भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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२०४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

भी निर्ग्रन्थों की प्रसिद्धि तथा बहुलता होनी चाहिये। इस प्रकार प्रतीत होता है कि निर्ग्रन्थ सम्प्रदाय महावीर से ही प्रारम्भ नहीं हुआ है अपितु उससे पूर्व भी प्रचलित था। श्री विन्टरनीज^१ नामक विद्वान् ने भी निर्ग्रन्थ सम्प्रदाय को महावीर से पूर्व का बतलाया है। जैन ग्रन्थों में महावीर से पूर्व आदि नाथ पार्श्वनाथ आदि का भी आचार्यरूप में उल्लेख मिलने से तथा आजतक भी पूर्व तीर्थङ्कररूप में जैन सम्प्रदाय में उनका सम्मान होने से प्रतीत होता है कि इस जैन सम्प्रदाय का महावीर द्वारा विशेष विकास किया जाने से पीछे से उसकी प्रधान आचार्य रूप में प्रसिद्धि होने पर भी निर्ग्रन्थ सम्प्रदाय ही जैन सम्प्रदाय होता हुआ पूर्व तीर्थङ्कर परम्परा द्वारा ही प्रारम्भ हुआ प्रतीत होता है। जैनों द्वारा अपने सम्प्रदाय के भिक्षुओं के अर्थ में प्रयुक्त किया जाने पर भी निर्ग्रन्थ शब्द निवृत्तहृदय ग्रन्थिरूप निरुक्ति के अनुसार विवेक एवं ज्ञान की श्रेणी में आरूढ़^२ का बोध कराने वाले तथा हृदय की^३ ग्रन्थियों के खुलजाने रूप आध्यात्मिक अर्थ में आस्तिक (वैदिक) सम्प्रदाय के ग्रन्थों में भी अत्यन्त प्राचीन काल से प्रयुक्त हुआ दीखता है।

पूर्व समय से प्रसिद्ध इन शब्दों को देखकर ही बौद्ध तथा जैनों ने श्रमण तथा निर्ग्रन्थ शब्दों का पीछे से अपने-अपने सम्प्रदाय के भिक्षुओं के लिये प्रयोग किया प्रतीत होता है। भाषा विज्ञान की दृष्टि से काल प्रवाह से घटिका शब्द की तरह प्राचीन शब्दों का भी रूपान्तर या अर्थान्तर में प्रायः प्रयोग होता देखा गया है। उदाहरणार्थ बोधायन, आश्वलायन, वराह, आपस्तम्ब आदि प्राचीन एवं प्रमुख सूत्रकारों द्वारा श्रौत एवं स्मार्त यज्ञभूमि के अर्थ में प्राचीन ग्रन्थों में स्थान-स्थान पर प्रयुक्त किया जाता हुआ विहार^४ शब्द बौद्धों द्वारा बौद्धभिक्षुसंघ के निवास स्थान के रूप में, तथा श्मशान में स्थित चित्त के अभीष्ट देवता, पीपल, मन्दिर, क्षेत्रज्ञ आदि अर्थों में प्रयुक्त होने वाला चैत्य^५ शब्द पीछे से स्तूप के लिये प्रयुक्त होने लगा है। प्राचीन काल में तप, ज्ञान तथा अवस्था में वृद्ध व्यक्ति के लिये प्रयुक्त किया जाने वाला स्थविर^६ शब्द भी बौद्धों द्वारा श्रेष्ठ तथा विशेष विद्वान् के अर्थ में प्रयुक्त होने लगा। इस प्रकार अर्वाचीनता के प्रेमी इन विहार आदि शब्दों को भी बौद्ध साम्प्रदायिक कह सकते हैं परन्तु केवल इतने मात्र से प्राचीन व्यवहार को बिना देखे इन्हें अर्वाचीन कहना उचित नहीं है। इसी प्रकार यहाँ आये हुए श्रमण, निर्ग्रन्थ आदि शब्द भी प्राचीन तपस्वियों के ही सूचक हैं।

यहां आये हुए लिङ्गिनी, परिव्राजिका, श्रमण का निर्ग्रन्थी, कण्डिनी, चीरवल्कलधारिणी, चरिकी, मातृमण्डलिकी तथा अवेक्षणिका आदि मधुकरी वृत्ति द्वारा घर-घर जाकर अपने सम्पर्क से जातहारिणी का प्रचार करती हुई नाना भिक्षुणियों के श्रेणी में निर्दिष्ट भेदों में से परिव्राजिका, श्रमणका तथा निर्ग्रन्थी को छोड़कर अन्य कोई भी भेद प्राचीन दूसरे ग्रन्थों या सम्प्रदायों में आजकल नहीं मिलता है। अर्वाचीन ग्रन्थों में आये हुए हंस, परमहंस, कुटीचक, बहूदक आदि भेदों को न देकर केवल इन कालप्रवाह से विलुप्त सम्प्रदायों का ही दिया जाना इन उपर्युक्त भेदों को प्राचीन ही सिद्ध करता है।

वहीं रेवती कल्पाध्याय के जातहारिणी के प्रकरण में सिंहल (लङ्का) तथा उड्र (उड़ीसा) आदि देश तथा सूत, मागध आदि जातियों का उल्लेख मिलता है। वहां खश, शक, यवन, पह्लव, तुषार कम्बोज आदि का उल्लेख भी है, यवन की तरह खश आदि शब्द भी मनुस्मृति आदि ग्रन्थों में मिलते हैं, ऐतिहासिक विद्वान् भी इन जातियों को प्राचीन मानते हैं। (Encyclopedia Britanica) नामक पुस्तक में हूणों का चतुर्थ शताब्दी (ई. प. ३७२) में यूरोप प्रवेश का उल्लेख मिलने पर भी २५०० वर्ष प्राचीन अवेस्ता ग्रन्थ में हूनू (हूण) जाति का प्रतिपक्षी जाति के रूप में वर्णन मिलने से तथा जरथुष्ट्र से भी पूर्ववर्ती केरसप (Kerasop) नामक इरान देश के राजा द्वारा उस जाति की विजय का उल्लेख मिलने से हूणों का समय (ई. पू. ७००) है ऐसा मोदी^७ महोदय ने प्रतिपादित किया है। महाभारत^८ में भी हूण, पह्लव, यवन, शक, पुण्ड्र, किरात, द्रविड़, खश आदियों का उल्लेख मिलता है। 'गार्गादिभ्यो यञ्' (४-१-१०५) इस सूत्रोक्त गण में शक, 'इन्द्रवरुणोति' (४-१-४९) सूत्र में यवन तथा 'कम्बोजालुक्' (४-१-१७५) इस सूत्रोक्त वार्तिक के कम्बोजादि गण में शक, यवन आदि का उल्लेख मिलता है। इस प्रकार इन शब्दों का पूर्वकाल में भी प्रसिद्ध होना स्पष्ट है।


१. १ से ८ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ३५-३६ देखें।