काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
से ही संभवतः कहा गया है। इसीलिये वैद्याचार्य दिवोदास के पूर्वपुरुष धन्वन्तरि के लिये लौकिक एवं तैर्थिक व्यक्तियों द्वारा अब्ज देवता का अवतार होने से देवरूप में निर्देश किया गया है।
भरद्वाज से सम्बन्ध, वाराणसी की स्थापना तथा प्रतर्दन नाम के पुत्र की समानता से हरिवंश तथा महाभारत में वर्णित दिवोदास की एकता प्रतीत होती है। कौषीतकी (सांख्यायन) ब्राह्मण¹ तथा कौषीतकी ब्राह्मणोपनिषत्² में भी दैवोदासि (दिवोदास के पुत्र) प्रतर्दन का ब्राह्मविद्या की प्राप्ति का वर्णन मिलता है। काठकंसंहिता³ के ब्राह्मण अंश में भी आरुणि के समकालीन भीमसेन के पुत्र दिवोदास का उल्लेख मिलता है।
इस प्रकार हरिवंश पुराण के अनुसार काश राजा की सन्तति रूप इन सबका काश राजा द्वारा स्थापित काशी नामक देश के राजा होने से काशिराज शब्द से कहा जाना, धन्व राजा का पुत्र होने से उसका धन्वन्तरि नाम से व्यवहार तथा आत्रेय आदि की तरह धन्वन्तरि का भी पूर्वाचार्य भरद्वाज से ही आयुर्वेद विद्या की उपलब्धि का निर्देश है। महाभारत तथा हरिवंश में धन्वन्तरि के प्रपौत्र काशीराज दिवोदास का वैद्यक के आचार्य रूप में निर्देश न मिलने पर भी सुश्रुत में काशीराज दिवोदास का सुश्रुत आदियों के उपदेशक के रूप में उल्लेख मिलने से वैद्याचार्य धन्वन्तरि की चतुर्थ सन्तति (पीढ़ी) में होने से तथा अपने पूर्वपुरुष की विद्या के आदर की दृष्टि से दिवोदास का भी वैद्य होना सङ्गत प्रतीत होता है। धन्वन्तरि की सन्निकृष्ट सन्तति (चौथी पीढ़ी) में होने से, उसके सम्प्रदाय का प्रकाश करने के कारण तथा उसका स्थानापन्न होने से धन्वन्तरि का अवतार मानकर सुश्रुतसंहिता में ‘धन्वन्तरिं दिवोदासं सुश्रुतप्रभृतयः ऊचुः’ आदि द्वारा धन्वन्तरि तथा दिवोदास का जो अभेद प्रकट किया गया है वह उचित ही है। आयुर्वेद के आचार्यरूप से प्रसिद्ध धन्वन्तरि के प्रपौत्र दिवोदास तथा सुश्रुत में आये हुए आयुर्वेद के उपदेशक धन्वन्तरिरूप दिवोदास इन दोनों की सङ्गति होने से धन्वन्तरिका आयुर्वेदीय सम्प्रदाय अपने शिष्यों की तरह दिवोदासरूप अपनी सन्तति में भी गया हुआ स्पष्ट रूप से प्रतीत होता है। मेरे पास सुश्रुतसंहिता की एक ताडपत्र² की पुस्तक है जिसके प्रारम्भ में ‘इत्युवाच भगवान् धन्वन्तरिः’ यह वाक्य नहीं है। धन्वन्तरिरूप दिवोदास के पास सुश्रुत आदियों के जाने का उल्लेख होने से प्रारंभ में इस प्रकार का वाक्य होना उचित भी नहीं है।
पूर्वोद्दिष्ट हरिवंश पुराण के लेख में कलियुग में दिवोदास द्वारा वाराणसी की स्थापना का उल्लेख होने से धन्वन्तरि तथा उसके प्रपौत्र दिवोदास का समय कलियुग में प्रतीत होता है। परन्तु कलियुग में कौन-सा समय है इसकी प्रतीति उससे नहीं होती।
काशी के युवराज ब्रह्मदत्त का आयुर्वेद के अध्ययन के लिये तक्षशिला जाने का वर्णन जातक ग्रन्थ में तथा फिर काशीराज के पद पर आरूढ़ ब्रह्मदत्त के साथ जीवक की भेंट का वर्णन महावग्ग में मिलता है। महावग्ग में यद्यपि काशी शब्द भी आया हुआ है, परन्तु वहा वाराणसी शब्द का प्रयोग अधिकता से किया गया है। बुद्ध द्वारा भी वाराणसी में ही धर्मचक्र (धर्मोपदेश) के प्रवर्तन का उल्लेख मिलता है। जातक ग्रन्थों में भी बहुत स्थानों पर वाराणसी शब्द आता है। पाणिनि ने देश वाचक काशी शब्द का ‘काश्यादिभ्यष्ठञ्त्रिठौ’ (४-२-११६) सूत्र में स्पष्ट निर्देश किया है। तथा नगर वाचक वाराणसी शब्द नद्यादि गण में मिलता है। (नद्यादिभ्यो ढक् ४-२-९७ वाराणसेयः) महाभाष्यकार ने भी वाराणसेय उदाहरण कई बार दिया है। जाबालोपनिषद् आदि में वाराणसी शब्द के मिलने पर भी प्राचीन उपनिषदों में काशी
१. १ से ३ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ४१ देखें।
२. इस पुस्तक में बहुत से पाठभेद हैं। इस संहिता के अन्त में सुश्रुत का निघण्टु भी दिया हुआ है। इस संहिता के पाठ के अनुसार सुश्रुतसंहिता का नया संस्करण करके मेरे मित्र श्री यादवजी ने प्रकाशित किया है।