भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २१७

इकार, उकार की वृद्धि के उदाहरण के लिये अदन्त शब्द से बना हुआ सौश्रुत शब्द उपयोगी न होकर हलन्त शब्द से बना हुआ सौश्रुत शब्द उपयोगी है इसलिये अदन्त शब्द से बने हुए सौश्रुत शब्द में अर्थ का भेद न होने पर भी प्रकृति (मूल शब्द-हलन्त सुश्रुत शब्द) सहित ‘सुश्रुत्-सौश्रुतः’ देना विशेष अर्थ रखता है। इसी प्रकार ‘तद्धितेष्वचामादेः’ (७-२-११७) इस सूत्र की व्याख्या में भी अन्तिम उपधा की वृद्धि के अपवाद रूप में आदि अच् (स्वर) की वृद्धि करने में अदन्त सुश्रुत शब्द की उपधावृद्धि सम्भव न होने से तथा हलन्त सुश्रुत् शब्द ही इस उदाहरण के लिये उपयुक्त होने से भाष्यकार ने हलन्त प्रकृति (सुश्रुत्) के साथ सौश्रुत शब्द दिया है। इस प्रकार दोनों स्थानों में हलन्त प्रकृति (सुश्रुत्) शब्द देकर जो भाष्यकार ने अदन्त प्रकृति का निराकरण किया है उससे यह सिद्ध होता है कि अदन्त सुश्रुत शब्द से भी सौश्रुत शब्द बन सकता है। इसीलिये कार्त्तकौजपादि सूत्र में निर्दिष्ट ‘सौश्रुतपार्थिवः’ तथा गोत्रान्तेवासी माणवब्राह्मणेषु क्षेपे (६-२-६९) सूत्र में निर्दिष्ट ‘भार्यासौश्रुतः’ शब्द का यौगिक अर्थ दिखलाने के लिये काशिका, पदमञ्जरी¹ तथा न्यास आदि ग्रन्थों के रचयिताओं ने किसी स्थान पर ‘सुश्रुतस्य छात्राः सौश्रुताः’ ‘सुश्रुताऽपत्यं सौश्रुतः’ तथा किसी-किसी स्थान पर ‘कस्यचित् सुश्रुतोऽपत्यं सौश्रुतः’ इत्यादि निर्वचनों द्वारा दोनों अदन्त तथा हलन्त सुश्रुत शब्दों से सौश्रुत शब्द बनाया है। इससे प्रतीत होता है कि बहुत काल पूर्व इन व्याकरणाचार्यों द्वारा भी अदन्त तथा हलन्त दोनों शब्द सौश्रुत शब्द की प्रकृति के रूप में स्वीकार किये गये थे। यहां यह एक प्रश्न हो सकता है कि वार्तिककार तथा भाष्यकार द्वारा दिये हुए ‘कुतपसौश्रुतः’ तथा गणपाठकार द्वारा दिये हुए ‘पार्थिवसौश्रुतः’ शब्दों में हलन्त सुश्रुत् शब्द से सौश्रुत शब्द की निष्पत्ति है या अदन्त सुश्रुत शब्द से दोनों में क्या भेद है। मेरा यह अभिप्राय नहीं है कि पाणिनि के उपदेशरूप में मिलने वाले गणपाठ में आये हुए सब शब्द पाणिनि द्वारा ही उपदिष्ट हैं। समय प्रवाह से उसमें दूसरे शब्द भी पीछे से अनुप्रविष्ट हो सकते हैं किन्तु एक ही काल वाले प्राचीन भाष्यकार तथा वार्तिककार आदि द्वारा सूत्रों के उदाहरण में दिये होने से गणपाठ में आये हुए सौश्रुत शब्द को तथा विशेष वक्तव्य के न होने से व्याख्यारहित कुछ सूत्रों को केवल भाष्य में न दिया होने से उन सूत्रों को अपाणिनीय बतलाना दुःसाहस है। भाष्यकार द्वारा बहुत से अव्याख्यात सूत्रों को यदि अपाणिनीय कह दिया जाय तो उस-उस अध्याय तथा पाद के अन्त में दी हुई सूत्रों की संख्या किस प्रकार पूरी हो सकती है। पाणिनि के कार्त्तकौजपादि गण में निर्दिष्ट शब्दों का अनुसन्धान करते हुए शेखर आदि व्याकरण ग्रन्थों में ‘सौश्रुतपार्थिवाः’ शब्द के मिलने से भिन्न-भिन्न सौश्रुतौं तथा पार्थिवों (राजाओं) का परस्पर संबन्ध प्रतीत होता है। तथा पार्थिव शब्द से भी सौश्रुतशब्द का पूर्व प्रयोग होने से प्रतीत होता है कि उस समय सौश्रुतौं को राजाओं द्वारा भी सम्मान प्राप्त था। ‘सौश्रुताः पार्थिवाश्च’ इस बहुवचन वाले समास में ही ‘सौश्रुतपार्थिवाः’ शब्द बना होने से पाणिनि के समय में भी अनेक सुश्रुत सम्प्रदाय वाले वैद्यों का अनेक राजाओं के साथ सम्बन्ध प्रतीत होता है। सुश्रुतसंहिता सूत्रस्थान के युक्तसेनोपाध्याय¹ में वैद्य द्वारा अच्छी प्रकार निरीक्षण करके राजा की रक्षा करना, स्कन्धावार (शिविर छावनी) में भी राजा के साथ रहना तथा राजा द्वारा भी वैद्य का विशेष सम्मान करने का उल्लेख मिलता है। सूत्रस्थान के उपसंहार² में भी इस शास्त्र का राजाओं तथा महात्माओं द्वारा अध्ययन करने का निर्देश होने से इस शास्त्र के ज्ञाताओं (वैद्यों) के साथ राजाओं का विशेष संबन्ध सूचित किया गया है। ‘शतं ते राजन् भिषजः सहस्त्रम्’ (ऋक् १-२४-९) इस मन्त्र के अंश द्वारा भी प्राचीन काल में राजाओं तथा वैद्यों का परस्पर संबन्ध सूचित होता है। महाभारत³ तथा कौटिलीय⁴ अर्थशास्त्र में भी युद्ध के प्रकरण में विशेषरूप से शस्त्रचिकित्सा के ज्ञाताओं का सहभाव निर्दिष्ट है। जिन्हें सदा शस्त्रास्त्रों से युद्ध करने पड़ते हैं उन सेना से युक्त राजाओं के साथ शल्यचिकित्सकों का होना आवश्यक भी है। सुश्रुत के शल्यचिकित्सक होने से ही उसके अनुयायी सौश्रुतौं के भी राजाओं के साथ निकट संबन्ध के अनुसार

१. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. ४७-४८ देखें।
२. १ से ४ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ४८ देखें।