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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २०३

अस्तिनास्तिदिष्टं मतिः (४. ४. ६०) इस सूत्र द्वारा पाणिनि ने भी दोनों (वेदमतानुयायी तथा वेदविरुद्धमतानुयायी) सम्प्रदायों का होना सूचित किया है। जैन ग्रन्थों के अनुसार पार्श्वनाथ आदि पूर्व आचार्यों में परस्पर बहुत व्यवधान के होने से पल्योपम, सागरोपम आदि शब्द वाचक संख्या की महत्ता से तथा आर्हत सम्प्रदाय की पूर्व परम्परा के अत्यन्त दीर्घ होने से उत्सर्पिणी आदि शब्द आर्हत (जैनसाम्प्रदायिक) होते हुए भी संभवतः महावीर से पूर्व समय से ही प्रसिद्ध हैं अथवा उपलब्ध श्रौतस्मार्त ग्रन्थों में न मिलने पर भी संभवतः प्राचीन विलुप्त ग्रन्थों में इनका व्यवहार आया हुआ हो। इस अवस्था में महावीर से पूर्व इन शब्दों का इस ग्रन्थ में अनुप्रवेश होने से इसमें अर्वाचीन विषयों की शङ्का नहीं होनी चाहिये।

रेवती कल्पाध्याय में मातङ्गी विद्या के प्राकृत शाबर शब्द से बने केयूर शब्द युक्त मन्त्र का निर्देश है। मातङ्गी का उल्लेख दक्षिणाम्नाय (दाक्षिणात्य वैदिक सम्प्रदाय की तरह बौद्धसम्प्रदायों में भी मिलता है। इतने मात्र से ही इसे बौद्धविद्या नहीं कहा जा सकता। यहीं रेवती कल्पाध्याय में ही इस विद्या के उपक्रमस्वरूप वैदिक यज्ञ का निर्देश करके 'मातङ्गी नाम विद्या ब्रह्मर्षिराजर्षिसिद्धचारणपूजिताऽर्चिता मतङ्गेन महर्षिणा कश्यपपुत्रेण कनीयसा महता तपसोग्रेण पितामहादेवासादिता' द्वारा स्पष्ट रूप से इसकी उत्पत्ति श्रौतसम्प्रदायों से बतला कर वैदिक पद्धति से ही इसके विधान को पूरा किया है। इस प्रकार सम्भव है कि मताङ्गी विद्या पीछे से बौद्धग्रन्थों में भी कहीं मिलती हो। परन्तु यह विद्या प्राचीन वैदिक सम्प्रदाय में भी विद्यमान थी। इसलिये इस ग्रन्थ में आया हुआ मताङ्गी शब्द बौद्ध विद्या की शङ्का उत्पन्न नहीं करता। ष्टाइन नामक विद्वान् द्वारा तूङ्‌हाङ् प्रदेश (चीन की उत्तर पश्चिमी सीमा पर) से उपलब्ध प्राचीन ग्रन्थ में भगवान् बुद्ध के जीवक के प्रति दिये गये उपदेश में बाबर मैनुस्क्रिप्ट गत नावनीतक के साथ वाले ग्रन्थ में तथा पञ्चरक्षा आदि बौद्ध ग्रन्थों में भी प्राकृत भाषा के शब्दों से युक्त मन्त्र व्यवहार के दिखाई देने से ८४ सिद्ध नाथ आदि के समय से पूर्व समय में भी प्राकृत शब्दों से युक्त मन्त्रों का व्यवहार विद्यमान था। इसलिये मन्त्रों में प्राकृत शब्दों के प्रवेश मात्र से कुछ नहीं कहा जा सकता।

इसके अतिरिक्त रेवती कल्पाध्याय में जातहारिणियों (उत्पन्न हुए को नष्ट करनेवाली) का निर्देश करते हुए भिक्षुणियों के लिये श्रमणिका तथा निर्ग्रन्थी शब्द का उल्लेख किया है। यद्यपि श्रमण शब्द बौद्ध एवं पीछे के अन्य विद्वानों द्वारा बौद्ध भिक्षुकों के लिये ही प्रयुक्त किया गया है तथा महाभाष्यकार द्वारा 'येषां च विरोधः शाश्वतिकः' (२. ४. ९) इस सूत्र में शाश्वतिक विरोध स्वरूप 'श्रमणब्राह्मणम्' यह उदाहरण दिया होने से बौद्धों तथा ब्राह्मणों के परस्पर संघर्ष को लेकर श्रमण शब्द बौद्धभिक्षु परक ही प्रतीत होता है तथापि उससे पूर्व पाणिनि द्वारा भी 'कुमारः श्रमणादिभिः' सूत्र में श्रमण शब्द का उल्लेख होने से बौद्ध तथा जैन सम्प्रदायों के उदय के पश्चात् ही यह शब्द आया है—ऐसा नहीं कहा जा सकता। श्रमण शब्द शारीरिक क्लेश आदि द्वारा उत्पन्न हुए श्रम (थकावट) के अनुसार वैखानस¹ सूत्र में तृतीय आश्रमवाले (वानप्रस्थी) के अर्थ में, बृहदारण्यक² में त्यागी भिक्षु के रूप में तथा तैत्तिरीयारण्यक³ और रामायण⁴ आदि⁵ अनेक प्राचीन ग्रन्थों में भिक्षु एवं तपस्वियों के लिये प्राचीन काल से ही प्रयुक्त होता हुआ मिलता है। श्रमण शब्द प्राचीन काल से ही व्यवहृत होता आ रहा है ऐसा श्री चिन्तामणि⁶ वैद्य ने अपनी पुस्तक में लिखा है।

निर्ग्रन्थ शब्द का अनुसन्धान करते हुए हम देखते हैं कि दिग्घ⁷निकाय में उस समय प्रचलित अन्य सम्प्रदायों की श्रेणी में प्रस्थानान्तरीय तथा प्रतिपक्षरूप से निर्दिष्ट किसी व्यक्ति का निग्गन्थनाथपुत्त (निर्ग्रन्थनाथ पुत्र) शब्द से उल्लेख किया गया है। कुछ विद्वानों का कथन है कि निर्ग्रन्थ शब्द जैन भिक्षुओं के लिये प्रसिद्ध होने से तथा उस समय महावीर के संभावित प्रतिपक्षी के रूप में मिलने से निर्ग्रन्थनाथ पुत्र शब्द से महावीर का निर्देश किया गया है। किन्तु महावीर के निर्ग्रन्थनाथ पुत्र होने से उसका पिता या आचार्य निर्ग्रन्थनाथ हुआ। इसमें नाथ पद के होने से उसके पिता के समय


१. १ से ७ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ३४-३५ देखें।

२०४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

भी निर्ग्रन्थों की प्रसिद्धि तथा बहुलता होनी चाहिये। इस प्रकार प्रतीत होता है कि निर्ग्रन्थ सम्प्रदाय महावीर से ही प्रारम्भ नहीं हुआ है अपितु उससे पूर्व भी प्रचलित था। श्री विन्टरनीज^१ नामक विद्वान् ने भी निर्ग्रन्थ सम्प्रदाय को महावीर से पूर्व का बतलाया है। जैन ग्रन्थों में महावीर से पूर्व आदि नाथ पार्श्वनाथ आदि का भी आचार्यरूप में उल्लेख मिलने से तथा आजतक भी पूर्व तीर्थङ्कररूप में जैन सम्प्रदाय में उनका सम्मान होने से प्रतीत होता है कि इस जैन सम्प्रदाय का महावीर द्वारा विशेष विकास किया जाने से पीछे से उसकी प्रधान आचार्य रूप में प्रसिद्धि होने पर भी निर्ग्रन्थ सम्प्रदाय ही जैन सम्प्रदाय होता हुआ पूर्व तीर्थङ्कर परम्परा द्वारा ही प्रारम्भ हुआ प्रतीत होता है। जैनों द्वारा अपने सम्प्रदाय के भिक्षुओं के अर्थ में प्रयुक्त किया जाने पर भी निर्ग्रन्थ शब्द निवृत्तहृदय ग्रन्थिरूप निरुक्ति के अनुसार विवेक एवं ज्ञान की श्रेणी में आरूढ़^२ का बोध कराने वाले तथा हृदय की^३ ग्रन्थियों के खुलजाने रूप आध्यात्मिक अर्थ में आस्तिक (वैदिक) सम्प्रदाय के ग्रन्थों में भी अत्यन्त प्राचीन काल से प्रयुक्त हुआ दीखता है।

पूर्व समय से प्रसिद्ध इन शब्दों को देखकर ही बौद्ध तथा जैनों ने श्रमण तथा निर्ग्रन्थ शब्दों का पीछे से अपने-अपने सम्प्रदाय के भिक्षुओं के लिये प्रयोग किया प्रतीत होता है। भाषा विज्ञान की दृष्टि से काल प्रवाह से घटिका शब्द की तरह प्राचीन शब्दों का भी रूपान्तर या अर्थान्तर में प्रायः प्रयोग होता देखा गया है। उदाहरणार्थ बोधायन, आश्वलायन, वराह, आपस्तम्ब आदि प्राचीन एवं प्रमुख सूत्रकारों द्वारा श्रौत एवं स्मार्त यज्ञभूमि के अर्थ में प्राचीन ग्रन्थों में स्थान-स्थान पर प्रयुक्त किया जाता हुआ विहार^४ शब्द बौद्धों द्वारा बौद्धभिक्षुसंघ के निवास स्थान के रूप में, तथा श्मशान में स्थित चित्त के अभीष्ट देवता, पीपल, मन्दिर, क्षेत्रज्ञ आदि अर्थों में प्रयुक्त होने वाला चैत्य^५ शब्द पीछे से स्तूप के लिये प्रयुक्त होने लगा है। प्राचीन काल में तप, ज्ञान तथा अवस्था में वृद्ध व्यक्ति के लिये प्रयुक्त किया जाने वाला स्थविर^६ शब्द भी बौद्धों द्वारा श्रेष्ठ तथा विशेष विद्वान् के अर्थ में प्रयुक्त होने लगा। इस प्रकार अर्वाचीनता के प्रेमी इन विहार आदि शब्दों को भी बौद्ध साम्प्रदायिक कह सकते हैं परन्तु केवल इतने मात्र से प्राचीन व्यवहार को बिना देखे इन्हें अर्वाचीन कहना उचित नहीं है। इसी प्रकार यहाँ आये हुए श्रमण, निर्ग्रन्थ आदि शब्द भी प्राचीन तपस्वियों के ही सूचक हैं।

यहां आये हुए लिङ्गिनी, परिव्राजिका, श्रमण का निर्ग्रन्थी, कण्डिनी, चीरवल्कलधारिणी, चरिकी, मातृमण्डलिकी तथा अवेक्षणिका आदि मधुकरी वृत्ति द्वारा घर-घर जाकर अपने सम्पर्क से जातहारिणी का प्रचार करती हुई नाना भिक्षुणियों के श्रेणी में निर्दिष्ट भेदों में से परिव्राजिका, श्रमणका तथा निर्ग्रन्थी को छोड़कर अन्य कोई भी भेद प्राचीन दूसरे ग्रन्थों या सम्प्रदायों में आजकल नहीं मिलता है। अर्वाचीन ग्रन्थों में आये हुए हंस, परमहंस, कुटीचक, बहूदक आदि भेदों को न देकर केवल इन कालप्रवाह से विलुप्त सम्प्रदायों का ही दिया जाना इन उपर्युक्त भेदों को प्राचीन ही सिद्ध करता है।

वहीं रेवती कल्पाध्याय के जातहारिणी के प्रकरण में सिंहल (लङ्का) तथा उड्र (उड़ीसा) आदि देश तथा सूत, मागध आदि जातियों का उल्लेख मिलता है। वहां खश, शक, यवन, पह्लव, तुषार कम्बोज आदि का उल्लेख भी है, यवन की तरह खश आदि शब्द भी मनुस्मृति आदि ग्रन्थों में मिलते हैं, ऐतिहासिक विद्वान् भी इन जातियों को प्राचीन मानते हैं। (Encyclopedia Britanica) नामक पुस्तक में हूणों का चतुर्थ शताब्दी (ई. प. ३७२) में यूरोप प्रवेश का उल्लेख मिलने पर भी २५०० वर्ष प्राचीन अवेस्ता ग्रन्थ में हूनू (हूण) जाति का प्रतिपक्षी जाति के रूप में वर्णन मिलने से तथा जरथुष्ट्र से भी पूर्ववर्ती केरसप (Kerasop) नामक इरान देश के राजा द्वारा उस जाति की विजय का उल्लेख मिलने से हूणों का समय (ई. पू. ७००) है ऐसा मोदी^७ महोदय ने प्रतिपादित किया है। महाभारत^८ में भी हूण, पह्लव, यवन, शक, पुण्ड्र, किरात, द्रविड़, खश आदियों का उल्लेख मिलता है। 'गार्गादिभ्यो यञ्' (४-१-१०५) इस सूत्रोक्त गण में शक, 'इन्द्रवरुणोति' (४-१-४९) सूत्र में यवन तथा 'कम्बोजालुक्' (४-१-१७५) इस सूत्रोक्त वार्तिक के कम्बोजादि गण में शक, यवन आदि का उल्लेख मिलता है। इस प्रकार इन शब्दों का पूर्वकाल में भी प्रसिद्ध होना स्पष्ट है।


१. १ से ८ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ३५-३६ देखें।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २०५

इस ग्रन्थ के प्रत्येक अध्याय में 'अमुकाध्यायं व्याख्यास्यामः' द्वारा प्रारम्भ करके 'इति ह स्माह भगवान् कश्यपः' द्वारा समाप्ति, शिष्योपक्रमणीय अध्याय में शब्द तथा अर्थ में वैदिक विधान द्वारा शिष्यों का उपनयन और अग्नि, सोम, प्रजापति आदि वैदिक देवताओं का स्वाहाकार, जाति सूत्रीयाध्याय में वैदिक वाक्य रचना, हीनदन्तोद्भेद में मारुती इष्टि तथा स्थालीपाक होम का विधान, पुत्रोत्पत्ति के नाना विधानों में अन्य सबको छोड़कर इष्टि (पुत्रेष्टि) का विधान, स्वप्नदोष को दूर करने के लिये सावित्री होम का विधान, शिशु रक्षा के लिये प्रयुक्त होने वाले धूप में 'अग्निस्तु' आदि वैदिक वाक्य का प्रयोग, रेवती कल्पाध्याय में ब्राह्मणग्रन्थों के अनुसार ऐतिहासिक वाक्य तथा वहीं वसु, रुद्र, आदित्य आदि देवताओं का कीर्तन तथा 'दीर्घजिव्ही च छन्दसि' (४-१-५९) पाणिनि के इस सूत्र के अनुसार वैदिक प्रयोग में आये हुए ङीप् प्रत्यय युक्त दीर्घजिव्ही का उल्लेख, भोजन कल्पाध्याय में काशी, पुण्ड्र, अङ्ग, (पूर्वीबिहार) बङ्ग (बङ्गाल) काच, सागर, अनूप, कोशल (अवध) तथा कलिङ्ग (उड़ीसा) देश का तथा देशसात्म्याध्याय में कुमारवर्त, निकटिवर्ष, ऋषभद्वीप, पौण्ड्रवर्धन, मृत्तिका, वर्धमान आदि बहुत से प्राचीन देशों का कीर्तन करके इनसे अधिक प्रसिद्ध पाण्ड्य (उत्तरी मद्रास) का निर्देश न करना, बाह्लीकभिषग् का उल्लेख होने पर भी यवन तथा रोम के भिषजों का उल्लेख न होना, राजतैल की प्रशस्ति में इक्ष्वाकु, सुबाहु, सगर, नहुष, दिलीप, भरत तथा गय पर्यन्त प्राचीन राजाओं का ही उल्लेख करना, रस धातु तथा रत्नों के ओषधिरूप में व्यवहार का कहीं न मिलना, समुदाय कारण (सृष्टि उत्पत्ति) के उल्लेख में प्राचीन सांख्य दर्शन के अनुसार ही अष्टप्रकृति तथा षोडश विकारों का निर्देश होना, परन्तु बौद्ध तथा जैनों के अध्यात्मवाद का न मिलना तथा 'दीप्ताग्नयो घस्मराः स्नेहपित्याः' तथा 'क्षीरं सात्म्यं क्षीरमाहुः पवित्रम्' इत्यादि वैदिक छन्द एवं पद्यों का दर्शन आदि बहुत से प्राचीनता को सिद्ध करने वाले प्रमाणों के मिलने से यह वृद्धजीवक्रीय तन्त्र अत्यन्त प्राचीन प्रतीत होता है। हेमाद्रि आदि में पुराणों के अनुसार आरोग्यशाला के निर्माण का विधान होने पर भी आजकल के विद्वान् उसके निश्चय के लिये उसके अनुरूप शिलालेख तथा देशान्तरीय और मतान्तरीय लेखों की अपेक्षा रखते हैं—इसके अनुसार प्रामाणिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से आलोचना करते हुए हम देखते हैं कि २३०० वर्ष पूर्व अशोक द्वारा सर्वसाधारण के लिये चिकित्सालय के उद्घाटन के मिलने तथा कौटिलीय अर्थशास्त्र में भी दुर्ग बनाते हुए उसमें भैषज्य गृह के बनाने का उल्लेख मिलने पर भी, चरक आदि में रसायनशाला का निर्देश होने पर भी सर्वसाधारण के लिये आरोग्यशाला का निर्देश न होना तथा उसी के अनुरूप इस संहिता के कल्पाध्याय में भी रसायनशाला तथा उस प्रकार के चिकित्सालय आदि के निर्माण का न मिलना, अपितु इससे विपरीत रोगी के घर जाकर वैद्य द्वारा ओषधि का विधान बतलाना, इत्यादि द्वारा भी इस ग्रन्थ का निर्माण प्राचीन ही सिद्ध होता है। कश्यप के साथ वृद्धजीवक का उत्तर प्रत्युत्तर रूप में निर्दिष्ट संवाद भी इसे प्राचीन ही सिद्ध करता है। काश्यपीय महासंहिता को वृद्धजीवक द्वारा संक्षिप्त कर के इस तन्त्र के निर्माण का उल्लेख मिलने से काश्यपीय महासंहिता का समय तो इससे भी प्राचीन प्रतीत होता है।

किन्तु जिस प्रकार श्रमण शब्द ब्राह्मण आदि ग्रन्थों में मिलता है उसी प्रकार ग्रन्थि शब्द के उपनिषद् आदि में मिलने पर भी निर्ग्रन्थ शब्द का तपस्वी के अर्थ में प्रयोग का भागवत पुराण को छोड़कर अन्य वैदिक ग्रन्थों तथा महाभारत आदि प्राचीन ग्रन्थों में कहीं भी स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं है। अर्वाचीन नागार्जुन आदि ने उपाय हृदय तथा ललित विस्तर नामक ग्रन्थों में जैनों के अर्थ में ही यह निर्ग्रन्थ शब्द प्रयुक्त किया है। वाचस्पति१ आदि आस्तिक दार्शनिकों ने भी वेदविरुद्ध दार्शनिकों की श्रेणी में ही इन शब्दों का निर्देश किया है। निर्ग्रन्थ सम्प्रदाय ही जैन सम्प्रदाय है ऐसी आधुनिक विद्वानों की भी धारणा है। इस संहिता में आये हुए जैन सम्प्रदाय के उत्सर्पिणी तथा अवसर्पिणी आदि असाधारण शब्द भी इसी बात को प्रकट करते हैं। इस प्रकार महावीर से प्राचीन तीर्थङ्करों के समय यदि इन शब्दों की प्रसिद्धि नहीं थी तो इस सम्प्रदाय के प्रधान आचार्य के रूप में प्रकट होने वाले महावीर के समय इन शब्दों की लोक में प्रसिद्धि होने से उस


१. टि. उपो. संस्कृत पृ. ३७ देखें।

२०६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

समय (महावीर के समय) इन दूसरे सम्प्रदाय के शब्दों का इस ग्रन्थ में अनुप्रवेश हुआ प्रतीत होता है। अर्वाचीन विद्वानों की यह भी धारणा है कि इस ग्रन्थ में शक, हूण, पल्हव, खश, यवन तथा कम्बोज आदि शब्दों के आने से भी यह ग्रन्थ बुद्ध के बाद का मालूम पड़ता है। इस प्रकार महावीर के बाद ही इस ग्रन्थ का निर्माण हुआ है—ऐसी शंका उत्पन्न होती है। किन्तु अनिश्चित समय वाले कुछ शब्दों के अनुप्रवेश के दर्शन मात्र से ही ग्रन्थ का काल निर्धारित नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त पीछे से जिन ग्रन्थों का प्रतिसंस्करण होने का स्पष्ट निर्देश हो उनमें कुछ सन्दिग्ध शब्दों के आधार पर ही ग्रन्थ के काल का निर्णय करना तो और भी दुःसाहस है। विद्वानों के किसी समय तर्क द्वारा निश्चित किये हुए भी बहुत से विषय पीछे समय प्रवाह से अन्य बलवान् तर्क के उपस्थित होने पर शारीरिक (वेदान्त) सूत्र के 'तर्कप्रतिष्ठानात्' के अनुसार परिवर्तित होते देखे गये हैं। यदि प्राचीनता को प्रकट करने वाले पूर्वोक्त लक्षणों को कुछ समय के लिये छोड़कर अर्वाचीन विद्वानों की धारणा का अवलम्बन करें तो भी कालप्रवाह से विलुप्त इस तन्त्र के वात्स्य द्वारा यक्ष से प्राप्त करके पीछे से संस्करण करने का संहिता कल्पाध्याय में स्वयं अपने मुख से उल्लेख किया होने से न केवल रेवती कल्पाध्याय में आये हुए निर्ग्रन्थ आदि शब्द, अपितु पूर्वभाग में आये हुए उत्सर्पिणी आदि अर्वाचीनता की शंका उत्पन्न करने वाले शब्द तथा विषय भी वृद्धजीवकीय तन्त्र के निर्माण के बाद संस्करण के समय वात्स्य की लेखनी द्वारा प्रविष्ट किये गये प्रतीत होते हैं। चरक संहिता तथा सुश्रुत संहिता के पूर्वभाग में परतन्त्रीय बालग्रह विषय के न मिलने पर भी सुश्रुत के उत्तर तन्त्र में शालाक्य, कौमारभृत्य आदि प्रस्थानान्तरीय विषयों का भी संग्रह होने से २७ से ३८ तक के अध्यायों में कौमारभृत्य के प्रसङ्ग में मूल में आचार्य के नाम का उल्लेख न होने पर भी टीकाकारों ने जो पार्वतक, जीवक, बन्धक आदि का निर्देश किया है उससे प्रतीत होता है कि कश्यप जीवक आदि के कौमारभृत्य तन्त्रों से ही संभवतः यह विषय लिया गया है। सुश्रुत के बालतन्त्र प्रकरण में (उ. तं. अ. २७) जिन स्कन्द, रेवती, शीतपूतना, शकुनी, मुखमण्डिका, नैगमेष आदि स्त्री तथा पुरुषरूप बालग्रहों का वर्णन है, उनसे मिलते जुलते ही ग्रहों का वर्णन इस संहिता के चिकित्सितस्थानीय बालग्रहाध्याय में मिलता है। रेवतीकल्पाध्याय में रेवती के भेदरूप से जिन जातहारिणियों का विशेष वर्णन है वे सुश्रुत के उत्तरतन्त्र में नहीं मिलते हैं। यदि इन दोनों अध्यायों के विषय साथ-साथ लिये गये होते तो जातहारिणी का विषय न्यूनाधिक रूप से सुश्रुत के उत्तरतन्त्र में भी अवश्य होना चाहिये था। रेवती ग्रह स्कन्द आदियों का प्रथम चिकित्सितस्थानीय बालग्रहाध्याय में निरूपण करने के बाद पुनः रेवती कल्पाध्याय में रेवती के विकास स्वरूप बहुत सी जातहारिणियों का पूर्वापर ग्रन्थ लेख की अपेक्षा अत्यन्त विकसित रूप में मिलने से कल्पाध्याय का यह विकसित लेख कश्यप तथा जीवक के पश्चात् वात्स्य के समय प्रतिसंस्करण में प्रविष्ट किया हुआ प्रतीत होता है। बिना विभाग के द्वारा प्रतिसंस्कार करने पर प्रायः ऐसी ही संशयोत्पादक गड़बड़ त्पन्न हो जाती हैं जिनका आगे वर्णन किया जायेगा। संहिता कल्पाध्याय को पूर्ण करने की दृष्टि से वात्स्य द्वारा जोड़े हुए खिलभाग के देशसात्म्याध्याय में तथा खिलभाग से पूर्ववर्ती भोजन कल्पाध्याय में भी सात्म्य के प्रसङ्ग में बहुत से प्राचीन देशों का उल्लेख है। भोजन कल्पाध्याय में कुरुक्षेत्र को केन्द्र मानकर चारों दिशाओं के बहुत से देशों का उल्लेख करते हुए सिन्धु, सौवीर आदि पाश्चात्य (Western) कश्मीर, चीन आदि उदीच्य (Northern), काशी, पुण्ड्र, अङ्ग, बङ्ग आदि पौरस्त्य (Eastern) तथा दक्षिण (South) में कलिङ्ग, पट्टन, नार्मदेय आदि देशों का ही उल्लेख किया गया है। रामायण काल में जिस प्रकार दक्षिणात्य (Southern) नगरों का विशेष परिचय नहीं था उसी प्रकार यहां भी कलिङ्ग, पट्टन आदि नर्मदा पर्यन्त देशों का ही निर्देश है। खिलभाग के देशसात्म्याध्याय के खण्डित रूप में मिलने से पूर्व तथा दक्षिण देशों का निर्देश करते हुए प्राचीन देशों का उल्लेख होने पर भी चिरपाली, चीर चोर, पुलिन्द, द्रविड़ आदि दूरवर्ती दक्षिणात्य देश तथा कुमारवर्त, निकटवर्ष, आदि पूर्ववर्ती देशों का विकसितरूप में उल्लेख मिलता है। अशोक के शिलालेख तथा अन्य प्राचीन साहित्य में आये हुए ये देश भी यद्यपि प्राचीन ही हैं ऐसा हम आगे लिखेंगे तथापि दोनों में देशों के वर्णन की तुलना करते हुए वृद्धजीवक के पूर्वभाग तथा वात्स्य के खिलभाग में समय की दृष्टि से स्पष्टरूप से बहुत अन्तर

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद | २०७

प्रतीत होता है। खिलभाग के देश सात्म्याध्याय में 'मगधासु महाराष्ट्रम्' ऐसा उल्लेख मिलता है। वेद में तथा जरासन्ध के समय मगध का निर्देश होने से तथा पुरातत्व के विद्वानों द्वारा आजकल राजगृह में उस स्थान की प्राप्ति से यद्यपि मगध राज्य को प्राचीन कहा जा सकता है, तथापि ग्रन्थ के पूर्वभाग में नाम द्वारा भी अनिर्दिष्ट मगध का उत्तरभाग में महाराष्ट्र के रूप में उल्लेख होने से पाण्ड्य देश तथा पाटलिपुत्र के निर्देश न होने से तथा बौद्ध ग्रन्थों में अनायास नामक यक्ष से अपने पूर्वज के ग्रन्थ की उपलब्धि का उल्लेख होने से बुद्ध तथा महावीर के पश्चात् नन्द एवं चन्द्रगुप्त के समय मगध की महाराष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठा के समय वात्स्य की उत्पत्ति प्रतीत होती है। इससे उस संस्कार में आये हुए (अनुप्रविष्ट) इन शब्दों से सन्देह उत्पन्न हुआ प्रतीत होता है।

नावनीतक के लेखक डल्हण आदि के लेख में कौमारभृत्य के आचार्य जीवक का नाम मिलने से तथा महावग्ग आदि बौद्ध ग्रन्थों में कौमारभृत्य विशेषण वाले प्रसिद्ध वृद्धजीवक का वृतान्त मिलने से दोनों में चिकित्सापाण्डित्य, नाम की समानता तथा कौमारभृत्य शब्द का समानरूप से उल्लेख होने से बौद्ध ग्रन्थोक्त जीवक ही कौमारभृत्य का आचार्य जीवक है—ऐसा कुछ विद्वानों का मत है। जब तक इस वृद्धजीवकीय तन्त्र की उपलब्धि नहीं हुई थी तब तक कौमारभृत्य के आचार्य वृद्धजीवक का परिचय देने वाले प्रमाणों का अभाव होने से तथा बौद्ध ग्रन्थों में जीवक की अत्यन्त प्रसिद्धि होने से दग्धाश्वरथन्याय¹ से दोनों को एक ही समझना संगत प्रतीत होता था। इस प्रकार इस तन्त्र के आचार्य तथा बौद्धग्रन्थोक्त जीवक की एकात्म्यता होने से इस तन्त्र के आचार्य वृद्धजीवक को बुद्ध कालीन मानने से पूर्वोक्त उत्सर्पिणी आदि शब्दों को देखकर भी सन्देह उत्पन्न नहीं होता था। परन्तु अब इस तन्त्र की उपलब्धि द्वारा वृद्धजीवक का बहुत-सा परिचय मिल जाने से उनके विषय में पिता का भेद, देशभेद, गुरुभेद, विशेषण तथा विशेषण रहित नामों का भेद, धर्मभेद आदि बहुत सी बातें मिलती हैं। बौद्ध ग्रन्थोक्त जीवक का कौमारभृत्यत्व महावग्ग के अनुसार कुमारद्वारा पालन किया जाने के कारण है न कि कौमारभृत्य का आचार्य होने से, बौद्ध ग्रन्थोक्त जीवक संभव है—कौमारभृत्य विद्या का भी पण्डित हो, किन्तु बहुत से बौद्ध ग्रन्थों में उसकी घटनाओं तथा चिकित्सा आदि विषयों का अत्यन्त विस्तारपूर्वक वर्णन होने पर भी उसके कौमारभृत्य के आचार्यत्व तथा तद्विषयक इस प्रसिद्ध तन्त्र के निर्माण का उल्लेख तक क्यों नहीं है? इस तन्त्र के विषय में अन्तरङ्ग दृष्टि से विचार करने पर भी दोनों का परस्पर विभेद ही दृष्टिगोचर होता है। तूङ्ग्हाङ् (Tun huang) प्रदेश में हार्नले द्वारा उपलब्ध प्राचीन ग्रन्थ में बुद्ध द्वारा अपने समकालीन जीवक को उपदेश देने का उल्लेख मिलता है। यदि वही यह वृद्धजीवक हो तो ग्रन्थ के अन्दर स्थान-स्थान पर धन्वन्तरि आदि की तरह जहां बाह्लीकभिषग्, काङ्कायन तथा अन्य विदेशी वैद्यों के नाम तथा चिकित्सा सम्बन्धी विषय दिए हैं वहां अपने गुरु भगवान् बुद्ध के नाम, उसकी प्रसिद्ध ओषधियों तथा प्रसङ्गवश कहीं-कहीं उसके आध्यात्मिक विषय आदि को लेशरूप में भी क्यों नहीं दिया है। इसमें बौद्धमत की लेशमात्र भी छाया नहीं मिलती है। महावग्ग आदि के लेख से जीवक की शल्यतन्त्र के विषय में भी विशेष प्रसिद्धि तथा कुशलता का परिचय मिलता है। किन्तु इस ग्रन्थ में शल्यतन्त्र का परतन्त्र के रूप में निर्देश करके उसके विषय में उदासीनता सूचित होती है। इस प्रकार इस गन्थ का आचार्य, बौद्धग्रन्थोक्त मगधदेशनिवासी भुजिष्या के गर्भ से उत्पन्न अभय के पुत्र जीवक से भिन्न प्राचीन, कनखलवासी, ऋचीक का पुत्र, कश्यप का शिष्य, महर्षियों द्वारा सम्मानित तथा कौमारभृत्य विषय का आचार्य प्रतीत होता है।

प्रसङ्गवश निर्दिष्ट अन्य आचार्यों का विवरण—कश्यप द्वारा उपदिष्ट प्रारम्भिक एवं विस्तृत महासंहिता को वृद्धजीवक ने संक्षिप्त किया तथा समयान्तर से वात्स्य ने उसका प्रतिसंस्कार करके प्रकाशित किया, ऐसा इस संहिता


१. जिस प्रकार रथ के घोड़ों के जल जाने से रथ निष्प्रयोजन हो जाता है उसी प्रकार किसी एक आवश्यक वस्तु के नष्ट हो जाने पर जब उससे सम्बन्धित दूसरी वस्तु स्वयं नष्ट हो जायें—उस अवस्था में यह व्यवहत होता है। (अनुवादक)

२०८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

के कल्पाध्याय में निर्देश होने से जिस प्रकार आत्रेय द्वारा प्रारम्भ में उपदिष्ट संहिता को अग्निवेश ने तन्त्र का रूप दिया और उसी तन्त्र को चरक ने प्रतिसंस्कृत करके वर्तमानरूप में प्रकाशित किया, तथा जिस प्रकार दिवोदासरूप धन्वन्तरि द्वारा प्रारम्भ में उपदिष्ट संहिता को सुश्रुत ने संहितारूप से परिवर्तित किया और पीछे से उसीको नागार्जुन या अन्य किसी प्रतिसंस्कर्ता ने संस्कार करके वर्तमान रूप में प्रकाशित किया है, उसीप्रकार कश्यप द्वारा उपदिष्ट मूलभूतमहासंहिता को वृद्धजीवक ने संक्षिप्त करके तन्त्र का रूप दिया, उसीको समयप्रवाह से वात्स्य ने प्रतिसंस्कृत करके वर्तमानरूप में हमारे सम्मुख उपस्थित किया है। इस प्रकार आजकल मूलसंहिता तथा उनके रूपान्तरभूत तन्त्रों के पृथक्-पृथक् उपलब्ध न होने से वर्तमान रूप में मिलने वाली चरकसंहिता ही अग्निवेशतन्त्र या आत्रेयसंहिता होने से, वर्तमान प्रतिसंस्कृत सुश्रुत संहिता ही मूलसुश्रुतसंहिता या धन्वन्तरि संहिता होने से तथा वात्स्य द्वारा प्रतिसंस्कृत संहिता ही वृद्धजीवकीय तन्त्र या मूलकाश्यप संहिता होने से उपलब्ध एक-एक ग्रन्थ तीन-तीन ग्रन्थों के प्रतिनिधि के रूप में हमारे सामने उपस्थित होता है। इन उपलब्ध तीनों प्राचीन ग्रन्थों में प्रतिसंस्कर्ता के रूप में मिलने वाले चरक, नागार्जुन तथा वात्स्य (अनिश्चित कालवाला) तृतीय श्रेणी में, उनसे ऊपर तन्त्रकर्ता अग्निवेश, सुश्रुत तथा वृद्धजीवक द्वितीय श्रेणी में तथा उनसे भी ऊपर मूलसंहिताओं के आचार्य (उपदेशक) आत्रेय, दिवोदासरूप धन्वन्तरि तथा मारीचकश्यप प्रथमश्रेणी में आते हैं। इस प्रकार इन संहिताओं में पुनर्वसु आत्रेय, धन्वन्तरि तथा कश्यप प्राचीनतम मूल आचार्य हैं।

प्राचीन रूप में मिलने वाले आत्रेय, धन्वन्तरि, कश्यप आदि मूल आचार्यों का निश्चित समय निर्धारण दुष्कर होने के कारण इनका पौर्वापर्य, परस्पर सहभाव तथा आत्रेय, अग्निवेश, चरक, धन्वन्तरि, दिवोदास, सुश्रुत, कश्यप, वृद्धजीवक तथा वात्स्य आदि आचार्यों के उद्भव को बतलाने के लिये कोई भी धारावाहिक ऐतिहासिक लेख न मिलने से उनके विषय में कुछ भी कहना यद्यपि दुःसाहस है तथापि हमें यह देखना है कि इनके उद्भव की अधिक से अधिक तथा कम से कम कौनसी अवधि निश्चित की जा सकती है जिससे इनके विषय में कुछ अस्पष्ट-सा ज्ञान भी हो सके तथा परस्पर एक दूसरे का अन्वेषण करते हुए संभवतः हमें कश्यप, वृद्धजीवक तथा वात्स्य के विषय में कुछ प्रकाश मिल सके। इसी अभिप्राय से अन्य विद्वानों के मतों का निर्देश करते हुए इन प्राचीन आचार्यों के विषय में अपने हृदय के कुछ भावों को प्रकट करते हैं।

धन्वन्तरि तथा दिवोदास—सुश्रुतसंहिता में धन्वन्तरिरूप काशीराज दिवोदास द्वारा सुश्रुत को उपदेश देने का निर्देश है। धन्वन्तरि दिवोदास के परिचय के लिये वेद में वैद्याचार्य धन्वन्तरि का कहीं उल्लेख नहीं मिलता है। ऋग्वेद में जहां वैद्यक के विषय मिलते हैं वहां देवभिषग् अश्विनीकुमारों का ही वैद्यरूप में उल्लेख है। ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में बहुत स्थानों पर दिवोदास नामक राजा का उल्लेख मिलता है। उसके साथ 'अतिथिग्वः शम्बरशत्रुः सुदासपिता' इत्यादि शूरता एवं वीरता संबन्धी विशेषण दिखाई देते हैं। काठकसंहिता के मन्त्रभाग में भी ब्रध्नश्व दिवोदास का उल्लेख है। इस वैदिक दिवोदास काशी का राजा होना तथा धन्वन्तरि से किसी प्रकार के सम्बन्ध का निर्देश नहीं मिलता है। इस प्रकार ऋग्वेद तथा काठकसंहिता में आये हुए दिवोदास का समय अत्यन्त प्राचीन है तथा वह वैद्य भी प्रतीत नहीं होता है।

पौराणिक इतिहास में भी दिवोदास नाम के अनेक व्यक्ति मिलते है। इनमें से हरिवंश^१ पुराण में २९वें अध्याय में काश के वंश में धन्वन्तरि तथा दिवोदास का काशिराज के रूप में उल्लेख मिलता है। वह वंशावली निम्न प्रकार से है—


१. वाराणसी में गोविन्दचन्द्र विजय के राज्य में १२०१ संवत् में लिखी हुई हरिवंश की एक प्राचीन ताडपत्र पुस्तक हमारे संग्रहालय में है। उसके पाठ के अनुसार भी यही क्रम मिलता है।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

२०९

काश

दीर्घतपा

धन्व

धन्वन्तरि

केतुमान्

भीमरथ (भीमसेन)

दिवोदास

प्रतर्दन

वत्स

अलर्क

काश के पौत्र धन्व नामवाले राजा ने समुद्रमन्थन से उत्पन्न अब्ज नामक देवता की आराधना करके अब्ज (कमल) के अवतार रूप धन्वन्तरि नामक पुत्र को प्राप्त किया। उस धन्वन्तरि ने भारद्वाज से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त करके उसे आठ भागों में विभक्त करके शिष्यों को उपदेश दिया। इसके प्रपौत्र दिवोदास ने वाराणसी¹ नगरी की स्थापना की। दिवोदास का पुत्र प्रतर्दन था। दिवोदास के समय शून्य हुई वाराणसी को प्रतर्दन के पौत्र काशीराज अलर्क ने पुनः बसाया, ऐसा हरिवंशपुराण से प्रतीत होता है। हरिवंश के अनुसार शून्य हुई वाराणसी का दिवोदास द्वारा पुनः बसाये जाने से वाराणसी की उससे पूर्व भी विद्यमानता प्रकट होने पर भी महाभारत² के अनुशासन पर्व में दिवोदास द्वारा ही वाराणसी के निर्माण का निर्देश है।

महाभारत में भी चार³ स्थानों पर दिवोदास का नाम आता है। महाभारत में भी दिवोदास का काशीपति⁴ होना, वाराणसी की स्थापना, हैहयों द्वारा पराजित होकर भरद्वाज की शरण में जाना, उसके द्वारा किये हुए पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रतर्दन नामक वीर पुत्र की उत्पत्ति आदि मिलते जुलते विषय ही मिलते हैं। इसमें दिवोदास के पूर्वपुरुषों में अन्य व्यक्तियों के साथ केवल हर्यश्व आदि प्रसिद्ध व्यक्तियों के ही नाम दिये हैं। अग्निपुराण (अ. २७८) तथा गरुडपुराण (अ. १३९ श्लोक ८-११) में भी वैद्य धन्वन्तरि की चतुर्थ सन्तति (पीढ़ी) में दिवोदास का नाम दिया है।

महाभारत⁵ के समुद्र मन्थन प्रकरण में धन्वन्तरि देव के आविर्भाव का वर्णन मिलता है। पुराण आदि में भी धन्वन्तरि का निर्देश है। आग्नेय⁶ पुराण में समुद्रमन्थन से उत्पन्न धन्वन्तरि का आयुर्वेद के प्रवर्तक के रूप में निर्देश किया गया है। परन्तु वेद में धन्वन्तरि का उल्लेख न होने से तथा हरिवंश पुराण में समुद्र मन्थन से आविर्भूत अब्ज देवता का धन्व राजा के पुत्र रूप में उत्पन्न होने के कारण यौगिक धन्वन्तरि नाम होने से दोनों की सङ्गति करने पर अब्ज के ही धन्वन्तरि होने से दोनों में अभेद मानकर समुद्र से उत्पत्ति के प्रसङ्ग में अब्ज देवता को भी भावी धन्वन्तरि नाम


१. इस प्रकार वारणार नामक किसी व्यक्ति ने वाराणसी को बनाया-यह प्रवाद निर्मूल है। (हिन्दी विश्वकोश-काशी शब्द देखें)।
२. २ से ६ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ४० देखें।

२१० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

से ही संभवतः कहा गया है। इसीलिये वैद्याचार्य दिवोदास के पूर्वपुरुष धन्वन्तरि के लिये लौकिक एवं तैर्थिक व्यक्तियों द्वारा अब्ज देवता का अवतार होने से देवरूप में निर्देश किया गया है।

भरद्वाज से सम्बन्ध, वाराणसी की स्थापना तथा प्रतर्दन नाम के पुत्र की समानता से हरिवंश तथा महाभारत में वर्णित दिवोदास की एकता प्रतीत होती है। कौषीतकी (सांख्यायन) ब्राह्मण¹ तथा कौषीतकी ब्राह्मणोपनिषत्² में भी दैवोदासि (दिवोदास के पुत्र) प्रतर्दन का ब्राह्मविद्या की प्राप्ति का वर्णन मिलता है। काठकंसंहिता³ के ब्राह्मण अंश में भी आरुणि के समकालीन भीमसेन के पुत्र दिवोदास का उल्लेख मिलता है।

इस प्रकार हरिवंश पुराण के अनुसार काश राजा की सन्तति रूप इन सबका काश राजा द्वारा स्थापित काशी नामक देश के राजा होने से काशिराज शब्द से कहा जाना, धन्व राजा का पुत्र होने से उसका धन्वन्तरि नाम से व्यवहार तथा आत्रेय आदि की तरह धन्वन्तरि का भी पूर्वाचार्य भरद्वाज से ही आयुर्वेद विद्या की उपलब्धि का निर्देश है। महाभारत तथा हरिवंश में धन्वन्तरि के प्रपौत्र काशीराज दिवोदास का वैद्यक के आचार्य रूप में निर्देश न मिलने पर भी सुश्रुत में काशीराज दिवोदास का सुश्रुत आदियों के उपदेशक के रूप में उल्लेख मिलने से वैद्याचार्य धन्वन्तरि की चतुर्थ सन्तति (पीढ़ी) में होने से तथा अपने पूर्वपुरुष की विद्या के आदर की दृष्टि से दिवोदास का भी वैद्य होना सङ्गत प्रतीत होता है। धन्वन्तरि की सन्निकृष्ट सन्तति (चौथी पीढ़ी) में होने से, उसके सम्प्रदाय का प्रकाश करने के कारण तथा उसका स्थानापन्न होने से धन्वन्तरि का अवतार मानकर सुश्रुतसंहिता में ‘धन्वन्तरिं दिवोदासं सुश्रुतप्रभृतयः ऊचुः’ आदि द्वारा धन्वन्तरि तथा दिवोदास का जो अभेद प्रकट किया गया है वह उचित ही है। आयुर्वेद के आचार्यरूप से प्रसिद्ध धन्वन्तरि के प्रपौत्र दिवोदास तथा सुश्रुत में आये हुए आयुर्वेद के उपदेशक धन्वन्तरिरूप दिवोदास इन दोनों की सङ्गति होने से धन्वन्तरिका आयुर्वेदीय सम्प्रदाय अपने शिष्यों की तरह दिवोदासरूप अपनी सन्तति में भी गया हुआ स्पष्ट रूप से प्रतीत होता है। मेरे पास सुश्रुतसंहिता की एक ताडपत्र² की पुस्तक है जिसके प्रारम्भ में ‘इत्युवाच भगवान् धन्वन्तरिः’ यह वाक्य नहीं है। धन्वन्तरिरूप दिवोदास के पास सुश्रुत आदियों के जाने का उल्लेख होने से प्रारंभ में इस प्रकार का वाक्य होना उचित भी नहीं है।

पूर्वोद्दिष्ट हरिवंश पुराण के लेख में कलियुग में दिवोदास द्वारा वाराणसी की स्थापना का उल्लेख होने से धन्वन्तरि तथा उसके प्रपौत्र दिवोदास का समय कलियुग में प्रतीत होता है। परन्तु कलियुग में कौन-सा समय है इसकी प्रतीति उससे नहीं होती।

काशी के युवराज ब्रह्मदत्त का आयुर्वेद के अध्ययन के लिये तक्षशिला जाने का वर्णन जातक ग्रन्थ में तथा फिर काशीराज के पद पर आरूढ़ ब्रह्मदत्त के साथ जीवक की भेंट का वर्णन महावग्ग में मिलता है। महावग्ग में यद्यपि काशी शब्द भी आया हुआ है, परन्तु वहा वाराणसी शब्द का प्रयोग अधिकता से किया गया है। बुद्ध द्वारा भी वाराणसी में ही धर्मचक्र (धर्मोपदेश) के प्रवर्तन का उल्लेख मिलता है। जातक ग्रन्थों में भी बहुत स्थानों पर वाराणसी शब्द आता है। पाणिनि ने देश वाचक काशी शब्द का ‘काश्यादिभ्यष्ठञ्त्रिठौ’ (४-२-११६) सूत्र में स्पष्ट निर्देश किया है। तथा नगर वाचक वाराणसी शब्द नद्यादि गण में मिलता है। (नद्यादिभ्यो ढक् ४-२-९७ वाराणसेयः) महाभाष्यकार ने भी वाराणसेय उदाहरण कई बार दिया है। जाबालोपनिषद् आदि में वाराणसी शब्द के मिलने पर भी प्राचीन उपनिषदों में काशी


१. १ से ३ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ४१ देखें।
२. इस पुस्तक में बहुत से पाठभेद हैं। इस संहिता के अन्त में सुश्रुत का निघण्टु भी दिया हुआ है। इस संहिता के पाठ के अनुसार सुश्रुतसंहिता का नया संस्करण करके मेरे मित्र श्री यादवजी ने प्रकाशित किया है।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

२११

शब्द तो मिलता है पर वाराणसी शब्द नहीं मिलता है। इससे अनुमान किया जाता है कि देशवाचक काशी शब्द प्राचीन काल से प्रचलित है तथा नगरी वाचक वाराणसी शब्द उपनिषदों के समय के बाद से ही प्रसिद्ध हुआ है। पुराणों में काशी तथा वाराणसी ये दोनों शब्द मिलते हैं। इतिहास में बुद्ध के पश्चात् कभी कोशल के राजाओं द्वारा, कभी मगध के शिशुनागों द्वारा, उसके बाद मौर्य, शुङ्ग तथा गुप्त आदि राजाओं द्वारा तथा अन्त में हर्षवर्धन द्वारा वाराणसी के विजय का वृत्तान्त मिलता है। उन-उन राजाओं के इतिवृत्त का अनुसन्धान करने पर धन्वन्तरि दिवोदास तथा प्रतर्दन आदि के नाम हमें नहीं मिलते हैं। प्रत्युत वार्तिककार कात्यायन द्वारा 'दिवश्च दासे' से दिवोदास शब्द को सिद्ध करने, महाभाष्यकार द्वारा 'दिवोदासाय¹गायते' उदाहरण के देने, कौषीतकि ब्राह्मण, उसकी उपनिषद् तथा ऋक्सर्वानुक्रम²सूत्र में भी दिवोदास के पुत्र प्रतर्दन के उल्लेख, काठकसंहिता के ब्राह्मण भाग में भीमसेन के पुत्र दिवोदास के उल्लेख तथा महाभारत और हरिवंश पुराण में भी इसी के समान वैद्य विद्या के आचार्य धन्वन्तरि के प्रपौत्र, वाराणसी के स्थापक, प्रतर्दन के पिता तथा अलर्क के प्रपितामह तथा कलियुग में होनेवाले दिवोदास के वर्णन मिलने से दिवोदास का समय कलियुग में ऐतरेय ब्राह्मण के समय तथा काठकब्राह्मण, कौषीतकी ब्राह्मण तथा उनकी उपनिषदों के समय या कुछ पूर्व सिद्ध होता है।

कौषीतकि ब्राह्मण के कारण के विषय में विचार करते हुए श्वेतकेतु आरुणि की कथाओं के संवाद के आधार पर पाश्चात्य लेखक वेबर³ ने लिखा है कि कौषीतकि उपनिषद् तथा बृहदारण्यक का काल समान है। विन्टरनीज⁴ नामक विद्वान् का भी इस विषय में यही मत है। उसने कौषीतकि ब्राह्मण को ऐतरेय ब्राह्मण से बाद का स्वीकार किया है। श्री चिन्तामणि⁵ विनायक वैद्य ने ऐतरेय ब्राह्मण में (७-११) कौषीतकि ब्राह्मण के वचन दिखला कर ऐतरेय ब्राह्मण से पूर्व कौषीतकि ब्राह्मण का समय ईसा से २५०० वर्ष पूर्व सिद्ध किया। एस. बी. दीक्षित⁶ महोदय ने ज्योतिष की गणना के आधार पर कौषीतकि ब्राह्मण का समय (ई. पू. २९००-१८५०) के बीच में बतलाया है। कौषीतकि ब्राह्मण (१७-४) का यास्क की निरुक्ति (१-९) में आया होने से तथा तीस अध्याय वाले कौषीतकि ब्राह्मण का 'त्रिंशच्चत्वारिंशतो ब्राह्मणे संज्ञायां उण्' (५-१-६२) सूत्र में तथा कौषीतकी के पूर्व पुरुष कुषीतक का 'विकर्णकुषीटकात्काश्यपे' (४-१-१२४) सूत्र में पाणिनि द्वारा ग्रहण किया गया होने से कौषीतकि ब्राह्मण पाणिनि तथा यास्क से भी प्राचीन है—ऐसा कीथ⁷ ने लिखा है। पाणिनि के समय का विचार करते हुए मंजुश्रीमूल कल्प नामक बौद्ध ऐतिहासिक ग्रन्थ के आधार पर लिखे हुए इतिहास में श्री जायसवालजी⁸ ने पाणिनि का समय (३६६-३३८ ईस्वी पूर्व) लिखा है तथा अन्य व्यक्तियों ने (४०० ईस्वी पूर्व) लिखा है। परन्तु पाणिनि के लेख में वेद-वेदाङ्ग सम्प्रदायों के प्रवर्तक ऋषि, देश, नगर, ग्राम, नद, नदी आदियों का उल्लेख होने पर भी गौतम बुद्ध तथा महावीर के सम्प्रदाय का एक भी विषय न मिलने से बुद्ध तथा महावीर से पूर्व (७००-८०० ईस्वी पूर्व) पाणिनि का समय है ऐसा⁹ गोल्स्टूकर महोदय ने लिखा है। श्रीयुत वेलवल्कर¹⁰ तथा भाण्डारकर¹¹ का भी यही मत है। श्रीयुत चिन्तामणि¹² विनायक वैद्य ने पाणिनि का समय (९०० ईस्वी पूर्व) बतलाया है। इस प्रकार विभिन्न मतों के दिखाई देने पर भी पाणिनि तथा उससे भी पूर्ववर्ती यास्क द्वारा गृहीत कौषीतकि ब्राह्मण का समय बहुत पहले का प्रतीत होते हुए भी कम से कम इस विषय में सब एक मत वाले हैं कि कौषीतकि ब्राह्मण का समय बुद्ध के बाद का तो निश्चित नहीं है। इस प्रकार ऐतरेय तथा कौषीतकि ब्राह्मण के मध्य का होने से यह दिवोदास उपनिषत्कालीन प्रतीत होता है और अपने प्रपितामह धन्वन्तरि को अपने से भी प्राचीन सिद्ध करता है।

मिलिन्दपञ्हो¹³ (मिलिन्दप्रश्न) नामक पालीग्रन्थ में द्वितीय शताब्दी (ईस्वी पूर्व) केमिलिन्द (Menander King of Bactria) के प्रति नागसेन की उक्ति में 'चिकित्सकानां पूर्वका आचार्याः' द्वारा प्रारंभ करके गिनाये हुए आचार्यों


१. १ से १३ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ४२-४३ देखें।

२१२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

में धन्वन्तरि का नाम भी है। इस में रोगोत्पत्ति निदान, स्वभावसमुत्थान तथा चिकित्सा आदि में आचार्यरूप से दिया होने से तथा नागसेन द्वारा अपने से पूर्व चिकित्सा के आचार्य रूप में निर्दिष्ट धन्वन्तरि महाभारत तथा आयुर्वेद के ग्रन्थों में मिलने वाला सुश्रुत संहिता का आचार्य प्राचीन धन्वन्तरि ही स्पष्टरूप से प्रतीत होता है। अथवा कपिल, नारद आदि के साथ आने से यह मूल धन्वन्तरि का द्योतक भी हो सकता है। इसके अतिरिक्त द्वितीय तृतीय शताब्दी ईस्वी पूर्व में बने हुए भरुच और साची के स्तूपों के शिलालेखों के संवाद तथा भरुच के स्तूप में जातक ग्रन्थों के नाम का उल्लेख होने से पाली जातक ग्रन्थों की उस समय भी उपस्थिति तथा प्रसिद्धि सिद्ध होती है। चतुर्थ शताब्दी ईस्वी पूर्व में वैशाली में हुई बौद्धमहासभा में भी जातक ग्रन्थों की प्रसिद्धि थी ऐसा मैकडोनल आदि पाश्चात्य विद्वान् कहते हैं। इन ग्रन्थों के उस समय प्रसिद्ध होने से ग्रन्थों का सत्व तो इस से भी प्राचीन होना चाहिये। इन में से अयोधर¹ (अयोगृह) नामक एक जातक में बुद्ध के किसी पूर्व जन्म में राजपुत्र की अवस्था में धर्मचर्या के लिये राजा की आज्ञा प्राप्त करने के लिये एक कथा दी हुई है जिस में धन्वन्तरि, वैतरण, भोज आदि चिकित्सकों का नाम लेकर ओषधि तथा विषापहरण के द्वारा लोगों का उपकार करने वाले धन्वन्तरि के समान विद्वान् भी काल के मुख में चले गये इत्यादि द्वारा मृत्यु की महिमा का उल्लेख करके अपना धर्मानुराग प्रकट किया गया है। इस कथा के द्वारा बुद्ध के किसी पूर्वजन्म में भी धन्वन्तरि, वैतरण तथा भोज आदि का इस लोक से चले जाने (मृत्यु) का उल्लेख किया गया है। यह कथा उस के किस पूर्व जन्म की है यह ज्ञात न होने पर भी अत्यन्त प्राचीन काल की सूचक प्रतीत होती है। आर्यसूरीय² जातक माला के अयोगृह जातक में व्याधियों के नाशक धन्वन्तरि आदि का अतीतरूप में सम्मानपूर्वक निर्देश किया गया है। आर्यसूरीय जातक में केवल धन्वन्तरि का ही नाम लिया है। अन्य आचार्यों का केवल प्रभृति शब्द से ही ग्रहण किया गया है। परन्तु पाली के लेख में धन्वन्तरि के साथ वैतरण तथा भोज के नाम का भी उल्लेख मिलता है। सुश्रुत संहिता के प्रारंभिक वाक्य में धन्वन्तरि रूप दिवोदास के पास विद्याप्राप्ति के लिये उपस्थित हुए शिष्यों में वैतरण का भी निर्देश किया गया है। इस में ‘सुश्रुतप्रभृतयः ऊचुः’ इस वाक्य में प्रभृति शब्द से भोज आदि का ग्रहण किया गया है ऐसा डल्लण ने व्याख्या में दिया है। परन्तु मेरे पास जो सुश्रुत की प्राचीन ताडपुस्तक है उसके मूल में ही ‘औपधेनववैतरणौरभ्रपौष्कलावतकरवीर्यगोपुररक्षितभोजसुश्रुतप्रभृतय ऊचुः’ इस वाक्य द्वारा वैतरण के समान भोज का भी स्पष्टरूप से उल्लेख किया गया है। इस अयोधर नामक पालीजातक में निर्दिष्ट धन्वन्तरि दिवोदास के शिष्य वैतरण तथा भोज के साहचर्य से मूल धन्वन्तरि प्रतीत नहीं होता, अपितु धन्वन्तरि का अवतार रूप होने से सुश्रुत में धन्वन्तरि शब्द द्वारा व्यवहृत दिवोदास प्रतीत होता है। यहां सुश्रुत आदि अन्य व्यक्तियों का उल्लेख न होने पर भी उपनिषत् काल में दिवोदास के मिलने से, सुश्रुतसंहिता में दिवोदास का धन्वन्तरिरूप से व्यवहार होने से दिवोदासरूप धन्वन्तरि के शिष्य वैतरण तथा भोज का सुश्रुतसंहिता में मिलने से तथा जातकों में आये हुए विषप्रतीकार के विषय का सुश्रुतसंहिता के कल्पस्थान में मिलने से भोज तथा वैतरण के साथ आये हुए सुश्रुत आदि का भी इन्हीं के साथ का समय प्रतीत होता है जैसा कि सुश्रुतसंहिता में दिया है। आग्नेय पुराण के अनुसार आयुर्वेद विद्या के ग्रहण करने में सुश्रुत भी धन्वन्तरि के शिष्यरूप में मिलता है। इस प्रकार दिवोदास रूप धन्वन्तरि की बौद्ध जातक ग्रन्थों से भी प्राचीनता सिद्ध होने से उसके पूर्व पुरुष मूल धन्वन्तरि को तो उससे भी प्राचीन होना चाहिये।

किसी-किसी का यह भी मत है कि विक्रमादित्य के नवरत्नों में क्षपणक, अमरसिंह आदि के साथ आया हुआ धन्वन्तरि ही प्रसिद्ध वैद्याचार्य धन्वन्तरि है। परन्तु नवरत्नों में आया हुआ धन्वन्तरि कवि था, न कि वैद्य। प्राचीन वैद्याचार्य धन्वन्तरि के मिलने से केवल धन्वन्तरि नाम की समानता से यह भ्रान्ति उत्पन्न हुई प्रतीत होती है।


१. १ से २ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ४३-४४ देखें।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २१३

काश्यपसंहिता के शिष्योपक्रमणीय अध्याय में होम्य देवताओं का निर्देश करते हुए प्रजापति, इन्द्र, अश्विनी कुमार तथा अपने तन्त्र के पूर्व आचार्य कश्यप के समान अन्य प्रस्थान (विभाग) के आचार्य धन्वन्तरि का भी स्वाहाकार के द्वारा ग्रहण एवं सम्मान किया गया है जब कि इस में आत्रेय आदि का उल्लेख नहीं किया गया है। दिवोदास, सुश्रुत तथा अन्य धन्वन्तरि के अनुयायियों का भी इसमें उल्लेख नहीं है। द्विव्रणीय अध्याय में 'परतन्त्रस्य समयम्' इस पद द्वारा शल्यतन्त्रका परतन्त्र के रूप में ग्रहण करने से भी उस समय धान्वन्तर सम्प्रदाय की उपस्थिति स्पष्ट है। आत्रेय संहिता में भी 'इति¹ धन्वन्तरिः' 'धान्वन्तरं मतम्' 'धान्वन्तराः' इत्यादि द्वारा अनेक स्थानों पर धन्वन्तरि तथा उस सम्प्रदाय के अन्य पूर्व आचार्यों का सम्मानपूर्वक निर्देश किया गया है। परन्तु दिवोदास तथा सुश्रुत का इस में भी कहीं स्पष्टरूप से उल्लेख नहीं किया है। सुश्रुत में आत्रेय तथा कश्यप का उल्लेख नहीं है। इस प्रकार मारीचि कश्यप तथा पुनर्वसु आत्रेय से धन्वन्तरि की प्राचीनता प्रकट होती है। इस के अतिरिक्त काश्यप संहित में केवल धन्वन्तरि का ही उल्लेख होने से तथा आत्रेय संहिता में धन्वन्तरि के सम्प्रदाय वालों का भी उल्लेख होने से धन्वन्तरि सम्प्रदाय के फैलने के बाद आत्रेय पुनर्वसु की उत्पत्ति प्रतीत होती है। धन्वन्तरि के पुनर्वसु आत्रेय से भी प्राचीन सिद्ध होने से उस के अनुयायी अग्निवेश, भेड आदि से तो वह निश्चित ही प्राचीन है। भेडसंहिता तथा चरक संहिता में आये हुए धान्वन्तर घृत आदि के उल्लेख से भी यही प्रकट होता है। सुश्रुत संहिता के शारीरस्थान के तृतीय अध्याय में शौनक, कृतवीर्य, पाराशर्य, मार्कण्डेय, सुभूतिगौतम आदि प्राचीनतम पूर्व आचार्यों का निर्देश मिलता है। इसके विपरीत आत्रेय तथा काश्यपसंहिता में काङ्क्षायन आदि का भी पूर्व आचार्यों के रूप में निर्देश है। डल्लण की सुश्रुत टीका में किसी-किसी के मत से दिवोदास के शिष्यरूप² में काङ्क्षायन का उल्लेख किया गया है। इस अवस्था में दिवोदास के शिष्य काङ्क्षायन का आत्रेय तथा काश्यप संहिता में निर्देश होने से दिवोदास तथा धन्वन्तरि का आत्रेय तथा कश्यप से पूर्व होना और भी सुदृढ़ हो जाता है।

हरिवंश पुराण में धन्वन्तरि की भरद्वाज से आयुर्वेद विद्या की प्राप्ति तथा दिवोदास द्वारा भी भरद्वाज के आश्रम का उल्लेख होने से तीन पीढ़ियों के अन्तर वाले धन्वन्तरि तथा दिवोदास के साथ सम्बद्ध भरद्वाज एक ही व्यक्ति है अथवा उसी गोत्र का कोई अन्य व्यक्ति है इस विषय में कुछ नहीं मिलता है। चरक संहिता के उपक्रम में भी भरद्वाज द्वारा आत्रेय की विद्या प्राप्ति तथा बाद में भरद्वाज के मत का आत्रेय द्वारा खण्डन तथा वातकलाकलीय अध्याय में 'कुमारशिर' विशेषण युक्त भरद्वाज का निर्देश है। इसी प्रकार काश्यप संहिता के रोगाध्याय में भी कृष्ण भरद्वाज का निर्देश है। इस प्रकार आयुर्वेद के ग्रन्थों में नाना भरद्वाजों का आचार्यरूप में उल्लेख मिलता है। इससे एक ही या उस गोत्र वाले भिन्न-भिन्न भरद्वाज नामवाले व्यक्तियों के साथ धन्वन्तरि, मारीच कश्यप, आत्रेय पुनर्वसु तथा दिवोदास का समकालीन संबन्ध प्रतीत होता है। आत्रेय पुनर्वसु तथा मारीच कश्यप द्वारा गृहीत धन्वन्तरि यद्यपि मूलधन्वन्तरि की सन्तति होने के कारण उस नाम से व्यवहृत दिवोदास भी हो सकता है तथापि कश्यप द्वारा स्वाहाकार देवता के रूप में भी धन्वन्तरि का निर्देश किया होने से, आत्रेय तथा कश्यप दोनों द्वारा काशीराज के रूप में प्रसिद्ध दिवोदास को प्रकट करने वाले काशीपति तथा दिवोदास आदि किसी विशेषण से रहित केवल धन्वन्तरि शब्द द्वारा उसका निर्देश किया होनेसे तथा महाभारत के अनुसार धन्वन्तरि का अष्ट प्रस्थानों का आचार्य तथा उसकी संहिता के प्राचीन समय में विद्यमान होने के निर्देश से प्रतीत होता है कि मूल धन्वन्तरि संहिता के विषयों को लेकर ही आत्रेय तथा कश्यप ने स्थान-स्थान पर धान्वन्तर मत दिये हैं। पूर्वोक्तानुसार दिवोदास नामक राजा के साथ आये हुए, गालव के प्रति केवल मारीच कश्यप के आश्रम का निर्देश महाभारत में मिलने से दिवोदास के समय मारीच कश्यप का अतीत रूप में होना प्रकट होता है अथवा आश्रम में मारीच


१. १-२ की टि. उपो. संस्कृत पृ. ४३-४४ देखें।

२१४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

कश्यप की उपस्थिति भी संभवतः हो सकती है। इस प्रकार मारीच कश्यप का समय धन्वन्तरि के पश्चात् तथा दिवोदास के पूर्व या उसके साथ आता है। चरक तथा काश्यपसंहिता में परस्पर आत्रेय द्वारा मारीचि कश्यप का तथा मारीचि कश्यप द्वारा पुनर्वसु आत्रेय का निर्देश होने से, आत्रेय संहिता के वातकलाकलीय अध्याय में मारीच कश्यप तथा आत्रेय पुनर्वसु के परस्पर संवाद का उल्लेख होने से तथा दोनों में उसी रूप में अथवा कुछ अन्तर के साथ भरद्वाज का उल्लेख मिलने से इन दोनों आचार्यों का काल लगभग साथ-साथ प्रतीत होता है।

सुश्रुत—सुश्रुतसंहिता¹ में लिखा है कि सुश्रुत संहिता का निर्माता विश्वामित्र का पुत्र सुश्रुत है। चक्रदत्त ने भी टीका² में ऐसा ही लिखा है। महाभारत³ में भी विश्वामित्र के पुत्रों में सुश्रुत का नाम मिलता है। ऋग्वेद के नाना मन्त्रों का द्रष्टा तथा भगवान् राम का धनुर्विद्या का उपदेशक महर्षि विश्वामित्र अन्य ही प्राचीन व्यक्ति प्रतीत होता है। सुश्रुत का उपनिषत्कालीन दिवोदास के शिष्य रूप में उल्लेख होने से तथा सुश्रुतसंहिता में कृष्ण⁴ का नाम मिलने से कश्यप तथा आत्रेय के समान गोत्रवाला विश्वामित्र का पुत्र सुश्रुत भी दिवोदास की तरह उपनिषत्काल में तथा भगवान् श्रीकृष्ण के उद्भव के पश्चात् हुआ प्रतीत होता है। ऋषि विश्वामित्र द्वारा अपने पुत्र सुश्रुत को काशीराज धन्वन्तरि (दिवोदास) के पास अध्ययन के लिये भेजने का उल्लेख भावप्रकाश⁵ में भी है। डल्लण की व्याख्या में विश्वामित्र के नाम से उद्धृत वैद्यक के वचन⁶ भी मिलते हैं। इस विश्वामित्र के विषय में पूर्ण परिचय नहीं मिलता है।

सुश्रुत संहिता के समय के विषय में विचार करते हुए हैस (Hass) नामक पाश्चात्य विद्वान् ने सुश्रुत आदि को १२ वीं शताब्दी का, जोन्स विल्सन (Jonewilson) ने ९-१० शताब्दी का तथा अन्य कुछ विद्वानों ने इसे चतुर्थ-पंचम शताब्दी का माना है।

मैकडोनल¹ नामक विद्वान् लिखता है कि सुश्रुत ई. प. चतुर्थ शताब्दी से पहले का प्रतीत नहीं होता है क्योंकि बावर मैन्युस्क्रिप्ट के प्रकरण चरक तथा सुश्रुत के साथ केवल भावों में ही समानता नहीं रखते अपितु उनमें शब्दों की भी समानता मिलती है।

वेबर² (Weber) लिखता है कि भाषा तथा शैली में सुश्रुत की वराहमिहिर के लेखों से समानता है।

अन्त³ में हवर्ट गोवन (H. Gowen) ने तो यहां तक लिख दिया है कि सुश्रुत नाम का कोई व्यक्ति आजतक हुआ ही नहीं है। और यदि हुआ भी है तो वह साक्रिटीज (Socrates) के अतिरिक्त और कोई नहीं है।

किन्तु उपर्युक्त के विषय में हमें यह कहना है कि लगभग दो सहस्त्र वर्ष प्राचीन दार्शनिक आर्य नागार्जुन² का उपायहृदय नामक दार्शनिक ग्रन्थ उपलब्ध हुआ है। भारत में मूलसंस्कृत लेख के न मिलने पर भी अत्यन्त प्राचीन काल


१. १ से ३ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ४५ देखें।
२. नागार्जुन नामवाले अनेक प्राचीन विद्वान् मिलते हैं। नागार्जुन की रचना रूप से मिलने वाले कक्षपुट, योगशतक, तत्वप्रकाश आदि अनेक ग्रन्थों में कक्षपुट आदि कौतुक ग्रन्थों (जादू टोने के ग्रन्थों) का प्रणेता सिद्ध नागार्जुन-इस विशेषण युक्त नाम वाले व्यक्ति को बताया है। वैद्यक विषय में योगशतक नाम का ग्रन्थ अभी मिला है जिसका तिब्बतीय भाषा में अनुवाद भी मिलता है। नागार्जुन की ही एक अन्य 'चित्तानन्दपटीयसी' नामक वैद्यक की संस्कृत में लिखी हुई ताड़पुस्तक तिब्बत के गीममठ में है ऐसा सुनने में आता है। इसके अन्य भी ग्रन्थ मिलते हैं। तन्त्रों में आया हुआ बौद्धों का अध्यात्म विषयक तत्वप्रकाश, परमरहस्य सुखाभिसंबोधि तथा समयमुद्रा आदि इसके अन्य ग्रन्थ हैं। केवल बौद्धदर्शनों के विषय में माध्यमिक वृत्ति, तर्कशास्त्र तथा उपायहृदय आदि ग्रन्थ हैं। इन भिन्न-भिन्न विषय के ग्रन्थों का निर्माता एक ही व्यक्ति है या भिन्न-भिन्न यह विचारणीय प्रश्न है। अष्टम शताब्दी में भारत में यात्रा के लिये आये हुए अल्वेरुनी नामक यात्री ने अपने से सौ वर्ष पूर्व रसायन विद्या में निपुण, बोधिसत्व (बुद्ध बनने के लिये तपस्या

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २१५

से चीनी भाषा में विद्यमान अनुवाद से हमारे परम मित्र श्री तुच्ची महोदय ने संस्कृत में पुनः अनुवाद करके जो प्रकाशित किया है उस ग्रन्थ के प्रारम्भ में अन्य तन्त्रों के प्रसङ्ग में ‘ओषधिविद्या षड्विधा-ओषधिनाम, ओषधिगुणः, ओषधिरसः, ओषधिवीर्यं, सन्निपातो, विपाकश्चेति भैषज्यधर्म’ इत्यादि द्वारा भैषज्यविद्या के प्रधान विषयों को देकर बाद में शास्त्र का वर्णन करते हुए ‘यथा सुवैद्यको भेषजकुशलो मैत्रचित्तेन शिक्षकः सुश्रुतः’ इत्यादि द्वारा भैषज्यविद्या के आचार्यरूप में सम्मान एवं गौरव के साथ सुश्रुत का नाम दिया है। इस प्रकार लगभग दो सहस्रवर्ष पूर्ववर्ती आर्य नागार्जुन द्वारा भी आचार्य के रूप में सुश्रुत का नाम दिया होना इसकी अर्वाचीनता के प्रतिवाद के लिये पर्याप्त प्रमाण है।

इसके अतिरिक्त पूर्वोद्दिष्ट खोटाङ् प्रदेश से प्राप्त भोजपत्र पर लिखे हुए नावनीतक नामक ग्रन्थ की लिपि को देखकर सब विद्वानों ने इसे तृतीय या चतुर्थ शताब्दी का निश्चित किया है। प्राचीन काल में आजकल के समान शीघ्र चलने वाले स्टीम ऐंजिन, हवाईजहाज, तार, रेडियो आदि अभाव में भी इस भारतीय ग्रन्थ के इतने दुर्गम तथा दूर प्रदेश में प्रचार


करने वाला) तथा अत्यन्त प्रसिद्ध नागार्जुन नामक विद्वान् का उल्लेख किया है। ७वीं शताब्दी में भारत में आये हुये ह्वुन सङ्ग नामक चीनी यात्री ने अपने से सात-आठ सौ वर्ष पूर्व शान्तिदेव तथा अश्वघोष आदि की तरह अत्यन्त प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान् शातवाहन के मित्र नागार्जुन का उल्लेख किया है जो कि रसायन के द्वारा पत्थर को भी स्वर्ण बना देता था। राजतरङ्गिणी के लेखक कल्हण ने बुद्ध के आविर्भाव से १५० (डेढ सौ) वर्ष पूर्व नागार्जुन नामक प्रसिद्ध विद्वान् के होने का निर्देश किया है। इस प्रकार भिन्न-भिन्न समयों के मिलने से इन नागार्जुनो में एकता प्रतीत नहीं होती अर्थात् ये परस्पर भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हैं। नागार्जुन द्वारा शातवाहन को पत्र भेजने का वृत्तान्त अन्यत्र प्रकाशित हुआ है। मेरे संग्रहालय में एक फटा हुआ संस्कृत भाषा में ताडपत्र पर लिखा हुआ शातवाहन चरित हैं जिसमें ‘दृष्टतत्त्वों बोधिसत्त्वो महासत्त्वो महाराजगुरुः श्रीनागार्जुनाभिधानः शाक्यभिक्षुराजः’ इस प्रकार के स्पष्ट उल्लेख होने से बोधिसत्त्वस्थानीय, कुरुकुल्ला के उपदेश के कारण तान्त्रिक तथा शाक्यभिक्षु नागार्जुन शातवाहन का समकालीन सिद्ध होता है। ह्वून् सङ्ग ने बोधिसत्त्व तथा धातुवाद (रसायन) के विद्वान् होने से इसी शातवाहन के समकालीन नागार्जुन का सम्भवतः उल्लेख किया है। नागार्जुन द्वारा शातवाहन को रसायन गुटिका ओषधि के देने का उल्लेख भी मिलता है। बाणभट्ट के हर्ष चरित (उ. ८) में समतिक्रामति च कियत्यपि काले तामेकावलीं तस्मान्नागराजान्नागार्जुनो नाम.....लेभे च, त्रिसमुद्राधिपतये शातवाहनाय नरेन्द्राय सुहृदे स ददौ ताम्’ इस लेख से नागार्जुन द्वारा अपने मित्र शातवाहन को रत्नों की एकावली (हार) के देने के उल्लेख से इन दोनों की मित्रता तथा समान काल प्रतीत होता है। इस प्रकार शातवाहन का समकालीन वोधिसत्त्वस्थानीय अत्यन्त विद्वान् तथा तन्त्र विद्या में निपुण नागार्जुन रसायन तथा वैद्यक का भी विद्वान् प्रतीत होता है। इस प्रकार तन्त्रों से युक्त बौद्ध अध्यात्मग्रन्थ तत्त्व प्रकाश आदि भी इस तान्त्रिक तथा बोधिसत्त्व नागार्जुन के हो सकते हैं। पाटलिपुत्र के शिलापट्ट पर लिखे हुए ‘नागार्जुनेन लिखिताः स्तम्भे पाटलिपुत्रके’ तथा वृन्द और चक्रपाणि द्वारा दिये गये ‘नागार्जुन के अमुक-अमुक रोग के प्रतिकार के लिये औषधयोग’ भी इसी नागार्जुन के प्रतीत होते हैं। सप्तम शताब्दी का निर्देश करने वाला अल्बेरुनी का लेख ह्वून् सङ्ग के लेख से ही खंडित हो जाने के कारण, उसके अनुसार अन्य नागार्जुन के न मिलने से आनुश्रविक तथा काल्पनिक समय को लिखकर शातवाहन के समकालीन नागार्जुन से ही अभिप्राय प्रतीत होता है। माध्यमिक वृत्ति तथा उपायहृदय (छायानुवाद रूप से प्रकाशित) में तान्त्रिक विषयों से रहित केवल अध्यात्म प्रधान प्रौढ़ शैली के होने से इस तान्त्रिक नागार्जुन से भिन्न नागार्जुन की कृतियां प्रतीत होती है। उपायहृदय में दर्शन से भिन्न विषयों के प्रसङ्ग में भैषज्य विद्या के प्रधानविषय रूप ६ भैषज्य धर्मों का केवल साधारण रूप से (नाममात्र) निर्देश होने से तथा धातु रसायन आदि विषयों का बिलकुल उल्लेख न होने से इस उपायहृदय तथा माध्यमिक वृत्ति का निर्माता अन्य ही महायान पथ का स्थापक दार्शनिक आर्य नागार्जुन प्रतीत होता है। राजतरङ्गिणी में निर्दिष्ट नागार्जुन का बौद्ध होने पर भी राजा के रूप में उल्लेख किया गया है। माध्यमिक वृत्ति आदि के कर्ता नागार्जुन का कहीं भी राजा के रूप में उल्लेख न मिलने से केवल समान नामवाला राजा नागार्जुन कोई भिन्न ही व्यक्ति प्रतीत होता है।

१५ का.सं.

२१६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

एवं प्राप्ति के लिये विशेष समय की अपेक्षा होने से ग्रन्थ की रचना और भी प्राचीन प्रतीत होती है। इस ग्रन्थ में मङ्गलाचरण के रूप में बुद्ध का उल्लेख मिलने से बुद्ध के कितने समय पश्चात् इस ग्रन्थ की रचना हुई है यह नहीं कहा जा सकता। इस प्राचीन ग्रन्थ में आत्रेय पुनर्वसु तथा उसके अनुयायी क्षारपाणि, हारीत, जातूकर्ण, पराशर तथा भेड आदि तथा काश्यप जीवक और सुश्रुत के नाम तथा उनके नाम से ओषधियों का उल्लेख मिलता है। उसमें आई हुई कुछ ओषधियों के वर्तमान चरक संहिता में मिलने पर भी उसमें आत्रेय नाम से उल्लेख किया गया है। चरक तथा नागार्जुन के नामों का इसमें उल्लेख नहीं मिलता है। चरक नाम से प्रसिद्ध चरकसंहिता के आविर्भाव के बाद यदि नावनीतक का निर्माण हुआ हो तो वाग्भट आदि ग्रन्थों के समान प्रसिद्ध चरक का उल्लेख इसमें अवश्य होता। इस प्रकार यह चरक के समय से भी प्राचीन प्रतीत होता है। यदि किसी बौद्ध ने इस ग्रन्थ का निर्माण किया हो तो वैद्यक में भी प्रसिद्ध बौद्धाचार्य नागार्जुन या अन्य किसी वैद्यक में प्रसिद्ध बौद्धाचार्य का भी इसमें उल्लेख होना चाहिये था। इस प्रकार यह ग्रन्थ आत्रेय, उसके अनुयायी, सुश्रुत, काश्यप तथा जीवक के बाद तथा नागार्जुन के समय के पूर्व का होने से इसमें आया सुश्रुत भी नागार्जुन से पूर्व का सिद्ध होता है।

इस प्रकार सुश्रुत न केवल आर्य नागार्जुन तथा नावनीतक से ही प्राचीन है अपितु महाभाष्यकार के ‘तद्धितेष्वचामादेः’ (७-२-११७) तथा इको गुणवृद्धी (१-१-३) सूत्रों की व्याख्या में ‘सौश्रुतः’ तथा ‘शाकपार्थिवादीनामुपसंख्यानम्’ (२-१-१७०) इस वार्तिक में ‘कुतपवासाः सौश्रुतः कुतपसौश्रुतः’ निर्देश से यह महाभाष्यकार तथा वार्तिककार से भी प्राचीन प्रतीत होता है। इतना ही नहीं, पाणिनि द्वारा ‘कार्तकौजपादद्यञ्’ (६-२-३७) इस सूत्र के गुण में ‘सौश्रुतपार्थिवाः’ में अपत्य अर्थ के सूचक प्रत्ययान्त सौश्रुत शब्द के दिया होने से न केवल सुश्रुत अपितु उसके वंश वाले अथवा उसके शिष्य और सम्बन्धी भी पाणिनि से प्राचीन प्रतीत होते हैं।

पाश्चात्य विद्वान् वेबर$^१$ का मत है कि महाभाष्यकार द्वारा ‘सुश्रुत्-सौश्रुतः’ में हलन्त सुश्रुत शब्द दिया होने से कार्तकौजपादि गण में सौश्रुत शब्द के मिलने पर भी बाद में उसके प्रक्षिप्त होने से पाणिनि द्वारा उसके उपदिष्ट होने का निश्चय न होने से, भाष्यकार द्वारा उस सूत्र की व्याख्या न की होने से उसके पाणिनीय सिद्ध न होने से तथा महाभाष्यकार द्वारा सुश्रुत के वैद्यकाचार्य होने का प्रमाण न मिलने से महाभाष्य में आया हुआ सुश्रुत यही व्यक्ति है ऐसा निश्चय से नहीं कहा जा सकता। परन्तु ऐसी बात नहीं है। ‘भृत्-भृतः, कर्मकृत् कर्मकरः’ आदि शब्दों की तरह ही हलन्त सुश्रुत शब्द क्विप् प्रत्ययान्त है तथा अदन्त सुश्रुत शब्दक्त प्रत्ययान्त है। ये दोनों शब्द केवल प्रत्यय भेद से आंशिक भेद को प्रकट करते हुए एक ही अर्थ के सूचक हैं। ‘इको गुणवृद्धी’ इस सूत्र की व्याख्या में अन्तिम इकार तथा उकार को ही गुण हो सकने के कारण ‘अग्नि, वायु, बभ्रु माडु इत्यादि इकारान्त तथा उकारान्त शब्दों में ही गुण होता है। उपधागत (‘अलोऽन्त्यात् पूर्व उपधा’ अर्थात् अन्तिम अल्—वर्ण से पूर्व वर्ण का नाम उपधा होता है) इकार, उकार में गुण नहीं होता यह दिखलाने के लिये हलन्त शब्द में ही प्रत्युदाहरण का दिया जाना संभव होने से तथा हलन्त सुश्रुत् शब्द में गुण न हो सकने के कारण (उपधा में उकार होने से) भाष्यकार ने ‘सुश्रुत्-सौश्रुतः’ यह हलन्त शब्द दिया है। हलत सुश्रुत् शब्द की तरह अदन्त सुश्रुत शब्द से भी ‘सौश्रुतः’ शब्द बनता है। बाभ्रव्य, माण्डव्य इत्यादि शब्द केवल बभ्रु तथा मण्डु से ही बन सकते है इसलिये इसमें प्रकृति (मूल शब्द) देने की आवश्यकता न होने से ही ‘बभ्रुः-ब व्यः’ तथा ‘मण्डुः-माण्डव्यः’ न लिखकर केवल बाभ्रन्य, माण्डव्य ही दिया है। इसी प्रकार यदि सौश्रुत शब्द भी केवल हलन्त सुश्रुत् शब्द से ही बनना सम्भव होता तो उस अवस्था में प्रकृतिरूप से हलन्त सुश्रुत् शब्द साथ में देने की आवश्यकता नहीं थी। हलन्त सुश्रुत शब्द की तरह अदन्त सुश्रुत शब्द से भी सौश्रुत शब्द बन सकता है। परन्तु उपधागत


१. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. ४७ का १ देखें।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २१७

इकार, उकार की वृद्धि के उदाहरण के लिये अदन्त शब्द से बना हुआ सौश्रुत शब्द उपयोगी न होकर हलन्त शब्द से बना हुआ सौश्रुत शब्द उपयोगी है इसलिये अदन्त शब्द से बने हुए सौश्रुत शब्द में अर्थ का भेद न होने पर भी प्रकृति (मूल शब्द-हलन्त सुश्रुत शब्द) सहित ‘सुश्रुत्-सौश्रुतः’ देना विशेष अर्थ रखता है। इसी प्रकार ‘तद्धितेष्वचामादेः’ (७-२-११७) इस सूत्र की व्याख्या में भी अन्तिम उपधा की वृद्धि के अपवाद रूप में आदि अच् (स्वर) की वृद्धि करने में अदन्त सुश्रुत शब्द की उपधावृद्धि सम्भव न होने से तथा हलन्त सुश्रुत् शब्द ही इस उदाहरण के लिये उपयुक्त होने से भाष्यकार ने हलन्त प्रकृति (सुश्रुत्) के साथ सौश्रुत शब्द दिया है। इस प्रकार दोनों स्थानों में हलन्त प्रकृति (सुश्रुत्) शब्द देकर जो भाष्यकार ने अदन्त प्रकृति का निराकरण किया है उससे यह सिद्ध होता है कि अदन्त सुश्रुत शब्द से भी सौश्रुत शब्द बन सकता है। इसीलिये कार्त्तकौजपादि सूत्र में निर्दिष्ट ‘सौश्रुतपार्थिवः’ तथा गोत्रान्तेवासी माणवब्राह्मणेषु क्षेपे (६-२-६९) सूत्र में निर्दिष्ट ‘भार्यासौश्रुतः’ शब्द का यौगिक अर्थ दिखलाने के लिये काशिका, पदमञ्जरी¹ तथा न्यास आदि ग्रन्थों के रचयिताओं ने किसी स्थान पर ‘सुश्रुतस्य छात्राः सौश्रुताः’ ‘सुश्रुताऽपत्यं सौश्रुतः’ तथा किसी-किसी स्थान पर ‘कस्यचित् सुश्रुतोऽपत्यं सौश्रुतः’ इत्यादि निर्वचनों द्वारा दोनों अदन्त तथा हलन्त सुश्रुत शब्दों से सौश्रुत शब्द बनाया है। इससे प्रतीत होता है कि बहुत काल पूर्व इन व्याकरणाचार्यों द्वारा भी अदन्त तथा हलन्त दोनों शब्द सौश्रुत शब्द की प्रकृति के रूप में स्वीकार किये गये थे। यहां यह एक प्रश्न हो सकता है कि वार्तिककार तथा भाष्यकार द्वारा दिये हुए ‘कुतपसौश्रुतः’ तथा गणपाठकार द्वारा दिये हुए ‘पार्थिवसौश्रुतः’ शब्दों में हलन्त सुश्रुत् शब्द से सौश्रुत शब्द की निष्पत्ति है या अदन्त सुश्रुत शब्द से दोनों में क्या भेद है। मेरा यह अभिप्राय नहीं है कि पाणिनि के उपदेशरूप में मिलने वाले गणपाठ में आये हुए सब शब्द पाणिनि द्वारा ही उपदिष्ट हैं। समय प्रवाह से उसमें दूसरे शब्द भी पीछे से अनुप्रविष्ट हो सकते हैं किन्तु एक ही काल वाले प्राचीन भाष्यकार तथा वार्तिककार आदि द्वारा सूत्रों के उदाहरण में दिये होने से गणपाठ में आये हुए सौश्रुत शब्द को तथा विशेष वक्तव्य के न होने से व्याख्यारहित कुछ सूत्रों को केवल भाष्य में न दिया होने से उन सूत्रों को अपाणिनीय बतलाना दुःसाहस है। भाष्यकार द्वारा बहुत से अव्याख्यात सूत्रों को यदि अपाणिनीय कह दिया जाय तो उस-उस अध्याय तथा पाद के अन्त में दी हुई सूत्रों की संख्या किस प्रकार पूरी हो सकती है। पाणिनि के कार्त्तकौजपादि गण में निर्दिष्ट शब्दों का अनुसन्धान करते हुए शेखर आदि व्याकरण ग्रन्थों में ‘सौश्रुतपार्थिवाः’ शब्द के मिलने से भिन्न-भिन्न सौश्रुतौं तथा पार्थिवों (राजाओं) का परस्पर संबन्ध प्रतीत होता है। तथा पार्थिव शब्द से भी सौश्रुतशब्द का पूर्व प्रयोग होने से प्रतीत होता है कि उस समय सौश्रुतौं को राजाओं द्वारा भी सम्मान प्राप्त था। ‘सौश्रुताः पार्थिवाश्च’ इस बहुवचन वाले समास में ही ‘सौश्रुतपार्थिवाः’ शब्द बना होने से पाणिनि के समय में भी अनेक सुश्रुत सम्प्रदाय वाले वैद्यों का अनेक राजाओं के साथ सम्बन्ध प्रतीत होता है। सुश्रुतसंहिता सूत्रस्थान के युक्तसेनोपाध्याय¹ में वैद्य द्वारा अच्छी प्रकार निरीक्षण करके राजा की रक्षा करना, स्कन्धावार (शिविर छावनी) में भी राजा के साथ रहना तथा राजा द्वारा भी वैद्य का विशेष सम्मान करने का उल्लेख मिलता है। सूत्रस्थान के उपसंहार² में भी इस शास्त्र का राजाओं तथा महात्माओं द्वारा अध्ययन करने का निर्देश होने से इस शास्त्र के ज्ञाताओं (वैद्यों) के साथ राजाओं का विशेष संबन्ध सूचित किया गया है। ‘शतं ते राजन् भिषजः सहस्त्रम्’ (ऋक् १-२४-९) इस मन्त्र के अंश द्वारा भी प्राचीन काल में राजाओं तथा वैद्यों का परस्पर संबन्ध सूचित होता है। महाभारत³ तथा कौटिलीय⁴ अर्थशास्त्र में भी युद्ध के प्रकरण में विशेषरूप से शस्त्रचिकित्सा के ज्ञाताओं का सहभाव निर्दिष्ट है। जिन्हें सदा शस्त्रास्त्रों से युद्ध करने पड़ते हैं उन सेना से युक्त राजाओं के साथ शल्यचिकित्सकों का होना आवश्यक भी है। सुश्रुत के शल्यचिकित्सक होने से ही उसके अनुयायी सौश्रुतौं के भी राजाओं के साथ निकट संबन्ध के अनुसार

१. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. ४७-४८ देखें।
२. १ से ४ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ४८ देखें।

२१८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

प्रचलित हुए 'सौश्रुतपार्थिवाः' शब्द को पाणिनि द्वारा गण में प्रविष्ट किया जाने से न केवल सुश्रुत अपितु उसके अनुयायी शल्यचिकित्सक सौश्रुतों की भी अत्यन्त प्राचीन काल से प्रसिद्धि तथा राजाओं द्वारा सम्मान की प्रतीति होती है। काशिका में 'सौश्रुतपार्थिवाः' इस पाठान्तर के मिलने से सौश्रुतों का राजाओं के साथ यद्यपि संबन्ध ज्ञात नहीं होता तथापि इससे सौश्रुतों की प्रसिद्धि तथा सम्मान तो प्रतीत होता ही है। व्याकरण के अनुसार सुश्रुत का वैद्यकाचार्यत्व प्रतीत न होने पर भी 'सुश्रुतस्य छात्राः सौश्रुताः' द्वारा सौश्रुत शब्द का अर्थ लिखने वाले काशिकाकार तथा न्यासकार आदि प्राचीन वैयाकरणों के लेख से भी वह मूलभूत सुश्रुत साधारण व्यक्ति प्रतीत न होकर विद्या-सम्प्रदाय का प्रवर्तक होने से सौश्रुतों का आचार्य प्रतीत होता है। विद्या सम्प्रदाय के प्रवर्तक के रूप में इस शल्याचार्य सुश्रुत को छोड़कर अन्य किसी सुश्रुत का कहीं उल्लेख नहीं मिलता है। भिषगाचार्य सुश्रुत का नागार्जुन द्वारा उपायहृदय में, वाग्भट, नावनीतक, ज्वरसमुच्चय आदि में तथा जयवर्मा के शिलालेख में भी उल्लेख मिलने एवं इसी के ग्रन्थ का अरब आदि देशों में अनुवाद होने से, हरिवंश पुराण के सदृश दिवोदास का ब्राह्मण उपनिषत् आदि में मिलने से, सुश्रुतसंहिता में विश्वामित्र के पुत्र सुश्रुत द्वारा दिवोदास से आयुर्वेद के ग्रहण का उल्लेख होने से तथा महाभारत में भी विश्वामित्र के पुत्रों में सुश्रुत का उल्लेख होने से प्राचीन समय से ही इस शल्यचिकित्सक सुश्रुत की ही सम्प्रदाय-प्रवर्तक आचार्य के रूप में प्रसिद्धि प्रतीत होती है।

सुश्रुतसंहिता में आर्ष रचना के दिखाई देने, बौद्ध छाया न दीखने, रस धातु आदि ओषधियों के प्रायः न मिलने, शौनक, कृतवीर्य, पाराशर्य, मार्कण्डेय, सुभूति गौतम आदि कुछ प्राचीन आचार्यों के ही उल्लेख होने तथा दिवोदास और सुश्रुत शब्द के स्वरप्रक्रिया में उदाहरणरूप में मिलने से सुश्रुताचार्य प्राचीन ही प्रतीत होता है। इस प्रकार प्राचीन काल से अत्यन्त प्रसिद्धि तथा सबके मस्तिष्क में विद्यमान शल्यचिकित्सक इस सुश्रुत को छोड़कर किसी दूसरे अनुपस्थित सुश्रुत की कल्पना करना व्यर्थ है। इस लिये व्याकरण के सूत्रकार, वार्तिककार तथा भाष्यकारों द्वारा निर्दिष्ट सुश्रुत भी यही है जो पाणिनि से पूर्व दिवोदास के समान ही उपनिषत्कालीन प्रतीत होता है। बलवान प्राचीन आश्रय को छोड़कर उदासीन नहीं होना चाहिये। कहा भी है—

‘व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्तिर्न हि सन्देहादलक्षणम्’।

इसके अतिरिक्त आग्नेय पुराण में (अ. २७९-२९२) नर, अश्व तथा गौओं से संबन्धित आयुर्वेद के विषय में जिज्ञासापूर्वक प्रश्न करने पर सुश्रुत को धन्वन्तरि द्वारा उसके उपदेश का वर्णन मिलने से धन्वन्तरि के समान उसका शिष्य सुश्रुत भी मनुष्यों के आयुर्वेद की तरह गौ तथा अश्व संबन्धी आयुर्वेद का भी ज्ञाता प्रतीत होता है। यह आग्नेय पुराण में आया हुआ सुश्रुत भी धन्वन्तरि के साहचर्य से सुश्रुतसंहिता का आचार्य (निबन्धा) ही प्रतीत होता है। एक व्यक्ति का अनेक विज्ञानों में प्रवेश होना प्रायः मिलता है। शालिहोत्र के ग्रन्थ में प्रष्टा (शिष्य) रूप से सुश्रुत का नाम आता है। अश्वशास्त्र के प्रवर्तक शालिहोत्र के विषय में श्री गिरीन्द्रनाथ¹ महोदय ने विशेष रूप से विवेचन किया है। कलकत्ता से प्रकाशित जयदत्त के अश्वचिकित्सा की भूमिका में भी कुछ वर्णन दिया है। एतद्विषयक विस्तृत विवरण वहीं से जानना चाहिये। शालिहोत्र ग्रन्थ का कुछ अंश कहीं-कहीं पुस्तकालयों में संभवतः मिलता है। मैंने उसे नहीं देखा है तथापि पूर्वनिर्दिष्ट हेमाद्रि के लक्षणप्रकाश के अश्वप्रकरण में कुछ शालिहोत्र के अश्वशास्त्र संबन्धी वचन उद्धृत मिलते हैं। इसमें सुश्रुत³ मित्रजित् तथा गान्धार आदि पुत्र एवं गर्ग आदि शिष्यों द्वारा प्रश्न किये जाने पर शालिहोत्र के अश्वसम्बन्धी उपदेश तथा प्रष्टा के रूप में शालिहोत्र के पुत्र सुश्रुत का उल्लेख मिलता है। शिष्य के लिये भी किसी-किसी ग्रन्थ में पुत्र शब्द का निर्देश मिलता है, परन्तु यहां 'पुत्राः शिष्याश्च पृच्छन्ति विनयेन महामुनिम्' इस वाक्य द्वारा पुत्र एवं शिष्यों का


१. १ से २ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ४९ देखें।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २१९

पृथक्-पृथक् निर्देश होने से तथा सुश्रुत का अनेक बार पुत्र रूप से स्पष्ट उल्लेख होने से शालिहोत्र द्वारा अश्वशास्त्र के विषय में उपदिष्ट सुश्रुत शालिहोत्र का पुत्र ही प्रतीत होता है। इसके विपरीत सुश्रुतसंहिता में शल्यचिकित्सक सुश्रुत का विश्वामित्र के पुत्र रूप में निर्देश किया गया है। महाभारत आदि में भी ऐसा ही मिलता है। पूर्व निर्दिष्ट शालिहोत्रोक्त अश्वाभिषेक मन्त्रों में आयुर्वेद के आचार्यों का निर्देश करते हुए (पृ. १२) आत्रेय तथा उसके शिष्य अग्निवेश, हारीत, क्षारपाणि, जातूकर्ण्य, पराशर तथा अन्य आचार्यों का उल्लेख होने पर भी धन्वन्तरि तथा दिवोदास का उल्लेख नहीं मिलता, यदि शालिहोत्र तथा धन्वन्तरि द्वारा उपदिष्ट सुश्रुत एक ही हो तो अश्ववैद्यक के आचार्य शालिहोत्र या उसके शिष्य सुश्रुत ने आयुर्वेद के अन्य आचार्यों के साथ तत्कालीन एवं अत्यन्त प्रसिद्ध धन्वन्तरि तथा दिवोदास का उल्लेख क्यों नहीं किया। तथा सुश्रुतसंहिता के कर्ता सुश्रुत को भी अश्वशास्त्र के आचार्य होने पर भी एक प्रस्थान रूप में इतने प्रसिद्ध अपने पिता या आचार्य शालिहोत्र का कहीं प्रसङ्गवश तो निर्देश करना चाहिये था। अन्य आचार्यों के वैद्यक विषयों से भरे हुए तथा पीछे से मिलाये गये उत्तरतन्त्र में सुश्रुत, सौश्रुत या प्रतिसंस्कर्ता ने इसका नाम क्यों नहीं दिया। इस प्रकार शालिहोत्र का शिष्य एवं पुत्र सुश्रुत तथा धन्वन्तरि द्वारा उपदिष्ट विश्वामित्र का पुत्र सुश्रुत दोनों भिन्न-भिन्न व्यक्ति प्रतीत होते हैं।

शालिहोत्रेण गर्गेण सुश्रुतेन च भाषितम् । तत्त्वं यद्वाजिशास्त्रस्य तत्सर्वमिह संस्थितम् ।।

दुर्लभ गण कृत सिद्धोपदेशसंग्रह नामक अश्ववैद्यक ग्रन्थ के उपर्युक्त श्लोक में सुश्रुत का अश्ववैद्यक के उपदेष्टा के रूप में उल्लेख किया गया है। परन्तु अग्नि पुराण के अनुसार धन्वन्तरि के शिष्य सुश्रुत का भी अश्ववैद्यक का ज्ञाता होना प्रकट होता है। इस प्रकार यह नहीं कहा जा सकता कि इस श्लोक में अश्वशास्त्र के उपदेशक के रूप में दिया हुआ सुश्रुत शालिहोत्र का शिष्य है या धन्वन्तरि का। यदि शालिहोत्र तथा गर्ग के साहचर्य से इस दुर्लभ गणोक्त सुश्रुत को शालिहोत्र का शिष्य मान भी लें तो उसी के वचन के अनुसार इसका अश्वशास्त्र संबन्धी कोई ग्रन्थ होना चाहिये। परन्तु इस शालिहोत्र के पुत्र सुश्रुत का आजकल एतद्विषयक कोई ग्रन्थ नहीं मिलता है। उसके ग्रन्थ का उल्लेख वचनों का उद्धरण तथा नाम मात्र भी इस गणकृत ग्रन्थ के अतिरिक्त अन्य किसी भी आयुर्वेद के ग्रन्थ में नहीं मिलता है। इस लिये इस सुश्रुत के विषय में अब कुछ भी कहना कठिन है। ग्रन्थों के मिलने से, अन्य ग्रन्थों में निर्देश होने से, अन्य आचार्यों द्वारा ग्रहण किया जाने से तथा शिलालेख आदि के उल्लेख कसे धान्वन्तर सुश्रुत की जिस प्रकार प्रसिद्धि है वैसी शालिहोत्र के पुत्र सुश्रुत की प्रसिद्धि नहीं है। इस लिये जहां भी सुश्रुत के नाम का निर्देश मिलता है वहां साधक एवं बाधक प्रमाणों के अभाव में शल्यचिकित्सक एवं धान्वन्तर सुश्रुत की ही प्रतीति होती है।

कुछ लोग दोनों सुश्रुत को एकता स्वीकार कर तथा शालिहोत्र के लेख से सुश्रुत को शालिहोत्र का पुत्र मानकर नकुलकृत अश्वचिकित्सा के ‘पायाद्वः स तुरङ्गघोषतनयः श्रीशालिहोत्रो मुनिः’ इस प्रारम्भिक वाक्य में आये हुए तुरङ्गघोष शब्द से अश्वघोष का ग्रहण करके शालिहोत्र को उसका पुत्र मानते हैं। तथा पूर्व निर्देशानुसार शालिहोत्र का पुत्र सुश्रुत होने से शालिहोत्र तथा सुश्रुत को कनिष्क के समकालीन अश्वघोष से भी अर्वाचीन मानते हैं। परन्तु नेपाल से प्राप्त अश्वचिकित्सा की दो पुस्तकों में मङ्गलाचरण वाले उपर्युक्त पद्य के ही न दिये होने से मूल में ही यह मत खण्डित हो जाता है। परन्तु यदि उस पद्य को मान भी लिया जाय तो भी शालिहोत्र के ग्रन्थ तथा अन्य अश्वचिकित्सा के ग्रन्थों के प्रारम्भ में ब्रह्मा तथा इन्द्र के साथ आया हुआ तथा मूलसंहिता के कर्ता के रूप में निर्दिष्ट शालिहोत्र प्राचीन ही प्रतीत होता है। शालिहोत्र के ग्रन्थ में इक्ष्वाकु तथा सगर द्वारा शालिहोत्र से प्रश्न करने का निर्देश होना भी शालिहोत्र को प्राचीन सिद्ध करता है। शालिहोत्र का केवल पंचतन्त्र के प्रारम्भ में ही उल्लेख नहीं है अपितु महाभारत के वनपर्व १ में अश्वों


१. १ का टि. उपो. संस्कृत पृ. ५० देखें।

२२० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

के पारखी नल की कथा में भी इसका उल्लेख है। वहां आये हुए शालिहोत्र का अश्वों के विशेषज्ञ रूप में वर्णन होने से तथा अन्य प्रकरण को देखकर वह यही आचार्य प्रतीत होत है। उपलब्ध शालिहोत्र संहिता चाहे शालिहोत्र की हस्तलिखित हो, चाहे प्रतिसंस्कृत हो और चाहे उसी के सम्प्रदाय वाले किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उपदिष्ट हो परन्तु अश्वशास्त्र का परम आचार्य शालिहोत्र अत्यन्त प्राचीन व्यक्ति है इसमें किसी को सन्देह नहीं है। इस प्राचीन ऋषि का युधिष्ठिर के भाई नकुल द्वारा अपने ग्रन्थ के मङ्गलाचरण में आचार्यरूप में सम्मानपूर्वक ग्रहण किया जाना भी उचित है, इससे पूर्वापर ग्रन्थ की संगति भी ठीक बैठती है। प्राचीन काल से प्रसिद्ध इस ऋषि को छोड़कर तुरङ्गघोष से अश्वघोष की कल्पना करके शालिहोत्र तथा सुश्रुत को क्रमशः उसके पुत्र तथा पौत्र मानने से तो सारा इतिहास की गड़बड़ हो जाता है। अश्वशास्त्र का प्रथम आचार्य (प्रवर्तक) यदि कनिष्क सामयिक अश्वघोष का पुत्र हो तो कनिष्क के बाद ही इसके शास्त्र का निर्माण होना चाहिये, उस अवस्था में कौटिलीय¹ अर्थशास्त्र में आये हुये अश्वशालानिर्माण, आहार-कल्पना, उनकी जातियां तथा चिकित्सकों के नाम इत्यादि संक्षेप में मिलने वाले विषय उसमें कहां से आ गये। अशोक द्वारा भारतीय चिकित्सा के आधार पर अपने देश की तरह विदेशों में भी अश्व आदि पशुओं के चिकित्सालयों का उद्घाटन किया जाना किसके आधार पर माना जाय। यह स्पष्ट है कि अश्वघोष बुद्ध सम्प्रदाय का प्रधान आचार्य है। परन्तु शालिहोत्र के ग्रन्थ में अश्वाभिषेक प्रकरण में केवल श्रौत ऋषियों के नाम, ब्रह्मघोष, श्रौतयज्ञविधान तथा घोड़ों को देवताओं के रूप में निर्देश करते हुए भी श्रौत एवं स्मार्त देवताओं का ही उल्लेख मिलने से शालिहोत्राचार्य वेदमार्गानुयायी प्रतीत होता है। शालिहोत्र ग्रन्थ तथा सुश्रुतसंहिता में बौद्ध छाया के न मिलने से भी ये दोनों बौद्धाचार्य अश्वघोष की सन्तति प्रतीत नहीं होती है। अश्वघोष का साकेतवर्ती तथा शालिहोत्र पश्चिमोत्तरदेशवर्ती होना भी इसी बात को प्रकट करता है। अश्वघोष के पुत्र रूप में कल्पित शालिहोत्र के पुत्र सुश्रुत के साथ यदि शल्याचार्य सुश्रुत का अभेद माना जाय तो कनिष्क तथा अश्वघोष के समकालीन नागार्जुन ने उसके पौत्र रूप में माने गये सुश्रुत की सुप्रसिद्ध भिषगाचार्य रूप में कैसे प्रशंसा की है तथा इस अवस्था में नागार्जुन द्वारा सुश्रुतसंहिता का प्रतिसंस्कार किये जाने विषयक निर्देश का भी क्या अर्थ है ? दोनों सुश्रुत का अभेद तथा कनिष्क सामयिक होने पर पाणिनि, वार्त्तिककार (कात्यायन) तथा भाष्यकार आदि द्वारा सुश्रुत शब्द का ग्रहण कैसे संभव हो सकता है, इसलिये यह सब निरर्थक है।

अन्त में युक्तिपूर्वक विक्रम संवत् के पूर्व ६ ठी शताब्दी में सुश्रुत के समय को सिद्ध करने वाले हार्नले (A. F. Rudolp Hoernel) नामक पाश्चात्य² विद्वान् के लेख के अनुसार भी वह प्राचीन सिद्ध होता है। कुछ³ विद्वान् कहते हैं कि पूर्णरूप से निश्चय न होने पर भी सुश्रुत का समय ईश्वी संवत् से ६०० वर्ष पूर्व है। कुछ अन्य⁴ विद्वान् कहते हैं कि सुश्रुत में सात प्रकार के कुष्ठ का वर्णन मिलता है। इस रोग का भारत तथा चीन देश के निवासियों ने २५०० वर्ष पूर्व ज्ञान प्राप्त किया था। इस प्रकार सुश्रुत लगभग ढाई हजार (२५००) वर्ष प्राचीन प्रतीत होता है। सुश्रुतसंहिता का लैटिन भाषा में अनुवाद करने वाले ह्यासलेर⁵ (Hessler) नामक पाश्चात्त्य विद्वान् तथा श्रीयुत गिरीन्द्रनाथ⁶ मुखोपाध्याय आदि ने भी ईश्वी सन् से लगभग एक सहस्त्र वर्ष पूर्व (ई. पू. १०००) सुश्रुत का समय निश्चित किया है।

इस प्रकार भिन्न-भिन्न विद्वानों के दृष्टिकोण से विचार करने पर सुश्रुतसंहिता के पूर्व भाग का समय कम से कम भी आज से २६०० वर्ष पूर्व प्रतीत होता है।

कुछ लोग सुश्रुतसंहिता में पूर्व आचार्यों की श्रेणी में निर्दिष्ट सुभूति गौतम को शाक्यसिंह का शिष्य मानकर सुश्रुत को बुद्ध के बाद का स्वीकार करते हैं। अष्टसाहस्रिका तथा शतसाहस्रिका आदि बौद्ध ग्रन्थों में यद्यपि सुभूति नाम अवश्य मिलता है परन्तु वहां आयुष्मत् सुभूति, स्थविर सुभूति आदि शब्द ही दिये गये हैं, सुभूतिगौतम का उल्लेख नहीं है।


१. १ से ६ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ५० देखें।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २२१

बौद्धग्रन्थों में सुभूति के अध्यात्म विषय का उल्लेख किया गया है। वैद्यक के आचार्यरूप में वहां उसका उल्लेख न मिलने से सुश्रुतसंहिता में आया हुआ सुभूतिगौतम बौद्ध न होकर अन्य ही प्राचीन वैद्याचार्य प्रतीत होता है। सुभूतिगौतम को यदि बौद्ध आचार्य माना जाय तो उसे भी पूर्व आचार्यों में गिनने वाले सुश्रुत के लेख में बौद्ध छाया अवश्य मिलनी चाहिये। बौद्ध छाया के न मिलने से सुभूतिगौतम बौद्ध नहीं हो सकता। स्थविर सुभूति का व्याकरण मिलने से केवल नाम की समानता होने से वह सुभूति भी प्राचीन तथा बुद्ध का प्रधान शिष्य प्रतीत होता है।

वैद्यक टीकाकारों द्वारा कहीं-कहीं उद्धृत वृद्ध सुश्रुत के वचनों के दिखाई देने से तथा उन उद्धृत वचन के वर्तमान सुश्रुतसंहिता में न मिलने से तथा 'औषधेनवमौरभ्रम्' इत्यादि सुश्रुतोक्त पद्य में भी सौश्रुत का पृथक् निर्देश होने से कुछ लोग कहते हैं कि वर्तमान सुश्रुतसंहिता से भिन्न वृद्धसुश्रुत का सौश्रुत तन्त्र पूर्वकाल में विद्यमान था। परन्तु सुश्रुतसंहिता में वृद्धसुश्रुत का पूर्वाचार्यों में निर्देश न होने से, महाभारत के आदि में भी विश्वामित्र के पुत्र के रूप में केवल सुश्रुत का ही उल्लेख होने से, महाभाष्यकार, नावनीतक, नागार्जुन, वाग्भट तथा ज्वरसमुच्चय आदि में सुश्रुत नाम का ही निर्देश होन से, अरब आदि दूर देशों में भी इस सुश्रुत की संहिता का ही अनुवाद एवं प्रचार होने से, कम्बोडिया स्थित यशोवर्मा के शिलालेख में भी सुश्रुत का ही उल्लेख होने से, वृद्धसुश्रुत नाम से मिलने वाले वचनों में प्राचीन रचना एवं प्रौढता न दिखलाई देने से, उसके वचनों के अनुसार वृद्ध सुश्रुत का शल्याचार्य सिद्ध न होने टीकाकारों एवं अर्वाचीन लेखकों द्वारा कहीं-कहीं उद्धृत वृद्ध सुश्रुत से कौन है, कब हुआ है, इसका कौन सा ग्रन्थ है, किस प्रस्थान (विभाग) का यह आचार्य है—इत्यादि सब विषयों के अज्ञान होने से पूर्वोद्दिष्ट दिवोदास के शिष्य, प्रसिद्ध एवं विश्रुत सुश्रुत को छोड़ कर अज्ञात वृद्ध सुश्रुत को शल्यतन्त्र का पूर्वाचार्य सिद्ध करने के लिये अत्यन्त दृढ़ प्रमाणों की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त—

औषधेनवमौरभ्रं सौश्रुतं पौष्कलावतम् । शेषाणां शल्यतन्त्राणां मूलान्येतानि निर्दिशेत् ।।

उपर्युक्त श्लोक सुश्रुतसंहिता के उपक्रम में काशीराज दिवोदास के पास शिष्यरूप से आये हुए औषधेनव, औरभ्र, पौष्कलावत, करवीर्य, गोपुर रक्षित, सुश्रुत आदि का निर्देश करके कहा गया है। इनमें औषधेनव, औरभ्र, पुष्कलावत तथा सुश्रुत द्वारा बनाये हुए तन्त्रों का निर्देश करने के लिये तदीयार्थक प्रत्ययान्त सौश्रुत आदि पद दिये गये हैं। सब तन्त्रों में इसकी प्रधानता दिखाने के लिये ही अपने ही ग्रन्थों में पुनः सौश्रुत शब्द दिया गया है। यदि इस सौश्रुत शब्द को देखकर अन्य सुश्रुत की कल्पना की जाय तो उस न्याय से औषधेनव आदि आचार्यों के तन्त्र भी पृथक् रूप में मिलने चाहिये। अपने ग्रन्थ में अपना ही नाम उल्लेख करने की प्रथा कौटिलिय अर्थशास्त्र आदि प्राचीन ग्रन्थों में भी मिलती है। इसलिये औषधेनव आदि तन्त्रों के समान अपने तन्त्र (सुश्रुतसंहिता) की प्रधानता दिखलाने के लिये अपने नाम का निर्देश करना अनुचित नहीं है। उपलब्ध सुश्रुतसंहिता में कहीं-कहीं जो अर्वाचीन विषयों की प्रतीति होती है वह संस्कार के कारण या पाठभेद के दोष से संभव है जिसका विवरण पीछे संस्करण के प्रकरण में दिया जायगा।

वैदिक अवस्था में आर्यों के निवास स्थान की परिस्थितियों के अनुसार विभक्त वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त तथा शिशिर इन ६ ऋतुओं का वैदिक साहित्य १ में उल्लेख मिलता है। इनमें वसन्त या अन्य किसी एक ऋतु से प्रारम्भ करके समाप्त किये हुए ऋतु पर्यावर्त (ऋतुओं के चक्कर) को संवत्सर कहते हैं। प्राचीन परिस्थितियों में निर्मित यह ऋतु विभाग बाद में ‘वसन्तादिभ्यश्छक्' (४-२-६३) सूत्र द्वारा पाणिनि द्वारा भी ग्रहण किया गया है। तथा आजकल भी लोक में प्रचलित है। सुश्रुतसंहिता के ऋतुचर्याध्याय में पहले उत्तरायण आदि को प्रारम्भ करके प्रचलित प्रक्रिया के अनुरूप शिशिर से प्रारम्भ करके हेमन्त तक ६ ऋतुओं का निर्देश करके पुनः अगले ही वाक्य में सर्दी, गर्मी तथा वर्षा के भेद से तीनों दोषों के उपचय (संचय), प्रकोप एवं संशमन की अवस्था के अनुसार अमुक समय में उपचित एवं प्रकुपित


१. १ की टि. उपो. संस्कृत पृ. ५२ देखें।

२२२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

दोष को अमुकक समय में शान्त करना चाहिये इत्यादि भैषज्य प्रक्रिया के उपयोगी ऋतु को बतलाने के लिये 'इह तु' इत्यादि द्वारा दक्षिणायन वाले विभाग को दिया है। इसमें वर्षा, शरद्, हेमन्त, वसन्त, ग्रीष्म तथा प्रावृट् ऋतुओं का उल्लेख होने से प्रथम प्रक्रिया (ऋतुविभाग) में चार मास सर्दी के तथा दो मास वर्षा के आते हैं। और द्वितीय प्रक्रिया में दो मास सर्दी के और चार मास वर्षा के होते हैं। दूसरी प्रक्रिया चिकित्साविज्ञान के उपयोग के लिये प्रतीत होती है। काश्यपसंहिता में ऋतु सम्बन्धी अध्याय के खण्डित होने पर भी आत्रेय और भेडसंहिता में भैषज्य सम्बन्धी द्वितीय ऋतुविभाग का ही ग्रहण किया गया है। इस प्रकार आयुर्वेदीय पद्धति में चिकित्सा की दृष्टि से हेमन्त एवं शिशिर के अभेद तथा प्रावृट् और वर्षा के भेद को प्रकट करते हुए ऋतु विशेष का ग्रहण करने के लिये ही 'इह तु' इत्यादि पद से आयुर्वेदीय मार्ग के अनुसार स्वदेश के अनुरूप ऋतुविभाग सुश्रुत में दिया गया है। किसी टीकाकार ने 'इह' शब्द का उपर्युक्त अर्थ किया है। परन्तु यह ठीक नहीं है क्योंकि किसी शास्त्र में सार्वदेशिक ऋतुविभाग को एक रूप से कहना संगत नहीं प्रतीत होता। भारत या अन्य किसी भी देश में सब जगह एक समान ऋतु विभाग नहीं हो सकता। प्रत्येक देश में सर्दी तथा गर्मी के भेद ऋतुएँ प्रायः बदलती रहती हैं। सिंहल प्रदेश (लंका-सीलोन) में प्रायः सदा छओं ऋतुएँ समान होती हैं। परन्तु ऐसा सब जगह नहीं हो सकता। कहीं बहुत देर तक अत्यन्त सर्दी पड़ती है, कहीं बहुत देर तक भयंकर गर्मी पड़ती है और कहीं वर्षा की बहुलता होती है। मद्रास आदि दक्षिण के प्रदेशों में मार्गशीर्ष तथा पौष में आम की मंजरियां (बौर) आ जाती हैं और फाल्गुन तथा चैत्र में उसके फल भी पक जाते हैं। ज्यों-ज्यों ऊपर पर्वतीय प्रदेश की ओर चलते जांय त्यों-त्यों आम पकते हैं। इस प्रकार पर्वतीय प्रदेश होने से नेपाल में वैशाख में आम में बौर आता है और अन्त में भाद्रपद तथा आश्विन में इसके फल पकते हैं। इसी प्रकार शाक, पुष्प, फल तथा ओषधि आदि के पकने का समय भी देशभेद से भिन्न-भिन्न होता है। देश के अनुसार सर्दी-गर्मी तथा जलवायु आदि में परिवर्तन हो जाने के कारण जहां जैसी परिस्थिति हो, उसी के अनुसार गुण तथा दोषों को जानकर चिकित्सकों को चिकित्सा कार्य में प्रवृत्त होना चाहिये, इसलिये 'इह तु' पद से आचार्य का उपदेश स्थल प्रतीत होता है। पूर्व प्रचलित ऋतु विभाग का प्रारम्भ में निर्देश करके 'इह तु' के द्वारा उपदेश स्थल में दूसरे ऋतु विभाग में प्रावृट् तथा वर्षा रूप वृष्टि के समय के दुगुने दिये होने से वह स्थान ऐसा होना चाहिये जहां सर्दी दो मास तथा वर्षा चार मास होती है। स्थानभेद से वर्षा का तारतम्य (कमी अथवा अधिकता) देखने में आता ही है। भारत में भी ग्रीष्म के अन्त में बंगाल की खाड़ी अथवा अरब सागर से जल लेकर उठे हुए बादल (मानसून) वायव्य दिशा की ओर बढ़ता हुआ उन-उन प्रदेशों में क्रमशः वर्षा करता जाता है तथा हिमालय या अन्य ऊँचे पहाड़ों की चोटियों से रुककर पश्चिम दिशा में न जा सकने के कारण चिरापूंजी (Cherapunji) आदि स्थानों में बहुत अधिक वर्षा करता है। ज्यों-ज्यों ये प्राकृतिक परिस्थितियां अधिक पैदा होंगी त्यों-त्यों वर्षा के समय की अधिकता बढ़ती जायगी यह वैज्ञानिकों का सिद्धान्त है। सुश्रुत में दिये हुए भैषज्यानुकूल द्वितीय ऋतु विभाग में वर्षा तथा प्रावृट् ऋतु का पृथक्-पृथक् निर्देश किया गया है। काशी में वर्षा समय के द्वैगुण्य का अभाव होने से इस द्वितीय ऋतुविभाग का वहां होना सम्भव न होने से 'इह तु' पद से उसी द्वितीय ऋतुविभाग के ही अनुरूप कोई दूसरा प्रदेश प्रतीत होता है। सुश्रुत की टीका में काश्यप के नाग से निम्न श्लोक मिलते हैं।

भूयो वर्षति पर्जन्यो गङ्गाया दक्षिणे जलम् । तेन प्रावृषवर्षाख्यौ ऋतू तेषां प्रकल्पितौ ।।
गङ्गाया उत्तरे कूले हिमवद्विमसंकुले । भूयः शीतमत्तस्तेषां हेमन्तशिशिरावृतू ।।

इन श्लोकों के द्वारा गङ्गा के उत्तर में हिमालय प्रदेश में हेमन्त शिशिररूप शीतद्वैगुण्य तथा गङ्गा के दक्षिण में प्रावृट् वर्षारूप वृष्टिद्वैगुण्य का बोध होता है। यहां 'गङ्गा' पद से वाराणसीगत गङ्गा का ग्रहण नहीं है क्योंकि वहां गङ्गा के दक्षिण तथा उत्तर में उपर्युक्त भेद प्रतीत नहीं होता है। अपितु गङ्गाद्वार से निकलने वाली गङ्गा का ग्रहण है क्योंकि वहां उत्तर में शीतद्वैगुण्य तथा दक्षिण में वृष्टिद्वैगुण्य का होना सम्भव है। उपर्युक्त सिद्धान्त से 'इह तु' इस पद से वृद्धि समय द्वैगुण्य वाले गङ्गा के दक्षिण भाग में स्थित किसी प्रदेश का ग्रहण होना चाहिये।