भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 228, कुल 942 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 228

२१४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

कश्यप की उपस्थिति भी संभवतः हो सकती है। इस प्रकार मारीच कश्यप का समय धन्वन्तरि के पश्चात् तथा दिवोदास के पूर्व या उसके साथ आता है। चरक तथा काश्यपसंहिता में परस्पर आत्रेय द्वारा मारीचि कश्यप का तथा मारीचि कश्यप द्वारा पुनर्वसु आत्रेय का निर्देश होने से, आत्रेय संहिता के वातकलाकलीय अध्याय में मारीच कश्यप तथा आत्रेय पुनर्वसु के परस्पर संवाद का उल्लेख होने से तथा दोनों में उसी रूप में अथवा कुछ अन्तर के साथ भरद्वाज का उल्लेख मिलने से इन दोनों आचार्यों का काल लगभग साथ-साथ प्रतीत होता है।

सुश्रुत—सुश्रुतसंहिता¹ में लिखा है कि सुश्रुत संहिता का निर्माता विश्वामित्र का पुत्र सुश्रुत है। चक्रदत्त ने भी टीका² में ऐसा ही लिखा है। महाभारत³ में भी विश्वामित्र के पुत्रों में सुश्रुत का नाम मिलता है। ऋग्वेद के नाना मन्त्रों का द्रष्टा तथा भगवान् राम का धनुर्विद्या का उपदेशक महर्षि विश्वामित्र अन्य ही प्राचीन व्यक्ति प्रतीत होता है। सुश्रुत का उपनिषत्कालीन दिवोदास के शिष्य रूप में उल्लेख होने से तथा सुश्रुतसंहिता में कृष्ण⁴ का नाम मिलने से कश्यप तथा आत्रेय के समान गोत्रवाला विश्वामित्र का पुत्र सुश्रुत भी दिवोदास की तरह उपनिषत्काल में तथा भगवान् श्रीकृष्ण के उद्भव के पश्चात् हुआ प्रतीत होता है। ऋषि विश्वामित्र द्वारा अपने पुत्र सुश्रुत को काशीराज धन्वन्तरि (दिवोदास) के पास अध्ययन के लिये भेजने का उल्लेख भावप्रकाश⁵ में भी है। डल्लण की व्याख्या में विश्वामित्र के नाम से उद्धृत वैद्यक के वचन⁶ भी मिलते हैं। इस विश्वामित्र के विषय में पूर्ण परिचय नहीं मिलता है।

सुश्रुत संहिता के समय के विषय में विचार करते हुए हैस (Hass) नामक पाश्चात्य विद्वान् ने सुश्रुत आदि को १२ वीं शताब्दी का, जोन्स विल्सन (Jonewilson) ने ९-१० शताब्दी का तथा अन्य कुछ विद्वानों ने इसे चतुर्थ-पंचम शताब्दी का माना है।

मैकडोनल¹ नामक विद्वान् लिखता है कि सुश्रुत ई. प. चतुर्थ शताब्दी से पहले का प्रतीत नहीं होता है क्योंकि बावर मैन्युस्क्रिप्ट के प्रकरण चरक तथा सुश्रुत के साथ केवल भावों में ही समानता नहीं रखते अपितु उनमें शब्दों की भी समानता मिलती है।

वेबर² (Weber) लिखता है कि भाषा तथा शैली में सुश्रुत की वराहमिहिर के लेखों से समानता है।

अन्त³ में हवर्ट गोवन (H. Gowen) ने तो यहां तक लिख दिया है कि सुश्रुत नाम का कोई व्यक्ति आजतक हुआ ही नहीं है। और यदि हुआ भी है तो वह साक्रिटीज (Socrates) के अतिरिक्त और कोई नहीं है।

किन्तु उपर्युक्त के विषय में हमें यह कहना है कि लगभग दो सहस्त्र वर्ष प्राचीन दार्शनिक आर्य नागार्जुन² का उपायहृदय नामक दार्शनिक ग्रन्थ उपलब्ध हुआ है। भारत में मूलसंस्कृत लेख के न मिलने पर भी अत्यन्त प्राचीन काल


१. १ से ३ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ४५ देखें।
२. नागार्जुन नामवाले अनेक प्राचीन विद्वान् मिलते हैं। नागार्जुन की रचना रूप से मिलने वाले कक्षपुट, योगशतक, तत्वप्रकाश आदि अनेक ग्रन्थों में कक्षपुट आदि कौतुक ग्रन्थों (जादू टोने के ग्रन्थों) का प्रणेता सिद्ध नागार्जुन-इस विशेषण युक्त नाम वाले व्यक्ति को बताया है। वैद्यक विषय में योगशतक नाम का ग्रन्थ अभी मिला है जिसका तिब्बतीय भाषा में अनुवाद भी मिलता है। नागार्जुन की ही एक अन्य 'चित्तानन्दपटीयसी' नामक वैद्यक की संस्कृत में लिखी हुई ताड़पुस्तक तिब्बत के गीममठ में है ऐसा सुनने में आता है। इसके अन्य भी ग्रन्थ मिलते हैं। तन्त्रों में आया हुआ बौद्धों का अध्यात्म विषयक तत्वप्रकाश, परमरहस्य सुखाभिसंबोधि तथा समयमुद्रा आदि इसके अन्य ग्रन्थ हैं। केवल बौद्धदर्शनों के विषय में माध्यमिक वृत्ति, तर्कशास्त्र तथा उपायहृदय आदि ग्रन्थ हैं। इन भिन्न-भिन्न विषय के ग्रन्थों का निर्माता एक ही व्यक्ति है या भिन्न-भिन्न यह विचारणीय प्रश्न है। अष्टम शताब्दी में भारत में यात्रा के लिये आये हुए अल्वेरुनी नामक यात्री ने अपने से सौ वर्ष पूर्व रसायन विद्या में निपुण, बोधिसत्व (बुद्ध बनने के लिये तपस्या