काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २१३
काश्यपसंहिता के शिष्योपक्रमणीय अध्याय में होम्य देवताओं का निर्देश करते हुए प्रजापति, इन्द्र, अश्विनी कुमार तथा अपने तन्त्र के पूर्व आचार्य कश्यप के समान अन्य प्रस्थान (विभाग) के आचार्य धन्वन्तरि का भी स्वाहाकार के द्वारा ग्रहण एवं सम्मान किया गया है जब कि इस में आत्रेय आदि का उल्लेख नहीं किया गया है। दिवोदास, सुश्रुत तथा अन्य धन्वन्तरि के अनुयायियों का भी इसमें उल्लेख नहीं है। द्विव्रणीय अध्याय में 'परतन्त्रस्य समयम्' इस पद द्वारा शल्यतन्त्रका परतन्त्र के रूप में ग्रहण करने से भी उस समय धान्वन्तर सम्प्रदाय की उपस्थिति स्पष्ट है। आत्रेय संहिता में भी 'इति¹ धन्वन्तरिः' 'धान्वन्तरं मतम्' 'धान्वन्तराः' इत्यादि द्वारा अनेक स्थानों पर धन्वन्तरि तथा उस सम्प्रदाय के अन्य पूर्व आचार्यों का सम्मानपूर्वक निर्देश किया गया है। परन्तु दिवोदास तथा सुश्रुत का इस में भी कहीं स्पष्टरूप से उल्लेख नहीं किया है। सुश्रुत में आत्रेय तथा कश्यप का उल्लेख नहीं है। इस प्रकार मारीचि कश्यप तथा पुनर्वसु आत्रेय से धन्वन्तरि की प्राचीनता प्रकट होती है। इस के अतिरिक्त काश्यप संहित में केवल धन्वन्तरि का ही उल्लेख होने से तथा आत्रेय संहिता में धन्वन्तरि के सम्प्रदाय वालों का भी उल्लेख होने से धन्वन्तरि सम्प्रदाय के फैलने के बाद आत्रेय पुनर्वसु की उत्पत्ति प्रतीत होती है। धन्वन्तरि के पुनर्वसु आत्रेय से भी प्राचीन सिद्ध होने से उस के अनुयायी अग्निवेश, भेड आदि से तो वह निश्चित ही प्राचीन है। भेडसंहिता तथा चरक संहिता में आये हुए धान्वन्तर घृत आदि के उल्लेख से भी यही प्रकट होता है। सुश्रुत संहिता के शारीरस्थान के तृतीय अध्याय में शौनक, कृतवीर्य, पाराशर्य, मार्कण्डेय, सुभूतिगौतम आदि प्राचीनतम पूर्व आचार्यों का निर्देश मिलता है। इसके विपरीत आत्रेय तथा काश्यपसंहिता में काङ्क्षायन आदि का भी पूर्व आचार्यों के रूप में निर्देश है। डल्लण की सुश्रुत टीका में किसी-किसी के मत से दिवोदास के शिष्यरूप² में काङ्क्षायन का उल्लेख किया गया है। इस अवस्था में दिवोदास के शिष्य काङ्क्षायन का आत्रेय तथा काश्यप संहिता में निर्देश होने से दिवोदास तथा धन्वन्तरि का आत्रेय तथा कश्यप से पूर्व होना और भी सुदृढ़ हो जाता है।
हरिवंश पुराण में धन्वन्तरि की भरद्वाज से आयुर्वेद विद्या की प्राप्ति तथा दिवोदास द्वारा भी भरद्वाज के आश्रम का उल्लेख होने से तीन पीढ़ियों के अन्तर वाले धन्वन्तरि तथा दिवोदास के साथ सम्बद्ध भरद्वाज एक ही व्यक्ति है अथवा उसी गोत्र का कोई अन्य व्यक्ति है इस विषय में कुछ नहीं मिलता है। चरक संहिता के उपक्रम में भी भरद्वाज द्वारा आत्रेय की विद्या प्राप्ति तथा बाद में भरद्वाज के मत का आत्रेय द्वारा खण्डन तथा वातकलाकलीय अध्याय में 'कुमारशिर' विशेषण युक्त भरद्वाज का निर्देश है। इसी प्रकार काश्यप संहिता के रोगाध्याय में भी कृष्ण भरद्वाज का निर्देश है। इस प्रकार आयुर्वेद के ग्रन्थों में नाना भरद्वाजों का आचार्यरूप में उल्लेख मिलता है। इससे एक ही या उस गोत्र वाले भिन्न-भिन्न भरद्वाज नामवाले व्यक्तियों के साथ धन्वन्तरि, मारीच कश्यप, आत्रेय पुनर्वसु तथा दिवोदास का समकालीन संबन्ध प्रतीत होता है। आत्रेय पुनर्वसु तथा मारीच कश्यप द्वारा गृहीत धन्वन्तरि यद्यपि मूलधन्वन्तरि की सन्तति होने के कारण उस नाम से व्यवहृत दिवोदास भी हो सकता है तथापि कश्यप द्वारा स्वाहाकार देवता के रूप में भी धन्वन्तरि का निर्देश किया होने से, आत्रेय तथा कश्यप दोनों द्वारा काशीराज के रूप में प्रसिद्ध दिवोदास को प्रकट करने वाले काशीपति तथा दिवोदास आदि किसी विशेषण से रहित केवल धन्वन्तरि शब्द द्वारा उसका निर्देश किया होनेसे तथा महाभारत के अनुसार धन्वन्तरि का अष्ट प्रस्थानों का आचार्य तथा उसकी संहिता के प्राचीन समय में विद्यमान होने के निर्देश से प्रतीत होता है कि मूल धन्वन्तरि संहिता के विषयों को लेकर ही आत्रेय तथा कश्यप ने स्थान-स्थान पर धान्वन्तर मत दिये हैं। पूर्वोक्तानुसार दिवोदास नामक राजा के साथ आये हुए, गालव के प्रति केवल मारीच कश्यप के आश्रम का निर्देश महाभारत में मिलने से दिवोदास के समय मारीच कश्यप का अतीत रूप में होना प्रकट होता है अथवा आश्रम में मारीच
१. १-२ की टि. उपो. संस्कृत पृ. ४३-४४ देखें।