भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २०३

अस्तिनास्तिदिष्टं मतिः (४. ४. ६०) इस सूत्र द्वारा पाणिनि ने भी दोनों (वेदमतानुयायी तथा वेदविरुद्धमतानुयायी) सम्प्रदायों का होना सूचित किया है। जैन ग्रन्थों के अनुसार पार्श्वनाथ आदि पूर्व आचार्यों में परस्पर बहुत व्यवधान के होने से पल्योपम, सागरोपम आदि शब्द वाचक संख्या की महत्ता से तथा आर्हत सम्प्रदाय की पूर्व परम्परा के अत्यन्त दीर्घ होने से उत्सर्पिणी आदि शब्द आर्हत (जैनसाम्प्रदायिक) होते हुए भी संभवतः महावीर से पूर्व समय से ही प्रसिद्ध हैं अथवा उपलब्ध श्रौतस्मार्त ग्रन्थों में न मिलने पर भी संभवतः प्राचीन विलुप्त ग्रन्थों में इनका व्यवहार आया हुआ हो। इस अवस्था में महावीर से पूर्व इन शब्दों का इस ग्रन्थ में अनुप्रवेश होने से इसमें अर्वाचीन विषयों की शङ्का नहीं होनी चाहिये।

रेवती कल्पाध्याय में मातङ्गी विद्या के प्राकृत शाबर शब्द से बने केयूर शब्द युक्त मन्त्र का निर्देश है। मातङ्गी का उल्लेख दक्षिणाम्नाय (दाक्षिणात्य वैदिक सम्प्रदाय की तरह बौद्धसम्प्रदायों में भी मिलता है। इतने मात्र से ही इसे बौद्धविद्या नहीं कहा जा सकता। यहीं रेवती कल्पाध्याय में ही इस विद्या के उपक्रमस्वरूप वैदिक यज्ञ का निर्देश करके 'मातङ्गी नाम विद्या ब्रह्मर्षिराजर्षिसिद्धचारणपूजिताऽर्चिता मतङ्गेन महर्षिणा कश्यपपुत्रेण कनीयसा महता तपसोग्रेण पितामहादेवासादिता' द्वारा स्पष्ट रूप से इसकी उत्पत्ति श्रौतसम्प्रदायों से बतला कर वैदिक पद्धति से ही इसके विधान को पूरा किया है। इस प्रकार सम्भव है कि मताङ्गी विद्या पीछे से बौद्धग्रन्थों में भी कहीं मिलती हो। परन्तु यह विद्या प्राचीन वैदिक सम्प्रदाय में भी विद्यमान थी। इसलिये इस ग्रन्थ में आया हुआ मताङ्गी शब्द बौद्ध विद्या की शङ्का उत्पन्न नहीं करता। ष्टाइन नामक विद्वान् द्वारा तूङ्‌हाङ् प्रदेश (चीन की उत्तर पश्चिमी सीमा पर) से उपलब्ध प्राचीन ग्रन्थ में भगवान् बुद्ध के जीवक के प्रति दिये गये उपदेश में बाबर मैनुस्क्रिप्ट गत नावनीतक के साथ वाले ग्रन्थ में तथा पञ्चरक्षा आदि बौद्ध ग्रन्थों में भी प्राकृत भाषा के शब्दों से युक्त मन्त्र व्यवहार के दिखाई देने से ८४ सिद्ध नाथ आदि के समय से पूर्व समय में भी प्राकृत शब्दों से युक्त मन्त्रों का व्यवहार विद्यमान था। इसलिये मन्त्रों में प्राकृत शब्दों के प्रवेश मात्र से कुछ नहीं कहा जा सकता।

इसके अतिरिक्त रेवती कल्पाध्याय में जातहारिणियों (उत्पन्न हुए को नष्ट करनेवाली) का निर्देश करते हुए भिक्षुणियों के लिये श्रमणिका तथा निर्ग्रन्थी शब्द का उल्लेख किया है। यद्यपि श्रमण शब्द बौद्ध एवं पीछे के अन्य विद्वानों द्वारा बौद्ध भिक्षुकों के लिये ही प्रयुक्त किया गया है तथा महाभाष्यकार द्वारा 'येषां च विरोधः शाश्वतिकः' (२. ४. ९) इस सूत्र में शाश्वतिक विरोध स्वरूप 'श्रमणब्राह्मणम्' यह उदाहरण दिया होने से बौद्धों तथा ब्राह्मणों के परस्पर संघर्ष को लेकर श्रमण शब्द बौद्धभिक्षु परक ही प्रतीत होता है तथापि उससे पूर्व पाणिनि द्वारा भी 'कुमारः श्रमणादिभिः' सूत्र में श्रमण शब्द का उल्लेख होने से बौद्ध तथा जैन सम्प्रदायों के उदय के पश्चात् ही यह शब्द आया है—ऐसा नहीं कहा जा सकता। श्रमण शब्द शारीरिक क्लेश आदि द्वारा उत्पन्न हुए श्रम (थकावट) के अनुसार वैखानस¹ सूत्र में तृतीय आश्रमवाले (वानप्रस्थी) के अर्थ में, बृहदारण्यक² में त्यागी भिक्षु के रूप में तथा तैत्तिरीयारण्यक³ और रामायण⁴ आदि⁵ अनेक प्राचीन ग्रन्थों में भिक्षु एवं तपस्वियों के लिये प्राचीन काल से ही प्रयुक्त होता हुआ मिलता है। श्रमण शब्द प्राचीन काल से ही व्यवहृत होता आ रहा है ऐसा श्री चिन्तामणि⁶ वैद्य ने अपनी पुस्तक में लिखा है।

निर्ग्रन्थ शब्द का अनुसन्धान करते हुए हम देखते हैं कि दिग्घ⁷निकाय में उस समय प्रचलित अन्य सम्प्रदायों की श्रेणी में प्रस्थानान्तरीय तथा प्रतिपक्षरूप से निर्दिष्ट किसी व्यक्ति का निग्गन्थनाथपुत्त (निर्ग्रन्थनाथ पुत्र) शब्द से उल्लेख किया गया है। कुछ विद्वानों का कथन है कि निर्ग्रन्थ शब्द जैन भिक्षुओं के लिये प्रसिद्ध होने से तथा उस समय महावीर के संभावित प्रतिपक्षी के रूप में मिलने से निर्ग्रन्थनाथ पुत्र शब्द से महावीर का निर्देश किया गया है। किन्तु महावीर के निर्ग्रन्थनाथ पुत्र होने से उसका पिता या आचार्य निर्ग्रन्थनाथ हुआ। इसमें नाथ पद के होने से उसके पिता के समय


१. १ से ७ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ३४-३५ देखें।