काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
के कल्पाध्याय में निर्देश होने से जिस प्रकार आत्रेय द्वारा प्रारम्भ में उपदिष्ट संहिता को अग्निवेश ने तन्त्र का रूप दिया और उसी तन्त्र को चरक ने प्रतिसंस्कृत करके वर्तमानरूप में प्रकाशित किया, तथा जिस प्रकार दिवोदासरूप धन्वन्तरि द्वारा प्रारम्भ में उपदिष्ट संहिता को सुश्रुत ने संहितारूप से परिवर्तित किया और पीछे से उसीको नागार्जुन या अन्य किसी प्रतिसंस्कर्ता ने संस्कार करके वर्तमान रूप में प्रकाशित किया है, उसीप्रकार कश्यप द्वारा उपदिष्ट मूलभूतमहासंहिता को वृद्धजीवक ने संक्षिप्त करके तन्त्र का रूप दिया, उसीको समयप्रवाह से वात्स्य ने प्रतिसंस्कृत करके वर्तमानरूप में हमारे सम्मुख उपस्थित किया है। इस प्रकार आजकल मूलसंहिता तथा उनके रूपान्तरभूत तन्त्रों के पृथक्-पृथक् उपलब्ध न होने से वर्तमान रूप में मिलने वाली चरकसंहिता ही अग्निवेशतन्त्र या आत्रेयसंहिता होने से, वर्तमान प्रतिसंस्कृत सुश्रुत संहिता ही मूलसुश्रुतसंहिता या धन्वन्तरि संहिता होने से तथा वात्स्य द्वारा प्रतिसंस्कृत संहिता ही वृद्धजीवकीय तन्त्र या मूलकाश्यप संहिता होने से उपलब्ध एक-एक ग्रन्थ तीन-तीन ग्रन्थों के प्रतिनिधि के रूप में हमारे सामने उपस्थित होता है। इन उपलब्ध तीनों प्राचीन ग्रन्थों में प्रतिसंस्कर्ता के रूप में मिलने वाले चरक, नागार्जुन तथा वात्स्य (अनिश्चित कालवाला) तृतीय श्रेणी में, उनसे ऊपर तन्त्रकर्ता अग्निवेश, सुश्रुत तथा वृद्धजीवक द्वितीय श्रेणी में तथा उनसे भी ऊपर मूलसंहिताओं के आचार्य (उपदेशक) आत्रेय, दिवोदासरूप धन्वन्तरि तथा मारीचकश्यप प्रथमश्रेणी में आते हैं। इस प्रकार इन संहिताओं में पुनर्वसु आत्रेय, धन्वन्तरि तथा कश्यप प्राचीनतम मूल आचार्य हैं।
प्राचीन रूप में मिलने वाले आत्रेय, धन्वन्तरि, कश्यप आदि मूल आचार्यों का निश्चित समय निर्धारण दुष्कर होने के कारण इनका पौर्वापर्य, परस्पर सहभाव तथा आत्रेय, अग्निवेश, चरक, धन्वन्तरि, दिवोदास, सुश्रुत, कश्यप, वृद्धजीवक तथा वात्स्य आदि आचार्यों के उद्भव को बतलाने के लिये कोई भी धारावाहिक ऐतिहासिक लेख न मिलने से उनके विषय में कुछ भी कहना यद्यपि दुःसाहस है तथापि हमें यह देखना है कि इनके उद्भव की अधिक से अधिक तथा कम से कम कौनसी अवधि निश्चित की जा सकती है जिससे इनके विषय में कुछ अस्पष्ट-सा ज्ञान भी हो सके तथा परस्पर एक दूसरे का अन्वेषण करते हुए संभवतः हमें कश्यप, वृद्धजीवक तथा वात्स्य के विषय में कुछ प्रकाश मिल सके। इसी अभिप्राय से अन्य विद्वानों के मतों का निर्देश करते हुए इन प्राचीन आचार्यों के विषय में अपने हृदय के कुछ भावों को प्रकट करते हैं।
धन्वन्तरि तथा दिवोदास—सुश्रुतसंहिता में धन्वन्तरिरूप काशीराज दिवोदास द्वारा सुश्रुत को उपदेश देने का निर्देश है। धन्वन्तरि दिवोदास के परिचय के लिये वेद में वैद्याचार्य धन्वन्तरि का कहीं उल्लेख नहीं मिलता है। ऋग्वेद में जहां वैद्यक के विषय मिलते हैं वहां देवभिषग् अश्विनीकुमारों का ही वैद्यरूप में उल्लेख है। ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में बहुत स्थानों पर दिवोदास नामक राजा का उल्लेख मिलता है। उसके साथ 'अतिथिग्वः शम्बरशत्रुः सुदासपिता' इत्यादि शूरता एवं वीरता संबन्धी विशेषण दिखाई देते हैं। काठकसंहिता के मन्त्रभाग में भी ब्रध्नश्व दिवोदास का उल्लेख है। इस वैदिक दिवोदास काशी का राजा होना तथा धन्वन्तरि से किसी प्रकार के सम्बन्ध का निर्देश नहीं मिलता है। इस प्रकार ऋग्वेद तथा काठकसंहिता में आये हुए दिवोदास का समय अत्यन्त प्राचीन है तथा वह वैद्य भी प्रतीत नहीं होता है।
पौराणिक इतिहास में भी दिवोदास नाम के अनेक व्यक्ति मिलते है। इनमें से हरिवंश^१ पुराण में २९वें अध्याय में काश के वंश में धन्वन्तरि तथा दिवोदास का काशिराज के रूप में उल्लेख मिलता है। वह वंशावली निम्न प्रकार से है—
१. वाराणसी में गोविन्दचन्द्र विजय के राज्य में १२०१ संवत् में लिखी हुई हरिवंश की एक प्राचीन ताडपत्र पुस्तक हमारे संग्रहालय में है। उसके पाठ के अनुसार भी यही क्रम मिलता है।