काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 219, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २०५
इस ग्रन्थ के प्रत्येक अध्याय में 'अमुकाध्यायं व्याख्यास्यामः' द्वारा प्रारम्भ करके 'इति ह स्माह भगवान् कश्यपः' द्वारा समाप्ति, शिष्योपक्रमणीय अध्याय में शब्द तथा अर्थ में वैदिक विधान द्वारा शिष्यों का उपनयन और अग्नि, सोम, प्रजापति आदि वैदिक देवताओं का स्वाहाकार, जाति सूत्रीयाध्याय में वैदिक वाक्य रचना, हीनदन्तोद्भेद में मारुती इष्टि तथा स्थालीपाक होम का विधान, पुत्रोत्पत्ति के नाना विधानों में अन्य सबको छोड़कर इष्टि (पुत्रेष्टि) का विधान, स्वप्नदोष को दूर करने के लिये सावित्री होम का विधान, शिशु रक्षा के लिये प्रयुक्त होने वाले धूप में 'अग्निस्तु' आदि वैदिक वाक्य का प्रयोग, रेवती कल्पाध्याय में ब्राह्मणग्रन्थों के अनुसार ऐतिहासिक वाक्य तथा वहीं वसु, रुद्र, आदित्य आदि देवताओं का कीर्तन तथा 'दीर्घजिव्ही च छन्दसि' (४-१-५९) पाणिनि के इस सूत्र के अनुसार वैदिक प्रयोग में आये हुए ङीप् प्रत्यय युक्त दीर्घजिव्ही का उल्लेख, भोजन कल्पाध्याय में काशी, पुण्ड्र, अङ्ग, (पूर्वीबिहार) बङ्ग (बङ्गाल) काच, सागर, अनूप, कोशल (अवध) तथा कलिङ्ग (उड़ीसा) देश का तथा देशसात्म्याध्याय में कुमारवर्त, निकटिवर्ष, ऋषभद्वीप, पौण्ड्रवर्धन, मृत्तिका, वर्धमान आदि बहुत से प्राचीन देशों का कीर्तन करके इनसे अधिक प्रसिद्ध पाण्ड्य (उत्तरी मद्रास) का निर्देश न करना, बाह्लीकभिषग् का उल्लेख होने पर भी यवन तथा रोम के भिषजों का उल्लेख न होना, राजतैल की प्रशस्ति में इक्ष्वाकु, सुबाहु, सगर, नहुष, दिलीप, भरत तथा गय पर्यन्त प्राचीन राजाओं का ही उल्लेख करना, रस धातु तथा रत्नों के ओषधिरूप में व्यवहार का कहीं न मिलना, समुदाय कारण (सृष्टि उत्पत्ति) के उल्लेख में प्राचीन सांख्य दर्शन के अनुसार ही अष्टप्रकृति तथा षोडश विकारों का निर्देश होना, परन्तु बौद्ध तथा जैनों के अध्यात्मवाद का न मिलना तथा 'दीप्ताग्नयो घस्मराः स्नेहपित्याः' तथा 'क्षीरं सात्म्यं क्षीरमाहुः पवित्रम्' इत्यादि वैदिक छन्द एवं पद्यों का दर्शन आदि बहुत से प्राचीनता को सिद्ध करने वाले प्रमाणों के मिलने से यह वृद्धजीवक्रीय तन्त्र अत्यन्त प्राचीन प्रतीत होता है। हेमाद्रि आदि में पुराणों के अनुसार आरोग्यशाला के निर्माण का विधान होने पर भी आजकल के विद्वान् उसके निश्चय के लिये उसके अनुरूप शिलालेख तथा देशान्तरीय और मतान्तरीय लेखों की अपेक्षा रखते हैं—इसके अनुसार प्रामाणिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से आलोचना करते हुए हम देखते हैं कि २३०० वर्ष पूर्व अशोक द्वारा सर्वसाधारण के लिये चिकित्सालय के उद्घाटन के मिलने तथा कौटिलीय अर्थशास्त्र में भी दुर्ग बनाते हुए उसमें भैषज्य गृह के बनाने का उल्लेख मिलने पर भी, चरक आदि में रसायनशाला का निर्देश होने पर भी सर्वसाधारण के लिये आरोग्यशाला का निर्देश न होना तथा उसी के अनुरूप इस संहिता के कल्पाध्याय में भी रसायनशाला तथा उस प्रकार के चिकित्सालय आदि के निर्माण का न मिलना, अपितु इससे विपरीत रोगी के घर जाकर वैद्य द्वारा ओषधि का विधान बतलाना, इत्यादि द्वारा भी इस ग्रन्थ का निर्माण प्राचीन ही सिद्ध होता है। कश्यप के साथ वृद्धजीवक का उत्तर प्रत्युत्तर रूप में निर्दिष्ट संवाद भी इसे प्राचीन ही सिद्ध करता है। काश्यपीय महासंहिता को वृद्धजीवक द्वारा संक्षिप्त कर के इस तन्त्र के निर्माण का उल्लेख मिलने से काश्यपीय महासंहिता का समय तो इससे भी प्राचीन प्रतीत होता है।
किन्तु जिस प्रकार श्रमण शब्द ब्राह्मण आदि ग्रन्थों में मिलता है उसी प्रकार ग्रन्थि शब्द के उपनिषद् आदि में मिलने पर भी निर्ग्रन्थ शब्द का तपस्वी के अर्थ में प्रयोग का भागवत पुराण को छोड़कर अन्य वैदिक ग्रन्थों तथा महाभारत आदि प्राचीन ग्रन्थों में कहीं भी स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं है। अर्वाचीन नागार्जुन आदि ने उपाय हृदय तथा ललित विस्तर नामक ग्रन्थों में जैनों के अर्थ में ही यह निर्ग्रन्थ शब्द प्रयुक्त किया है। वाचस्पति१ आदि आस्तिक दार्शनिकों ने भी वेदविरुद्ध दार्शनिकों की श्रेणी में ही इन शब्दों का निर्देश किया है। निर्ग्रन्थ सम्प्रदाय ही जैन सम्प्रदाय है ऐसी आधुनिक विद्वानों की भी धारणा है। इस संहिता में आये हुए जैन सम्प्रदाय के उत्सर्पिणी तथा अवसर्पिणी आदि असाधारण शब्द भी इसी बात को प्रकट करते हैं। इस प्रकार महावीर से प्राचीन तीर्थङ्करों के समय यदि इन शब्दों की प्रसिद्धि नहीं थी तो इस सम्प्रदाय के प्रधान आचार्य के रूप में प्रकट होने वाले महावीर के समय इन शब्दों की लोक में प्रसिद्धि होने से उस
१. टि. उपो. संस्कृत पृ. ३७ देखें।