भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

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शब्द तो मिलता है पर वाराणसी शब्द नहीं मिलता है। इससे अनुमान किया जाता है कि देशवाचक काशी शब्द प्राचीन काल से प्रचलित है तथा नगरी वाचक वाराणसी शब्द उपनिषदों के समय के बाद से ही प्रसिद्ध हुआ है। पुराणों में काशी तथा वाराणसी ये दोनों शब्द मिलते हैं। इतिहास में बुद्ध के पश्चात् कभी कोशल के राजाओं द्वारा, कभी मगध के शिशुनागों द्वारा, उसके बाद मौर्य, शुङ्ग तथा गुप्त आदि राजाओं द्वारा तथा अन्त में हर्षवर्धन द्वारा वाराणसी के विजय का वृत्तान्त मिलता है। उन-उन राजाओं के इतिवृत्त का अनुसन्धान करने पर धन्वन्तरि दिवोदास तथा प्रतर्दन आदि के नाम हमें नहीं मिलते हैं। प्रत्युत वार्तिककार कात्यायन द्वारा 'दिवश्च दासे' से दिवोदास शब्द को सिद्ध करने, महाभाष्यकार द्वारा 'दिवोदासाय¹गायते' उदाहरण के देने, कौषीतकि ब्राह्मण, उसकी उपनिषद् तथा ऋक्सर्वानुक्रम²सूत्र में भी दिवोदास के पुत्र प्रतर्दन के उल्लेख, काठकसंहिता के ब्राह्मण भाग में भीमसेन के पुत्र दिवोदास के उल्लेख तथा महाभारत और हरिवंश पुराण में भी इसी के समान वैद्य विद्या के आचार्य धन्वन्तरि के प्रपौत्र, वाराणसी के स्थापक, प्रतर्दन के पिता तथा अलर्क के प्रपितामह तथा कलियुग में होनेवाले दिवोदास के वर्णन मिलने से दिवोदास का समय कलियुग में ऐतरेय ब्राह्मण के समय तथा काठकब्राह्मण, कौषीतकी ब्राह्मण तथा उनकी उपनिषदों के समय या कुछ पूर्व सिद्ध होता है।

कौषीतकि ब्राह्मण के कारण के विषय में विचार करते हुए श्वेतकेतु आरुणि की कथाओं के संवाद के आधार पर पाश्चात्य लेखक वेबर³ ने लिखा है कि कौषीतकि उपनिषद् तथा बृहदारण्यक का काल समान है। विन्टरनीज⁴ नामक विद्वान् का भी इस विषय में यही मत है। उसने कौषीतकि ब्राह्मण को ऐतरेय ब्राह्मण से बाद का स्वीकार किया है। श्री चिन्तामणि⁵ विनायक वैद्य ने ऐतरेय ब्राह्मण में (७-११) कौषीतकि ब्राह्मण के वचन दिखला कर ऐतरेय ब्राह्मण से पूर्व कौषीतकि ब्राह्मण का समय ईसा से २५०० वर्ष पूर्व सिद्ध किया। एस. बी. दीक्षित⁶ महोदय ने ज्योतिष की गणना के आधार पर कौषीतकि ब्राह्मण का समय (ई. पू. २९००-१८५०) के बीच में बतलाया है। कौषीतकि ब्राह्मण (१७-४) का यास्क की निरुक्ति (१-९) में आया होने से तथा तीस अध्याय वाले कौषीतकि ब्राह्मण का 'त्रिंशच्चत्वारिंशतो ब्राह्मणे संज्ञायां उण्' (५-१-६२) सूत्र में तथा कौषीतकी के पूर्व पुरुष कुषीतक का 'विकर्णकुषीटकात्काश्यपे' (४-१-१२४) सूत्र में पाणिनि द्वारा ग्रहण किया गया होने से कौषीतकि ब्राह्मण पाणिनि तथा यास्क से भी प्राचीन है—ऐसा कीथ⁷ ने लिखा है। पाणिनि के समय का विचार करते हुए मंजुश्रीमूल कल्प नामक बौद्ध ऐतिहासिक ग्रन्थ के आधार पर लिखे हुए इतिहास में श्री जायसवालजी⁸ ने पाणिनि का समय (३६६-३३८ ईस्वी पूर्व) लिखा है तथा अन्य व्यक्तियों ने (४०० ईस्वी पूर्व) लिखा है। परन्तु पाणिनि के लेख में वेद-वेदाङ्ग सम्प्रदायों के प्रवर्तक ऋषि, देश, नगर, ग्राम, नद, नदी आदियों का उल्लेख होने पर भी गौतम बुद्ध तथा महावीर के सम्प्रदाय का एक भी विषय न मिलने से बुद्ध तथा महावीर से पूर्व (७००-८०० ईस्वी पूर्व) पाणिनि का समय है ऐसा⁹ गोल्स्टूकर महोदय ने लिखा है। श्रीयुत वेलवल्कर¹⁰ तथा भाण्डारकर¹¹ का भी यही मत है। श्रीयुत चिन्तामणि¹² विनायक वैद्य ने पाणिनि का समय (९०० ईस्वी पूर्व) बतलाया है। इस प्रकार विभिन्न मतों के दिखाई देने पर भी पाणिनि तथा उससे भी पूर्ववर्ती यास्क द्वारा गृहीत कौषीतकि ब्राह्मण का समय बहुत पहले का प्रतीत होते हुए भी कम से कम इस विषय में सब एक मत वाले हैं कि कौषीतकि ब्राह्मण का समय बुद्ध के बाद का तो निश्चित नहीं है। इस प्रकार ऐतरेय तथा कौषीतकि ब्राह्मण के मध्य का होने से यह दिवोदास उपनिषत्कालीन प्रतीत होता है और अपने प्रपितामह धन्वन्तरि को अपने से भी प्राचीन सिद्ध करता है।

मिलिन्दपञ्हो¹³ (मिलिन्दप्रश्न) नामक पालीग्रन्थ में द्वितीय शताब्दी (ईस्वी पूर्व) केमिलिन्द (Menander King of Bactria) के प्रति नागसेन की उक्ति में 'चिकित्सकानां पूर्वका आचार्याः' द्वारा प्रारंभ करके गिनाये हुए आचार्यों


१. १ से १३ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ४२-४३ देखें।