भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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२०६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

समय (महावीर के समय) इन दूसरे सम्प्रदाय के शब्दों का इस ग्रन्थ में अनुप्रवेश हुआ प्रतीत होता है। अर्वाचीन विद्वानों की यह भी धारणा है कि इस ग्रन्थ में शक, हूण, पल्हव, खश, यवन तथा कम्बोज आदि शब्दों के आने से भी यह ग्रन्थ बुद्ध के बाद का मालूम पड़ता है। इस प्रकार महावीर के बाद ही इस ग्रन्थ का निर्माण हुआ है—ऐसी शंका उत्पन्न होती है। किन्तु अनिश्चित समय वाले कुछ शब्दों के अनुप्रवेश के दर्शन मात्र से ही ग्रन्थ का काल निर्धारित नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त पीछे से जिन ग्रन्थों का प्रतिसंस्करण होने का स्पष्ट निर्देश हो उनमें कुछ सन्दिग्ध शब्दों के आधार पर ही ग्रन्थ के काल का निर्णय करना तो और भी दुःसाहस है। विद्वानों के किसी समय तर्क द्वारा निश्चित किये हुए भी बहुत से विषय पीछे समय प्रवाह से अन्य बलवान् तर्क के उपस्थित होने पर शारीरिक (वेदान्त) सूत्र के 'तर्कप्रतिष्ठानात्' के अनुसार परिवर्तित होते देखे गये हैं। यदि प्राचीनता को प्रकट करने वाले पूर्वोक्त लक्षणों को कुछ समय के लिये छोड़कर अर्वाचीन विद्वानों की धारणा का अवलम्बन करें तो भी कालप्रवाह से विलुप्त इस तन्त्र के वात्स्य द्वारा यक्ष से प्राप्त करके पीछे से संस्करण करने का संहिता कल्पाध्याय में स्वयं अपने मुख से उल्लेख किया होने से न केवल रेवती कल्पाध्याय में आये हुए निर्ग्रन्थ आदि शब्द, अपितु पूर्वभाग में आये हुए उत्सर्पिणी आदि अर्वाचीनता की शंका उत्पन्न करने वाले शब्द तथा विषय भी वृद्धजीवकीय तन्त्र के निर्माण के बाद संस्करण के समय वात्स्य की लेखनी द्वारा प्रविष्ट किये गये प्रतीत होते हैं। चरक संहिता तथा सुश्रुत संहिता के पूर्वभाग में परतन्त्रीय बालग्रह विषय के न मिलने पर भी सुश्रुत के उत्तर तन्त्र में शालाक्य, कौमारभृत्य आदि प्रस्थानान्तरीय विषयों का भी संग्रह होने से २७ से ३८ तक के अध्यायों में कौमारभृत्य के प्रसङ्ग में मूल में आचार्य के नाम का उल्लेख न होने पर भी टीकाकारों ने जो पार्वतक, जीवक, बन्धक आदि का निर्देश किया है उससे प्रतीत होता है कि कश्यप जीवक आदि के कौमारभृत्य तन्त्रों से ही संभवतः यह विषय लिया गया है। सुश्रुत के बालतन्त्र प्रकरण में (उ. तं. अ. २७) जिन स्कन्द, रेवती, शीतपूतना, शकुनी, मुखमण्डिका, नैगमेष आदि स्त्री तथा पुरुषरूप बालग्रहों का वर्णन है, उनसे मिलते जुलते ही ग्रहों का वर्णन इस संहिता के चिकित्सितस्थानीय बालग्रहाध्याय में मिलता है। रेवतीकल्पाध्याय में रेवती के भेदरूप से जिन जातहारिणियों का विशेष वर्णन है वे सुश्रुत के उत्तरतन्त्र में नहीं मिलते हैं। यदि इन दोनों अध्यायों के विषय साथ-साथ लिये गये होते तो जातहारिणी का विषय न्यूनाधिक रूप से सुश्रुत के उत्तरतन्त्र में भी अवश्य होना चाहिये था। रेवती ग्रह स्कन्द आदियों का प्रथम चिकित्सितस्थानीय बालग्रहाध्याय में निरूपण करने के बाद पुनः रेवती कल्पाध्याय में रेवती के विकास स्वरूप बहुत सी जातहारिणियों का पूर्वापर ग्रन्थ लेख की अपेक्षा अत्यन्त विकसित रूप में मिलने से कल्पाध्याय का यह विकसित लेख कश्यप तथा जीवक के पश्चात् वात्स्य के समय प्रतिसंस्करण में प्रविष्ट किया हुआ प्रतीत होता है। बिना विभाग के द्वारा प्रतिसंस्कार करने पर प्रायः ऐसी ही संशयोत्पादक गड़बड़ त्पन्न हो जाती हैं जिनका आगे वर्णन किया जायेगा। संहिता कल्पाध्याय को पूर्ण करने की दृष्टि से वात्स्य द्वारा जोड़े हुए खिलभाग के देशसात्म्याध्याय में तथा खिलभाग से पूर्ववर्ती भोजन कल्पाध्याय में भी सात्म्य के प्रसङ्ग में बहुत से प्राचीन देशों का उल्लेख है। भोजन कल्पाध्याय में कुरुक्षेत्र को केन्द्र मानकर चारों दिशाओं के बहुत से देशों का उल्लेख करते हुए सिन्धु, सौवीर आदि पाश्चात्य (Western) कश्मीर, चीन आदि उदीच्य (Northern), काशी, पुण्ड्र, अङ्ग, बङ्ग आदि पौरस्त्य (Eastern) तथा दक्षिण (South) में कलिङ्ग, पट्टन, नार्मदेय आदि देशों का ही उल्लेख किया गया है। रामायण काल में जिस प्रकार दक्षिणात्य (Southern) नगरों का विशेष परिचय नहीं था उसी प्रकार यहां भी कलिङ्ग, पट्टन आदि नर्मदा पर्यन्त देशों का ही निर्देश है। खिलभाग के देशसात्म्याध्याय के खण्डित रूप में मिलने से पूर्व तथा दक्षिण देशों का निर्देश करते हुए प्राचीन देशों का उल्लेख होने पर भी चिरपाली, चीर चोर, पुलिन्द, द्रविड़ आदि दूरवर्ती दक्षिणात्य देश तथा कुमारवर्त, निकटवर्ष, आदि पूर्ववर्ती देशों का विकसितरूप में उल्लेख मिलता है। अशोक के शिलालेख तथा अन्य प्राचीन साहित्य में आये हुए ये देश भी यद्यपि प्राचीन ही हैं ऐसा हम आगे लिखेंगे तथापि दोनों में देशों के वर्णन की तुलना करते हुए वृद्धजीवक के पूर्वभाग तथा वात्स्य के खिलभाग में समय की दृष्टि से स्पष्टरूप से बहुत अन्तर