भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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२१२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

में धन्वन्तरि का नाम भी है। इस में रोगोत्पत्ति निदान, स्वभावसमुत्थान तथा चिकित्सा आदि में आचार्यरूप से दिया होने से तथा नागसेन द्वारा अपने से पूर्व चिकित्सा के आचार्य रूप में निर्दिष्ट धन्वन्तरि महाभारत तथा आयुर्वेद के ग्रन्थों में मिलने वाला सुश्रुत संहिता का आचार्य प्राचीन धन्वन्तरि ही स्पष्टरूप से प्रतीत होता है। अथवा कपिल, नारद आदि के साथ आने से यह मूल धन्वन्तरि का द्योतक भी हो सकता है। इसके अतिरिक्त द्वितीय तृतीय शताब्दी ईस्वी पूर्व में बने हुए भरुच और साची के स्तूपों के शिलालेखों के संवाद तथा भरुच के स्तूप में जातक ग्रन्थों के नाम का उल्लेख होने से पाली जातक ग्रन्थों की उस समय भी उपस्थिति तथा प्रसिद्धि सिद्ध होती है। चतुर्थ शताब्दी ईस्वी पूर्व में वैशाली में हुई बौद्धमहासभा में भी जातक ग्रन्थों की प्रसिद्धि थी ऐसा मैकडोनल आदि पाश्चात्य विद्वान् कहते हैं। इन ग्रन्थों के उस समय प्रसिद्ध होने से ग्रन्थों का सत्व तो इस से भी प्राचीन होना चाहिये। इन में से अयोधर¹ (अयोगृह) नामक एक जातक में बुद्ध के किसी पूर्व जन्म में राजपुत्र की अवस्था में धर्मचर्या के लिये राजा की आज्ञा प्राप्त करने के लिये एक कथा दी हुई है जिस में धन्वन्तरि, वैतरण, भोज आदि चिकित्सकों का नाम लेकर ओषधि तथा विषापहरण के द्वारा लोगों का उपकार करने वाले धन्वन्तरि के समान विद्वान् भी काल के मुख में चले गये इत्यादि द्वारा मृत्यु की महिमा का उल्लेख करके अपना धर्मानुराग प्रकट किया गया है। इस कथा के द्वारा बुद्ध के किसी पूर्वजन्म में भी धन्वन्तरि, वैतरण तथा भोज आदि का इस लोक से चले जाने (मृत्यु) का उल्लेख किया गया है। यह कथा उस के किस पूर्व जन्म की है यह ज्ञात न होने पर भी अत्यन्त प्राचीन काल की सूचक प्रतीत होती है। आर्यसूरीय² जातक माला के अयोगृह जातक में व्याधियों के नाशक धन्वन्तरि आदि का अतीतरूप में सम्मानपूर्वक निर्देश किया गया है। आर्यसूरीय जातक में केवल धन्वन्तरि का ही नाम लिया है। अन्य आचार्यों का केवल प्रभृति शब्द से ही ग्रहण किया गया है। परन्तु पाली के लेख में धन्वन्तरि के साथ वैतरण तथा भोज के नाम का भी उल्लेख मिलता है। सुश्रुत संहिता के प्रारंभिक वाक्य में धन्वन्तरि रूप दिवोदास के पास विद्याप्राप्ति के लिये उपस्थित हुए शिष्यों में वैतरण का भी निर्देश किया गया है। इस में ‘सुश्रुतप्रभृतयः ऊचुः’ इस वाक्य में प्रभृति शब्द से भोज आदि का ग्रहण किया गया है ऐसा डल्लण ने व्याख्या में दिया है। परन्तु मेरे पास जो सुश्रुत की प्राचीन ताडपुस्तक है उसके मूल में ही ‘औपधेनववैतरणौरभ्रपौष्कलावतकरवीर्यगोपुररक्षितभोजसुश्रुतप्रभृतय ऊचुः’ इस वाक्य द्वारा वैतरण के समान भोज का भी स्पष्टरूप से उल्लेख किया गया है। इस अयोधर नामक पालीजातक में निर्दिष्ट धन्वन्तरि दिवोदास के शिष्य वैतरण तथा भोज के साहचर्य से मूल धन्वन्तरि प्रतीत नहीं होता, अपितु धन्वन्तरि का अवतार रूप होने से सुश्रुत में धन्वन्तरि शब्द द्वारा व्यवहृत दिवोदास प्रतीत होता है। यहां सुश्रुत आदि अन्य व्यक्तियों का उल्लेख न होने पर भी उपनिषत् काल में दिवोदास के मिलने से, सुश्रुतसंहिता में दिवोदास का धन्वन्तरिरूप से व्यवहार होने से दिवोदासरूप धन्वन्तरि के शिष्य वैतरण तथा भोज का सुश्रुतसंहिता में मिलने से तथा जातकों में आये हुए विषप्रतीकार के विषय का सुश्रुतसंहिता के कल्पस्थान में मिलने से भोज तथा वैतरण के साथ आये हुए सुश्रुत आदि का भी इन्हीं के साथ का समय प्रतीत होता है जैसा कि सुश्रुतसंहिता में दिया है। आग्नेय पुराण के अनुसार आयुर्वेद विद्या के ग्रहण करने में सुश्रुत भी धन्वन्तरि के शिष्यरूप में मिलता है। इस प्रकार दिवोदास रूप धन्वन्तरि की बौद्ध जातक ग्रन्थों से भी प्राचीनता सिद्ध होने से उसके पूर्व पुरुष मूल धन्वन्तरि को तो उससे भी प्राचीन होना चाहिये।

किसी-किसी का यह भी मत है कि विक्रमादित्य के नवरत्नों में क्षपणक, अमरसिंह आदि के साथ आया हुआ धन्वन्तरि ही प्रसिद्ध वैद्याचार्य धन्वन्तरि है। परन्तु नवरत्नों में आया हुआ धन्वन्तरि कवि था, न कि वैद्य। प्राचीन वैद्याचार्य धन्वन्तरि के मिलने से केवल धन्वन्तरि नाम की समानता से यह भ्रान्ति उत्पन्न हुई प्रतीत होती है।


१. १ से २ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ४३-४४ देखें।

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