काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 236, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें२२२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
दोष को अमुकक समय में शान्त करना चाहिये इत्यादि भैषज्य प्रक्रिया के उपयोगी ऋतु को बतलाने के लिये 'इह तु' इत्यादि द्वारा दक्षिणायन वाले विभाग को दिया है। इसमें वर्षा, शरद्, हेमन्त, वसन्त, ग्रीष्म तथा प्रावृट् ऋतुओं का उल्लेख होने से प्रथम प्रक्रिया (ऋतुविभाग) में चार मास सर्दी के तथा दो मास वर्षा के आते हैं। और द्वितीय प्रक्रिया में दो मास सर्दी के और चार मास वर्षा के होते हैं। दूसरी प्रक्रिया चिकित्साविज्ञान के उपयोग के लिये प्रतीत होती है। काश्यपसंहिता में ऋतु सम्बन्धी अध्याय के खण्डित होने पर भी आत्रेय और भेडसंहिता में भैषज्य सम्बन्धी द्वितीय ऋतुविभाग का ही ग्रहण किया गया है। इस प्रकार आयुर्वेदीय पद्धति में चिकित्सा की दृष्टि से हेमन्त एवं शिशिर के अभेद तथा प्रावृट् और वर्षा के भेद को प्रकट करते हुए ऋतु विशेष का ग्रहण करने के लिये ही 'इह तु' इत्यादि पद से आयुर्वेदीय मार्ग के अनुसार स्वदेश के अनुरूप ऋतुविभाग सुश्रुत में दिया गया है। किसी टीकाकार ने 'इह' शब्द का उपर्युक्त अर्थ किया है। परन्तु यह ठीक नहीं है क्योंकि किसी शास्त्र में सार्वदेशिक ऋतुविभाग को एक रूप से कहना संगत नहीं प्रतीत होता। भारत या अन्य किसी भी देश में सब जगह एक समान ऋतु विभाग नहीं हो सकता। प्रत्येक देश में सर्दी तथा गर्मी के भेद ऋतुएँ प्रायः बदलती रहती हैं। सिंहल प्रदेश (लंका-सीलोन) में प्रायः सदा छओं ऋतुएँ समान होती हैं। परन्तु ऐसा सब जगह नहीं हो सकता। कहीं बहुत देर तक अत्यन्त सर्दी पड़ती है, कहीं बहुत देर तक भयंकर गर्मी पड़ती है और कहीं वर्षा की बहुलता होती है। मद्रास आदि दक्षिण के प्रदेशों में मार्गशीर्ष तथा पौष में आम की मंजरियां (बौर) आ जाती हैं और फाल्गुन तथा चैत्र में उसके फल भी पक जाते हैं। ज्यों-ज्यों ऊपर पर्वतीय प्रदेश की ओर चलते जांय त्यों-त्यों आम पकते हैं। इस प्रकार पर्वतीय प्रदेश होने से नेपाल में वैशाख में आम में बौर आता है और अन्त में भाद्रपद तथा आश्विन में इसके फल पकते हैं। इसी प्रकार शाक, पुष्प, फल तथा ओषधि आदि के पकने का समय भी देशभेद से भिन्न-भिन्न होता है। देश के अनुसार सर्दी-गर्मी तथा जलवायु आदि में परिवर्तन हो जाने के कारण जहां जैसी परिस्थिति हो, उसी के अनुसार गुण तथा दोषों को जानकर चिकित्सकों को चिकित्सा कार्य में प्रवृत्त होना चाहिये, इसलिये 'इह तु' पद से आचार्य का उपदेश स्थल प्रतीत होता है। पूर्व प्रचलित ऋतु विभाग का प्रारम्भ में निर्देश करके 'इह तु' के द्वारा उपदेश स्थल में दूसरे ऋतु विभाग में प्रावृट् तथा वर्षा रूप वृष्टि के समय के दुगुने दिये होने से वह स्थान ऐसा होना चाहिये जहां सर्दी दो मास तथा वर्षा चार मास होती है। स्थानभेद से वर्षा का तारतम्य (कमी अथवा अधिकता) देखने में आता ही है। भारत में भी ग्रीष्म के अन्त में बंगाल की खाड़ी अथवा अरब सागर से जल लेकर उठे हुए बादल (मानसून) वायव्य दिशा की ओर बढ़ता हुआ उन-उन प्रदेशों में क्रमशः वर्षा करता जाता है तथा हिमालय या अन्य ऊँचे पहाड़ों की चोटियों से रुककर पश्चिम दिशा में न जा सकने के कारण चिरापूंजी (Cherapunji) आदि स्थानों में बहुत अधिक वर्षा करता है। ज्यों-ज्यों ये प्राकृतिक परिस्थितियां अधिक पैदा होंगी त्यों-त्यों वर्षा के समय की अधिकता बढ़ती जायगी यह वैज्ञानिकों का सिद्धान्त है। सुश्रुत में दिये हुए भैषज्यानुकूल द्वितीय ऋतु विभाग में वर्षा तथा प्रावृट् ऋतु का पृथक्-पृथक् निर्देश किया गया है। काशी में वर्षा समय के द्वैगुण्य का अभाव होने से इस द्वितीय ऋतुविभाग का वहां होना सम्भव न होने से 'इह तु' पद से उसी द्वितीय ऋतुविभाग के ही अनुरूप कोई दूसरा प्रदेश प्रतीत होता है। सुश्रुत की टीका में काश्यप के नाग से निम्न श्लोक मिलते हैं।
भूयो वर्षति पर्जन्यो गङ्गाया दक्षिणे जलम् । तेन प्रावृषवर्षाख्यौ ऋतू तेषां प्रकल्पितौ ।।
गङ्गाया उत्तरे कूले हिमवद्विमसंकुले । भूयः शीतमत्तस्तेषां हेमन्तशिशिरावृतू ।।
इन श्लोकों के द्वारा गङ्गा के उत्तर में हिमालय प्रदेश में हेमन्त शिशिररूप शीतद्वैगुण्य तथा गङ्गा के दक्षिण में प्रावृट् वर्षारूप वृष्टिद्वैगुण्य का बोध होता है। यहां 'गङ्गा' पद से वाराणसीगत गङ्गा का ग्रहण नहीं है क्योंकि वहां गङ्गा के दक्षिण तथा उत्तर में उपर्युक्त भेद प्रतीत नहीं होता है। अपितु गङ्गाद्वार से निकलने वाली गङ्गा का ग्रहण है क्योंकि वहां उत्तर में शीतद्वैगुण्य तथा दक्षिण में वृष्टिद्वैगुण्य का होना सम्भव है। उपर्युक्त सिद्धान्त से 'इह तु' इस पद से वृद्धि समय द्वैगुण्य वाले गङ्गा के दक्षिण भाग में स्थित किसी प्रदेश का ग्रहण होना चाहिये।