भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १९९

किया था। इस जीवक के बिम्बसार के पुत्र अजातशत्रु को बुद्ध के दर्शनों के लिये प्रेरित किया था। इत्यादि अन्य भी इस सम्बन्ध की बहुत सी आख्यायिकायें जातक आदि बौद्ध ग्रन्थों में मिलती हैं। इस विषय में बुद्ध$^१$ नामक पुस्तक में श्री Oldenberg नामक विद्वान् तथा श्री $^२$गिरीन्द्रनाथ महोदय ने बहुत कुछ लिखा है। जीवक ने अपने घर के समीप श्रीगुप्त परिखा में एक उद्यान तथा बुद्ध का व्याख्यानचत्वर (व्याख्यान के लिये वेदी-आंगन) बनवाया हुआ था। गृहचत्वर, वृक्ष आदियों के अवशेष के चिह्न वहां आजतक भी विद्यमान हैं ऐसा विल$^३$ महाशय का कहना है।

उपर्युक्त वर्णन के अनुसार प्रसिद्ध जीवक नामक वैद्य बुद्ध तथा बिम्बसार के समकालीन आज से २५०० वर्ष पूर्व (ई. पू. ६००) हुआ प्रतीत होता है।

बौद्धग्रन्थोक्त जीवक का मगध देश के रहने वाले, बिम्बसार द्वारा भुजिष्यां नामक वेश्या में उत्पन्न हुए तथा तरुण वैद्य के रूप में निर्देश किया गया है। उसने बाल्यावस्था के बाद तक्षशिला जाकर वहां के किसी आचार्य से सात वर्ष तक वैद्यविद्या का अध्ययन किया। उसके बाद महावग्ग के अनुसार बौद्धभिक्षुओं के सत्कर्ता वैद्य, तिब्बतीय कथा के अनुसार स्तूपनिर्माता और बाद में तथागत के सम्प्रदाय में प्रविष्ट हुए, तथा मज्झम निकाय के अनुसार बुद्ध के शरणागत तथा उपासक होने की प्रतीति होती है। परन्तु काश्यप संहिता के अनुसार इस ग्रन्थ का आचार्य जीवक कनखलवासी, ऋचीक पुत्र, पांच वर्ष की अवस्था में भी वलि-पलित (झुर्रियों तथा सफेद बालों) के कारण वृद्ध प्रतीत होने वाला, वेदवेदाङ्ग के ज्ञाता तथा आहिताग्नि कश्यप का शिष्य, महर्षियों द्वारा सस्कृत, अपने वंशोद्भव, शिवकश्यप के भक्त तथा वेदवेदाङ्ग के पण्डित प्रतिसंस्कर्ता, वात्स्य का पूर्वपुरुष तथा श्रुति एवं स्मृति के अनुकूल मार्ग का अनुयायी प्रतीत होता है।

बुद्ध सामयिक जीवक के भैषज्यसम्बन्धी वृत्तान्त में राजगृह के सेठ के कपाल तथा वाराणसी के सेठ की आंतों के भेदन का उल्लेख मिलने से वह शल्यतन्त्र का विशेषज्ञ प्रतीत होता है न कि बालरोगों का। शल्यतन्त्र के विद्वान् के रूप में उल्लेख होने मात्र से ही उसकी बालचिकित्सा या अन्य चिकित्साओं में अनभिज्ञता थी, ऐसा मेरा अभिप्राय नहीं है। परन्तु जिस प्रकार शल्यतन्त्राचार्य सुश्रुत का अन्य विषयों के ज्ञान के निर्देश होने पर भी उसकी शल्यतन्त्र के विषय में ही प्रसिद्धि है उसी प्रकार यदि यह भी बालकों के रोगों का विशेषज्ञ था तो तद्विषयक वृत्तान्त अवश्य मिलना चाहिये परन्तु ऐसा नहीं मिलता है। परन्तु इस ग्रन्थ के आचार्य जीवक को तो प्रारम्भ से ही बालरोगों का मुख्यरूप से अनुभव होने से यह स्पष्ट रूप से बालतन्त्र का आचार्य प्रतीत होता है।

बुद्ध के समय काश्यप तथा जीवक की ऐतिहासिक समकालीनता मिलने के कारण इस ग्रन्थ में साथ-साथ आये हुए कश्यप तथा जीवक दोनों बुद्ध के समकालीन तथा बौद्ध ग्रन्थों में आये हुए हैं, ऐसी कल्पना भी उचित नहीं है क्योंकि काश्यप तीनों भाइयों में ज्येष्ठ था तथा वह दार्शनिक और याज्ञिक था। महावग्ग में उसके विषय में मिलता है कि उरुबिल्व ग्राम में बुद्ध ने उसे बौद्धधर्म में दीक्षित किया था फिर उसे देखकर बिम्बसार ने भी बौद्धमत को स्वीकार कर लिया। उसके दार्शनिक होने का उल्लेख मिलता है इस प्रकार उसका न तो वैद्य के रूप में न कौमारभृत्याचार्य के रूप में तथा न मरीचि के पुत्र रूप में ही उल्लेख मिलता है। बौद्ध ग्रन्थोक्त जीवक का तिब्बतीय कथाओं के अनुसार भी तक्षशिला स्थित आत्रेय से अध्ययन का उल्लेख मिलता है न कि मगधदेशीय काश्यप से। इस प्रकार बौद्धकाश्यप एवं कश्यप में बहुत सी असमानतायें होने से तथा केवल नाम मात्र की समानता से ही जीवक के विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता।

इसके अतिरिक्त बौद्धकालीन जीवक का कुमार द्वारा पालन किया जाने के कारण पालीभाषा के अनुसार कुमारभच्च तथा इस ग्रन्थ के आचार्य का कुमार (बाल) रोगों के आचार्य होने के कारण कौमारभृत्य होने से भी दोनों एक नहीं हो


१. १ से ३ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ३० देखें।

१४ का.सं.