काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १९७
नाम से अन्य भी दो तीन श्लोक दिये हुए हैं। परन्तु इस संहिता के बहुत से भागों के खण्डित होने से संभवतः वे श्लोक इस खण्डित भाग में हों ।
पीयूषधारा के गर्भाधानप्रकरण¹ में उक्तं च कश्यपसंहितायां, वर्षद्वादशकादूर्ध्वम्' इत्यादि द्वारा प्रारंभ करके निम्न श्लोक दिया है—
अन्तः पुष्पं भवत्येव पनसोदुम्बरादिवत् । अतस्तु तत्र कुर्वीत तत्सङ्गं बुद्धिमान्नरः ।।
(अर्थात् कटहल तथा गूलर की तरह बारह वर्ष के बाद स्त्री अन्तःपुष्पा होती है, इसलिये उसके साथ बुद्धिमान् पुरुष सङ्ग कर सकता है) ।
उपर्युक्त श्लोक के ज्योतिष के ग्रन्थ में होने से कश्यपसंहिता नाम का अन्य ज्योतिष का ग्रन्थ भी हो सकता है। काश्यपसंहिता के जातिसूत्रीयाध्याय में आये हुए गर्भाधान से संबन्धित विषय के अंशरूप में त्रुटित होने से तथा इस संहिता में आर्ष रचना द्वारा गर्भाधान के विषय का प्रतिपादन किया होने से यह श्लोक संभवतः उस त्रुटित भाग में आया हुआ भी हो सकता है। उस अवस्था में पीयूषधारा में वर्णित कश्यपसंहिता भी संभवतः यही हो ।
जीवक-संबन्धी विचार—पूर्वोद्दिष्ट काश्यपसंहिता के कल्पाध्याय के अनुसार ज्ञात होता है कि कश्यप द्वारा उपदिष्ट महातन्त्र रूपी इस संहिता को कनखल निवासी तथा ऋचीकपुत्र वृद्धजीवक नामवाले किसी महर्षि ने उसे ग्रहण किया तथा संक्षिप्त करके उसे तन्त्ररूप में प्रकाशित किया।
महाभारत के प्रारम्भ में जामदग्नोपाख्यान में ऋचीक नाम के महर्षि का उल्लेख मिलता है। असीरियन् देश के पूर्ववृत्त में भी गालव आदि के नाम की तरह ऋचीक का नाम भी मिलता है। साधक प्रमाणों के अभाव में इस वृद्धजीवक का पिता कौनसा ऋचीक है, यह नहीं कहा जा सकता। पुराण, इतिहास आदि में तथा आत्रेय सुश्रुत आदि प्राचीन वैद्यक ग्रन्थों में भी वृद्धजीवक या जीवक का नाम कहीं भी दिखाई नहीं देता है। परन्तु नावनीतक के कौमारभृत्य प्रकरण में कश्यप के समान ही नाम² ग्रहण पूर्वक छर्दि एवं उरोघात रोग में जीवक की ओषधि का भी उल्लेख होने से तथा बालभैषज्य के विषय एवं काश्यप के साहचर्य से यही वृद्धजीवक प्रतीत होता है। इस वृद्ध जीवक तन्त्र में छर्दि रोग के प्रकरण के खण्डित होने से वह ओषधि यहाँ नहीं मिलती है। उरोघात रोग में ओषधियों का निर्देश करने वाले श्लोक बीच-बीच में खण्डित हैं परन्तु अवशिष्ट भाग में पिप्पली के साथ मिलाकर किसी ओषधि का प्रयोग दिखाई देने से कुछ समानता प्रतीत होती है। सुश्रुत के उत्तर तन्त्र में 'ये च विस्तरतो दृष्टाः कुमाराबाधहेतवः' द्वारा सामान्यरूप से निर्देश करके उसकी व्याख्या करते हुए डल्लन ने 'पार्वतकजीवबन्ध्यकप्रभृतिभिः' द्वारा जिस जीवक का संकेत किया है, कौमारभृत्याचार्यों की श्रेणी में दिया होने से संभवतः वह यही वृद्धजीवक है। चक्रदत्त ने भी जीवक के नाम से सौरेश्वर घृत दिया हुआ है। अन्य टीकाग्रन्थों में भी कुमारों के लिये उपयोगी कास-श्वासनाशक ओषधियाँ जीवक के नाम से उद्धृत मिलती है।
यह वृद्धजीवक कौन है ? इसका अनुसन्धान करने पर हमें भगवान् बुद्ध के समय के महावग्ग नामक पालीग्रन्थ बौद्धजातक तथा तिब्बतीय गाथाओं में 'कुमारभच्च' विशेषण युक्त जीवक नामक किसी प्रसिद्ध वैद्य का वृत्तान्त मिलता है। इसमें कुमारभच्च विशेषण तथा जीवक नामक प्रसिद्ध वैद्य के मिलने से इसके परिचय के लिये महावग्ग नामक बौद्ध पालीग्रन्थ के आठवें अध्याय में निम्न कथानक मिलता है—
१. १ से २ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. २८-२९ देखें ।