काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 209, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद १९५
इस पूर्वार्धभाग में नाना वातरोग, ज्वर, ग्रहणी, अतिसार, अर्श, इनके निदान, उनको दूर करने के लिये ओषधियां तथा निदानरूप पापों को दूर करने के लिये रुद्र, शिव, विष्णु आदि की आराधना संक्षेप से दिया हुआ है। इस पूर्वार्ध के अन्त में 'बालरोगस्य' द्वारा प्रारंभ करके निम्न श्लोक दिये हुए हैं—
सर्वाङ्गं मूर्ध्नि कक्षे द्वे श्रोणी द्वे पादबाहुकम् । पिटकं दर्दुरं कण्डूं तिमिरं कृमिसंकुलम् ।। पूयं रक्तं स्रवति च वेदनं शुष्कमङ्गजम् । विदाहं शोषमत्यन्तबालकं पिच्छिपिच्छिलाम् ।। एते गुणविकाराश्च पैत्तरूपं समुद्भवम् । तत्पैत्तनाडीनाशार्थं रास्नादिलेह्यकं तथा ।। ममासं मासत्रयं नित्यं बालपैत्तविनाशकम् । अश्वगन्धिघृतं सेवेद्विडङ्गादिघृतं तथा ।। वाकुचीघृतविख्यातं बालकं पिच्छिलं हरेत् ।
इन श्लोकों के बाद 'इति पार्वतीपरमेश्वरसंवादे काश्यपसंहितायां पूर्वार्द्धं समाप्तम्' द्वारा इसे समाप्त किया गया है। इस संहिता का लेख प्रौढ़ एवं सुसंस्कृत न होने से इसे प्राचीन नहीं कहा जा सकता। उसमें बालभैषज्य का भी मुख्यरूप से वर्णन नहीं है। केवल अन्त में इस विषय के उपरिनिर्दिष्ट श्लोक दिये हैं। वृद्धजीवकीयतन्त्र के साथ इसकी विषय रचना तथा भैषज्य की दृष्टि से बिलकुल भी समानता नहीं है। यह तान्त्रिक प्रक्रियाओं से युक्त भिन्न ही संहिता प्रतीत होती है। तथा इसका उपदेशक भी कश्यप नाम वाला कोई भिन्न ही प्रतीत होता है !
मद्रास प्रदेश में मुद्रित काश्यपसंहिता¹ नाम का अगदतन्त्र विषयक एक अन्य ग्रन्थ भी मिलता है। उसमें गारुडिविद्या (सर्पविद्या), विषनाशक औषधप्रयोग, मान्त्रिकप्रयोग, विषों की भिन्न-भिन्न जातियाँ और भेद तथा दंश आदि का वर्णन है। इस संहिता का लेख डल्लन तथा मधुकोश में उद्धृत अगदतन्त्र विषयक श्लोकों से लेशमात्र भी नहीं मिलता है। इसमें वे दोनों श्लोक भी नहीं दिये हैं। इस प्रकार अगदतन्त्र के ज्ञाता किसी अन्य अर्वाचीन काश्यप का अथवा प्राचीन अगदाचार्य काश्यप के सम्प्रदाय वाले किसी अन्य का ही यह लेख प्रतीत होता है। इस कौमारभृत्य विषयक संहिता में इसकी गन्ध तथा नाम भी नहीं है।
इस प्रकार कश्यप तथा काश्यप शब्दों के भिन्न-भिन्न दिखाई देने से इन उपरिनिर्दिष्ट काश्यपों के प्राचीन होने पर भी विषय के भेद से काश्यपसंहिता नाम से मिलने वाले उपरिनिर्दिष्ट दोनों ग्रन्थों के अर्वाचीन होने से तथा इन काश्यपों के साथ मारीच शब्द का विशेषण न लगा होने से इस कौमारभृत्य संहिता आचार्य मारीचकश्यप नाम वाला भिन्न ही आचार्य प्रतीत होता है। तथा उसकी यह नवोपलब्ध प्राचीन संहिता भी भिन्न ही प्रतीत होती है। कश्यप द्वारा उपदिष्ट होने पर भी तदीयत्व (उस विषयक) बोधक प्रत्यय से समानाधिकरण समास होकर पुंवद्भाव में 'कश्यप की संहिता' इस अर्थ को दृष्टि में रखते हुए इसका काश्यपसंहिता यह नाम उचित ही है।
अष्टाङ्ग हृदय में बालकों के रोगों के प्रतिषेध विषयक अध्याय में वृद्धकश्यप² तथा कश्यप³ नाम से दो औषध योग दिये हुए हैं। वृद्धकश्यप तथा कश्यप का पृथक्-पृथक् निर्देश होने से इस काश्यपसंहिता में वृद्धकश्यपोक्त विषय के न मिलने पर भी कश्यप नाम से दिया हुआ बालकों का ग्रहहर दशाङ्ग धूप धूपप्रकरण में कुछ पाठभेद से मिलता है। कश्यप नाम से दिया हुआ बालकों के यक्ष-राक्षस आदि की बाधाओं को नष्ट करने वाला अभयघृत वाग्भट⁴ में भी दिया है। वस्तुओं तथा रक्षोघ्नत्वादि की समानता से यह वही प्रतीत होता है।
खोटाङ्ग (मध्य एशिया) नामक स्थान के भूगर्भ से बावर मैनुस्क्रिप्ट (Bower manuscript) रूप से प्रसिद्ध नावनीतक नाम का एक प्राचीन वैद्यक⁵ ग्रन्थ अभी मिला है। इस पुस्तक की भोजपत्र पर लिखित प्राचीन लिपि को देखकर
१. टि. १ से ४ उपो. संस्कृत पृ. २७ देखें।
५. यह ग्रन्थ यूरोप तथा लाहौर से भी मुद्रित हुआ है।