भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 230

२१६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

एवं प्राप्ति के लिये विशेष समय की अपेक्षा होने से ग्रन्थ की रचना और भी प्राचीन प्रतीत होती है। इस ग्रन्थ में मङ्गलाचरण के रूप में बुद्ध का उल्लेख मिलने से बुद्ध के कितने समय पश्चात् इस ग्रन्थ की रचना हुई है यह नहीं कहा जा सकता। इस प्राचीन ग्रन्थ में आत्रेय पुनर्वसु तथा उसके अनुयायी क्षारपाणि, हारीत, जातूकर्ण, पराशर तथा भेड आदि तथा काश्यप जीवक और सुश्रुत के नाम तथा उनके नाम से ओषधियों का उल्लेख मिलता है। उसमें आई हुई कुछ ओषधियों के वर्तमान चरक संहिता में मिलने पर भी उसमें आत्रेय नाम से उल्लेख किया गया है। चरक तथा नागार्जुन के नामों का इसमें उल्लेख नहीं मिलता है। चरक नाम से प्रसिद्ध चरकसंहिता के आविर्भाव के बाद यदि नावनीतक का निर्माण हुआ हो तो वाग्भट आदि ग्रन्थों के समान प्रसिद्ध चरक का उल्लेख इसमें अवश्य होता। इस प्रकार यह चरक के समय से भी प्राचीन प्रतीत होता है। यदि किसी बौद्ध ने इस ग्रन्थ का निर्माण किया हो तो वैद्यक में भी प्रसिद्ध बौद्धाचार्य नागार्जुन या अन्य किसी वैद्यक में प्रसिद्ध बौद्धाचार्य का भी इसमें उल्लेख होना चाहिये था। इस प्रकार यह ग्रन्थ आत्रेय, उसके अनुयायी, सुश्रुत, काश्यप तथा जीवक के बाद तथा नागार्जुन के समय के पूर्व का होने से इसमें आया सुश्रुत भी नागार्जुन से पूर्व का सिद्ध होता है।

इस प्रकार सुश्रुत न केवल आर्य नागार्जुन तथा नावनीतक से ही प्राचीन है अपितु महाभाष्यकार के ‘तद्धितेष्वचामादेः’ (७-२-११७) तथा इको गुणवृद्धी (१-१-३) सूत्रों की व्याख्या में ‘सौश्रुतः’ तथा ‘शाकपार्थिवादीनामुपसंख्यानम्’ (२-१-१७०) इस वार्तिक में ‘कुतपवासाः सौश्रुतः कुतपसौश्रुतः’ निर्देश से यह महाभाष्यकार तथा वार्तिककार से भी प्राचीन प्रतीत होता है। इतना ही नहीं, पाणिनि द्वारा ‘कार्तकौजपादद्यञ्’ (६-२-३७) इस सूत्र के गुण में ‘सौश्रुतपार्थिवाः’ में अपत्य अर्थ के सूचक प्रत्ययान्त सौश्रुत शब्द के दिया होने से न केवल सुश्रुत अपितु उसके वंश वाले अथवा उसके शिष्य और सम्बन्धी भी पाणिनि से प्राचीन प्रतीत होते हैं।

पाश्चात्य विद्वान् वेबर$^१$ का मत है कि महाभाष्यकार द्वारा ‘सुश्रुत्-सौश्रुतः’ में हलन्त सुश्रुत शब्द दिया होने से कार्तकौजपादि गण में सौश्रुत शब्द के मिलने पर भी बाद में उसके प्रक्षिप्त होने से पाणिनि द्वारा उसके उपदिष्ट होने का निश्चय न होने से, भाष्यकार द्वारा उस सूत्र की व्याख्या न की होने से उसके पाणिनीय सिद्ध न होने से तथा महाभाष्यकार द्वारा सुश्रुत के वैद्यकाचार्य होने का प्रमाण न मिलने से महाभाष्य में आया हुआ सुश्रुत यही व्यक्ति है ऐसा निश्चय से नहीं कहा जा सकता। परन्तु ऐसी बात नहीं है। ‘भृत्-भृतः, कर्मकृत् कर्मकरः’ आदि शब्दों की तरह ही हलन्त सुश्रुत शब्द क्विप् प्रत्ययान्त है तथा अदन्त सुश्रुत शब्दक्त प्रत्ययान्त है। ये दोनों शब्द केवल प्रत्यय भेद से आंशिक भेद को प्रकट करते हुए एक ही अर्थ के सूचक हैं। ‘इको गुणवृद्धी’ इस सूत्र की व्याख्या में अन्तिम इकार तथा उकार को ही गुण हो सकने के कारण ‘अग्नि, वायु, बभ्रु माडु इत्यादि इकारान्त तथा उकारान्त शब्दों में ही गुण होता है। उपधागत (‘अलोऽन्त्यात् पूर्व उपधा’ अर्थात् अन्तिम अल्—वर्ण से पूर्व वर्ण का नाम उपधा होता है) इकार, उकार में गुण नहीं होता यह दिखलाने के लिये हलन्त शब्द में ही प्रत्युदाहरण का दिया जाना संभव होने से तथा हलन्त सुश्रुत् शब्द में गुण न हो सकने के कारण (उपधा में उकार होने से) भाष्यकार ने ‘सुश्रुत्-सौश्रुतः’ यह हलन्त शब्द दिया है। हलत सुश्रुत् शब्द की तरह अदन्त सुश्रुत शब्द से भी ‘सौश्रुतः’ शब्द बनता है। बाभ्रव्य, माण्डव्य इत्यादि शब्द केवल बभ्रु तथा मण्डु से ही बन सकते है इसलिये इसमें प्रकृति (मूल शब्द) देने की आवश्यकता न होने से ही ‘बभ्रुः-ब व्यः’ तथा ‘मण्डुः-माण्डव्यः’ न लिखकर केवल बाभ्रन्य, माण्डव्य ही दिया है। इसी प्रकार यदि सौश्रुत शब्द भी केवल हलन्त सुश्रुत् शब्द से ही बनना सम्भव होता तो उस अवस्था में प्रकृतिरूप से हलन्त सुश्रुत् शब्द साथ में देने की आवश्यकता नहीं थी। हलन्त सुश्रुत शब्द की तरह अदन्त सुश्रुत शब्द से भी सौश्रुत शब्द बन सकता है। परन्तु उपधागत


१. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. ४७ का १ देखें।