भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 234, कुल 942 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 234

२२० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

के पारखी नल की कथा में भी इसका उल्लेख है। वहां आये हुए शालिहोत्र का अश्वों के विशेषज्ञ रूप में वर्णन होने से तथा अन्य प्रकरण को देखकर वह यही आचार्य प्रतीत होत है। उपलब्ध शालिहोत्र संहिता चाहे शालिहोत्र की हस्तलिखित हो, चाहे प्रतिसंस्कृत हो और चाहे उसी के सम्प्रदाय वाले किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उपदिष्ट हो परन्तु अश्वशास्त्र का परम आचार्य शालिहोत्र अत्यन्त प्राचीन व्यक्ति है इसमें किसी को सन्देह नहीं है। इस प्राचीन ऋषि का युधिष्ठिर के भाई नकुल द्वारा अपने ग्रन्थ के मङ्गलाचरण में आचार्यरूप में सम्मानपूर्वक ग्रहण किया जाना भी उचित है, इससे पूर्वापर ग्रन्थ की संगति भी ठीक बैठती है। प्राचीन काल से प्रसिद्ध इस ऋषि को छोड़कर तुरङ्गघोष से अश्वघोष की कल्पना करके शालिहोत्र तथा सुश्रुत को क्रमशः उसके पुत्र तथा पौत्र मानने से तो सारा इतिहास की गड़बड़ हो जाता है। अश्वशास्त्र का प्रथम आचार्य (प्रवर्तक) यदि कनिष्क सामयिक अश्वघोष का पुत्र हो तो कनिष्क के बाद ही इसके शास्त्र का निर्माण होना चाहिये, उस अवस्था में कौटिलीय¹ अर्थशास्त्र में आये हुये अश्वशालानिर्माण, आहार-कल्पना, उनकी जातियां तथा चिकित्सकों के नाम इत्यादि संक्षेप में मिलने वाले विषय उसमें कहां से आ गये। अशोक द्वारा भारतीय चिकित्सा के आधार पर अपने देश की तरह विदेशों में भी अश्व आदि पशुओं के चिकित्सालयों का उद्घाटन किया जाना किसके आधार पर माना जाय। यह स्पष्ट है कि अश्वघोष बुद्ध सम्प्रदाय का प्रधान आचार्य है। परन्तु शालिहोत्र के ग्रन्थ में अश्वाभिषेक प्रकरण में केवल श्रौत ऋषियों के नाम, ब्रह्मघोष, श्रौतयज्ञविधान तथा घोड़ों को देवताओं के रूप में निर्देश करते हुए भी श्रौत एवं स्मार्त देवताओं का ही उल्लेख मिलने से शालिहोत्राचार्य वेदमार्गानुयायी प्रतीत होता है। शालिहोत्र ग्रन्थ तथा सुश्रुतसंहिता में बौद्ध छाया के न मिलने से भी ये दोनों बौद्धाचार्य अश्वघोष की सन्तति प्रतीत नहीं होती है। अश्वघोष का साकेतवर्ती तथा शालिहोत्र पश्चिमोत्तरदेशवर्ती होना भी इसी बात को प्रकट करता है। अश्वघोष के पुत्र रूप में कल्पित शालिहोत्र के पुत्र सुश्रुत के साथ यदि शल्याचार्य सुश्रुत का अभेद माना जाय तो कनिष्क तथा अश्वघोष के समकालीन नागार्जुन ने उसके पौत्र रूप में माने गये सुश्रुत की सुप्रसिद्ध भिषगाचार्य रूप में कैसे प्रशंसा की है तथा इस अवस्था में नागार्जुन द्वारा सुश्रुतसंहिता का प्रतिसंस्कार किये जाने विषयक निर्देश का भी क्या अर्थ है ? दोनों सुश्रुत का अभेद तथा कनिष्क सामयिक होने पर पाणिनि, वार्त्तिककार (कात्यायन) तथा भाष्यकार आदि द्वारा सुश्रुत शब्द का ग्रहण कैसे संभव हो सकता है, इसलिये यह सब निरर्थक है।

अन्त में युक्तिपूर्वक विक्रम संवत् के पूर्व ६ ठी शताब्दी में सुश्रुत के समय को सिद्ध करने वाले हार्नले (A. F. Rudolp Hoernel) नामक पाश्चात्य² विद्वान् के लेख के अनुसार भी वह प्राचीन सिद्ध होता है। कुछ³ विद्वान् कहते हैं कि पूर्णरूप से निश्चय न होने पर भी सुश्रुत का समय ईश्वी संवत् से ६०० वर्ष पूर्व है। कुछ अन्य⁴ विद्वान् कहते हैं कि सुश्रुत में सात प्रकार के कुष्ठ का वर्णन मिलता है। इस रोग का भारत तथा चीन देश के निवासियों ने २५०० वर्ष पूर्व ज्ञान प्राप्त किया था। इस प्रकार सुश्रुत लगभग ढाई हजार (२५००) वर्ष प्राचीन प्रतीत होता है। सुश्रुतसंहिता का लैटिन भाषा में अनुवाद करने वाले ह्यासलेर⁵ (Hessler) नामक पाश्चात्त्य विद्वान् तथा श्रीयुत गिरीन्द्रनाथ⁶ मुखोपाध्याय आदि ने भी ईश्वी सन् से लगभग एक सहस्त्र वर्ष पूर्व (ई. पू. १०००) सुश्रुत का समय निश्चित किया है।

इस प्रकार भिन्न-भिन्न विद्वानों के दृष्टिकोण से विचार करने पर सुश्रुतसंहिता के पूर्व भाग का समय कम से कम भी आज से २६०० वर्ष पूर्व प्रतीत होता है।

कुछ लोग सुश्रुतसंहिता में पूर्व आचार्यों की श्रेणी में निर्दिष्ट सुभूति गौतम को शाक्यसिंह का शिष्य मानकर सुश्रुत को बुद्ध के बाद का स्वीकार करते हैं। अष्टसाहस्रिका तथा शतसाहस्रिका आदि बौद्ध ग्रन्थों में यद्यपि सुभूति नाम अवश्य मिलता है परन्तु वहां आयुष्मत् सुभूति, स्थविर सुभूति आदि शब्द ही दिये गये हैं, सुभूतिगौतम का उल्लेख नहीं है।


१. १ से ६ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ५० देखें।