भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 216
२०२काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

से न मिलने पर भी चरक विमा¹न स्थान तृतीयाध्याय में कृतयुग का आदि कालरूप अवान्तर विभाग करके शारीरसंहनन तथा आयु के मान आदियों की भी यथोत्तर अवनति का निर्देश मिलता है । उसकी व्याख्या² में चक्रपाणि ने यथापूर्व उत्कर्षवाद तथा यथोत्तर अपकर्षवाद सूचक व्यास के वचनों को उद्धृत किया है । इस प्रकार उत्कर्ष तथा अपकर्ष के तारतम्य का निर्देश श्रुति तथा स्मृति के अनुयायी सम्प्रदायों में भी अंशरूप में मिलता है । श्रीजाकोबी³ ने भी ‘इनसाइक्लोपीडिया आफ रिलीजन एण्ड इथिक्स भाग १ के पृष्ठ २०२ पर इस प्रक्रिया को पुराणसंमत बताया है ।

महापुराण, कर्मप्रकृति तथा जीवसमासवृत्ति आदि जैनग्रन्थों में उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी कालविभाग, वज्र आदि शारीरसंहनन के भेद तथा पल्योपम आदि आयु के मानों के मिलने पर भी उसमें वज्र, ऋषभ, नाराज आदि ६ प्रकार के शारीर संहनन तथा आयु के मान का पल्योपम तथा सागरोपम शब्दों द्वारा निर्देश मिलने से तथा इस वृद्धजीवकीय तन्त्र में नारायण, अर्धनारायण, कौशिक तथा प्रज्ञप्तिपिशितरूप चार प्रकार के शारीर संहनन तथा आयु के मान का भी पलितोपम शब्द द्वारा निर्देश होने से विषय की थोड़ी बहुत छाया के मिलने पर भी पूर्वरूप से समानता नहीं है ।

बाह्य (वेदों से बाह्य-वेदविरुद्ध) सम्प्रदायों के समान श्रौतसम्प्रदाय के भी बहुत से प्राचीन ग्रन्थ विलुप्त हो गये हैं । पूर्व सम्प्रदायों के प्रसिद्ध शब्दों को पीछे के सम्प्रदायों द्वारा लिये होने पर भी पूर्वसम्प्रदाय के ग्रन्थों के न मिलने से बाद में जहां ये शब्द मिलते हैं उन्हीं के प्रतीत होने लगते हैं । ग्रन्थ के पूर्वापर पर्यालोचन करने पर भी इस लेशमात्र विषय के अतिरिक्त इस ग्रन्थ में जैन एवं बौद्ध आध्यात्मिक अथवा अन्य कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं मिलती है । प्रत्युत जिस अध्याय में उत्सर्पिणी, अवसर्पिणी शब्दों का निर्देश है वहीं अगले वाक्यों में ही समुदय कारणों (सृष्टि की उत्पत्ति) का उल्लेख करते हुए अव्यक्त, महत् आदि के क्रम से संख्यादर्शन के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति के मिलने से तथा इसके आगे गर्भावक्रान्ति अध्याय में श्रौतदर्शनों के अनुकूल ईश्वर के गुणों से युक्त सर्वगत संसारी जीवों का निर्देश मिलने से यह उन्नत; अवनत तथा शुभ, अशुभ काल, शारीरसंहनन तथा आयु के मान आदि का उल्लेख भी प्राचीन श्रौत एवं स्मार्त सम्प्रदायों के अनुसार ही प्रतीत होता है । तथापि उत्सर्पिणी तथा अवसर्पिणी शब्दों के उपलब्ध श्रौत-स्मार्त ग्रन्थों में कहीं भी न मिलने तथा जैनग्रन्थों में इनके बाहुल्य से मिलने से, तथा नाम और संख्या का विभेद होने पर भी संहनन आदि के भी उन्हीं जैन ग्रन्थों में मिलने से इस संहिता के इस अंश में जैन सम्प्रदाय के विषय की झलक मिलती ही है । यहां आया हुआ आयु का मानसूचक पलितोपम शब्द भी जैन ग्रन्थों के पल्योपम शब्द का अपभ्रंश प्रतीत होता है । सैण्ट पीटर्सबर्ग बृहत्कोश तथा जैकोबी के इनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलीजन एण्ड इथिक्स—भाग १ के पृष्ठ २०२ में भी ये शब्द जैनसम्प्रदाय के ही बतलाये हैं । अभिधान राजेन्द्र नामक जैन बृहत्कोश में भी इन शब्दों का अर्थ उसी सम्प्रदाय के अनुसार किया है । श्रीमती स्टीवेन्सन ने भी ‘दी हार्ट आफ जैनिज्म’ नामक पुस्तक के पृ. २७२-७६ पर जैन सम्प्रदाय के विषयों को लेकर उत्सर्पिणी तथा अवसर्पिणी शब्दों का कालपरक अर्थ किया है । ⁴हार्डी नामक विद्वान् ने भी बौद्ध सम्प्रदाय के लेख में इस विषय का निरूपण किया है । इस प्रकार जैन सम्प्रदाय के विषयों की लेशमात्र छाया भी इसे जैन सम्प्रदाय के उद्गम के बाद का सिद्ध करती है । किन्तु जैन सम्प्रदाय में महावीर तथा बुद्ध सम्प्रदाय में गौतमबुद्ध के विशेष प्रसिद्ध होने से आचार्य प्रतीत होने पर भी उन्हीं के ग्रन्थों में महावीर से पूर्ववर्त्ती पार्श्वनाथ आदि २३ तीर्थङ्करों का और गौतमबुद्ध के पूर्ववर्ती कनकमुनि आदि का उल्लेख होने से तथा अशोक द्वारा गौतम बुद्ध के पूर्ववर्त्ती कनकमुनि के स्तूप के जीर्णोद्धार ⁵सम्बन्धी शिलालेख तथा स्तूप की प्राप्ति से प्राचीन काल में भी इन सम्प्रदायों का इसी रूप में या थोड़े अन्तर के साथ होना प्रकट होता है । इस प्रकार जैन सम्प्रदाय का महावीर द्वारा तथा बौद्धसम्प्रदाय का गौतमबुद्ध द्वारा प्रारम्भ किये जाने विषयक इतिहास आज भी अधूरा है । प्राचीन काल में भी वैदविरुद्ध मतानुयायियों का सत्त्व दीघ्घनि⁶काय ग्रन्थ के लेख से स्पष्ट है । उपनिषदों में भी तद्विषयक आक्षेप के मिलने से उनका सत्त्व प्रकट होता है ।


१. १ से ६ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ३३ देखें।