भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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१९६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

विद्वानों ने इसे तीसरी चौथी शताब्दी में लिखा हुआ निश्चित किया है¹। ग्रन्थ रचना तो इससे भी प्राचीन होनी चाहिये। इसमें आत्रेय, क्षार पाणि, जातूकर्ण, पराशर, भेड, हारीत, सुश्रुत, काश्यप तथा जीवक आदि के नाम भी दिये हुये हैं। इन प्राचीन आचार्यों की संहिताओं के योगों का इसमें संग्रह होने से परन्तु अष्टाङ्गहृदयोक्त एक भी योग के न होने से यह निबन्ध कश्यप, काश्यप, आत्रेय, सुश्रुत, तथा भेड आदि से पश्चात् तथा वाग्भट से पूर्व का प्रतीत होता है। इसके कौमारभृत्य विषयक १४ वें अध्याय में काश्यप तथा जीवक नाम से कुछ औषध योग दिये हैं। यहां कौमारभृत्य के प्रकरण में जीवक के साथ आया हुआ काश्यप संभवतः इस काश्यप संहिता का आचार्य ही है। स्वार्थ में अण् करके अथवा उस गोत्र के अर्थ में कश्यप का काश्यप शब्द द्वारा भी व्यवहार संभव होने के कश्यप के स्थान पर काश्यप दिया हुआ प्रतीत होता है। वहीं पर निम्न श्लोक दिये हैं जिनमें कश्यप के नाम से गुटिका ओषधियों के रूप में विशेष योग दिया है—

आसवेन सुजातेन बालानां दापयेद्भिषक् । सुखं भवति तेनास्य काश्यपस्य वचो यथा ॥१०॥ तेन कोष्ठगतो वायुः क्षिप्रमेव प्रमुच्यते । शिरोरोगेषु शमनं वमनं चैव शाम्यति ॥११॥ कृमिर्गुदगतो यस्य गुटिकायाः प्रलेपयेत् । तेनास्य सौख्यं भवति काश्यपस्य वचो यथा ॥१२॥ शर्कराक्षौद्रसंयुक्तां पाययीत चिकित्सकः । सुखी भवति तां पीत्वा काश्यपस्य वचो यथा ॥१३॥

नवनीतक में इससे पूर्व के श्लोकों के लुप्त होने से इस गुटिकौषध का क्या स्वरूप है यह नहीं कहा जा सकता। काश्यपसंहिता में स्थान-स्थान पर गुटिकौषधियों की रचना तथा उपयोग दिये हैं, उन्हीं में से किसी एक को लेकर अपने अनुभूत अनुपान विशेष के साथ यहां दिया गया प्रतीत होता है।

प्राचीन रावणकृत बालतन्त्र में काश्यप तथा वृद्धकाश्यप के नाम दिये हैं। इस कौमारतन्त्र में वृद्धकाश्यप के साथ आचार्यरूप में आया हुआ काश्यप भी यही कौमारभृत्याचार्य कश्यप प्रतीत होता है।

ज्वरसमुच्चय नाम का एक प्राचीन ग्रन्थ हैं जिसमें ज्वर के विषय में प्राचीन ऋषियों के वचनों का संग्रह किया गया है। जिसकी एक ताडपुस्तक, लिपि के अनुसार सात-आठ सौ वर्ष पूर्व की तथा दूसरी ४४ नेपाली संवत्सर (ई. प. ९२४) में लिखी हुई मेरे पास है। जब ग्रन्थ का लेख (लिपि) समय ही इतना प्राचीन है तब ग्रन्थ का रचना समय तो इससे भी प्राचीन होना चाहिये। इस ग्रन्थ में कश्यप नाम से बहुत से श्लोक दिये हुए हैं। इन श्लोकों की काश्यपसंहिता में आये हुए श्लोकों से संगति है, इसका पीछे निर्देश किया जायगा। इससे यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि ज्वरसमुच्चय में आया हुआ काश्यप इस संहिता का आचार्य कश्यप ही है। तथा उसमें दिये हुए श्लोक भी इस संहिता से ही लिये गये हैं।

इसी प्रकार सुश्रुत की व्याख्या के निबन्धसंग्रह² अष्टाङ्ग हृदय³ की टीका तथा चरक की चक्रपाणि टीका में कश्यप


१. इस ग्रन्थ की उपलब्धि के विषय में भारतीय इतिहास की रूपरेखा पृ. ९८३ (जयचन्द्र विद्यालंकार) पर लिखा है— सन् १८९० में ब्रिटिश भारतीय सेना के लैफ्टिनेंट बावर नामक एक अफसर को एक दूसरे अंग्रेज के घातक की खोज में घूमते फिरते चीनी तुर्किस्तान के उत्तरपूर्वी छोर की कुचार (कूचा) नामक बस्ती से एक स्तूप के खण्डहरों में से निकाली गई भोजपत्रों पर लिखी एक पोथी मिली। वह अब बावर-पोथी कहलाती है। वह कलकत्ते में डॉ. हार्नली के पास भेजी गई और गुप्त युग ब्राह्मी में लिखी संस्कृत की पोथी निकली। वह वैद्यक का ग्रन्थ है जिसके पहले अंश में लहसुन के गुण बखाने गये हैं। बाबर पोथी अब आक्सफोर्ड में है। उसके पूरे फोटो लिप्यन्तर और अनुवार हार्नली ने आ. स. इ. जि. २२ में प्रकाशित किये हैं—अनुवादक। २. २ से ३ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. २८ देखें।