भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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१९८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

राजगृह (वर्तमान राजगीर-पटना जिला) में शालावती नाम की किसी वेश्या द्वारा सद्यः प्रसूत बालक को दासी ने शूर्प (छाज) में रखकर बाहर फेंक दिया। राजकुमार अभय उसे देखकर महल में ले आया तथा दासी द्वारा इसका पालन-पोषण किया। 'उत्सृष्टोऽपि जीवति' (छोड़ा हुआ या फेंक दिया जाने पर भी जीवित हैं) इस व्युत्पत्ति के अनुसार इसका नाम जीवक हुआ तथा राजकुमार द्वारा पालन-पोषण किया जाने के कारण पाली भाषा के अनुसार इसका नाम कु (को) मारभच्च (कौमारभृत्य, कुमारभृत) भी हो गया। उसके बाद कालक्रम से वृद्धि को प्राप्त होकर जीविका की दृष्टि से विद्याध्ययन के लिये राजकुमार को बिना कहे ही उसने तक्षशिला जाकर वहां के किसी प्रसिद्ध वैद्य से सात वर्ष तक वैद्यक विद्या का अभ्यास किया। विद्या समाप्ति के बाद आचार्य ने पाथेय बांधकर उसे विदा किया और वह वहां से लौट गया। मार्ग में साकेत (अयोध्या) पहुंचकर सात वर्षों से शिरोवेदना से पीडित किसी सेठानी के घर पहुंचकर उस तरुण वैद्य ने घृत नस्य आदि ओषधियों से उसको स्वस्थ कर दिया तथा सत्कार में मिले हुए धन, दास तथा रथ आदि लेकर राजगृह पहुंचा। उस अर्जित धन को पोषण के प्रत्युपकार रूप में उसने राजकुमार अभय को देना चाहा परन्तु उसने अस्वीकृत करके उसका सम्मान किया तथा राजप्रासाद के अन्दर ही उसका निवास स्थान बनवा दिया। इसके बाद मगध के राजा बिम्बिसार का तीव्र भगन्दर रोग उसने एक ही लेप में अच्छा कर दिया। इससे प्रसन्न होकर राजा ने उसका ५०० स्त्रियों के आभूषणों से सत्कार करके उस तरुण जीवक को अपने अन्तःपुर में रहने वाले प्रमुख बौद्ध भिक्षुओं की भी चिकित्सा की अनुमति प्रदान की। फिर सात वर्षों से शिरोवेदना से पीड़ित एक सेठ को किसी ओषधि से संज्ञाहीन करके कपाल का भेदन करके उसमें से दो कृमियों को निकाल कर पुनः कपाल को सीकर कुछ दिनों में उसे स्वस्थ करके उससे सत्कार रूप में बहुत सा धन प्राप्त किया। उसके बाद राजाज्ञा से बनारस जाकर आन्त्रग्रन्थि (T. B. of Intestinal Glands) रोग से पीड़ित किसी सेठ के लड़के के पेट का भेदन करके उसको स्वस्थ किया। उस सेठ ने भी उसका धन द्वारा बहुत सत्कार किया। उसके बाद राजा की आज्ञा से उज्जायिनी के राजा प्रद्योत के पाण्डुरोग को घृत प्रयोग द्वारा शान्त करने के लिये पहुंचा। घृत को न पीने की इच्छा वाले राजा को जब उसने कषायरूप से घृत का पान करा दिया तो उसे वमन हो गया। तब राजा के डर से पहले से ही तैयार की हुई हथिनी पर सवार होकर भागकर राजगृह लौट गया। औषध प्रयोग द्वारा वमन होने से स्वस्थ हुए राजा ने जीवक के लिये शिवि देश (शोरकोट-मध्य पंजाब) में होनेवाले मृगचर्म आदि की भेंट भेजी। फिर आनन्द तथागत की सूचना से रुग्ण हुए भगवान् बुद्ध को जीवक ने विरेचन के प्रयोग से स्वस्थ किया। प्रद्योत और बनारस के राजा द्वारा दिये हुए मृगचर्म, कम्बल आदि जीवक ने भिक्षुओं के लिये भगवान् तथागत को अर्पित कर दिया।

तिब्ब¹तीय गाथाओं के अनुसार बिम्बसार द्वारा भुजिष्या में उत्पन्न हुए पुत्र को माता ने एक टोकरी में रखकर फेंक दिया। उस बालक का राजकुमार अभय ने पालन-पोषण किया इसलिये उसका नाम कुमारभृत (भृत्य) हो गया। वह भैषज्य विद्या का अभ्यास करके राजकुमार की आज्ञा से कपालभेदन आदि शल्यतन्त्र (Surgery) का विशेष ज्ञान प्राप्त करने के लिये तक्षशिला पहुंचा। वहां शल्यतन्त्र के परम विद्वान् आत्रेय से शिक्षा ग्रहण करके शल्यतन्त्र में अत्यन्त निपुण हो गया, तथा अपने गुरु आत्रेय से भी बढ़ गया। ई. प. ४५० में लिखित बुद्धघोषकृत धम्म²पदव्याख्या में जीवक द्वारा ५०० भिक्षुओं सहित भगवान् बुद्ध के भोजन तथा बुद्ध के पादव्रण की चिकित्सा का निर्देश है। इसके अतिरिक्त सतीगुम्बजातक, संकिच्चजातक तथा चुल्ल³हंसजातक आदि में भी जीवक का निर्देश है।

उसने कभी अम्बपाली नामक उद्यान में एक विहार बनवाकर साढ़े बारह सौ (१२५०) भिक्षुओं के सहित बुद्ध को निमन्त्रित करके उसका सत्कार किया। राजगृह के श्रीगुप्त परिखा (मोहल्लाबस्ती) में उसने किसी स्तूप का भी निर्माण


१. १ से ३ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ३० देखें।