भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद | २०७

प्रतीत होता है। खिलभाग के देश सात्म्याध्याय में 'मगधासु महाराष्ट्रम्' ऐसा उल्लेख मिलता है। वेद में तथा जरासन्ध के समय मगध का निर्देश होने से तथा पुरातत्व के विद्वानों द्वारा आजकल राजगृह में उस स्थान की प्राप्ति से यद्यपि मगध राज्य को प्राचीन कहा जा सकता है, तथापि ग्रन्थ के पूर्वभाग में नाम द्वारा भी अनिर्दिष्ट मगध का उत्तरभाग में महाराष्ट्र के रूप में उल्लेख होने से पाण्ड्य देश तथा पाटलिपुत्र के निर्देश न होने से तथा बौद्ध ग्रन्थों में अनायास नामक यक्ष से अपने पूर्वज के ग्रन्थ की उपलब्धि का उल्लेख होने से बुद्ध तथा महावीर के पश्चात् नन्द एवं चन्द्रगुप्त के समय मगध की महाराष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठा के समय वात्स्य की उत्पत्ति प्रतीत होती है। इससे उस संस्कार में आये हुए (अनुप्रविष्ट) इन शब्दों से सन्देह उत्पन्न हुआ प्रतीत होता है।

नावनीतक के लेखक डल्हण आदि के लेख में कौमारभृत्य के आचार्य जीवक का नाम मिलने से तथा महावग्ग आदि बौद्ध ग्रन्थों में कौमारभृत्य विशेषण वाले प्रसिद्ध वृद्धजीवक का वृतान्त मिलने से दोनों में चिकित्सापाण्डित्य, नाम की समानता तथा कौमारभृत्य शब्द का समानरूप से उल्लेख होने से बौद्ध ग्रन्थोक्त जीवक ही कौमारभृत्य का आचार्य जीवक है—ऐसा कुछ विद्वानों का मत है। जब तक इस वृद्धजीवकीय तन्त्र की उपलब्धि नहीं हुई थी तब तक कौमारभृत्य के आचार्य वृद्धजीवक का परिचय देने वाले प्रमाणों का अभाव होने से तथा बौद्ध ग्रन्थों में जीवक की अत्यन्त प्रसिद्धि होने से दग्धाश्वरथन्याय¹ से दोनों को एक ही समझना संगत प्रतीत होता था। इस प्रकार इस तन्त्र के आचार्य तथा बौद्धग्रन्थोक्त जीवक की एकात्म्यता होने से इस तन्त्र के आचार्य वृद्धजीवक को बुद्ध कालीन मानने से पूर्वोक्त उत्सर्पिणी आदि शब्दों को देखकर भी सन्देह उत्पन्न नहीं होता था। परन्तु अब इस तन्त्र की उपलब्धि द्वारा वृद्धजीवक का बहुत-सा परिचय मिल जाने से उनके विषय में पिता का भेद, देशभेद, गुरुभेद, विशेषण तथा विशेषण रहित नामों का भेद, धर्मभेद आदि बहुत सी बातें मिलती हैं। बौद्ध ग्रन्थोक्त जीवक का कौमारभृत्यत्व महावग्ग के अनुसार कुमारद्वारा पालन किया जाने के कारण है न कि कौमारभृत्य का आचार्य होने से, बौद्ध ग्रन्थोक्त जीवक संभव है—कौमारभृत्य विद्या का भी पण्डित हो, किन्तु बहुत से बौद्ध ग्रन्थों में उसकी घटनाओं तथा चिकित्सा आदि विषयों का अत्यन्त विस्तारपूर्वक वर्णन होने पर भी उसके कौमारभृत्य के आचार्यत्व तथा तद्विषयक इस प्रसिद्ध तन्त्र के निर्माण का उल्लेख तक क्यों नहीं है? इस तन्त्र के विषय में अन्तरङ्ग दृष्टि से विचार करने पर भी दोनों का परस्पर विभेद ही दृष्टिगोचर होता है। तूङ्ग्हाङ् (Tun huang) प्रदेश में हार्नले द्वारा उपलब्ध प्राचीन ग्रन्थ में बुद्ध द्वारा अपने समकालीन जीवक को उपदेश देने का उल्लेख मिलता है। यदि वही यह वृद्धजीवक हो तो ग्रन्थ के अन्दर स्थान-स्थान पर धन्वन्तरि आदि की तरह जहां बाह्लीकभिषग्, काङ्कायन तथा अन्य विदेशी वैद्यों के नाम तथा चिकित्सा सम्बन्धी विषय दिए हैं वहां अपने गुरु भगवान् बुद्ध के नाम, उसकी प्रसिद्ध ओषधियों तथा प्रसङ्गवश कहीं-कहीं उसके आध्यात्मिक विषय आदि को लेशरूप में भी क्यों नहीं दिया है। इसमें बौद्धमत की लेशमात्र भी छाया नहीं मिलती है। महावग्ग आदि के लेख से जीवक की शल्यतन्त्र के विषय में भी विशेष प्रसिद्धि तथा कुशलता का परिचय मिलता है। किन्तु इस ग्रन्थ में शल्यतन्त्र का परतन्त्र के रूप में निर्देश करके उसके विषय में उदासीनता सूचित होती है। इस प्रकार इस गन्थ का आचार्य, बौद्धग्रन्थोक्त मगधदेशनिवासी भुजिष्या के गर्भ से उत्पन्न अभय के पुत्र जीवक से भिन्न प्राचीन, कनखलवासी, ऋचीक का पुत्र, कश्यप का शिष्य, महर्षियों द्वारा सम्मानित तथा कौमारभृत्य विषय का आचार्य प्रतीत होता है।

प्रसङ्गवश निर्दिष्ट अन्य आचार्यों का विवरण—कश्यप द्वारा उपदिष्ट प्रारम्भिक एवं विस्तृत महासंहिता को वृद्धजीवक ने संक्षिप्त किया तथा समयान्तर से वात्स्य ने उसका प्रतिसंस्कार करके प्रकाशित किया, ऐसा इस संहिता


१. जिस प्रकार रथ के घोड़ों के जल जाने से रथ निष्प्रयोजन हो जाता है उसी प्रकार किसी एक आवश्यक वस्तु के नष्ट हो जाने पर जब उससे सम्बन्धित दूसरी वस्तु स्वयं नष्ट हो जायें—उस अवस्था में यह व्यवहत होता है। (अनुवादक)