काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 233, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २१९
पृथक्-पृथक् निर्देश होने से तथा सुश्रुत का अनेक बार पुत्र रूप से स्पष्ट उल्लेख होने से शालिहोत्र द्वारा अश्वशास्त्र के विषय में उपदिष्ट सुश्रुत शालिहोत्र का पुत्र ही प्रतीत होता है। इसके विपरीत सुश्रुतसंहिता में शल्यचिकित्सक सुश्रुत का विश्वामित्र के पुत्र रूप में निर्देश किया गया है। महाभारत आदि में भी ऐसा ही मिलता है। पूर्व निर्दिष्ट शालिहोत्रोक्त अश्वाभिषेक मन्त्रों में आयुर्वेद के आचार्यों का निर्देश करते हुए (पृ. १२) आत्रेय तथा उसके शिष्य अग्निवेश, हारीत, क्षारपाणि, जातूकर्ण्य, पराशर तथा अन्य आचार्यों का उल्लेख होने पर भी धन्वन्तरि तथा दिवोदास का उल्लेख नहीं मिलता, यदि शालिहोत्र तथा धन्वन्तरि द्वारा उपदिष्ट सुश्रुत एक ही हो तो अश्ववैद्यक के आचार्य शालिहोत्र या उसके शिष्य सुश्रुत ने आयुर्वेद के अन्य आचार्यों के साथ तत्कालीन एवं अत्यन्त प्रसिद्ध धन्वन्तरि तथा दिवोदास का उल्लेख क्यों नहीं किया। तथा सुश्रुतसंहिता के कर्ता सुश्रुत को भी अश्वशास्त्र के आचार्य होने पर भी एक प्रस्थान रूप में इतने प्रसिद्ध अपने पिता या आचार्य शालिहोत्र का कहीं प्रसङ्गवश तो निर्देश करना चाहिये था। अन्य आचार्यों के वैद्यक विषयों से भरे हुए तथा पीछे से मिलाये गये उत्तरतन्त्र में सुश्रुत, सौश्रुत या प्रतिसंस्कर्ता ने इसका नाम क्यों नहीं दिया। इस प्रकार शालिहोत्र का शिष्य एवं पुत्र सुश्रुत तथा धन्वन्तरि द्वारा उपदिष्ट विश्वामित्र का पुत्र सुश्रुत दोनों भिन्न-भिन्न व्यक्ति प्रतीत होते हैं।
शालिहोत्रेण गर्गेण सुश्रुतेन च भाषितम् । तत्त्वं यद्वाजिशास्त्रस्य तत्सर्वमिह संस्थितम् ।।
दुर्लभ गण कृत सिद्धोपदेशसंग्रह नामक अश्ववैद्यक ग्रन्थ के उपर्युक्त श्लोक में सुश्रुत का अश्ववैद्यक के उपदेष्टा के रूप में उल्लेख किया गया है। परन्तु अग्नि पुराण के अनुसार धन्वन्तरि के शिष्य सुश्रुत का भी अश्ववैद्यक का ज्ञाता होना प्रकट होता है। इस प्रकार यह नहीं कहा जा सकता कि इस श्लोक में अश्वशास्त्र के उपदेशक के रूप में दिया हुआ सुश्रुत शालिहोत्र का शिष्य है या धन्वन्तरि का। यदि शालिहोत्र तथा गर्ग के साहचर्य से इस दुर्लभ गणोक्त सुश्रुत को शालिहोत्र का शिष्य मान भी लें तो उसी के वचन के अनुसार इसका अश्वशास्त्र संबन्धी कोई ग्रन्थ होना चाहिये। परन्तु इस शालिहोत्र के पुत्र सुश्रुत का आजकल एतद्विषयक कोई ग्रन्थ नहीं मिलता है। उसके ग्रन्थ का उल्लेख वचनों का उद्धरण तथा नाम मात्र भी इस गणकृत ग्रन्थ के अतिरिक्त अन्य किसी भी आयुर्वेद के ग्रन्थ में नहीं मिलता है। इस लिये इस सुश्रुत के विषय में अब कुछ भी कहना कठिन है। ग्रन्थों के मिलने से, अन्य ग्रन्थों में निर्देश होने से, अन्य आचार्यों द्वारा ग्रहण किया जाने से तथा शिलालेख आदि के उल्लेख कसे धान्वन्तर सुश्रुत की जिस प्रकार प्रसिद्धि है वैसी शालिहोत्र के पुत्र सुश्रुत की प्रसिद्धि नहीं है। इस लिये जहां भी सुश्रुत के नाम का निर्देश मिलता है वहां साधक एवं बाधक प्रमाणों के अभाव में शल्यचिकित्सक एवं धान्वन्तर सुश्रुत की ही प्रतीति होती है।
कुछ लोग दोनों सुश्रुत को एकता स्वीकार कर तथा शालिहोत्र के लेख से सुश्रुत को शालिहोत्र का पुत्र मानकर नकुलकृत अश्वचिकित्सा के ‘पायाद्वः स तुरङ्गघोषतनयः श्रीशालिहोत्रो मुनिः’ इस प्रारम्भिक वाक्य में आये हुए तुरङ्गघोष शब्द से अश्वघोष का ग्रहण करके शालिहोत्र को उसका पुत्र मानते हैं। तथा पूर्व निर्देशानुसार शालिहोत्र का पुत्र सुश्रुत होने से शालिहोत्र तथा सुश्रुत को कनिष्क के समकालीन अश्वघोष से भी अर्वाचीन मानते हैं। परन्तु नेपाल से प्राप्त अश्वचिकित्सा की दो पुस्तकों में मङ्गलाचरण वाले उपर्युक्त पद्य के ही न दिये होने से मूल में ही यह मत खण्डित हो जाता है। परन्तु यदि उस पद्य को मान भी लिया जाय तो भी शालिहोत्र के ग्रन्थ तथा अन्य अश्वचिकित्सा के ग्रन्थों के प्रारम्भ में ब्रह्मा तथा इन्द्र के साथ आया हुआ तथा मूलसंहिता के कर्ता के रूप में निर्दिष्ट शालिहोत्र प्राचीन ही प्रतीत होता है। शालिहोत्र के ग्रन्थ में इक्ष्वाकु तथा सगर द्वारा शालिहोत्र से प्रश्न करने का निर्देश होना भी शालिहोत्र को प्राचीन सिद्ध करता है। शालिहोत्र का केवल पंचतन्त्र के प्रारम्भ में ही उल्लेख नहीं है अपितु महाभारत के वनपर्व १ में अश्वों
१. १ का टि. उपो. संस्कृत पृ. ५० देखें।