भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 214

२०० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

सकते क्योंकि आयुर्वेद के प्राचीन आठ विभागों में से एक विभाग बालचिकित्सा संबन्धी कौमारभृत्य है उसके ज्ञाता तथा उपदेशक कौमारभृत्य कहलाते हैं। इस प्रकृतग्रन्थ का ‘कौमारभृत्यमष्टानां तन्त्राणामाद्यमुच्यते’ ‘कौमारभृत्यमतिवर्धनमेतदुक्तम्’ इत्यादि ग्रन्थ लेख तथा ‘काश्यपीयसंहितायां कौमारभृत्ये’ इस पुष्पिका लेख से कौमारभृत्य विषयक तथा ‘कौमारभृत्यास्त्वपरे जङ्गमस्थावराश्रयात्। द्वियोनिं ब्रुवते धूपं कश्यपस्य मते स्थिताः’ तथा भिषक्कौमारभृत्यस्तैः इत्यादि वाक्यों द्वारा इस ग्रन्थ के आचार्य कश्यप तथा अन्य वैद्यों का कौमारभृत्यत्व प्रकट होता है। इसके विपरीत बुद्धकालीन जीवक के लिये तो बौद्धग्रन्थों में कुमार अभय द्वारा पालन किया जाने के कारण विद्याध्यन से पूर्व ही कुमारभृत्य शब्द से निर्देश किया गया है, कुमारभृत्य के ज्ञाता के रूप में उसका निर्देश नहीं है। यदि ऐसा होता तो बालचिकित्सा तथा उसके ज्ञाता दोनों का निर्देश क्यों नहीं है। इसके अतिरिक्त यह भी नहीं कहा जा सकता कि कुमार द्वारा पालित जीवक की विशेष विद्या के कारण ही इस प्रस्थान (विभाग) का नाम कौमारभृत्य है क्योंकि प्राचीनकाल से ही इस प्रस्थान का यह नाम सुश्रुत, नावनीतक आदि में मिलता है। तथा न केवल जीवक अपितु किसी भी कुमार द्वारा न पाले गये, पार्वतक बन्धक आदि का भी कौमारभृत्याचार्य के रूप में उल्लेख मिलता है। इस तन्त्र के आचार्य के बौद्धत्व का भी कहीं निर्देश नहीं है। बौद्धविद्वान् की वाणी अथवा लेखनी द्वारा अन्तःकरण से निकली बौद्ध छाया भी इस ग्रन्थ में कहीं भी नहीं मिलती है। इससे प्रतीत होता है कि बौद्धग्रन्थोक्त जीवक तथा इस तन्त्र के आचार्य वृद्धजीवक में बहुत ही भेद हैं।

जैन ग्रन्थों में आये हुए उत्सर्पिणी तथा अवसर्पिणी पद यहां मिलते हैं तथा जैन इतिहास के पर्यालोचन में जीवक नाम के एक प्रसिद्ध पुरुष का उल्लेख मिलता है जिसके श्रुतन्धर राजकुमार, जीवन्धर तथा जीवस्वामी नाम भी हैं। जिसका महापुराण, जीवन्धरचरित्र तथा गद्यचिन्तामणि आदि जैनग्रन्थों में भी वर्णन मिलता है। उस राजकुमार ने अपने पिता की नगरी से निकलकर अपने बाहुबल से शत्रुओं का संहार करके राजपद को प्राप्त किया तथा जैनधर्म स्वीकार किया। अपने द्वारा उपकृत एक गन्धर्व से प्राप्त विषहरण मन्त्र के प्रभाव से इसमें स्पर्शमात्र से विषापहरण शक्ति का निर्देश मिलता है। इस प्रकार इसका न तो वैद्य विद्या के आचार्यत्व का और न कौमारभृत्य के ज्ञाता होने का ही निर्देश मिलता है।

इस वृद्धजीवकीय तन्त्र में वैदिक¹ धर्म से अनुप्राणित अनेक विषय तथा लेख मिलते हैं। इस प्रकार इस ग्रन्थ का आचार्य बौद्ध तथा जैनग्रन्थों में आये हुए जीवक से भिन्न अन्य ही कोई प्राचीन ऋचीक का पुत्र वृद्धजीवक है। ऐसा इस ग्रन्थ से ज्ञात होता है।

वात्स्य निरूपण—इस संहिता के कल्पाध्याय के लेख से यह ज्ञात होता है कि वृद्धजीवकीय तन्त्ररूप में आई हुई तथा काल प्रवाह से लुप्त हुई इस काश्यपसंहिता को अनायास नाम के पक्ष से प्राप्त करके जीवक के वंशवाले, वेदवेदाङ्ग के पण्डित तथा शिवकश्यप के भक्त वात्स्य नामक किसी विद्वान् ने पुनः संस्कृत करके प्रकाशित किया। इस वर्णन से यह जिज्ञासा होती है कि यह वात्स्य कौन है तथा किस समय हुआ है ? इसके विषय में निम्न उल्लेखनीय है।

वत्स गोत्र में उत्पन्न हुए अर्थ के अनुसार वात्स्य यह केवल कुल का नाम है। जीवक का भार्गव के रूप में उल्लेख होने से तथा वत्स के भृगु कुल में उत्पन्न होने का निर्देश होने से जीवकवंश में होने वाले इस प्रतिसंस्कर्ता का वात्स्य होना उचित है। वंश ब्राह्मण आदि में भी ‘वात्स्याद्वात्स्यः’ इस प्रकार वात्स्य का उल्लेख मिलता है। वंशब्राह्मण में वंश नाम से उल्लिखित यही है या कोई दूसरा यह नहीं कहा जा सकता। इस प्रतिसंस्कर्ता वात्स्य का क्या नाम है तथा


१. १ की टि. उपो. संस्कृत पृ. ३१ देखें।