काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 235, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २२१
बौद्धग्रन्थों में सुभूति के अध्यात्म विषय का उल्लेख किया गया है। वैद्यक के आचार्यरूप में वहां उसका उल्लेख न मिलने से सुश्रुतसंहिता में आया हुआ सुभूतिगौतम बौद्ध न होकर अन्य ही प्राचीन वैद्याचार्य प्रतीत होता है। सुभूतिगौतम को यदि बौद्ध आचार्य माना जाय तो उसे भी पूर्व आचार्यों में गिनने वाले सुश्रुत के लेख में बौद्ध छाया अवश्य मिलनी चाहिये। बौद्ध छाया के न मिलने से सुभूतिगौतम बौद्ध नहीं हो सकता। स्थविर सुभूति का व्याकरण मिलने से केवल नाम की समानता होने से वह सुभूति भी प्राचीन तथा बुद्ध का प्रधान शिष्य प्रतीत होता है।
वैद्यक टीकाकारों द्वारा कहीं-कहीं उद्धृत वृद्ध सुश्रुत के वचनों के दिखाई देने से तथा उन उद्धृत वचन के वर्तमान सुश्रुतसंहिता में न मिलने से तथा 'औषधेनवमौरभ्रम्' इत्यादि सुश्रुतोक्त पद्य में भी सौश्रुत का पृथक् निर्देश होने से कुछ लोग कहते हैं कि वर्तमान सुश्रुतसंहिता से भिन्न वृद्धसुश्रुत का सौश्रुत तन्त्र पूर्वकाल में विद्यमान था। परन्तु सुश्रुतसंहिता में वृद्धसुश्रुत का पूर्वाचार्यों में निर्देश न होने से, महाभारत के आदि में भी विश्वामित्र के पुत्र के रूप में केवल सुश्रुत का ही उल्लेख होने से, महाभाष्यकार, नावनीतक, नागार्जुन, वाग्भट तथा ज्वरसमुच्चय आदि में सुश्रुत नाम का ही निर्देश होन से, अरब आदि दूर देशों में भी इस सुश्रुत की संहिता का ही अनुवाद एवं प्रचार होने से, कम्बोडिया स्थित यशोवर्मा के शिलालेख में भी सुश्रुत का ही उल्लेख होने से, वृद्धसुश्रुत नाम से मिलने वाले वचनों में प्राचीन रचना एवं प्रौढता न दिखलाई देने से, उसके वचनों के अनुसार वृद्ध सुश्रुत का शल्याचार्य सिद्ध न होने टीकाकारों एवं अर्वाचीन लेखकों द्वारा कहीं-कहीं उद्धृत वृद्ध सुश्रुत से कौन है, कब हुआ है, इसका कौन सा ग्रन्थ है, किस प्रस्थान (विभाग) का यह आचार्य है—इत्यादि सब विषयों के अज्ञान होने से पूर्वोद्दिष्ट दिवोदास के शिष्य, प्रसिद्ध एवं विश्रुत सुश्रुत को छोड़ कर अज्ञात वृद्ध सुश्रुत को शल्यतन्त्र का पूर्वाचार्य सिद्ध करने के लिये अत्यन्त दृढ़ प्रमाणों की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त—
औषधेनवमौरभ्रं सौश्रुतं पौष्कलावतम् । शेषाणां शल्यतन्त्राणां मूलान्येतानि निर्दिशेत् ।।
उपर्युक्त श्लोक सुश्रुतसंहिता के उपक्रम में काशीराज दिवोदास के पास शिष्यरूप से आये हुए औषधेनव, औरभ्र, पौष्कलावत, करवीर्य, गोपुर रक्षित, सुश्रुत आदि का निर्देश करके कहा गया है। इनमें औषधेनव, औरभ्र, पुष्कलावत तथा सुश्रुत द्वारा बनाये हुए तन्त्रों का निर्देश करने के लिये तदीयार्थक प्रत्ययान्त सौश्रुत आदि पद दिये गये हैं। सब तन्त्रों में इसकी प्रधानता दिखाने के लिये ही अपने ही ग्रन्थों में पुनः सौश्रुत शब्द दिया गया है। यदि इस सौश्रुत शब्द को देखकर अन्य सुश्रुत की कल्पना की जाय तो उस न्याय से औषधेनव आदि आचार्यों के तन्त्र भी पृथक् रूप में मिलने चाहिये। अपने ग्रन्थ में अपना ही नाम उल्लेख करने की प्रथा कौटिलिय अर्थशास्त्र आदि प्राचीन ग्रन्थों में भी मिलती है। इसलिये औषधेनव आदि तन्त्रों के समान अपने तन्त्र (सुश्रुतसंहिता) की प्रधानता दिखलाने के लिये अपने नाम का निर्देश करना अनुचित नहीं है। उपलब्ध सुश्रुतसंहिता में कहीं-कहीं जो अर्वाचीन विषयों की प्रतीति होती है वह संस्कार के कारण या पाठभेद के दोष से संभव है जिसका विवरण पीछे संस्करण के प्रकरण में दिया जायगा।
वैदिक अवस्था में आर्यों के निवास स्थान की परिस्थितियों के अनुसार विभक्त वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त तथा शिशिर इन ६ ऋतुओं का वैदिक साहित्य १ में उल्लेख मिलता है। इनमें वसन्त या अन्य किसी एक ऋतु से प्रारम्भ करके समाप्त किये हुए ऋतु पर्यावर्त (ऋतुओं के चक्कर) को संवत्सर कहते हैं। प्राचीन परिस्थितियों में निर्मित यह ऋतु विभाग बाद में ‘वसन्तादिभ्यश्छक्' (४-२-६३) सूत्र द्वारा पाणिनि द्वारा भी ग्रहण किया गया है। तथा आजकल भी लोक में प्रचलित है। सुश्रुतसंहिता के ऋतुचर्याध्याय में पहले उत्तरायण आदि को प्रारम्भ करके प्रचलित प्रक्रिया के अनुरूप शिशिर से प्रारम्भ करके हेमन्त तक ६ ऋतुओं का निर्देश करके पुनः अगले ही वाक्य में सर्दी, गर्मी तथा वर्षा के भेद से तीनों दोषों के उपचय (संचय), प्रकोप एवं संशमन की अवस्था के अनुसार अमुक समय में उपचित एवं प्रकुपित
१. १ की टि. उपो. संस्कृत पृ. ५२ देखें।