भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २१५

से चीनी भाषा में विद्यमान अनुवाद से हमारे परम मित्र श्री तुच्ची महोदय ने संस्कृत में पुनः अनुवाद करके जो प्रकाशित किया है उस ग्रन्थ के प्रारम्भ में अन्य तन्त्रों के प्रसङ्ग में ‘ओषधिविद्या षड्विधा-ओषधिनाम, ओषधिगुणः, ओषधिरसः, ओषधिवीर्यं, सन्निपातो, विपाकश्चेति भैषज्यधर्म’ इत्यादि द्वारा भैषज्यविद्या के प्रधान विषयों को देकर बाद में शास्त्र का वर्णन करते हुए ‘यथा सुवैद्यको भेषजकुशलो मैत्रचित्तेन शिक्षकः सुश्रुतः’ इत्यादि द्वारा भैषज्यविद्या के आचार्यरूप में सम्मान एवं गौरव के साथ सुश्रुत का नाम दिया है। इस प्रकार लगभग दो सहस्रवर्ष पूर्ववर्ती आर्य नागार्जुन द्वारा भी आचार्य के रूप में सुश्रुत का नाम दिया होना इसकी अर्वाचीनता के प्रतिवाद के लिये पर्याप्त प्रमाण है।

इसके अतिरिक्त पूर्वोद्दिष्ट खोटाङ् प्रदेश से प्राप्त भोजपत्र पर लिखे हुए नावनीतक नामक ग्रन्थ की लिपि को देखकर सब विद्वानों ने इसे तृतीय या चतुर्थ शताब्दी का निश्चित किया है। प्राचीन काल में आजकल के समान शीघ्र चलने वाले स्टीम ऐंजिन, हवाईजहाज, तार, रेडियो आदि अभाव में भी इस भारतीय ग्रन्थ के इतने दुर्गम तथा दूर प्रदेश में प्रचार


करने वाला) तथा अत्यन्त प्रसिद्ध नागार्जुन नामक विद्वान् का उल्लेख किया है। ७वीं शताब्दी में भारत में आये हुये ह्वुन सङ्ग नामक चीनी यात्री ने अपने से सात-आठ सौ वर्ष पूर्व शान्तिदेव तथा अश्वघोष आदि की तरह अत्यन्त प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान् शातवाहन के मित्र नागार्जुन का उल्लेख किया है जो कि रसायन के द्वारा पत्थर को भी स्वर्ण बना देता था। राजतरङ्गिणी के लेखक कल्हण ने बुद्ध के आविर्भाव से १५० (डेढ सौ) वर्ष पूर्व नागार्जुन नामक प्रसिद्ध विद्वान् के होने का निर्देश किया है। इस प्रकार भिन्न-भिन्न समयों के मिलने से इन नागार्जुनो में एकता प्रतीत नहीं होती अर्थात् ये परस्पर भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हैं। नागार्जुन द्वारा शातवाहन को पत्र भेजने का वृत्तान्त अन्यत्र प्रकाशित हुआ है। मेरे संग्रहालय में एक फटा हुआ संस्कृत भाषा में ताडपत्र पर लिखा हुआ शातवाहन चरित हैं जिसमें ‘दृष्टतत्त्वों बोधिसत्त्वो महासत्त्वो महाराजगुरुः श्रीनागार्जुनाभिधानः शाक्यभिक्षुराजः’ इस प्रकार के स्पष्ट उल्लेख होने से बोधिसत्त्वस्थानीय, कुरुकुल्ला के उपदेश के कारण तान्त्रिक तथा शाक्यभिक्षु नागार्जुन शातवाहन का समकालीन सिद्ध होता है। ह्वून् सङ्ग ने बोधिसत्त्व तथा धातुवाद (रसायन) के विद्वान् होने से इसी शातवाहन के समकालीन नागार्जुन का सम्भवतः उल्लेख किया है। नागार्जुन द्वारा शातवाहन को रसायन गुटिका ओषधि के देने का उल्लेख भी मिलता है। बाणभट्ट के हर्ष चरित (उ. ८) में समतिक्रामति च कियत्यपि काले तामेकावलीं तस्मान्नागराजान्नागार्जुनो नाम.....लेभे च, त्रिसमुद्राधिपतये शातवाहनाय नरेन्द्राय सुहृदे स ददौ ताम्’ इस लेख से नागार्जुन द्वारा अपने मित्र शातवाहन को रत्नों की एकावली (हार) के देने के उल्लेख से इन दोनों की मित्रता तथा समान काल प्रतीत होता है। इस प्रकार शातवाहन का समकालीन वोधिसत्त्वस्थानीय अत्यन्त विद्वान् तथा तन्त्र विद्या में निपुण नागार्जुन रसायन तथा वैद्यक का भी विद्वान् प्रतीत होता है। इस प्रकार तन्त्रों से युक्त बौद्ध अध्यात्मग्रन्थ तत्त्व प्रकाश आदि भी इस तान्त्रिक तथा बोधिसत्त्व नागार्जुन के हो सकते हैं। पाटलिपुत्र के शिलापट्ट पर लिखे हुए ‘नागार्जुनेन लिखिताः स्तम्भे पाटलिपुत्रके’ तथा वृन्द और चक्रपाणि द्वारा दिये गये ‘नागार्जुन के अमुक-अमुक रोग के प्रतिकार के लिये औषधयोग’ भी इसी नागार्जुन के प्रतीत होते हैं। सप्तम शताब्दी का निर्देश करने वाला अल्बेरुनी का लेख ह्वून् सङ्ग के लेख से ही खंडित हो जाने के कारण, उसके अनुसार अन्य नागार्जुन के न मिलने से आनुश्रविक तथा काल्पनिक समय को लिखकर शातवाहन के समकालीन नागार्जुन से ही अभिप्राय प्रतीत होता है। माध्यमिक वृत्ति तथा उपायहृदय (छायानुवाद रूप से प्रकाशित) में तान्त्रिक विषयों से रहित केवल अध्यात्म प्रधान प्रौढ़ शैली के होने से इस तान्त्रिक नागार्जुन से भिन्न नागार्जुन की कृतियां प्रतीत होती है। उपायहृदय में दर्शन से भिन्न विषयों के प्रसङ्ग में भैषज्य विद्या के प्रधानविषय रूप ६ भैषज्य धर्मों का केवल साधारण रूप से (नाममात्र) निर्देश होने से तथा धातु रसायन आदि विषयों का बिलकुल उल्लेख न होने से इस उपायहृदय तथा माध्यमिक वृत्ति का निर्माता अन्य ही महायान पथ का स्थापक दार्शनिक आर्य नागार्जुन प्रतीत होता है। राजतरङ्गिणी में निर्दिष्ट नागार्जुन का बौद्ध होने पर भी राजा के रूप में उल्लेख किया गया है। माध्यमिक वृत्ति आदि के कर्ता नागार्जुन का कहीं भी राजा के रूप में उल्लेख न मिलने से केवल समान नामवाला राजा नागार्जुन कोई भिन्न ही व्यक्ति प्रतीत होता है।

१५ का.सं.