास नामक यक्ष के विषय में विचार करने पर एक स्थान पर उसका नाम मिलता है। आजकल पञ्चरक्षा नामक एक बौद्ध ग्रन्थ मिलता है उसके चीनी भाषा में भी बहुत से अनुवाद हुए हैं। जिनमें से एक अनुवाद ई. प. ३१७ से ३२२ में मध्यएशिया निवासी कुचभिक्षु पोश्रीमित्र ने किया है ऐसा निर्देश मिलता है। इस भारतीय ग्रन्थ का इतने दूर तथा उस समय में हुआ अनुवाद उसके रचनाकाल को और भी प्राचीन सिद्ध करता है। उस ग्रन्थ में भी लगभग २०० यक्षों का निर्देश है। तथा भिन्न-भिन्न देशों के रक्षकों के रूप में वैश्रवण (कुबेर) आदि यक्षाधिपों की आराधन विधि, उनके आराधन से वातिक, पैत्तिक तथा श्लैष्मिक रोगों की निवृत्ति, वैद्य, गर्भ के बालकों के रोग तथा बालग्रहों की पूजा आदि का उल्लेख है। उसी ग्रन्थ में महामायूरी विद्या के प्रकरण में रमठ देश के रक्षक के रूप में रावण का निर्देश है। मन्त्र विद्या द्वारा रोगनिवृत्ति के रूप में रावण का अन्यत्र भी उल्लेख मिलता है। मान्त्रिक प्रक्रिया द्वारा बालकों की चिकित्सा विषयक प्राचीन रावणतन्त्र भी मिलता है। पञ्चरक्षा के महामायूरी विद्या के प्रकरण में अमुक-अमुक देश के पूज्य यक्षों का निर्देश करते हुए ‘कौशाम्ब्यां चाप्यनायासो भद्रिकायां च भद्रिकः’ इत्यादि वाक्य द्वारा कौशाम्बी (कोसम-इलाहाबाद के पास) के रक्षक रूप से अनायास नामक यक्ष का निर्देश मिलता है। कौशाम्बी बुद्ध के समय भी प्रसिद्ध थी। इस प्रकार उस लेख के द्वारा उस समय भी पूज्य श्रेणी में निर्दिष्ट अनायास यक्ष को बहुत प्राचीन होना चाहिये। बुद्ध के समय भी पूज्य मानी गई यक्ष जाति के पूर्व समय में विद्यमान अनायास से वात्स्य द्वारा इस तन्त्र की प्राप्ति का वर्णन मिलने से वात्स्य भी बुद्ध से पूर्व प्रतीत होता है। एक प्राचीन पुस्तक में महामायूरी विद्य के उपसंहार में ‘आर्यमहामायूरी विद्या विनष्टा यक्षमुखात् प्रतिलब्धा’ इस उल्लेख से यक्षों द्वारा भी विद्या का सम्प्रदाय (परम्परा) मिलता है। इससे अनायास नामक यक्ष से भी इस तन्त्र की प्राप्ति संगत ही है। इसके अतिरिक्त आत्रेय गार्ग्य, शौनक आदि के समान आर्ष नाम से भी यह वात्स्य प्राचीन ही प्रतीत होता हैं। वेद-वेदाङ्ग के पण्डित तथा शिवकश्यप के भक्त रूप से निर्देश मिलने से यह वात्स्य वेदमार्गानुयायी भी प्रतीत होता है।

यहां यह एक विचारणीय प्रश्न है कि इस वृद्धजीवक तन्त्र के शारीरिक स्थान में काल का निरूपण करते हुए आदियुग, देवयुग तथा कृतयुग द्वारा तीन में विभक्त किया हुआ उन्नतावस्था रूप शुभ काल को उत्सर्पिणी शब्द से, त्रेता, द्वापर तथा कलि द्वारा तीन में विभक्त किये हुए अवनत्यवस्था रूप अशुभ काल को अवसर्पिणी शब्द से उत्तरोत्तर क्षीण होते हुए शारीर समूहों को नारायण आदि शब्दों से तथा आयु के मान को पलितोपम शब्द द्वारा व्यवहृत किया गया है। इस ग्रन्थ के इस अंश में निर्दिष्ट युगभेद से न कभी सुना गया, न कभी देखा गया तथा अद्भुत शरीरविन्यास की विचित्र गर्भावस्था, विकासवाद तथा अवनतिवाद में से किस सिद्धान्त के आधार पर है यह विचारणीय है। इस प्रक्रिया से पूर्णरूप


१. उसके यक्ष संबन्धी लेख से तुलना कीजिये।

२०२काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

से न मिलने पर भी चरक विमा¹न स्थान तृतीयाध्याय में कृतयुग का आदि कालरूप अवान्तर विभाग करके शारीरसंहनन तथा आयु के मान आदियों की भी यथोत्तर अवनति का निर्देश मिलता है । उसकी व्याख्या² में चक्रपाणि ने यथापूर्व उत्कर्षवाद तथा यथोत्तर अपकर्षवाद सूचक व्यास के वचनों को उद्धृत किया है । इस प्रकार उत्कर्ष तथा अपकर्ष के तारतम्य का निर्देश श्रुति तथा स्मृति के अनुयायी सम्प्रदायों में भी अंशरूप में मिलता है । श्रीजाकोबी³ ने भी ‘इनसाइक्लोपीडिया आफ रिलीजन एण्ड इथिक्स भाग १ के पृष्ठ २०२ पर इस प्रक्रिया को पुराणसंमत बताया है ।

महापुराण, कर्मप्रकृति तथा जीवसमासवृत्ति आदि जैनग्रन्थों में उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी कालविभाग, वज्र आदि शारीरसंहनन के भेद तथा पल्योपम आदि आयु के मानों के मिलने पर भी उसमें वज्र, ऋषभ, नाराज आदि ६ प्रकार के शारीर संहनन तथा आयु के मान का पल्योपम तथा सागरोपम शब्दों द्वारा निर्देश मिलने से तथा इस वृद्धजीवकीय तन्त्र में नारायण, अर्धनारायण, कौशिक तथा प्रज्ञप्तिपिशितरूप चार प्रकार के शारीर संहनन तथा आयु के मान का भी पलितोपम शब्द द्वारा निर्देश होने से विषय की थोड़ी बहुत छाया के मिलने पर भी पूर्वरूप से समानता नहीं है ।

बाह्य (वेदों से बाह्य-वेदविरुद्ध) सम्प्रदायों के समान श्रौतसम्प्रदाय के भी बहुत से प्राचीन ग्रन्थ विलुप्त हो गये हैं । पूर्व सम्प्रदायों के प्रसिद्ध शब्दों को पीछे के सम्प्रदायों द्वारा लिये होने पर भी पूर्वसम्प्रदाय के ग्रन्थों के न मिलने से बाद में जहां ये शब्द मिलते हैं उन्हीं के प्रतीत होने लगते हैं । ग्रन्थ के पूर्वापर पर्यालोचन करने पर भी इस लेशमात्र विषय के अतिरिक्त इस ग्रन्थ में जैन एवं बौद्ध आध्यात्मिक अथवा अन्य कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं मिलती है । प्रत्युत जिस अध्याय में उत्सर्पिणी, अवसर्पिणी शब्दों का निर्देश है वहीं अगले वाक्यों में ही समुदय कारणों (सृष्टि की उत्पत्ति) का उल्लेख करते हुए अव्यक्त, महत् आदि के क्रम से संख्यादर्शन के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति के मिलने से तथा इसके आगे गर्भावक्रान्ति अध्याय में श्रौतदर्शनों के अनुकूल ईश्वर के गुणों से युक्त सर्वगत संसारी जीवों का निर्देश मिलने से यह उन्नत; अवनत तथा शुभ, अशुभ काल, शारीरसंहनन तथा आयु के मान आदि का उल्लेख भी प्राचीन श्रौत एवं स्मार्त सम्प्रदायों के अनुसार ही प्रतीत होता है । तथापि उत्सर्पिणी तथा अवसर्पिणी शब्दों के उपलब्ध श्रौत-स्मार्त ग्रन्थों में कहीं भी न मिलने तथा जैनग्रन्थों में इनके बाहुल्य से मिलने से, तथा नाम और संख्या का विभेद होने पर भी संहनन आदि के भी उन्हीं जैन ग्रन्थों में मिलने से इस संहिता के इस अंश में जैन सम्प्रदाय के विषय की झलक मिलती ही है । यहां आया हुआ आयु का मानसूचक पलितोपम शब्द भी जैन ग्रन्थों के पल्योपम शब्द का अपभ्रंश प्रतीत होता है । सैण्ट पीटर्सबर्ग बृहत्कोश तथा जैकोबी के इनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलीजन एण्ड इथिक्स—भाग १ के पृष्ठ २०२ में भी ये शब्द जैनसम्प्रदाय के ही बतलाये हैं । अभिधान राजेन्द्र नामक जैन बृहत्कोश में भी इन शब्दों का अर्थ उसी सम्प्रदाय के अनुसार किया है । श्रीमती स्टीवेन्सन ने भी ‘दी हार्ट आफ जैनिज्म’ नामक पुस्तक के पृ. २७२-७६ पर जैन सम्प्रदाय के विषयों को लेकर उत्सर्पिणी तथा अवसर्पिणी शब्दों का कालपरक अर्थ किया है । ⁴हार्डी नामक विद्वान् ने भी बौद्ध सम्प्रदाय के लेख में इस विषय का निरूपण किया है । इस प्रकार जैन सम्प्रदाय के विषयों की लेशमात्र छाया भी इसे जैन सम्प्रदाय के उद्गम के बाद का सिद्ध करती है । किन्तु जैन सम्प्रदाय में महावीर तथा बुद्ध सम्प्रदाय में गौतमबुद्ध के विशेष प्रसिद्ध होने से आचार्य प्रतीत होने पर भी उन्हीं के ग्रन्थों में महावीर से पूर्ववर्त्ती पार्श्वनाथ आदि २३ तीर्थङ्करों का और गौतमबुद्ध के पूर्ववर्ती कनकमुनि आदि का उल्लेख होने से तथा अशोक द्वारा गौतम बुद्ध के पूर्ववर्त्ती कनकमुनि के स्तूप के जीर्णोद्धार ⁵सम्बन्धी शिलालेख तथा स्तूप की प्राप्ति से प्राचीन काल में भी इन सम्प्रदायों का इसी रूप में या थोड़े अन्तर के साथ होना प्रकट होता है । इस प्रकार जैन सम्प्रदाय का महावीर द्वारा तथा बौद्धसम्प्रदाय का गौतमबुद्ध द्वारा प्रारम्भ किये जाने विषयक इतिहास आज भी अधूरा है । प्राचीन काल में भी वैदविरुद्ध मतानुयायियों का सत्त्व दीघ्घनि⁶काय ग्रन्थ के लेख से स्पष्ट है । उपनिषदों में भी तद्विषयक आक्षेप के मिलने से उनका सत्त्व प्रकट होता है ।


१. १ से ६ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ३३ देखें।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २०३

अस्तिनास्तिदिष्टं मतिः (४. ४. ६०) इस सूत्र द्वारा पाणिनि ने भी दोनों (वेदमतानुयायी तथा वेदविरुद्धमतानुयायी) सम्प्रदायों का होना सूचित किया है। जैन ग्रन्थों के अनुसार पार्श्वनाथ आदि पूर्व आचार्यों में परस्पर बहुत व्यवधान के होने से पल्योपम, सागरोपम आदि शब्द वाचक संख्या की महत्ता से तथा आर्हत सम्प्रदाय की पूर्व परम्परा के अत्यन्त दीर्घ होने से उत्सर्पिणी आदि शब्द आर्हत (जैनसाम्प्रदायिक) होते हुए भी संभवतः महावीर से पूर्व समय से ही प्रसिद्ध हैं अथवा उपलब्ध श्रौतस्मार्त ग्रन्थों में न मिलने पर भी संभवतः प्राचीन विलुप्त ग्रन्थों में इनका व्यवहार आया हुआ हो। इस अवस्था में महावीर से पूर्व इन शब्दों का इस ग्रन्थ में अनुप्रवेश होने से इसमें अर्वाचीन विषयों की शङ्का नहीं होनी चाहिये।

रेवती कल्पाध्याय में मातङ्गी विद्या के प्राकृत शाबर शब्द से बने केयूर शब्द युक्त मन्त्र का निर्देश है। मातङ्गी का उल्लेख दक्षिणाम्नाय (दाक्षिणात्य वैदिक सम्प्रदाय की तरह बौद्धसम्प्रदायों में भी मिलता है। इतने मात्र से ही इसे बौद्धविद्या नहीं कहा जा सकता। यहीं रेवती कल्पाध्याय में ही इस विद्या के उपक्रमस्वरूप वैदिक यज्ञ का निर्देश करके 'मातङ्गी नाम विद्या ब्रह्मर्षिराजर्षिसिद्धचारणपूजिताऽर्चिता मतङ्गेन महर्षिणा कश्यपपुत्रेण कनीयसा महता तपसोग्रेण पितामहादेवासादिता' द्वारा स्पष्ट रूप से इसकी उत्पत्ति श्रौतसम्प्रदायों से बतला कर वैदिक पद्धति से ही इसके विधान को पूरा किया है। इस प्रकार सम्भव है कि मताङ्गी विद्या पीछे से बौद्धग्रन्थों में भी कहीं मिलती हो। परन्तु यह विद्या प्राचीन वैदिक सम्प्रदाय में भी विद्यमान थी। इसलिये इस ग्रन्थ में आया हुआ मताङ्गी शब्द बौद्ध विद्या की शङ्का उत्पन्न नहीं करता। ष्टाइन नामक विद्वान् द्वारा तूङ्‌हाङ् प्रदेश (चीन की उत्तर पश्चिमी सीमा पर) से उपलब्ध प्राचीन ग्रन्थ में भगवान् बुद्ध के जीवक के प्रति दिये गये उपदेश में बाबर मैनुस्क्रिप्ट गत नावनीतक के साथ वाले ग्रन्थ में तथा पञ्चरक्षा आदि बौद्ध ग्रन्थों में भी प्राकृत भाषा के शब्दों से युक्त मन्त्र व्यवहार के दिखाई देने से ८४ सिद्ध नाथ आदि के समय से पूर्व समय में भी प्राकृत शब्दों से युक्त मन्त्रों का व्यवहार विद्यमान था। इसलिये मन्त्रों में प्राकृत शब्दों के प्रवेश मात्र से कुछ नहीं कहा जा सकता।

इसके अतिरिक्त रेवती कल्पाध्याय में जातहारिणियों (उत्पन्न हुए को नष्ट करनेवाली) का निर्देश करते हुए भिक्षुणियों के लिये श्रमणिका तथा निर्ग्रन्थी शब्द का उल्लेख किया है। यद्यपि श्रमण शब्द बौद्ध एवं पीछे के अन्य विद्वानों द्वारा बौद्ध भिक्षुकों के लिये ही प्रयुक्त किया गया है तथा महाभाष्यकार द्वारा 'येषां च विरोधः शाश्वतिकः' (२. ४. ९) इस सूत्र में शाश्वतिक विरोध स्वरूप 'श्रमणब्राह्मणम्' यह उदाहरण दिया होने से बौद्धों तथा ब्राह्मणों के परस्पर संघर्ष को लेकर श्रमण शब्द बौद्धभिक्षु परक ही प्रतीत होता है तथापि उससे पूर्व पाणिनि द्वारा भी 'कुमारः श्रमणादिभिः' सूत्र में श्रमण शब्द का उल्लेख होने से बौद्ध तथा जैन सम्प्रदायों के उदय के पश्चात् ही यह शब्द आया है—ऐसा नहीं कहा जा सकता। श्रमण शब्द शारीरिक क्लेश आदि द्वारा उत्पन्न हुए श्रम (थकावट) के अनुसार वैखानस¹ सूत्र में तृतीय आश्रमवाले (वानप्रस्थी) के अर्थ में, बृहदारण्यक² में त्यागी भिक्षु के रूप में तथा तैत्तिरीयारण्यक³ और रामायण⁴ आदि⁵ अनेक प्राचीन ग्रन्थों में भिक्षु एवं तपस्वियों के लिये प्राचीन काल से ही प्रयुक्त होता हुआ मिलता है। श्रमण शब्द प्राचीन काल से ही व्यवहृत होता आ रहा है ऐसा श्री चिन्तामणि⁶ वैद्य ने अपनी पुस्तक में लिखा है।

निर्ग्रन्थ शब्द का अनुसन्धान करते हुए हम देखते हैं कि दिग्घ⁷निकाय में उस समय प्रचलित अन्य सम्प्रदायों की श्रेणी में प्रस्थानान्तरीय तथा प्रतिपक्षरूप से निर्दिष्ट किसी व्यक्ति का निग्गन्थनाथपुत्त (निर्ग्रन्थनाथ पुत्र) शब्द से उल्लेख किया गया है। कुछ विद्वानों का कथन है कि निर्ग्रन्थ शब्द जैन भिक्षुओं के लिये प्रसिद्ध होने से तथा उस समय महावीर के संभावित प्रतिपक्षी के रूप में मिलने से निर्ग्रन्थनाथ पुत्र शब्द से महावीर का निर्देश किया गया है। किन्तु महावीर के निर्ग्रन्थनाथ पुत्र होने से उसका पिता या आचार्य निर्ग्रन्थनाथ हुआ। इसमें नाथ पद के होने से उसके पिता के समय


१. १ से ७ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ३४-३५ देखें।

२०४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

भी निर्ग्रन्थों की प्रसिद्धि तथा बहुलता होनी चाहिये। इस प्रकार प्रतीत होता है कि निर्ग्रन्थ सम्प्रदाय महावीर से ही प्रारम्भ नहीं हुआ है अपितु उससे पूर्व भी प्रचलित था। श्री विन्टरनीज^१ नामक विद्वान् ने भी निर्ग्रन्थ सम्प्रदाय को महावीर से पूर्व का बतलाया है। जैन ग्रन्थों में महावीर से पूर्व आदि नाथ पार्श्वनाथ आदि का भी आचार्यरूप में उल्लेख मिलने से तथा आजतक भी पूर्व तीर्थङ्कररूप में जैन सम्प्रदाय में उनका सम्मान होने से प्रतीत होता है कि इस जैन सम्प्रदाय का महावीर द्वारा विशेष विकास किया जाने से पीछे से उसकी प्रधान आचार्य रूप में प्रसिद्धि होने पर भी निर्ग्रन्थ सम्प्रदाय ही जैन सम्प्रदाय होता हुआ पूर्व तीर्थङ्कर परम्परा द्वारा ही प्रारम्भ हुआ प्रतीत होता है। जैनों द्वारा अपने सम्प्रदाय के भिक्षुओं के अर्थ में प्रयुक्त किया जाने पर भी निर्ग्रन्थ शब्द निवृत्तहृदय ग्रन्थिरूप निरुक्ति के अनुसार विवेक एवं ज्ञान की श्रेणी में आरूढ़^२ का बोध कराने वाले तथा हृदय की^३ ग्रन्थियों के खुलजाने रूप आध्यात्मिक अर्थ में आस्तिक (वैदिक) सम्प्रदाय के ग्रन्थों में भी अत्यन्त प्राचीन काल से प्रयुक्त हुआ दीखता है।

पूर्व समय से प्रसिद्ध इन शब्दों को देखकर ही बौद्ध तथा जैनों ने श्रमण तथा निर्ग्रन्थ शब्दों का पीछे से अपने-अपने सम्प्रदाय के भिक्षुओं के लिये प्रयोग किया प्रतीत होता है। भाषा विज्ञान की दृष्टि से काल प्रवाह से घटिका शब्द की तरह प्राचीन शब्दों का भी रूपान्तर या अर्थान्तर में प्रायः प्रयोग होता देखा गया है। उदाहरणार्थ बोधायन, आश्वलायन, वराह, आपस्तम्ब आदि प्राचीन एवं प्रमुख सूत्रकारों द्वारा श्रौत एवं स्मार्त यज्ञभूमि के अर्थ में प्राचीन ग्रन्थों में स्थान-स्थान पर प्रयुक्त किया जाता हुआ विहार^४ शब्द बौद्धों द्वारा बौद्धभिक्षुसंघ के निवास स्थान के रूप में, तथा श्मशान में स्थित चित्त के अभीष्ट देवता, पीपल, मन्दिर, क्षेत्रज्ञ आदि अर्थों में प्रयुक्त होने वाला चैत्य^५ शब्द पीछे से स्तूप के लिये प्रयुक्त होने लगा है। प्राचीन काल में तप, ज्ञान तथा अवस्था में वृद्ध व्यक्ति के लिये प्रयुक्त किया जाने वाला स्थविर^६ शब्द भी बौद्धों द्वारा श्रेष्ठ तथा विशेष विद्वान् के अर्थ में प्रयुक्त होने लगा। इस प्रकार अर्वाचीनता के प्रेमी इन विहार आदि शब्दों को भी बौद्ध साम्प्रदायिक कह सकते हैं परन्तु केवल इतने मात्र से प्राचीन व्यवहार को बिना देखे इन्हें अर्वाचीन कहना उचित नहीं है। इसी प्रकार यहाँ आये हुए श्रमण, निर्ग्रन्थ आदि शब्द भी प्राचीन तपस्वियों के ही सूचक हैं।

यहां आये हुए लिङ्गिनी, परिव्राजिका, श्रमण का निर्ग्रन्थी, कण्डिनी, चीरवल्कलधारिणी, चरिकी, मातृमण्डलिकी तथा अवेक्षणिका आदि मधुकरी वृत्ति द्वारा घर-घर जाकर अपने सम्पर्क से जातहारिणी का प्रचार करती हुई नाना भिक्षुणियों के श्रेणी में निर्दिष्ट भेदों में से परिव्राजिका, श्रमणका तथा निर्ग्रन्थी को छोड़कर अन्य कोई भी भेद प्राचीन दूसरे ग्रन्थों या सम्प्रदायों में आजकल नहीं मिलता है। अर्वाचीन ग्रन्थों में आये हुए हंस, परमहंस, कुटीचक, बहूदक आदि भेदों को न देकर केवल इन कालप्रवाह से विलुप्त सम्प्रदायों का ही दिया जाना इन उपर्युक्त भेदों को प्राचीन ही सिद्ध करता है।

वहीं रेवती कल्पाध्याय के जातहारिणी के प्रकरण में सिंहल (लङ्का) तथा उड्र (उड़ीसा) आदि देश तथा सूत, मागध आदि जातियों का उल्लेख मिलता है। वहां खश, शक, यवन, पह्लव, तुषार कम्बोज आदि का उल्लेख भी है, यवन की तरह खश आदि शब्द भी मनुस्मृति आदि ग्रन्थों में मिलते हैं, ऐतिहासिक विद्वान् भी इन जातियों को प्राचीन मानते हैं। (Encyclopedia Britanica) नामक पुस्तक में हूणों का चतुर्थ शताब्दी (ई. प. ३७२) में यूरोप प्रवेश का उल्लेख मिलने पर भी २५०० वर्ष प्राचीन अवेस्ता ग्रन्थ में हूनू (हूण) जाति का प्रतिपक्षी जाति के रूप में वर्णन मिलने से तथा जरथुष्ट्र से भी पूर्ववर्ती केरसप (Kerasop) नामक इरान देश के राजा द्वारा उस जाति की विजय का उल्लेख मिलने से हूणों का समय (ई. पू. ७००) है ऐसा मोदी^७ महोदय ने प्रतिपादित किया है। महाभारत^८ में भी हूण, पह्लव, यवन, शक, पुण्ड्र, किरात, द्रविड़, खश आदियों का उल्लेख मिलता है। 'गार्गादिभ्यो यञ्' (४-१-१०५) इस सूत्रोक्त गण में शक, 'इन्द्रवरुणोति' (४-१-४९) सूत्र में यवन तथा 'कम्बोजालुक्' (४-१-१७५) इस सूत्रोक्त वार्तिक के कम्बोजादि गण में शक, यवन आदि का उल्लेख मिलता है। इस प्रकार इन शब्दों का पूर्वकाल में भी प्रसिद्ध होना स्पष्ट है।


१. १ से ८ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ३५-३६ देखें।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २०५

इस ग्रन्थ के प्रत्येक अध्याय में 'अमुकाध्यायं व्याख्यास्यामः' द्वारा प्रारम्भ करके 'इति ह स्माह भगवान् कश्यपः' द्वारा समाप्ति, शिष्योपक्रमणीय अध्याय में शब्द तथा अर्थ में वैदिक विधान द्वारा शिष्यों का उपनयन और अग्नि, सोम, प्रजापति आदि वैदिक देवताओं का स्वाहाकार, जाति सूत्रीयाध्याय में वैदिक वाक्य रचना, हीनदन्तोद्भेद में मारुती इष्टि तथा स्थालीपाक होम का विधान, पुत्रोत्पत्ति के नाना विधानों में अन्य सबको छोड़कर इष्टि (पुत्रेष्टि) का विधान, स्वप्नदोष को दूर करने के लिये सावित्री होम का विधान, शिशु रक्षा के लिये प्रयुक्त होने वाले धूप में 'अग्निस्तु' आदि वैदिक वाक्य का प्रयोग, रेवती कल्पाध्याय में ब्राह्मणग्रन्थों के अनुसार ऐतिहासिक वाक्य तथा वहीं वसु, रुद्र, आदित्य आदि देवताओं का कीर्तन तथा 'दीर्घजिव्ही च छन्दसि' (४-१-५९) पाणिनि के इस सूत्र के अनुसार वैदिक प्रयोग में आये हुए ङीप् प्रत्यय युक्त दीर्घजिव्ही का उल्लेख, भोजन कल्पाध्याय में काशी, पुण्ड्र, अङ्ग, (पूर्वीबिहार) बङ्ग (बङ्गाल) काच, सागर, अनूप, कोशल (अवध) तथा कलिङ्ग (उड़ीसा) देश का तथा देशसात्म्याध्याय में कुमारवर्त, निकटिवर्ष, ऋषभद्वीप, पौण्ड्रवर्धन, मृत्तिका, वर्धमान आदि बहुत से प्राचीन देशों का कीर्तन करके इनसे अधिक प्रसिद्ध पाण्ड्य (उत्तरी मद्रास) का निर्देश न करना, बाह्लीकभिषग् का उल्लेख होने पर भी यवन तथा रोम के भिषजों का उल्लेख न होना, राजतैल की प्रशस्ति में इक्ष्वाकु, सुबाहु, सगर, नहुष, दिलीप, भरत तथा गय पर्यन्त प्राचीन राजाओं का ही उल्लेख करना, रस धातु तथा रत्नों के ओषधिरूप में व्यवहार का कहीं न मिलना, समुदाय कारण (सृष्टि उत्पत्ति) के उल्लेख में प्राचीन सांख्य दर्शन के अनुसार ही अष्टप्रकृति तथा षोडश विकारों का निर्देश होना, परन्तु बौद्ध तथा जैनों के अध्यात्मवाद का न मिलना तथा 'दीप्ताग्नयो घस्मराः स्नेहपित्याः' तथा 'क्षीरं सात्म्यं क्षीरमाहुः पवित्रम्' इत्यादि वैदिक छन्द एवं पद्यों का दर्शन आदि बहुत से प्राचीनता को सिद्ध करने वाले प्रमाणों के मिलने से यह वृद्धजीवक्रीय तन्त्र अत्यन्त प्राचीन प्रतीत होता है। हेमाद्रि आदि में पुराणों के अनुसार आरोग्यशाला के निर्माण का विधान होने पर भी आजकल के विद्वान् उसके निश्चय के लिये उसके अनुरूप शिलालेख तथा देशान्तरीय और मतान्तरीय लेखों की अपेक्षा रखते हैं—इसके अनुसार प्रामाणिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से आलोचना करते हुए हम देखते हैं कि २३०० वर्ष पूर्व अशोक द्वारा सर्वसाधारण के लिये चिकित्सालय के उद्घाटन के मिलने तथा कौटिलीय अर्थशास्त्र में भी दुर्ग बनाते हुए उसमें भैषज्य गृह के बनाने का उल्लेख मिलने पर भी, चरक आदि में रसायनशाला का निर्देश होने पर भी सर्वसाधारण के लिये आरोग्यशाला का निर्देश न होना तथा उसी के अनुरूप इस संहिता के कल्पाध्याय में भी रसायनशाला तथा उस प्रकार के चिकित्सालय आदि के निर्माण का न मिलना, अपितु इससे विपरीत रोगी के घर जाकर वैद्य द्वारा ओषधि का विधान बतलाना, इत्यादि द्वारा भी इस ग्रन्थ का निर्माण प्राचीन ही सिद्ध होता है। कश्यप के साथ वृद्धजीवक का उत्तर प्रत्युत्तर रूप में निर्दिष्ट संवाद भी इसे प्राचीन ही सिद्ध करता है। काश्यपीय महासंहिता को वृद्धजीवक द्वारा संक्षिप्त कर के इस तन्त्र के निर्माण का उल्लेख मिलने से काश्यपीय महासंहिता का समय तो इससे भी प्राचीन प्रतीत होता है।

किन्तु जिस प्रकार श्रमण शब्द ब्राह्मण आदि ग्रन्थों में मिलता है उसी प्रकार ग्रन्थि शब्द के उपनिषद् आदि में मिलने पर भी निर्ग्रन्थ शब्द का तपस्वी के अर्थ में प्रयोग का भागवत पुराण को छोड़कर अन्य वैदिक ग्रन्थों तथा महाभारत आदि प्राचीन ग्रन्थों में कहीं भी स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं है। अर्वाचीन नागार्जुन आदि ने उपाय हृदय तथा ललित विस्तर नामक ग्रन्थों में जैनों के अर्थ में ही यह निर्ग्रन्थ शब्द प्रयुक्त किया है। वाचस्पति१ आदि आस्तिक दार्शनिकों ने भी वेदविरुद्ध दार्शनिकों की श्रेणी में ही इन शब्दों का निर्देश किया है। निर्ग्रन्थ सम्प्रदाय ही जैन सम्प्रदाय है ऐसी आधुनिक विद्वानों की भी धारणा है। इस संहिता में आये हुए जैन सम्प्रदाय के उत्सर्पिणी तथा अवसर्पिणी आदि असाधारण शब्द भी इसी बात को प्रकट करते हैं। इस प्रकार महावीर से प्राचीन तीर्थङ्करों के समय यदि इन शब्दों की प्रसिद्धि नहीं थी तो इस सम्प्रदाय के प्रधान आचार्य के रूप में प्रकट होने वाले महावीर के समय इन शब्दों की लोक में प्रसिद्धि होने से उस


१. टि. उपो. संस्कृत पृ. ३७ देखें।

२०६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

समय (महावीर के समय) इन दूसरे सम्प्रदाय के शब्दों का इस ग्रन्थ में अनुप्रवेश हुआ प्रतीत होता है। अर्वाचीन विद्वानों की यह भी धारणा है कि इस ग्रन्थ में शक, हूण, पल्हव, खश, यवन तथा कम्बोज आदि शब्दों के आने से भी यह ग्रन्थ बुद्ध के बाद का मालूम पड़ता है। इस प्रकार महावीर के बाद ही इस ग्रन्थ का निर्माण हुआ है—ऐसी शंका उत्पन्न होती है। किन्तु अनिश्चित समय वाले कुछ शब्दों के अनुप्रवेश के दर्शन मात्र से ही ग्रन्थ का काल निर्धारित नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त पीछे से जिन ग्रन्थों का प्रतिसंस्करण होने का स्पष्ट निर्देश हो उनमें कुछ सन्दिग्ध शब्दों के आधार पर ही ग्रन्थ के काल का निर्णय करना तो और भी दुःसाहस है। विद्वानों के किसी समय तर्क द्वारा निश्चित किये हुए भी बहुत से विषय पीछे समय प्रवाह से अन्य बलवान् तर्क के उपस्थित होने पर शारीरिक (वेदान्त) सूत्र के 'तर्कप्रतिष्ठानात्' के अनुसार परिवर्तित होते देखे गये हैं। यदि प्राचीनता को प्रकट करने वाले पूर्वोक्त लक्षणों को कुछ समय के लिये छोड़कर अर्वाचीन विद्वानों की धारणा का अवलम्बन करें तो भी कालप्रवाह से विलुप्त इस तन्त्र के वात्स्य द्वारा यक्ष से प्राप्त करके पीछे से संस्करण करने का संहिता कल्पाध्याय में स्वयं अपने मुख से उल्लेख किया होने से न केवल रेवती कल्पाध्याय में आये हुए निर्ग्रन्थ आदि शब्द, अपितु पूर्वभाग में आये हुए उत्सर्पिणी आदि अर्वाचीनता की शंका उत्पन्न करने वाले शब्द तथा विषय भी वृद्धजीवकीय तन्त्र के निर्माण के बाद संस्करण के समय वात्स्य की लेखनी द्वारा प्रविष्ट किये गये प्रतीत होते हैं। चरक संहिता तथा सुश्रुत संहिता के पूर्वभाग में परतन्त्रीय बालग्रह विषय के न मिलने पर भी सुश्रुत के उत्तर तन्त्र में शालाक्य, कौमारभृत्य आदि प्रस्थानान्तरीय विषयों का भी संग्रह होने से २७ से ३८ तक के अध्यायों में कौमारभृत्य के प्रसङ्ग में मूल में आचार्य के नाम का उल्लेख न होने पर भी टीकाकारों ने जो पार्वतक, जीवक, बन्धक आदि का निर्देश किया है उससे प्रतीत होता है कि कश्यप जीवक आदि के कौमारभृत्य तन्त्रों से ही संभवतः यह विषय लिया गया है। सुश्रुत के बालतन्त्र प्रकरण में (उ. तं. अ. २७) जिन स्कन्द, रेवती, शीतपूतना, शकुनी, मुखमण्डिका, नैगमेष आदि स्त्री तथा पुरुषरूप बालग्रहों का वर्णन है, उनसे मिलते जुलते ही ग्रहों का वर्णन इस संहिता के चिकित्सितस्थानीय बालग्रहाध्याय में मिलता है। रेवतीकल्पाध्याय में रेवती के भेदरूप से जिन जातहारिणियों का विशेष वर्णन है वे सुश्रुत के उत्तरतन्त्र में नहीं मिलते हैं। यदि इन दोनों अध्यायों के विषय साथ-साथ लिये गये होते तो जातहारिणी का विषय न्यूनाधिक रूप से सुश्रुत के उत्तरतन्त्र में भी अवश्य होना चाहिये था। रेवती ग्रह स्कन्द आदियों का प्रथम चिकित्सितस्थानीय बालग्रहाध्याय में निरूपण करने के बाद पुनः रेवती कल्पाध्याय में रेवती के विकास स्वरूप बहुत सी जातहारिणियों का पूर्वापर ग्रन्थ लेख की अपेक्षा अत्यन्त विकसित रूप में मिलने से कल्पाध्याय का यह विकसित लेख कश्यप तथा जीवक के पश्चात् वात्स्य के समय प्रतिसंस्करण में प्रविष्ट किया हुआ प्रतीत होता है। बिना विभाग के द्वारा प्रतिसंस्कार करने पर प्रायः ऐसी ही संशयोत्पादक गड़बड़ त्पन्न हो जाती हैं जिनका आगे वर्णन किया जायेगा। संहिता कल्पाध्याय को पूर्ण करने की दृष्टि से वात्स्य द्वारा जोड़े हुए खिलभाग के देशसात्म्याध्याय में तथा खिलभाग से पूर्ववर्ती भोजन कल्पाध्याय में भी सात्म्य के प्रसङ्ग में बहुत से प्राचीन देशों का उल्लेख है। भोजन कल्पाध्याय में कुरुक्षेत्र को केन्द्र मानकर चारों दिशाओं के बहुत से देशों का उल्लेख करते हुए सिन्धु, सौवीर आदि पाश्चात्य (Western) कश्मीर, चीन आदि उदीच्य (Northern), काशी, पुण्ड्र, अङ्ग, बङ्ग आदि पौरस्त्य (Eastern) तथा दक्षिण (South) में कलिङ्ग, पट्टन, नार्मदेय आदि देशों का ही उल्लेख किया गया है। रामायण काल में जिस प्रकार दक्षिणात्य (Southern) नगरों का विशेष परिचय नहीं था उसी प्रकार यहां भी कलिङ्ग, पट्टन आदि नर्मदा पर्यन्त देशों का ही निर्देश है। खिलभाग के देशसात्म्याध्याय के खण्डित रूप में मिलने से पूर्व तथा दक्षिण देशों का निर्देश करते हुए प्राचीन देशों का उल्लेख होने पर भी चिरपाली, चीर चोर, पुलिन्द, द्रविड़ आदि दूरवर्ती दक्षिणात्य देश तथा कुमारवर्त, निकटवर्ष, आदि पूर्ववर्ती देशों का विकसितरूप में उल्लेख मिलता है। अशोक के शिलालेख तथा अन्य प्राचीन साहित्य में आये हुए ये देश भी यद्यपि प्राचीन ही हैं ऐसा हम आगे लिखेंगे तथापि दोनों में देशों के वर्णन की तुलना करते हुए वृद्धजीवक के पूर्वभाग तथा वात्स्य के खिलभाग में समय की दृष्टि से स्पष्टरूप से बहुत अन्तर

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद | २०७

प्रतीत होता है। खिलभाग के देश सात्म्याध्याय में 'मगधासु महाराष्ट्रम्' ऐसा उल्लेख मिलता है। वेद में तथा जरासन्ध के समय मगध का निर्देश होने से तथा पुरातत्व के विद्वानों द्वारा आजकल राजगृह में उस स्थान की प्राप्ति से यद्यपि मगध राज्य को प्राचीन कहा जा सकता है, तथापि ग्रन्थ के पूर्वभाग में नाम द्वारा भी अनिर्दिष्ट मगध का उत्तरभाग में महाराष्ट्र के रूप में उल्लेख होने से पाण्ड्य देश तथा पाटलिपुत्र के निर्देश न होने से तथा बौद्ध ग्रन्थों में अनायास नामक यक्ष से अपने पूर्वज के ग्रन्थ की उपलब्धि का उल्लेख होने से बुद्ध तथा महावीर के पश्चात् नन्द एवं चन्द्रगुप्त के समय मगध की महाराष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठा के समय वात्स्य की उत्पत्ति प्रतीत होती है। इससे उस संस्कार में आये हुए (अनुप्रविष्ट) इन शब्दों से सन्देह उत्पन्न हुआ प्रतीत होता है।

नावनीतक के लेखक डल्हण आदि के लेख में कौमारभृत्य के आचार्य जीवक का नाम मिलने से तथा महावग्ग आदि बौद्ध ग्रन्थों में कौमारभृत्य विशेषण वाले प्रसिद्ध वृद्धजीवक का वृतान्त मिलने से दोनों में चिकित्सापाण्डित्य, नाम की समानता तथा कौमारभृत्य शब्द का समानरूप से उल्लेख होने से बौद्ध ग्रन्थोक्त जीवक ही कौमारभृत्य का आचार्य जीवक है—ऐसा कुछ विद्वानों का मत है। जब तक इस वृद्धजीवकीय तन्त्र की उपलब्धि नहीं हुई थी तब तक कौमारभृत्य के आचार्य वृद्धजीवक का परिचय देने वाले प्रमाणों का अभाव होने से तथा बौद्ध ग्रन्थों में जीवक की अत्यन्त प्रसिद्धि होने से दग्धाश्वरथन्याय¹ से दोनों को एक ही समझना संगत प्रतीत होता था। इस प्रकार इस तन्त्र के आचार्य तथा बौद्धग्रन्थोक्त जीवक की एकात्म्यता होने से इस तन्त्र के आचार्य वृद्धजीवक को बुद्ध कालीन मानने से पूर्वोक्त उत्सर्पिणी आदि शब्दों को देखकर भी सन्देह उत्पन्न नहीं होता था। परन्तु अब इस तन्त्र की उपलब्धि द्वारा वृद्धजीवक का बहुत-सा परिचय मिल जाने से उनके विषय में पिता का भेद, देशभेद, गुरुभेद, विशेषण तथा विशेषण रहित नामों का भेद, धर्मभेद आदि बहुत सी बातें मिलती हैं। बौद्ध ग्रन्थोक्त जीवक का कौमारभृत्यत्व महावग्ग के अनुसार कुमारद्वारा पालन किया जाने के कारण है न कि कौमारभृत्य का आचार्य होने से, बौद्ध ग्रन्थोक्त जीवक संभव है—कौमारभृत्य विद्या का भी पण्डित हो, किन्तु बहुत से बौद्ध ग्रन्थों में उसकी घटनाओं तथा चिकित्सा आदि विषयों का अत्यन्त विस्तारपूर्वक वर्णन होने पर भी उसके कौमारभृत्य के आचार्यत्व तथा तद्विषयक इस प्रसिद्ध तन्त्र के निर्माण का उल्लेख तक क्यों नहीं है? इस तन्त्र के विषय में अन्तरङ्ग दृष्टि से विचार करने पर भी दोनों का परस्पर विभेद ही दृष्टिगोचर होता है। तूङ्ग्हाङ् (Tun huang) प्रदेश में हार्नले द्वारा उपलब्ध प्राचीन ग्रन्थ में बुद्ध द्वारा अपने समकालीन जीवक को उपदेश देने का उल्लेख मिलता है। यदि वही यह वृद्धजीवक हो तो ग्रन्थ के अन्दर स्थान-स्थान पर धन्वन्तरि आदि की तरह जहां बाह्लीकभिषग्, काङ्कायन तथा अन्य विदेशी वैद्यों के नाम तथा चिकित्सा सम्बन्धी विषय दिए हैं वहां अपने गुरु भगवान् बुद्ध के नाम, उसकी प्रसिद्ध ओषधियों तथा प्रसङ्गवश कहीं-कहीं उसके आध्यात्मिक विषय आदि को लेशरूप में भी क्यों नहीं दिया है। इसमें बौद्धमत की लेशमात्र भी छाया नहीं मिलती है। महावग्ग आदि के लेख से जीवक की शल्यतन्त्र के विषय में भी विशेष प्रसिद्धि तथा कुशलता का परिचय मिलता है। किन्तु इस ग्रन्थ में शल्यतन्त्र का परतन्त्र के रूप में निर्देश करके उसके विषय में उदासीनता सूचित होती है। इस प्रकार इस गन्थ का आचार्य, बौद्धग्रन्थोक्त मगधदेशनिवासी भुजिष्या के गर्भ से उत्पन्न अभय के पुत्र जीवक से भिन्न प्राचीन, कनखलवासी, ऋचीक का पुत्र, कश्यप का शिष्य, महर्षियों द्वारा सम्मानित तथा कौमारभृत्य विषय का आचार्य प्रतीत होता है।

प्रसङ्गवश निर्दिष्ट अन्य आचार्यों का विवरण—कश्यप द्वारा उपदिष्ट प्रारम्भिक एवं विस्तृत महासंहिता को वृद्धजीवक ने संक्षिप्त किया तथा समयान्तर से वात्स्य ने उसका प्रतिसंस्कार करके प्रकाशित किया, ऐसा इस संहिता


१. जिस प्रकार रथ के घोड़ों के जल जाने से रथ निष्प्रयोजन हो जाता है उसी प्रकार किसी एक आवश्यक वस्तु के नष्ट हो जाने पर जब उससे सम्बन्धित दूसरी वस्तु स्वयं नष्ट हो जायें—उस अवस्था में यह व्यवहत होता है। (अनुवादक)

२०८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

के कल्पाध्याय में निर्देश होने से जिस प्रकार आत्रेय द्वारा प्रारम्भ में उपदिष्ट संहिता को अग्निवेश ने तन्त्र का रूप दिया और उसी तन्त्र को चरक ने प्रतिसंस्कृत करके वर्तमानरूप में प्रकाशित किया, तथा जिस प्रकार दिवोदासरूप धन्वन्तरि द्वारा प्रारम्भ में उपदिष्ट संहिता को सुश्रुत ने संहितारूप से परिवर्तित किया और पीछे से उसीको नागार्जुन या अन्य किसी प्रतिसंस्कर्ता ने संस्कार करके वर्तमान रूप में प्रकाशित किया है, उसीप्रकार कश्यप द्वारा उपदिष्ट मूलभूतमहासंहिता को वृद्धजीवक ने संक्षिप्त करके तन्त्र का रूप दिया, उसीको समयप्रवाह से वात्स्य ने प्रतिसंस्कृत करके वर्तमानरूप में हमारे सम्मुख उपस्थित किया है। इस प्रकार आजकल मूलसंहिता तथा उनके रूपान्तरभूत तन्त्रों के पृथक्-पृथक् उपलब्ध न होने से वर्तमान रूप में मिलने वाली चरकसंहिता ही अग्निवेशतन्त्र या आत्रेयसंहिता होने से, वर्तमान प्रतिसंस्कृत सुश्रुत संहिता ही मूलसुश्रुतसंहिता या धन्वन्तरि संहिता होने से तथा वात्स्य द्वारा प्रतिसंस्कृत संहिता ही वृद्धजीवकीय तन्त्र या मूलकाश्यप संहिता होने से उपलब्ध एक-एक ग्रन्थ तीन-तीन ग्रन्थों के प्रतिनिधि के रूप में हमारे सामने उपस्थित होता है। इन उपलब्ध तीनों प्राचीन ग्रन्थों में प्रतिसंस्कर्ता के रूप में मिलने वाले चरक, नागार्जुन तथा वात्स्य (अनिश्चित कालवाला) तृतीय श्रेणी में, उनसे ऊपर तन्त्रकर्ता अग्निवेश, सुश्रुत तथा वृद्धजीवक द्वितीय श्रेणी में तथा उनसे भी ऊपर मूलसंहिताओं के आचार्य (उपदेशक) आत्रेय, दिवोदासरूप धन्वन्तरि तथा मारीचकश्यप प्रथमश्रेणी में आते हैं। इस प्रकार इन संहिताओं में पुनर्वसु आत्रेय, धन्वन्तरि तथा कश्यप प्राचीनतम मूल आचार्य हैं।

प्राचीन रूप में मिलने वाले आत्रेय, धन्वन्तरि, कश्यप आदि मूल आचार्यों का निश्चित समय निर्धारण दुष्कर होने के कारण इनका पौर्वापर्य, परस्पर सहभाव तथा आत्रेय, अग्निवेश, चरक, धन्वन्तरि, दिवोदास, सुश्रुत, कश्यप, वृद्धजीवक तथा वात्स्य आदि आचार्यों के उद्भव को बतलाने के लिये कोई भी धारावाहिक ऐतिहासिक लेख न मिलने से उनके विषय में कुछ भी कहना यद्यपि दुःसाहस है तथापि हमें यह देखना है कि इनके उद्भव की अधिक से अधिक तथा कम से कम कौनसी अवधि निश्चित की जा सकती है जिससे इनके विषय में कुछ अस्पष्ट-सा ज्ञान भी हो सके तथा परस्पर एक दूसरे का अन्वेषण करते हुए संभवतः हमें कश्यप, वृद्धजीवक तथा वात्स्य के विषय में कुछ प्रकाश मिल सके। इसी अभिप्राय से अन्य विद्वानों के मतों का निर्देश करते हुए इन प्राचीन आचार्यों के विषय में अपने हृदय के कुछ भावों को प्रकट करते हैं।

धन्वन्तरि तथा दिवोदास—सुश्रुतसंहिता में धन्वन्तरिरूप काशीराज दिवोदास द्वारा सुश्रुत को उपदेश देने का निर्देश है। धन्वन्तरि दिवोदास के परिचय के लिये वेद में वैद्याचार्य धन्वन्तरि का कहीं उल्लेख नहीं मिलता है। ऋग्वेद में जहां वैद्यक के विषय मिलते हैं वहां देवभिषग् अश्विनीकुमारों का ही वैद्यरूप में उल्लेख है। ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में बहुत स्थानों पर दिवोदास नामक राजा का उल्लेख मिलता है। उसके साथ 'अतिथिग्वः शम्बरशत्रुः सुदासपिता' इत्यादि शूरता एवं वीरता संबन्धी विशेषण दिखाई देते हैं। काठकसंहिता के मन्त्रभाग में भी ब्रध्नश्व दिवोदास का उल्लेख है। इस वैदिक दिवोदास काशी का राजा होना तथा धन्वन्तरि से किसी प्रकार के सम्बन्ध का निर्देश नहीं मिलता है। इस प्रकार ऋग्वेद तथा काठकसंहिता में आये हुए दिवोदास का समय अत्यन्त प्राचीन है तथा वह वैद्य भी प्रतीत नहीं होता है।

पौराणिक इतिहास में भी दिवोदास नाम के अनेक व्यक्ति मिलते है। इनमें से हरिवंश^१ पुराण में २९वें अध्याय में काश के वंश में धन्वन्तरि तथा दिवोदास का काशिराज के रूप में उल्लेख मिलता है। वह वंशावली निम्न प्रकार से है—


१. वाराणसी में गोविन्दचन्द्र विजय के राज्य में १२०१ संवत् में लिखी हुई हरिवंश की एक प्राचीन ताडपत्र पुस्तक हमारे संग्रहालय में है। उसके पाठ के अनुसार भी यही क्रम मिलता है।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

२०९

काश

दीर्घतपा

धन्व

धन्वन्तरि

केतुमान्

भीमरथ (भीमसेन)

दिवोदास

प्रतर्दन

वत्स

अलर्क

काश के पौत्र धन्व नामवाले राजा ने समुद्रमन्थन से उत्पन्न अब्ज नामक देवता की आराधना करके अब्ज (कमल) के अवतार रूप धन्वन्तरि नामक पुत्र को प्राप्त किया। उस धन्वन्तरि ने भारद्वाज से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त करके उसे आठ भागों में विभक्त करके शिष्यों को उपदेश दिया। इसके प्रपौत्र दिवोदास ने वाराणसी¹ नगरी की स्थापना की। दिवोदास का पुत्र प्रतर्दन था। दिवोदास के समय शून्य हुई वाराणसी को प्रतर्दन के पौत्र काशीराज अलर्क ने पुनः बसाया, ऐसा हरिवंशपुराण से प्रतीत होता है। हरिवंश के अनुसार शून्य हुई वाराणसी का दिवोदास द्वारा पुनः बसाये जाने से वाराणसी की उससे पूर्व भी विद्यमानता प्रकट होने पर भी महाभारत² के अनुशासन पर्व में दिवोदास द्वारा ही वाराणसी के निर्माण का निर्देश है।

महाभारत में भी चार³ स्थानों पर दिवोदास का नाम आता है। महाभारत में भी दिवोदास का काशीपति⁴ होना, वाराणसी की स्थापना, हैहयों द्वारा पराजित होकर भरद्वाज की शरण में जाना, उसके द्वारा किये हुए पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रतर्दन नामक वीर पुत्र की उत्पत्ति आदि मिलते जुलते विषय ही मिलते हैं। इसमें दिवोदास के पूर्वपुरुषों में अन्य व्यक्तियों के साथ केवल हर्यश्व आदि प्रसिद्ध व्यक्तियों के ही नाम दिये हैं। अग्निपुराण (अ. २७८) तथा गरुडपुराण (अ. १३९ श्लोक ८-११) में भी वैद्य धन्वन्तरि की चतुर्थ सन्तति (पीढ़ी) में दिवोदास का नाम दिया है।

महाभारत⁵ के समुद्र मन्थन प्रकरण में धन्वन्तरि देव के आविर्भाव का वर्णन मिलता है। पुराण आदि में भी धन्वन्तरि का निर्देश है। आग्नेय⁶ पुराण में समुद्रमन्थन से उत्पन्न धन्वन्तरि का आयुर्वेद के प्रवर्तक के रूप में निर्देश किया गया है। परन्तु वेद में धन्वन्तरि का उल्लेख न होने से तथा हरिवंश पुराण में समुद्र मन्थन से आविर्भूत अब्ज देवता का धन्व राजा के पुत्र रूप में उत्पन्न होने के कारण यौगिक धन्वन्तरि नाम होने से दोनों की सङ्गति करने पर अब्ज के ही धन्वन्तरि होने से दोनों में अभेद मानकर समुद्र से उत्पत्ति के प्रसङ्ग में अब्ज देवता को भी भावी धन्वन्तरि नाम


१. इस प्रकार वारणार नामक किसी व्यक्ति ने वाराणसी को बनाया-यह प्रवाद निर्मूल है। (हिन्दी विश्वकोश-काशी शब्द देखें)।
२. २ से ६ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ४० देखें।

२१० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

से ही संभवतः कहा गया है। इसीलिये वैद्याचार्य दिवोदास के पूर्वपुरुष धन्वन्तरि के लिये लौकिक एवं तैर्थिक व्यक्तियों द्वारा अब्ज देवता का अवतार होने से देवरूप में निर्देश किया गया है।

भरद्वाज से सम्बन्ध, वाराणसी की स्थापना तथा प्रतर्दन नाम के पुत्र की समानता से हरिवंश तथा महाभारत में वर्णित दिवोदास की एकता प्रतीत होती है। कौषीतकी (सांख्यायन) ब्राह्मण¹ तथा कौषीतकी ब्राह्मणोपनिषत्² में भी दैवोदासि (दिवोदास के पुत्र) प्रतर्दन का ब्राह्मविद्या की प्राप्ति का वर्णन मिलता है। काठकंसंहिता³ के ब्राह्मण अंश में भी आरुणि के समकालीन भीमसेन के पुत्र दिवोदास का उल्लेख मिलता है।

इस प्रकार हरिवंश पुराण के अनुसार काश राजा की सन्तति रूप इन सबका काश राजा द्वारा स्थापित काशी नामक देश के राजा होने से काशिराज शब्द से कहा जाना, धन्व राजा का पुत्र होने से उसका धन्वन्तरि नाम से व्यवहार तथा आत्रेय आदि की तरह धन्वन्तरि का भी पूर्वाचार्य भरद्वाज से ही आयुर्वेद विद्या की उपलब्धि का निर्देश है। महाभारत तथा हरिवंश में धन्वन्तरि के प्रपौत्र काशीराज दिवोदास का वैद्यक के आचार्य रूप में निर्देश न मिलने पर भी सुश्रुत में काशीराज दिवोदास का सुश्रुत आदियों के उपदेशक के रूप में उल्लेख मिलने से वैद्याचार्य धन्वन्तरि की चतुर्थ सन्तति (पीढ़ी) में होने से तथा अपने पूर्वपुरुष की विद्या के आदर की दृष्टि से दिवोदास का भी वैद्य होना सङ्गत प्रतीत होता है। धन्वन्तरि की सन्निकृष्ट सन्तति (चौथी पीढ़ी) में होने से, उसके सम्प्रदाय का प्रकाश करने के कारण तथा उसका स्थानापन्न होने से धन्वन्तरि का अवतार मानकर सुश्रुतसंहिता में ‘धन्वन्तरिं दिवोदासं सुश्रुतप्रभृतयः ऊचुः’ आदि द्वारा धन्वन्तरि तथा दिवोदास का जो अभेद प्रकट किया गया है वह उचित ही है। आयुर्वेद के आचार्यरूप से प्रसिद्ध धन्वन्तरि के प्रपौत्र दिवोदास तथा सुश्रुत में आये हुए आयुर्वेद के उपदेशक धन्वन्तरिरूप दिवोदास इन दोनों की सङ्गति होने से धन्वन्तरिका आयुर्वेदीय सम्प्रदाय अपने शिष्यों की तरह दिवोदासरूप अपनी सन्तति में भी गया हुआ स्पष्ट रूप से प्रतीत होता है। मेरे पास सुश्रुतसंहिता की एक ताडपत्र² की पुस्तक है जिसके प्रारम्भ में ‘इत्युवाच भगवान् धन्वन्तरिः’ यह वाक्य नहीं है। धन्वन्तरिरूप दिवोदास के पास सुश्रुत आदियों के जाने का उल्लेख होने से प्रारंभ में इस प्रकार का वाक्य होना उचित भी नहीं है।

पूर्वोद्दिष्ट हरिवंश पुराण के लेख में कलियुग में दिवोदास द्वारा वाराणसी की स्थापना का उल्लेख होने से धन्वन्तरि तथा उसके प्रपौत्र दिवोदास का समय कलियुग में प्रतीत होता है। परन्तु कलियुग में कौन-सा समय है इसकी प्रतीति उससे नहीं होती।

काशी के युवराज ब्रह्मदत्त का आयुर्वेद के अध्ययन के लिये तक्षशिला जाने का वर्णन जातक ग्रन्थ में तथा फिर काशीराज के पद पर आरूढ़ ब्रह्मदत्त के साथ जीवक की भेंट का वर्णन महावग्ग में मिलता है। महावग्ग में यद्यपि काशी शब्द भी आया हुआ है, परन्तु वहा वाराणसी शब्द का प्रयोग अधिकता से किया गया है। बुद्ध द्वारा भी वाराणसी में ही धर्मचक्र (धर्मोपदेश) के प्रवर्तन का उल्लेख मिलता है। जातक ग्रन्थों में भी बहुत स्थानों पर वाराणसी शब्द आता है। पाणिनि ने देश वाचक काशी शब्द का ‘काश्यादिभ्यष्ठञ्त्रिठौ’ (४-२-११६) सूत्र में स्पष्ट निर्देश किया है। तथा नगर वाचक वाराणसी शब्द नद्यादि गण में मिलता है। (नद्यादिभ्यो ढक् ४-२-९७ वाराणसेयः) महाभाष्यकार ने भी वाराणसेय उदाहरण कई बार दिया है। जाबालोपनिषद् आदि में वाराणसी शब्द के मिलने पर भी प्राचीन उपनिषदों में काशी


१. १ से ३ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ४१ देखें।
२. इस पुस्तक में बहुत से पाठभेद हैं। इस संहिता के अन्त में सुश्रुत का निघण्टु भी दिया हुआ है। इस संहिता के पाठ के अनुसार सुश्रुतसंहिता का नया संस्करण करके मेरे मित्र श्री यादवजी ने प्रकाशित किया है।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

२११

शब्द तो मिलता है पर वाराणसी शब्द नहीं मिलता है। इससे अनुमान किया जाता है कि देशवाचक काशी शब्द प्राचीन काल से प्रचलित है तथा नगरी वाचक वाराणसी शब्द उपनिषदों के समय के बाद से ही प्रसिद्ध हुआ है। पुराणों में काशी तथा वाराणसी ये दोनों शब्द मिलते हैं। इतिहास में बुद्ध के पश्चात् कभी कोशल के राजाओं द्वारा, कभी मगध के शिशुनागों द्वारा, उसके बाद मौर्य, शुङ्ग तथा गुप्त आदि राजाओं द्वारा तथा अन्त में हर्षवर्धन द्वारा वाराणसी के विजय का वृत्तान्त मिलता है। उन-उन राजाओं के इतिवृत्त का अनुसन्धान करने पर धन्वन्तरि दिवोदास तथा प्रतर्दन आदि के नाम हमें नहीं मिलते हैं। प्रत्युत वार्तिककार कात्यायन द्वारा 'दिवश्च दासे' से दिवोदास शब्द को सिद्ध करने, महाभाष्यकार द्वारा 'दिवोदासाय¹गायते' उदाहरण के देने, कौषीतकि ब्राह्मण, उसकी उपनिषद् तथा ऋक्सर्वानुक्रम²सूत्र में भी दिवोदास के पुत्र प्रतर्दन के उल्लेख, काठकसंहिता के ब्राह्मण भाग में भीमसेन के पुत्र दिवोदास के उल्लेख तथा महाभारत और हरिवंश पुराण में भी इसी के समान वैद्य विद्या के आचार्य धन्वन्तरि के प्रपौत्र, वाराणसी के स्थापक, प्रतर्दन के पिता तथा अलर्क के प्रपितामह तथा कलियुग में होनेवाले दिवोदास के वर्णन मिलने से दिवोदास का समय कलियुग में ऐतरेय ब्राह्मण के समय तथा काठकब्राह्मण, कौषीतकी ब्राह्मण तथा उनकी उपनिषदों के समय या कुछ पूर्व सिद्ध होता है।

कौषीतकि ब्राह्मण के कारण के विषय में विचार करते हुए श्वेतकेतु आरुणि की कथाओं के संवाद के आधार पर पाश्चात्य लेखक वेबर³ ने लिखा है कि कौषीतकि उपनिषद् तथा बृहदारण्यक का काल समान है। विन्टरनीज⁴ नामक विद्वान् का भी इस विषय में यही मत है। उसने कौषीतकि ब्राह्मण को ऐतरेय ब्राह्मण से बाद का स्वीकार किया है। श्री चिन्तामणि⁵ विनायक वैद्य ने ऐतरेय ब्राह्मण में (७-११) कौषीतकि ब्राह्मण के वचन दिखला कर ऐतरेय ब्राह्मण से पूर्व कौषीतकि ब्राह्मण का समय ईसा से २५०० वर्ष पूर्व सिद्ध किया। एस. बी. दीक्षित⁶ महोदय ने ज्योतिष की गणना के आधार पर कौषीतकि ब्राह्मण का समय (ई. पू. २९००-१८५०) के बीच में बतलाया है। कौषीतकि ब्राह्मण (१७-४) का यास्क की निरुक्ति (१-९) में आया होने से तथा तीस अध्याय वाले कौषीतकि ब्राह्मण का 'त्रिंशच्चत्वारिंशतो ब्राह्मणे संज्ञायां उण्' (५-१-६२) सूत्र में तथा कौषीतकी के पूर्व पुरुष कुषीतक का 'विकर्णकुषीटकात्काश्यपे' (४-१-१२४) सूत्र में पाणिनि द्वारा ग्रहण किया गया होने से कौषीतकि ब्राह्मण पाणिनि तथा यास्क से भी प्राचीन है—ऐसा कीथ⁷ ने लिखा है। पाणिनि के समय का विचार करते हुए मंजुश्रीमूल कल्प नामक बौद्ध ऐतिहासिक ग्रन्थ के आधार पर लिखे हुए इतिहास में श्री जायसवालजी⁸ ने पाणिनि का समय (३६६-३३८ ईस्वी पूर्व) लिखा है तथा अन्य व्यक्तियों ने (४०० ईस्वी पूर्व) लिखा है। परन्तु पाणिनि के लेख में वेद-वेदाङ्ग सम्प्रदायों के प्रवर्तक ऋषि, देश, नगर, ग्राम, नद, नदी आदियों का उल्लेख होने पर भी गौतम बुद्ध तथा महावीर के सम्प्रदाय का एक भी विषय न मिलने से बुद्ध तथा महावीर से पूर्व (७००-८०० ईस्वी पूर्व) पाणिनि का समय है ऐसा⁹ गोल्स्टूकर महोदय ने लिखा है। श्रीयुत वेलवल्कर¹⁰ तथा भाण्डारकर¹¹ का भी यही मत है। श्रीयुत चिन्तामणि¹² विनायक वैद्य ने पाणिनि का समय (९०० ईस्वी पूर्व) बतलाया है। इस प्रकार विभिन्न मतों के दिखाई देने पर भी पाणिनि तथा उससे भी पूर्ववर्ती यास्क द्वारा गृहीत कौषीतकि ब्राह्मण का समय बहुत पहले का प्रतीत होते हुए भी कम से कम इस विषय में सब एक मत वाले हैं कि कौषीतकि ब्राह्मण का समय बुद्ध के बाद का तो निश्चित नहीं है। इस प्रकार ऐतरेय तथा कौषीतकि ब्राह्मण के मध्य का होने से यह दिवोदास उपनिषत्कालीन प्रतीत होता है और अपने प्रपितामह धन्वन्तरि को अपने से भी प्राचीन सिद्ध करता है।

मिलिन्दपञ्हो¹³ (मिलिन्दप्रश्न) नामक पालीग्रन्थ में द्वितीय शताब्दी (ईस्वी पूर्व) केमिलिन्द (Menander King of Bactria) के प्रति नागसेन की उक्ति में 'चिकित्सकानां पूर्वका आचार्याः' द्वारा प्रारंभ करके गिनाये हुए आचार्यों


१. १ से १३ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ४२-४३ देखें।

२१२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

में धन्वन्तरि का नाम भी है। इस में रोगोत्पत्ति निदान, स्वभावसमुत्थान तथा चिकित्सा आदि में आचार्यरूप से दिया होने से तथा नागसेन द्वारा अपने से पूर्व चिकित्सा के आचार्य रूप में निर्दिष्ट धन्वन्तरि महाभारत तथा आयुर्वेद के ग्रन्थों में मिलने वाला सुश्रुत संहिता का आचार्य प्राचीन धन्वन्तरि ही स्पष्टरूप से प्रतीत होता है। अथवा कपिल, नारद आदि के साथ आने से यह मूल धन्वन्तरि का द्योतक भी हो सकता है। इसके अतिरिक्त द्वितीय तृतीय शताब्दी ईस्वी पूर्व में बने हुए भरुच और साची के स्तूपों के शिलालेखों के संवाद तथा भरुच के स्तूप में जातक ग्रन्थों के नाम का उल्लेख होने से पाली जातक ग्रन्थों की उस समय भी उपस्थिति तथा प्रसिद्धि सिद्ध होती है। चतुर्थ शताब्दी ईस्वी पूर्व में वैशाली में हुई बौद्धमहासभा में भी जातक ग्रन्थों की प्रसिद्धि थी ऐसा मैकडोनल आदि पाश्चात्य विद्वान् कहते हैं। इन ग्रन्थों के उस समय प्रसिद्ध होने से ग्रन्थों का सत्व तो इस से भी प्राचीन होना चाहिये। इन में से अयोधर¹ (अयोगृह) नामक एक जातक में बुद्ध के किसी पूर्व जन्म में राजपुत्र की अवस्था में धर्मचर्या के लिये राजा की आज्ञा प्राप्त करने के लिये एक कथा दी हुई है जिस में धन्वन्तरि, वैतरण, भोज आदि चिकित्सकों का नाम लेकर ओषधि तथा विषापहरण के द्वारा लोगों का उपकार करने वाले धन्वन्तरि के समान विद्वान् भी काल के मुख में चले गये इत्यादि द्वारा मृत्यु की महिमा का उल्लेख करके अपना धर्मानुराग प्रकट किया गया है। इस कथा के द्वारा बुद्ध के किसी पूर्वजन्म में भी धन्वन्तरि, वैतरण तथा भोज आदि का इस लोक से चले जाने (मृत्यु) का उल्लेख किया गया है। यह कथा उस के किस पूर्व जन्म की है यह ज्ञात न होने पर भी अत्यन्त प्राचीन काल की सूचक प्रतीत होती है। आर्यसूरीय² जातक माला के अयोगृह जातक में व्याधियों के नाशक धन्वन्तरि आदि का अतीतरूप में सम्मानपूर्वक निर्देश किया गया है। आर्यसूरीय जातक में केवल धन्वन्तरि का ही नाम लिया है। अन्य आचार्यों का केवल प्रभृति शब्द से ही ग्रहण किया गया है। परन्तु पाली के लेख में धन्वन्तरि के साथ वैतरण तथा भोज के नाम का भी उल्लेख मिलता है। सुश्रुत संहिता के प्रारंभिक वाक्य में धन्वन्तरि रूप दिवोदास के पास विद्याप्राप्ति के लिये उपस्थित हुए शिष्यों में वैतरण का भी निर्देश किया गया है। इस में ‘सुश्रुतप्रभृतयः ऊचुः’ इस वाक्य में प्रभृति शब्द से भोज आदि का ग्रहण किया गया है ऐसा डल्लण ने व्याख्या में दिया है। परन्तु मेरे पास जो सुश्रुत की प्राचीन ताडपुस्तक है उसके मूल में ही ‘औपधेनववैतरणौरभ्रपौष्कलावतकरवीर्यगोपुररक्षितभोजसुश्रुतप्रभृतय ऊचुः’ इस वाक्य द्वारा वैतरण के समान भोज का भी स्पष्टरूप से उल्लेख किया गया है। इस अयोधर नामक पालीजातक में निर्दिष्ट धन्वन्तरि दिवोदास के शिष्य वैतरण तथा भोज के साहचर्य से मूल धन्वन्तरि प्रतीत नहीं होता, अपितु धन्वन्तरि का अवतार रूप होने से सुश्रुत में धन्वन्तरि शब्द द्वारा व्यवहृत दिवोदास प्रतीत होता है। यहां सुश्रुत आदि अन्य व्यक्तियों का उल्लेख न होने पर भी उपनिषत् काल में दिवोदास के मिलने से, सुश्रुतसंहिता में दिवोदास का धन्वन्तरिरूप से व्यवहार होने से दिवोदासरूप धन्वन्तरि के शिष्य वैतरण तथा भोज का सुश्रुतसंहिता में मिलने से तथा जातकों में आये हुए विषप्रतीकार के विषय का सुश्रुतसंहिता के कल्पस्थान में मिलने से भोज तथा वैतरण के साथ आये हुए सुश्रुत आदि का भी इन्हीं के साथ का समय प्रतीत होता है जैसा कि सुश्रुतसंहिता में दिया है। आग्नेय पुराण के अनुसार आयुर्वेद विद्या के ग्रहण करने में सुश्रुत भी धन्वन्तरि के शिष्यरूप में मिलता है। इस प्रकार दिवोदास रूप धन्वन्तरि की बौद्ध जातक ग्रन्थों से भी प्राचीनता सिद्ध होने से उसके पूर्व पुरुष मूल धन्वन्तरि को तो उससे भी प्राचीन होना चाहिये।

किसी-किसी का यह भी मत है कि विक्रमादित्य के नवरत्नों में क्षपणक, अमरसिंह आदि के साथ आया हुआ धन्वन्तरि ही प्रसिद्ध वैद्याचार्य धन्वन्तरि है। परन्तु नवरत्नों में आया हुआ धन्वन्तरि कवि था, न कि वैद्य। प्राचीन वैद्याचार्य धन्वन्तरि के मिलने से केवल धन्वन्तरि नाम की समानता से यह भ्रान्ति उत्पन्न हुई प्रतीत होती है।


१. १ से २ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ४३-४४ देखें।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २१३

काश्यपसंहिता के शिष्योपक्रमणीय अध्याय में होम्य देवताओं का निर्देश करते हुए प्रजापति, इन्द्र, अश्विनी कुमार तथा अपने तन्त्र के पूर्व आचार्य कश्यप के समान अन्य प्रस्थान (विभाग) के आचार्य धन्वन्तरि का भी स्वाहाकार के द्वारा ग्रहण एवं सम्मान किया गया है जब कि इस में आत्रेय आदि का उल्लेख नहीं किया गया है। दिवोदास, सुश्रुत तथा अन्य धन्वन्तरि के अनुयायियों का भी इसमें उल्लेख नहीं है। द्विव्रणीय अध्याय में 'परतन्त्रस्य समयम्' इस पद द्वारा शल्यतन्त्रका परतन्त्र के रूप में ग्रहण करने से भी उस समय धान्वन्तर सम्प्रदाय की उपस्थिति स्पष्ट है। आत्रेय संहिता में भी 'इति¹ धन्वन्तरिः' 'धान्वन्तरं मतम्' 'धान्वन्तराः' इत्यादि द्वारा अनेक स्थानों पर धन्वन्तरि तथा उस सम्प्रदाय के अन्य पूर्व आचार्यों का सम्मानपूर्वक निर्देश किया गया है। परन्तु दिवोदास तथा सुश्रुत का इस में भी कहीं स्पष्टरूप से उल्लेख नहीं किया है। सुश्रुत में आत्रेय तथा कश्यप का उल्लेख नहीं है। इस प्रकार मारीचि कश्यप तथा पुनर्वसु आत्रेय से धन्वन्तरि की प्राचीनता प्रकट होती है। इस के अतिरिक्त काश्यप संहित में केवल धन्वन्तरि का ही उल्लेख होने से तथा आत्रेय संहिता में धन्वन्तरि के सम्प्रदाय वालों का भी उल्लेख होने से धन्वन्तरि सम्प्रदाय के फैलने के बाद आत्रेय पुनर्वसु की उत्पत्ति प्रतीत होती है। धन्वन्तरि के पुनर्वसु आत्रेय से भी प्राचीन सिद्ध होने से उस के अनुयायी अग्निवेश, भेड आदि से तो वह निश्चित ही प्राचीन है। भेडसंहिता तथा चरक संहिता में आये हुए धान्वन्तर घृत आदि के उल्लेख से भी यही प्रकट होता है। सुश्रुत संहिता के शारीरस्थान के तृतीय अध्याय में शौनक, कृतवीर्य, पाराशर्य, मार्कण्डेय, सुभूतिगौतम आदि प्राचीनतम पूर्व आचार्यों का निर्देश मिलता है। इसके विपरीत आत्रेय तथा काश्यपसंहिता में काङ्क्षायन आदि का भी पूर्व आचार्यों के रूप में निर्देश है। डल्लण की सुश्रुत टीका में किसी-किसी के मत से दिवोदास के शिष्यरूप² में काङ्क्षायन का उल्लेख किया गया है। इस अवस्था में दिवोदास के शिष्य काङ्क्षायन का आत्रेय तथा काश्यप संहिता में निर्देश होने से दिवोदास तथा धन्वन्तरि का आत्रेय तथा कश्यप से पूर्व होना और भी सुदृढ़ हो जाता है।

हरिवंश पुराण में धन्वन्तरि की भरद्वाज से आयुर्वेद विद्या की प्राप्ति तथा दिवोदास द्वारा भी भरद्वाज के आश्रम का उल्लेख होने से तीन पीढ़ियों के अन्तर वाले धन्वन्तरि तथा दिवोदास के साथ सम्बद्ध भरद्वाज एक ही व्यक्ति है अथवा उसी गोत्र का कोई अन्य व्यक्ति है इस विषय में कुछ नहीं मिलता है। चरक संहिता के उपक्रम में भी भरद्वाज द्वारा आत्रेय की विद्या प्राप्ति तथा बाद में भरद्वाज के मत का आत्रेय द्वारा खण्डन तथा वातकलाकलीय अध्याय में 'कुमारशिर' विशेषण युक्त भरद्वाज का निर्देश है। इसी प्रकार काश्यप संहिता के रोगाध्याय में भी कृष्ण भरद्वाज का निर्देश है। इस प्रकार आयुर्वेद के ग्रन्थों में नाना भरद्वाजों का आचार्यरूप में उल्लेख मिलता है। इससे एक ही या उस गोत्र वाले भिन्न-भिन्न भरद्वाज नामवाले व्यक्तियों के साथ धन्वन्तरि, मारीच कश्यप, आत्रेय पुनर्वसु तथा दिवोदास का समकालीन संबन्ध प्रतीत होता है। आत्रेय पुनर्वसु तथा मारीच कश्यप द्वारा गृहीत धन्वन्तरि यद्यपि मूलधन्वन्तरि की सन्तति होने के कारण उस नाम से व्यवहृत दिवोदास भी हो सकता है तथापि कश्यप द्वारा स्वाहाकार देवता के रूप में भी धन्वन्तरि का निर्देश किया होने से, आत्रेय तथा कश्यप दोनों द्वारा काशीराज के रूप में प्रसिद्ध दिवोदास को प्रकट करने वाले काशीपति तथा दिवोदास आदि किसी विशेषण से रहित केवल धन्वन्तरि शब्द द्वारा उसका निर्देश किया होनेसे तथा महाभारत के अनुसार धन्वन्तरि का अष्ट प्रस्थानों का आचार्य तथा उसकी संहिता के प्राचीन समय में विद्यमान होने के निर्देश से प्रतीत होता है कि मूल धन्वन्तरि संहिता के विषयों को लेकर ही आत्रेय तथा कश्यप ने स्थान-स्थान पर धान्वन्तर मत दिये हैं। पूर्वोक्तानुसार दिवोदास नामक राजा के साथ आये हुए, गालव के प्रति केवल मारीच कश्यप के आश्रम का निर्देश महाभारत में मिलने से दिवोदास के समय मारीच कश्यप का अतीत रूप में होना प्रकट होता है अथवा आश्रम में मारीच


१. १-२ की टि. उपो. संस्कृत पृ. ४३-४४ देखें।