भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २०१

जीवक की कौन सी सन्तति (पीढ़ी) में यह हुआ है, इस विषय में विशेष कुछ नहीं मिलता है। अनायास नामक यक्ष को प्रसन्न करके उससे इस तन्त्र की प्राप्ति का वर्णन करने से यह प्रतिसंस्कर्ता यक्षजाति की विद्या समृद्धि के समय अपना सत्त्व (होना) प्रकट करता है। यक्ष जातियां प्राचीनकाल से प्रसिद्ध थीं। यक्षों के साथ भारतीयों का परिचय तथा सम्पर्क भी प्राचीन ही है। यक्षों के सम्प्रदाय को बौद्धधर्म से प्राचीन बतलाते हुए श्रीयुत कुमार¹ स्वामी ने यक्षों के विषय में बहुत विवेचन किया है। यह सम्प्रदाय पीछे से बौद्ध तथा जैन सम्प्रदाय के अन्दर मिल गया। प्राचीन बौद्ध तथा जैन ग्रन्थों में भी यक्षों का निर्देश मिलता है। बुद्ध के समय भी भारत में यक्षों की पूजा प्रचलित थी। भारत में इधर-उधर यक्षों की प्राचीन मूर्तियां भी मिलती हैं। न केवल भारत में अपितु रमठ, जागुड, बाह्लीक आदि सीमाप्रान्त के प्रदेशों में भी प्राचीन समय से यक्षों की पूजा का निर्देश मिलता है। किसी की भी अपने जीवन काल में देवता की तरह पूजा नहीं की जाती। बल, वीर्य, विद्या आदि द्वारा समृद्ध जाति का कुछ समय बाद ही देवताओं की तरह पूजा एवं सम्मान सम्भव है। वात्स्य ने जिस यक्ष से इस विलुप्त तन्त्र को प्राप्त किया था उस अनायास नामक यक्ष के विषय में विचार करने पर एक स्थान पर उसका नाम मिलता है। आजकल पञ्चरक्षा नामक एक बौद्ध ग्रन्थ मिलता है उसके चीनी भाषा में भी बहुत से अनुवाद हुए हैं। जिनमें से एक अनुवाद ई. प. ३१७ से ३२२ में मध्यएशिया निवासी कुचभिक्षु पोश्रीमित्र ने किया है ऐसा निर्देश मिलता है। इस भारतीय ग्रन्थ का इतने दूर तथा उस समय में हुआ अनुवाद उसके रचनाकाल को और भी प्राचीन सिद्ध करता है। उस ग्रन्थ में भी लगभग २०० यक्षों का निर्देश है। तथा भिन्न-भिन्न देशों के रक्षकों के रूप में वैश्रवण (कुबेर) आदि यक्षाधिपों की आराधन विधि, उनके आराधन से वातिक, पैत्तिक तथा श्लैष्मिक रोगों की निवृत्ति, वैद्य, गर्भ के बालकों के रोग तथा बालग्रहों की पूजा आदि का उल्लेख है। उसी ग्रन्थ में महामायूरी विद्या के प्रकरण में रमठ देश के रक्षक के रूप में रावण का निर्देश है। मन्त्र विद्या द्वारा रोगनिवृत्ति के रूप में रावण का अन्यत्र भी उल्लेख मिलता है। मान्त्रिक प्रक्रिया द्वारा बालकों की चिकित्सा विषयक प्राचीन रावणतन्त्र भी मिलता है। पञ्चरक्षा के महामायूरी विद्या के प्रकरण में अमुक-अमुक देश के पूज्य यक्षों का निर्देश करते हुए ‘कौशाम्ब्यां चाप्यनायासो भद्रिकायां च भद्रिकः’ इत्यादि वाक्य द्वारा कौशाम्बी (कोसम-इलाहाबाद के पास) के रक्षक रूप से अनायास नामक यक्ष का निर्देश मिलता है। कौशाम्बी बुद्ध के समय भी प्रसिद्ध थी। इस प्रकार उस लेख के द्वारा उस समय भी पूज्य श्रेणी में निर्दिष्ट अनायास यक्ष को बहुत प्राचीन होना चाहिये। बुद्ध के समय भी पूज्य मानी गई यक्ष जाति के पूर्व समय में विद्यमान अनायास से वात्स्य द्वारा इस तन्त्र की प्राप्ति का वर्णन मिलने से वात्स्य भी बुद्ध से पूर्व प्रतीत होता है। एक प्राचीन पुस्तक में महामायूरी विद्य के उपसंहार में ‘आर्यमहामायूरी विद्या विनष्टा यक्षमुखात् प्रतिलब्धा’ इस उल्लेख से यक्षों द्वारा भी विद्या का सम्प्रदाय (परम्परा) मिलता है। इससे अनायास नामक यक्ष से भी इस तन्त्र की प्राप्ति संगत ही है। इसके अतिरिक्त आत्रेय गार्ग्य, शौनक आदि के समान आर्ष नाम से भी यह वात्स्य प्राचीन ही प्रतीत होता हैं। वेद-वेदाङ्ग के पण्डित तथा शिवकश्यप के भक्त रूप से निर्देश मिलने से यह वात्स्य वेदमार्गानुयायी भी प्रतीत होता है।

यहां यह एक विचारणीय प्रश्न है कि इस वृद्धजीवक तन्त्र के शारीरिक स्थान में काल का निरूपण करते हुए आदियुग, देवयुग तथा कृतयुग द्वारा तीन में विभक्त किया हुआ उन्नतावस्था रूप शुभ काल को उत्सर्पिणी शब्द से, त्रेता, द्वापर तथा कलि द्वारा तीन में विभक्त किये हुए अवनत्यवस्था रूप अशुभ काल को अवसर्पिणी शब्द से उत्तरोत्तर क्षीण होते हुए शारीर समूहों को नारायण आदि शब्दों से तथा आयु के मान को पलितोपम शब्द द्वारा व्यवहृत किया गया है। इस ग्रन्थ के इस अंश में निर्दिष्ट युगभेद से न कभी सुना गया, न कभी देखा गया तथा अद्भुत शरीरविन्यास की विचित्र गर्भावस्था, विकासवाद तथा अवनतिवाद में से किस सिद्धान्त के आधार पर है यह विचारणीय है। इस प्रक्रिया से पूर्णरूप


१. उसके यक्ष संबन्धी लेख से तुलना कीजिये।