भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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१२४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

(विभागों) का उल्लेख मिलता है। 'विविधानि शास्त्राणि भिषजां प्रचरन्ति लोके' द्वारा स्वयं आत्रेय ने भी सब स्थानों में अनेक चिकित्सा-विज्ञानों के प्रचार का उल्लेख किया है। चरकसंहिता के अनुसार पाञ्चाल तथा काम्पिल्य आदि देशों में, भेड के लेखानुसार गान्धार में तथा काश्यप के अनुसार गङ्गाद्वार पर स्थित कनखल आदि में आयुर्वेद विद्या के उपदेश का उल्लेख मिलने से उन-उन स्थानों पर भी इस विद्या को प्रतिष्ठा प्रतीत होती है। इस प्रकार न केवल गान्धार अपितु बाह्लीक भिषग् काङ्कायन के उल्लेख से, बाह्लीक से लेकर काशी पर्यन्त पश्चिमोत्तर देशों में आयुर्वेद के प्रचार तथा उन्नति का अनुमान होता है। परन्तु जातक ग्रन्थों में काशी के युवराज ब्रह्मदत्त द्वारा तक्षशिला जाकर आयुर्वेद के अध्ययन के उल्लेख से, महावग्ग के अनुसार मगधनिवासी बुद्ध-समकालीन जीवक द्वारा समीपस्थ काशी की उपेक्षा करके तक्षशिला जाकर भैषज्य विद्या में विशेष कुशलता प्राप्त करके लौटने पर विद्या प्राप्त करके काशिराज पद पर प्रतिष्ठित ब्रह्मदत्त के समय किसी सेठ के पुत्र के पेट का ऑपरेशन द्वारा काशी में शस्त्रचिकित्सा की प्रतिष्ठा तथा अन्य भी बहुत से रोगियों को शस्त्रचिकित्सा तथा कायचिकित्सा द्वारा नीरोग करने के कारण उत्पन्न हुई जीवक की ख्याति के उल्लेख मिलने से तथा देशदेशान्तर से विद्या प्राप्ति के लिये जिज्ञासुओं के तक्षशिला आने का जातक ग्रन्थों में निर्देश मिलने से कालक्रम से बुद्ध के समय अन्य विद्याओं की तरह भैषज्य विद्या (विशेष रूप से शल्यविज्ञान) की भी काशी की अपेक्षा तक्षशिला में अधिक प्रतिष्ठा एवं उन्नति प्रतीत होती है। बाद में काशी में समय-समय पर राज्यों के उलटफेर के इतिहास मिलने से भी क्रमशः काशी में आयुर्वेद विद्या के ह्रास तथा आचार्य विशेषों द्वारा चर्चा बाहुल्य के कारण तक्षशिला में उन्नति की सम्भावना हो सकती है। अन्ततोगत्वा अशोक के समय अपने देश के समान विदेशों में भी चिकित्सालयों के उद्घाटन द्वारा यह आयुर्वेद विद्या दूर-दूर तक फैल गई। परन्तु बाद में कालक्रम से तक्षशिला के समान उस विद्यापीठ में भी विद्या का ह्रास हो गया। इसका कारण भी इतिहास में मिलने वाले राजविप्लव ही होने चाहिये। इसी प्रकार बुद्ध के समय तक्षशिला की अपेक्षा काशी में विद्या का ह्रास हो गया होगा।

आत्रेय

'इन्द्रः ऋषिभ्यश्चतुर्भ्यः कश्यपवसिष्ठात्रिभृगुभ्यस्ते पुत्रेभ्यः शिष्येभ्यश्च प्रददुर्हितार्थम्' द्वारा काश्यपसंहिता में पूर्व सम्प्रदाय के उल्लेख के मिलने से आयुर्वेद में अत्रि का भी एक सम्प्रदाय प्रतीत होता है। यहां आत्रेय गोत्रवाले भिक्षुरात्रेय, कृष्णात्रेय तथा पुनर्वसु आत्रेय नामक आचार्य मिलते हैं। अन्य भी अनेक अत्रि परम्परा वाले आचार्य हो सकते हैं। जिस प्रकार कौमार-भृत्य संहिता में कश्यप परम्परा में मारीच विशेषण युक्त कश्यप मूल आचार्य है उसी प्रकार आत्रेय परम्परा में पुनर्वसु विशेषण वाला आत्रेय-अग्निवेश आदि का उपदेशक तथा चरक संहिता में मूल उपदेशक आचार्य है। उसी पुनर्वसु आत्रेय को माता के नाम के अनुसार चरक में—'यथाप्रश्नं भगवता व्याहृतं चान्द्रभागिना' (सू.अ. १३) तथा भेडसंहिता में 'सुश्रोता नाम मेधावी चान्द्रभाग मुवाच ह' (पृ. ३९) द्वारा चान्द्रभाग तथा चान्द्रभागी नाम से कहा गया है। चरक में—'त्रित्वेनाष्टौ समुद्दिष्टाः कृष्णात्रेयेण धीमता' (सू. अ. ११) तथा भेडसहिता में 'कृष्णात्रेयं पुरस्कृत्य कथाश्चक्रुर्महर्षयः' इत्यादि पदों के आधार पर कुछ लोग यह भी कहते हैं कि पुनर्वसु आत्रेय को ही कृष्णात्रेय नाम से व्यवहृत किया गया है। इसके विपरीत कृष्णात्रेय नाम से दिये हुए शालाक्य विषयक उद्धरणों को देखकर श्रीकण्ठदत्त तथा शिवदास आदि कहते हैं कि कृष्णात्रेय आत्रेय पुनर्वसु से भिन्न ही व्यक्ति है। चरकसंहिता में आदि से अन्त तक आत्रेय अथवा पुनर्वसु आत्रेय नाम से व्यवहार होने से, भेडसंहिता में भी पुनर्वसु आत्रेय का ही निर्देश होने से, आत्रेय परम्परा वाले कृष्णात्रेय नामक किसी अन्य आचार्य के मत का भी चरक तथा भेडसंहिता में दिया होना संभव होने से तथा कृष्णात्रेय और पुनर्वसु आत्रेय का कहीं भी एकत्र प्रयोग न मिलने से कृष्णात्रेय तथा पुनर्वसु आत्रेय भिन्न-भिन्न आचार्य प्रतीत होते हैं।