काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २२३
यद्यपि भावप्रकाश¹ में विश्वामित्र द्वारा अपने पुत्र सुश्रुत को अन्य सौ मुनि पुत्रों के साथ दिवोदास से वैद्यक विद्या के अध्ययन के लिये काशी भेजने का निर्देश होने तथा सुश्रुतसंहिता में भी आश्रम में विद्यमान काशीराज दिवोदास के पास जाकर सुश्रुत आदियों के अध्ययन का उल्लेख होने से काशी स्थित किसी आश्रम में सुश्रुत आदियों को उपदेश दिया गया प्रतीत होता है। परन्तु 'इह तु' द्वारा निर्दिष्ट उपर्युक्त वृष्टिद्वैगुण्य समय के काशी में संभव न होने से तथा महाभारत में आई हुई दिवोदास की कथा में हैहयों द्वारा आक्रान्त दिवोदास का राज्य छिन जाने पर भरद्वाज के आश्रम में जाने का उल्लेख मिलने से संभवतः राज्य छिन जाने पर मुनि के आश्रम में अथवा प्राचीन राजाओं के अन्तिम अवस्था में वानप्रस्थ की प्रथा के मिलने से वानप्रस्थी होकर आश्रम में जाकर वृष्टिसमय की अधिकता वाले गङ्गाद्वार के दक्षिणस्थ किसी प्रदेश में दिवोदास द्वारा सुश्रुत को उपदेश दिया जाना प्रतीत होता है। इस प्रकार 'इह तु' पद से आश्रमस्थ का अभिप्राय प्रतीत होता है। आश्रम आकर उपदेश करने पर भी दिवोदास को पूर्वाधिपत्य की दृष्टि से सुश्रुत में काशिराजरूप से निर्देश किया गया प्रतीत होता है। महाभाष्यकार द्वारा शाकपार्थिवादि (२-३-७०) गण के उदाहरण में 'कुतपवासाः सौश्रुतः कुतपसौश्रुतः' के निर्देश द्वारा सौश्रुत के कम्बलरूप कुतप (छाग कम्बल—A sort of blanket-made of the hair of mountainian goat Poa Cynosuroides) की प्रधानता का उल्लेख होने से सुश्रुत की सन्तति या शिष्यों का भी हिमालय के समीप किसी देश में रहने की कल्पना होती है। प्रचण्ड गरमी से सिर को तपाने वाली वाराणसी में रहने पर कुतप प्राधान्य (कुतपरूप कम्बल ओढ़ना) युक्तियुक्त प्रतीत नहीं होता।
यहां उपर्युक्त दो ऋतुविभागों का उल्लेख देखकर श्रीयुत एकेन्द्रनाथ घोष¹ का मत है कि गणित के हिसाब से संहिता के निर्माण तथा संस्करण में १५०० (डेढ़ हजार) वर्ष का अन्तर प्रतीत होता है। तथा पूर्वोक्त वर्णन के अनुसार धन्वन्तरि, दिवोदास तथा सुश्रुत में इतने समय का व्यवधान नहीं हो सकता। सुश्रुत के अनुयायी या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा बाद में किये हुए संस्करण में यह संभव है। परन्तु सुश्रुतसंहिता के संस्करण युक्त इस उत्तरतन्त्र का ही सातवीं-आठवीं शताब्दी में अरब आदि देशों में अनुवाद मिलने से तथा कम्बोडिया में मिले हुए यशोवर्मा के शिलालेख में भी इसका उल्लेख मिलने से इतने दूर देशों में इसका प्रचार होने के लिये विशेष काल की अपेक्षा होने से तथा वाग्भट, ज्वरसमुच्चय आदि में भी उत्तरतन्त्र के मिलने से नागार्जुन द्वारा इसके संस्कार का उल्लेख होने पर भी इस वर्तमान रूप में उपस्थित संस्कारयुक्त संहिता का समय अन्ततोगत्वा १७-१८ सौ वर्ष पूर्व का निश्चित होने से इसमें उपर्वनिर्दिष्ट १५०० (डेढ़ हजार) वर्ष मिलाने से मूलसंहिता का काल ३२०० वर्ष पूर्व निश्चित होता है।
धन्वन्तरि दिवोदास, वार्योविद² तथा वामक³ काशीपति रूप से निर्देश होने से प्रतीत होता है कि बहुत से वैद्याचार्य राजर्षियों द्वारा प्राचीन काल में काशी में वैद्यकविद्या की प्रतिष्ठा की गई थी। बुद्धकालीन काशी के युवराज ब्रह्मदत्त का आयुर्वेद विद्या के अध्ययन के लिये तक्षशिला जाने के जातक ग्रन्थों में किये गये उल्लेख से पूर्वपरम्परागत आयुर्वेद विद्या की रक्षा के लिये काशी के राजकुल में अनुराग प्रकट होता है। सुश्रुतसंहिता में औपधेनव, औरभ्रसौश्रुत तथा पौष्कलावत आदि चारों का समान रूप से निर्देश होने से तथा इनमें से किसके तन्त्र का उस समय विशेष प्रचलन था इसका निर्देश न मिलने पर भी नागार्जुन तथा टीकाकारों द्वारा सुश्रुत तथा सौश्रुत का विशेष ग्रहण किया होने से तथा औपधेनव आदि के नाम का भी निर्देश न होने से यह कल्पना की जा सकती है कि सुश्रुत का सम्प्रदाय पश्चिम दिशा में तथा विशेषरूप से पूर्व के देशों में प्रचलित था। यह तो निश्चय से नहीं कहा जा सकता कि पश्चिम देशों में काय चिकित्सा तथा काशी आदि पूर्व के देशों में सुश्रुत की शल्यचिकित्सा ही प्रचलित थी। काशी के धन्वन्तरि सम्प्रदाय में भी आठों प्रस्थानों
१. १-३ की टि. उपो. संस्कृत पृ. ५३ देखें।