काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
तृतीयेऽहनि निर्वृत्तिं जनयेत् स तृतीयकः ।
| ३४६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | विषमज्वरनिर्दशीयाध्याय ? ] |
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तृतीयेऽहनि निर्वृत्तिं जनयेत् स तृतीयकः ।
तृतीयक ज्वर—तृतीयक ज्वर का स्थान कण्ठ होता है। प्रथम अहोरात्र (२४ घण्टे) में दोष कण्ठ से च्युत होकर उर (छाती) में पहुंचता है तथा दूसरे अहोरात्र में वह यथाक्रम रसधातु (आमाशय स्थित) में पहुंचकर ऊष्मा (उष्णता) के साथ मूर्च्छित हुआ तीसरे दिन पुनः प्रकट होता है। उसे तृतीयक ज्वर कहते हैं। अर्थात् दोष अपने स्थान कण्ठ से क्रमशः प्रथम दिन छाती में पहुंचता है तथा वहां से अगले दिन आमाशय में पहुंचता है आमाशय में पहुंचकर पूर्वोक्तानुसार दोष रसवाहिनियों के मार्गों को बन्द कर देता है तब ज्वर की उत्पत्ति होती है। इसलिये तृतीयक ज्वर एक दिन छोड़कर अर्थात् तीसरे दिन (४८ घण्टे में एकबार) उत्पन्न होता है ॥३४-३५॥
शिरश्चतुर्थकस्थानं चतुर्थं समुदाहृतम् ।।३६।।
अहोरात्राच्च्युतः स्थानाद्दोषः कण्ठेऽवतिष्ठते । ततः पुनरहोरात्रादुरसि प्रतिपद्यते ।।३७।।
तृतीये चाप्यहोरात्रे रसधातौ प्रकुप्यति । चतुर्थकः स विज्ञेयश्चिरस्थायी महाज्वरः ।।३८।।
गम्भीरस्थानसंभूतो धातुसंकरदूषितः । दर्शयित्वा बलं काले जन्तोः शिरसि लीयते ।।३९।।
त्रिदोषसंभवत्वाच्च भूतसंस्पर्शनादपि । दुश्चिकित्स्यतमो ह्येष तस्माद्यत्नेनमुपक्रमेत् ।।४०।।
चतुर्थक ज्वर—चौथा चतुर्थक ज्वर होता है इसका स्थान शिर माना गया है। प्रथम अहोरात्र में अपने स्थान शिर से च्युत होकर दोष कण्ठ में पहुंचता है। अगले अहोरात्र में वह उर (छाती) में पहुंचता है तथा तृतीय अहोरात्र में वह दोष आमाशय स्थित रस धातु में पहुँचकर प्रकुपित होता है इसे चतुर्थक ज्वर कहते हैं। यह महाज्वर चिरस्थायी होता है अर्थात् यह अत्यन्त कठिनता से ठीक होता है। गंभीर स्थान में उत्पन्न होकर तथा अनेक धातुओं से दूषित हुआ यह अपने समय पर बलको प्रकट करके अर्थात् चतुर्थ दिन (७२ घंटे में एक बार) प्रकुपित होकर पुनः शिर में लीन हो जाता है अर्थात् वहां स्थित हो जाता है। त्रिदोष से उत्पन्न होने तथा भूतों का संसर्ग होने के कारण यह दुश्चिकित्स्य होता है इसलिये निम्न उपायों के द्वारा इसकी चिकित्सा करे। अर्थात् तीन अहोरात्र के बाद दोष अपने स्थान सिरसे यथाक्रम आमाशय में पहुंचता है इसलिये चतुर्थ दिन प्रकुपित होकर यह चतुर्थक ज्वर को करता है। तृतीयक तथा चतुर्थक ज्वर के लिये चरक चि. अ. ३ में कहा है—दोषोऽस्थिमज्जगः कुर्यात्तृतीयकचतुर्थकौ। अर्थात् अस्थि और मज्जा में पहुंचा हुआ दोष क्रमशः तृतीयक और चतुर्थक ज्वर को करता है। वहीं इन ज्वरों की गतियां निम्न प्रकार से कही गई हैं—गतिद्वयकान्तरान्येद्युर्दोषस्योक्ताऽन्यथा परैः । रक्तमेवाभिसंसृज्य कुर्यादन्येद्युकं ज्वरम् ।। मांसस्रोतांस्यनुसृतो जनयेत्तु तृतीयकम् । ज्वरं दोषः संसृतो हि मेदोमार्गं चतुर्थकम् ।। अर्थात् दोषों की गतियां क्रमशः प्रतिदिन, एक दिन छोड़कर अथवा दो दिन छोड़कर कही गई हैं। जब प्रतिदिन एक बार गति होती है तब अन्येद्युक ज्वर होता है। जब एक दिन के अन्तर से होती है तब तृतीयक और जब दो दिन के अन्तर से होती है तब चतुर्थक ज्वर होता है। सुश्रुत उ. अ. ३९ में ये गतियां निम्न प्रकार दी गई हैं—सन्ततं रसरक्तस्थः सोऽन्येद्युः पिशिताश्रितः । मेदोगतस्तृतीयेऽह्नि त्वस्थिमज्जगतः पुनः ।। कुर्याच्चतुर्थकं घोरमन्तकं रोगसङ्करम् ।।३६-४०।।
बलिभिः शान्तिहोमैश्च सिद्धैर्मन्त्रपदैस्तथा । पापापहरणं चास्य कर्तव्यं सिद्धिरिच्छता ।।४१।।
भूतेश्वरं नीलकण्ठं प्रपद्येत वृषध्वजम् ।
सिद्धि को चाहने वाले वैद्य को बलि, शान्ति, होम (शान्ति के निमित्त किये जाने वाले यज्ञ) तथा सिद्ध मन्त्रों के द्वारा इसके पाप का निराकरण करना चाहिये। नीलकण्ठ (नीले कण्ठ वाले) तथा वृषध्वज (जिसकी ध्वजा पर वृष-बैल का चिह्न हो) भूतेश्वर महादेव की उपासना करनी चाहिये ॥४१॥
विषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ] खिलस्थानम् ३४७
चिरानुबन्धी विषमो यथाकालं विवर्धते ।।४२।।
एकाहाच्च द्व्यहाच्चैव त्र्याहाच्चतुरहात्तथा ।
चिरानुबन्धी (चिरकालीन अनुबन्ध वाला-जीर्ण) विषमज्वर यथासमय एक, दो, तीन तथा चार दिन बाद वृद्धि को प्राप्त होता है।
**वक्तव्य—**आधुनिक विज्ञान के अनुसार हम विषमज्वर को Malarial fever कह सकते हैं। पाश्चात्य विज्ञान मलेरिया को एक Specific protozoon (Malarial parasite) द्वारा उत्पन्न हुआ मानता है। मादा Anopheline नामक मच्छर के काटने से इसका संक्रमण मनुष्यों में होता है। इस पराश्रयी (Parasite) के दो Life cycles होते हैं। १. मनुष्य में Asexual cycle तथा २. मच्छर में Sexual cycle । सर्वप्रथम मच्छर के काटने से मनुष्य के अन्दर Sporozoite प्रविष्ट हो जाता है। वह रक्तकणों में प्रविष्ट होकर धीरे २ बढ़ता जाता है तथा अन्त में Merozoites के रूप में आजाता है। इस प्रकार Parasite का Asexual cycle मनुष्य में पूर्ण हो जाता है। अब जब मनुष्य को पुनः मच्छर काटता है तब ये मच्छर के आमाशय में पहुंचकर फिर वृद्धि को प्राप्त होते हैं तथा धीरे २ बढ़कर पुनः Sporozoites की अवस्था में मच्छर की लालाग्रन्थियों में पहुंच जाते हैं। इस प्रकार Parasite का Sexual cycle मच्छर में पूर्ण हो जाता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि Parasite के दो Life cycle हैं। इसे हम निम्न तालिका से प्रकट कर सकते हैं—
Macrogametocyte Microgametocyte
│ │
Macrogamete Microgamete
└───┬─────────────┘
Sexual cycle │
(मच्छर में) Zygote
│
Oocyst
│
Sporozoites
│
Sporozoite मच्छर के काटनेसे प्रविष्ट
│
Asexual cycle Trophozoite
(मनुष्य में) │
Schizont
│
Merozoites
Malarial Parasite तीन प्रकार के होते हैं—
- Plasmodium Vivex 2. P. Malarial 3. P. Falsiparum.
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P. Vivex—यह Benign Tertian Malaria को उत्पन्न करता है। इसका Asexual cycle ४८ घण्टे का होता है अर्थात् यह तृतीयक ज्वर को करता है।
P. Malarial—यह Quartan Malaria को उत्पन्न करता है। इसका Asexual cycle ७२ घण्टे का होता है। अर्थात् यह चातुर्थिक ज्वर को करता है।
P. Falsiparum—यह Malignant Tertian Malaria (Quotidian) को उत्पन्न करता है। इसका Asexual cycle २४-४८ घण्टे का होता है। यह अन्येद्युक को करता है। जब कभी साथ में ही दूसरा (Double) Infection हो जाता है तब सततज्वर (Double Tertian) होता है। रक्त में Spores के आने से जब उनका रक्त विष में मिलता है तब ज्वर का आक्रमण होता है। G. E. Beaumont की Medicine में लिखा है—The fever is thought to correspond with the liberation of the spores in the blood, perhaps due to freeing of their toxins, but there must be a threshold value, a definite amount of toxin being required in any individual to produce a rise of temperature. इसी प्रकार अखिलरञ्जन मजूमदार की Bedside Midicine में भी लिखा है—The mature rose the ruptures and young parasites (merozoites) and a toxin are thrown into the general circulation, If many such red cells rupture liberating, a quantity of toxin, a paroxysm of fever follows. ।।४२।।
पञ्चमेऽहनि षष्ठे वा कस्मादेष न जायते ।।४३।।
तस्य त्वामाशयः स्थानमुरः कण्ठः शिरस्तथा।
स्थानमन्यत्ततो नास्ति स्थानाभावान्न जायते ।।४४।।
यह विषमज्वर पांचवें तथा छठे दिन क्यों नहीं होता है ? इसका उत्तर—विषमज्वर के आमाशय, उर (छाती), कण्ठ तथा शिर ये चार स्थान हैं। इनके अतिरिक्त और कोई स्थान नहीं है। इसलिये अन्य स्थानों के अभाव से इन चार के अतिरिक्त पांचवें तथा छठे दिन यह ज्वर नहीं होता है ।।४३-४४।।
आग्नेयः स्यात् सततको वायव्यो हि द्वितीयकः। वैश्वदेवस्तृतीयः स्यादैशानस्तु चतुर्थकः ।।४५।।
सततज्वर आग्नेय (दक्षिण पूर्व दिशा) होता है। द्वितीयक (अन्येद्यक) वायव्य (पश्चिमोत्तर दिशा) होता है। तृतीयक वैश्वदेव तथा चतुर्थक ज्वर ऐशान (ईशान सम्बन्धी पूर्वोत्तर दिशा) होता है ।।४५।।
कस्मात् परिक्षीणबलः क्षीणधातुबलौजसः। ज्वरो विवर्धति जन्तोर्मोक्षकाले विशेषतः ।।४६।।
जिसका धातु, बल एवं ओज क्षीण हो गया है ऐसे व्यक्ति का क्षीण बल वाला ज्वर विशेष कर मोक्षकाल में क्यों वृद्धि को प्राप्त होता है ।।४६।।
| गतेरभावाद्वाह्येन | वायुनाऽभ्याहतक्रमः । |
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| संक्षीणवर्त्यनुगतः | स्नेहाव्वाभिमूर्च्छितः । |
| शान्तोऽपि तदुपादानाद्यथा | दीपो न (ऽनु ?) दीप्यते ।। |
तद्वद्धातुबले क्षीणे ज्वरः क्षीणबलोऽपि सन्। निरुपादानदोषत्वान्मोक्षकाले विशेषतः ।।४८।।
हेतुशेषमशेषेण दहन् दर्शयते बलम्। सप्रतीकारवैशेष्यात् प्रशमं याति हन्ति वा ।।४९।।
उपर्युक्त प्रश्न का उत्तर—जिस प्रकार गति के अभाव में बाह्य वायु द्वारा आक्रान्त हुआ तथा बत्ती के क्षीण हो जाने से अनुगामी हुआ तथा स्नेह एवं वायु से मूर्च्छित होने के कारण शान्त हुआ भी दीपक अपने उपादान कारण के विद्यमान
विषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ] खिलस्थानम् ३४९
होने से प्रदीप्त (तेजी से जलना) होता है उसी प्रकार धातु एवं बल के क्षीण हो जाने पर ज्वर क्षीण बलवाला हो जाने पर भी उपादान दोषों के बचे होने से मोक्षकाल में विशेष कर बचे हुए दोष रूप हेतुओं को विशेषरूप से दहन करता (जलाता) हुआ अपने बलको प्रकट करता है। यह चिकित्सा की विशेषता के कारण शान्त हो जाता है अथवा रोगी को मार देता है अर्थात् यदि ठीक तरह से चिकित्सा हो जाय तो ज्वर शान्त हो जाता है अन्यथा रोगी समाप्त हो जाता है ॥४७-४९॥
पाकाद्वा शमनाद्वाऽपि शोधनाद्वा हृताधिके । स्वस्थानस्थे नरो दोषे शुद्धस्रोता विसृज्यते ॥५०॥
दोषों के पाचन, शमन अथवा शोधन के द्वारा अपने स्थान में स्थित दोषों के नष्ट हो जाने से शुद्ध स्रोतों वाला मनुष्य ज्वर से मुक्त हो जाता है ॥५०॥
निर्दिष्टो दोषपाकादेरस्माद्धेतुत्रयात् परम् । अन्यत्र चैव नान्योऽस्ति हेतुर्ज्वरविमोक्षणे ॥५१॥
ज्वर से मुक्त होने का इन दोषपाक आदि तीन कारणों के अतिरिक्त और कहीं कोई कारण नहीं होता है ॥५१॥
कस्माद्दोषपरिक्षोभे प्रायशः शीतपूर्वकम् । निर्वर्तते ज्वरो जन्तोः पश्चाद्दाहः प्रवर्तते ॥५२॥
दोषों के प्रकुपित होने पर मनुष्य को ज्वर में पहले ठण्ड तथा बाद में गर्मी क्यों लगती है ? ॥५२॥
वायुर्व्यवायी विशदः शीतो रूक्षश्चलः खरः । पित्तमाग्नेयमुष्णं च तीक्ष्णमल्पं लघु द्रवम् ॥५३॥
सौम्यः शीतो गुरुः स्निग्धो बलवान् कफको बहु । कफो मन्दव्यवायी च चिरोत्थाननिवर्तनः ॥५४॥
वायुश्च शीतसामान्यात् कफस्यानुबलो बली ।
बलवान् हि गुणः सौम्य आग्नेयो दुर्बलः स्मृतः ॥५५॥
हेतुनाऽनेन महता श्लेष्मा हि बलवत्तरः । तस्मात् पूर्वं ज्वरे शीतं पश्चाद्दाहः प्रवर्तते ॥५६॥
उपर्युक्त प्रश्न का उत्तर—वायु व्यवायी, विशद, शीत, रूक्ष, चल तथा खर होता है। पित्त आग्नेय, उष्ण, तीक्ष्ण, अल्प, लघु एवं द्रव होता है। कफ, सौम्य, शीत, गुरु, स्निग्ध, अत्यन्त बलवान् एवं मन्दव्यवायी होता है तथा इसकी उत्पत्ति एवं निवृत्ति दोनों देर से होते हैं अर्थात् श्लैष्मिक रोग उत्पन्न भी देर में होते हैं तथा समाप्त भी देर में होते हैं। शीत की समानता से वायु भी कफ के समान ही बलवाला होता है। सौम्यगुण बलवान् होते हैं तथा आग्नेय गुण दुर्बल माने गये हैं। इस उपर्युक्त महान् हेतु के कारण कफ अधिक बलवान् होता है। इसीलिये ज्वर में पहले शीत लगती है तथा बाद में दाह होता है। विषमज्वर (मलेरिया) का जब आक्रमण होता है तब पहले Cold stage ही होती है। पीछे Hot stage आती है। अर्थात् पहले ठण्ड लगती है पीछे गरमी। G. E. Beaumont की Medicine में कहा है—He feels cold all over and may vomit. After a Varying period of about 2 hours the skin becomes hot and flushed and the beadache is more intense. This phase persists for 2 or 3 hours and is then followed by sweating and marked relief from the discomforts.
स्ववेगपरिणामाच्च क्रियाभिश्च यदा कफः । उष्णाभिः प्रशमं याति तदा पित्तं प्रकुप्यति ॥५७॥
परीणामक्रियाभिर्वा शान्ते तस्मिन् सुखी भवेत् । हेतुरुक्तो महानेष यथावच्छीतपूर्वके ॥५८॥
अपने वेग के परिणाम तथा उष्ण क्रियाओं के द्वारा जब कफ शान्त हो जाता है तब पित्त प्रकुपित होता है। तथा उसके बाद परिणाम एवं क्रियाओं के द्वारा जब पित्त शान्त हो जाता है तब मनुष्य स्वस्थ हो जाता है। ज्वर में प्रारम्भ में ठण्ड लगने का यह महान् हेतु बतलाया गया है ॥५७-५८॥
३५० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विषमज्वरनिदंशीयाध्याय ? ]
अथ कस्माज्ज्वरो जन्तोर्जायते दाहपूर्वकः । स एव हेतुरत्रापि बलीयस्त्वादुदाहृतः ।।५९।।
अत्युदीर्णं यदा पित्तं वायुनाऽल्पेन मूर्च्छितम् ।
अनुबद्धं रसस्थाने श्लेष्मणाऽल्पबलेन च ।।६०।।
दाहः पूर्वं तदा जन्तोः शीतमन्ते प्रवर्तते । सोद्वेपकः सप्रलापस्मृतिबुद्धिप्रमोहनः ।।६१।।
प्रश्न—अब अगला प्रश्न यह है कि मनुष्य को दाहपूर्वक (जिसमें प्रारम्भ में दाह होती है) ज्वर क्यों होता है ?
उत्तर—यहां भी वही कारण है। बलवान् होने के कारण जब उदीर्ण हुआ पित्त अल्प वायु तथा अल्प बलवाले श्लेष्मा के द्वारा मूर्च्छित हुआ रस के स्थान आमाशय में स्थित हो जाता है तब रोगी को प्रारम्भ में दाह होता है तथा बाद में ठण्ड लगती है। इस ज्वर में रोगी को कंपकंपी, प्रलाप (Detirium) तथा स्मृति एवं बुद्धि का व्याघात हो जाता है ।।५९-६१।।
तावेतौ शीतदाहादी ज्वरौ संसर्गसंभवौ । असाध्यः कृच्छ्रसाध्यो वा दाहपूर्वो ज्वरस्तयोः ।।६२।।
इस प्रकार सर्दी एवं गर्मी वाले ये दोनों ज्वर संसर्ग से उत्पन्न होते हैं। इनमें दाह पूर्व (जिसमें प्रारम्भ में गर्मी लगती है) ज्वर असाध्य अथवा कृच्छ्रसाध्य होता है ।।६२।।
प्रत्यनीकगुणाः सन्तो दोषा वातादयः कथम् ।
संभूय कुर्वते रोगानान्योऽन्यं शमयन्ति च ।।६३।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २०० तमं पत्रम्।)
प्रश्न—ये वातादिदोष विरोधी गुण वाले होते हुए भी परस्पर मिलकर किस प्रकार रोगों को उत्पन्न करते हैं तथा विरोधी होने के कारण ये दोष परस्पर एक दूसरे को शान्त क्यों नहीं करते हैं ।।६३।।
स्वभावाददूषणाद्दोषा नान्योन्यशमनाः स्मृताः । यस्मात्तस्माद्बहुविधाः संसृष्टाः कुर्वते गदान् ।।६४।।
विरुद्धा गुणतोऽन्योन्यं कार्यं सत्त्वादयो यथा ।
उत्तर—क्योंकि स्वभाव से तथा दूषित होते के कारण ये दोष परस्पर एक दूसरे को शान्त नहीं करते हैं इसीलिये ये मिलकर अनेक प्रकार के रोगों को उत्पन्न करते हैं। जिस प्रकार गुणों में विरुद्ध होते हुए सत्त्व आदि गुण परस्पर मिल-कर कार्य करते हैं ।।६४।।
शिरः संतप्यते कस्माज्ज्वरितस्य विशेषतः ।।६५।।
सति सर्वाङ्गतापे च शैत्यं भवति पादयोः ।
प्रश्न—ज्वर के रोगी का विशेष कर सिर क्यों गरम रहता है तथा सम्पूर्ण शरीर गरम होने पर भी पैर ठण्डे क्यों होते हैं ।।
दोषैरावृतमार्गत्वादूर्ध्वगत्वाच्च तेजसः ।।६६।।
बाहुल्यादिन्द्रियाणां च शिरः संतप्यतेऽधिकम् । तेजसाऽतिप्रवृद्धेन सोमधातुः प्रपीडितः ।।६७।।
अधः प्रपद्यते तेन शैत्यं भवति पादयोः ।।
उत्तर—दोषों के द्वारा मार्गों के बन्द होने से, तेज के ऊर्ध्वगति का स्वभाव होने से तथा इन्द्रियों की बहुलता (अधिकता) के कारण सिर अधिक सन्तप्त (गरम) रहता है। तथा अत्यन्त बढ़ी हुई तेजधातु के कारण पीडित हुआ सोमधातु नीचे की ओर आता है इसलिये रोगी के पैर ठण्डे रहते हैं ।।६६-६७।।
विषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ] खिलस्थानम् ३५१
ज्वरोष्मणाऽभिसंतप्ते प्रागुष्णादिक्रियाविधिः ॥६८॥ क्रियते नेतरः कस्माच्छीत उष्णस्य बाधकः । यथाऽग्न्यगारे संतप्ते कपाटपुटसंवृते ॥६९॥ भवत्यत्यधिकस्तूष्मा सर्वतः परितापनः । स एवोद्घाटितद्वारे मन्दीभवति तत्क्षणात् ॥७०॥ एवमावृतमार्गेषु दोषैः स्रोतःसु देहिनाम् । ज्वरोष्मा वर्धते देहे यथाहेतुबलाश्रयम् ॥७१॥ उद्घाटनार्थं तत्तेषामुष्णोपक्रम इष्यते । स्तम्भनो हि गुणः शीत उष्णो विलयनः स्मृतः ॥७२॥
ज्वर की उष्णता के द्वारा संतप्त हुए रोगी में सर्वप्रथम उष्ण विधि करनी चाहिये, शीत नहीं। क्योंकि, शीतविधि उष्णता की बाधक होती है। जिस प्रकार संतप्त हुए तथा बन्द दरवाजों वाले अग्न्यागार (अग्निकोष्ठक) में चारों ओर से गरमी पहुंचाने वाली उष्णता अत्यधिक होती है, वही उष्णता अग्न्यागार के दरवाजे खोल देने पर उसी क्षण मन्द हो जाती है। उसी प्रकार रोगियों के शरीर में दोषों के द्वारा बन्द मार्ग वाले स्रोतों में हेतु एवं बल के आश्रय के अनुसार ज्वर की ऊष्मा वृद्धि को प्राप्त होती है। उन बन्द स्रोतों को खोलने के लिये उष्ण चिकित्सा अभिप्रेत है। शीत गुण दोषों का स्तम्भन करने वाला है तथा उष्ण गुण दोषों का विलयन करने (पिघलाने) वाला है ॥६८-७२॥
तस्मादुष्णाम्बु पानाय ज्वरिताय प्रदीयते । तेनास्य दोषाः पच्यन्ते कायाग्निश्चाभिदीप्यते ॥७३॥ ज्वरोष्मा मार्दवं याति विबन्धश्च प्रशाम्यति । तृष्णा निवर्तते चाशु प्रकाङ्क्षा चोपजायते ॥७४॥
इसलिये ज्वर रोग वाले व्यक्ति को पीने के लिये उष्ण जल देना चाहिये। इससे उसके दोषों का पाक हो जाता है तथा जाठराग्नि प्रदीप्त हो जाती है। ज्वर की उष्णता कम हो जाती है तथा विबन्ध (मलबन्ध) दूर हो जाता है। प्यास शीघ्र ही शान्त हो जाती है तथा भोजन में रुचि उत्पन्न हो जाती है। चरक वि. अ. ३ में भी कहा है-ज्वरितस्य कायसमुत्थानदेशकालानभिसमीक्ष्य पाचनार्थं पानीयमुष्णं प्रयच्छन्ति भिषजः, ज्वरो ह्यामाशयसमुत्थः, प्रायो भेषजानि चामाशयसमुत्थानां विकाराणां पाचनवमनापतर्पणसमर्थानि भवन्ति, पाचनार्थं च पानीयमुष्णं, तस्मादेतज्ज्वरितेभ्यः प्रयच्छन्ति भिषजो भूयिष्ठं, तद्धीयेषां पीतं वातमनुलोमयति, अग्निमुदर्यमुदीरयति, क्षिप्रं जरां गच्छति, श्लेष्माणं च परिशोषयति, स्वल्पमपि च पीतं तृष्णाप्रशमनायोपपद्यते ॥७३-७४॥
ऋते पित्तज्वरादुष्णो विधिः सर्वो ज्वरापहः । तत्राप्यनुष्णाशीतादिरुपचारो विधीयते ॥७५॥
पित्त ज्वर के अतिरिक्त सम्पूर्ण ज्वरों को नष्ट करने के लिये उष्ण विधि का प्रयोग करना चाहिये तथा पित्त ज्वर में भी ऐसा उपचार करना चाहिये जो न उष्ण हो और न शीत हो ॥
इति सप्त यथाप्रश्नं निर्दिष्टा विषमज्वराः । वक्ष्ये सततकादीनां चिकित्सां शृण्वतः परम् ॥७६॥
इस प्रकार प्रश्न के अनुसार सात विषम ज्वरों का निर्देश किया गया है। अब मैं सतत आदि विषय ज्वरों की चिकित्सा कहूँगा। उसे तू सुन ॥७६॥
उपक्रमैः परिक्लिष्टं क्षीणधातुबलौजसम् । ज्वरः पुराणो रूक्षत्वादनुबध्नाति देहिनम् ॥७७॥
चिकित्सा के द्वारा परिक्लिष्ट हुए तथा जिसके धातु, बल एवं ओज क्षीण हो गये हैं ऐसे व्यक्ति को रूक्ष होने के कारण पुराण ज्वर पकड़ लेता है ॥७७॥
तस्मादस्य बलाधाने प्रयतेत विचक्षणः । रम्यैर्विचित्रैराहारैर्हृद्यैः श्रद्धोपपादितैः ॥७८॥ सुराग्रपानैर्मांसानां वैष्किराणां च भक्षणैः । सर्पिषः पञ्चगव्यस्य पयसो लशुनस्य च ॥७९॥
४५ का.सं.
| ३५२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | विषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ] |
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इसलिये बुद्धिमान् व्यक्ति रम्य, विचित्र, हृद्य (हृदय को अच्छे लगने वाले) तथा श्रद्धा (रुचि) उत्पन्न करने वाले आहारों, सुरापान, विष्किर जन्तुओं के मांस के भक्षण, पञ्चगव्य घृत, दूध तथा लशुन के द्वारा रोगी के बलाधान का प्रयत्न करे ॥
उपक्रमेच्चौषधानां प्रयोगैर्विषमज्वरम् । दैवतेज्योपहारैश्च धूपनाभ्यञ्जनाञ्जनैः ॥८०॥
इसके अतिरिक्त ओषधियों के प्रयोग, देवता तथा इज्या के उपहार, धूपन, मालिश, एवं अञ्जनों के द्वारा विषम ज्वर की चिकित्सा करनी चाहिये ॥८०॥
वातोत्तरं स्नेहपानैरभ्यङ्गैः सावगाहनैः । स्निग्धोष्णैरन्नपानैश्च बलिभिश्चाप्युपक्रमैः ॥८१॥
वातप्रधान विषमज्वर की स्नेहपान, अभ्यङ्ग (मालिश), अवगाहन (Tub baths), स्निग्ध एवं उष्ण अन्नपान तथा बलियों के द्वारा चिकित्सा करे ॥८१॥
पित्तोत्तरं तिक्तशीतैः शमनैः सविरेचनैः । पयसा सर्पिषा चैव शीतैश्चाभ्यञ्जनैर्जयेत् ॥८२॥
पित्त प्रधान विषमज्वर की तिक्त एवं शीतल शमन द्रव्य, विरेचन द्रव्य, दूध, घृत तथा शीतल अभ्यञ्जन (मालिशों) के द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये ॥८२॥
वमनैः पाचनीयैश्च लङ्घनैर्लघुभोजनैः । रूक्षोष्णैश्चाप्युपचरेत् कषायैश्च कफोत्तरम् ॥८३॥
कफ प्रधान ज्वर की वमन एवं पाचन द्रव्य, लङ्घन, लघुभोजन तथा रूक्ष एवं उष्ण कषायों के द्वारा चिकित्सा करे ॥
रोमहर्षोऽङ्गमर्दश्च वातपित्तोत्तरे ज्वरे । महाकल्याणकं सर्पिः पञ्चगव्यमथो पिबेत् ॥८४॥
पीत्वा वा महतीं मात्रां सर्पिषः पुनरुल्लिखेत् । तदहर्वा परेद्युर्वा पेयां समरिचां पिबेत् ॥८५॥
वात तथा पित्त प्रधान ज्वर में रोमहर्ष तथा अङ्गमर्द होता है। इसमें महाकल्याणक तथा पञ्चगव्य घृत पिलाना चाहिये। अथवा घृत की बड़ी मात्रा पिलाकर पुनः वमन कराना चाहिये। अथवा उसी दिन या अगले दिन मरिच युक्त पेया पिलानी चाहिये ॥८४-८५॥
राजमूलस्य वा क्वाथं पिबेत् प्रज्वरकं हविः । क्रितोयं ...... मयोगश्चतुर्थकमपोहति ॥८६॥
अथवा ज्वर की प्रबलता होने पर राजमूल का क्वाथ पिलाना चाहिये तथा यज्ञ में ...... आहुति देनी चाहिये इससे चतुर्थक ज्वर दूर हो जाता है ॥८६॥
धारोष्णं वा पयः पीत्वा तद्वमेदिच्छया न वा ।
शीतं वा मधुनाऽशीतं निम्बपत्रोदकं पिबेत् ॥८७॥
अथवा धारोष्ण दूध पीकर स्वयमेव इच्छा से या अनिच्छा से वमन कर देना चाहिये अथवा मधु के साथ शीत या उष्ण निम्बपत्रोदक (नीम के पत्तों का कषाय) पिलाना चाहिये ॥
सर्पिर्वा माहिषं पीत्वा हिङ्गुस्तोकसमन्वितम् । तस्मिन् विदग्ध एवान्नं दध्ना भुञ्जीत केवलम् ॥८८॥
अथवा भैंस के घृत में थोड़ी हींग मिलाकर पिलाना चाहिये तथा इसके विदग्ध हो जाने पर दही के साथ केवल अन्न का सेवन करना चाहिये ॥८८॥
नीलस्यन्दशिफा वाऽपि सुपिष्टा तण्डुलाम्बुना ।
देया ज्वरतिथौ नस्ये मृगराजस्य वा वसा ॥८९॥
विषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ] खिलस्थानम् ३५३
ज्वर के आने के दिन चावलों के पानी के साथ नील अपराजिता की मूल को अच्छी तरह पीसकर अथवा मृगराज की वसा (चर्बी) नस्य के रूप में देनी चाहिये ॥८९॥
हरीतकी वचा कुष्ठं निम्बपत्रं पलङ्कषा ।
सिद्धार्थका यवाः सर्पिर्धूपो जीर्णज्वरापहः ॥९०॥
हरीतकी, वच, कूट, नीम के पत्ते, गूगल, सफेद सरसों, जौ तथा घी-इनका धूप जीर्ण ज्वर को नष्ट करता है ॥९०॥
मूलानि सहदेवायाः कटुका रोहिणी वचा । तण्डुलोदकपिष्टोऽयं देहो दाहज्वरापहः ॥९१॥
सहदेवी की जड़, कुटकी, रोहिणी तथा बच-इन्हें तण्डुलोदक के साथ पीसकर देने से दाहज्वर नष्ट होता है ॥९१॥
सुरया सर्वगन्धैश्च तैलमभ्यञ्जनं पचेत् । सर्षपा लसुनं हिङ्गु त्रिव्योषं रोचना वचा ॥९२॥
ऋक्षपित्तं बस्तमूत्रं करञ्जस्य फलानि च । ग्रहज्वराभिभूतानां नस्यकर्माञ्जनं हितम् ॥९३॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २०१ तमं पत्रम् ।)
सुरा तथा सर्वगन्ध की ओषधियों के द्वारा अभ्यङ्ग के लिये तैल का पाक करना चाहिये तथा सरसों, लहसुन, हींग, त्रिकटु, गोरोचन, वच, रीछ का पित्त, बकरे का मूत्र तथा करञ्ज के फल-ग्रह ज्वर से पीडित रोगी में नस्यकर्म तथा अञ्जन के लिये हितकर होते हैं ॥९२-९३॥
सन्निपातविबन्धे च व्यालदष्टे च शस्यते । अर्शःसु योनिशूले च प्रलेपोऽयमनुत्तमः ॥९४॥
उपर्युक्त ओषधियों का ही लेप सन्निपात ज्वर, मलबन्ध, सर्पदंश, अर्श तथा योनि शूल में हितकर होता है ॥९४॥
भीषणैर्हर्षणैश्चैव विचित्राद्भुतदर्शनैः । व्याक्षेपं मनसश्चास्य भिषक्कुर्याज्ज्वरागमे ॥९५॥
ज्वर हो जाने पर चिकित्सक को भीषण (भयंकर) तथा हर्षकारक विचित्र एवं अद्भुत दर्शनों के द्वारा रोगी के मन का परिवर्तन करना चाहिये ॥९५॥
पानं चैतत् प्रदातव्यं स्निग्धस्विन्नस्य देहिनः । त्रिभण्डीमजगन्धां च नीलिनीं कटुरोहिणीम् ॥९६॥
कल्कं वा कटुरोहिण्याः पिबेन्मूत्रसंप्लुतम् । चिकित्सायां च यत् प्रोक्तं तच्च कुर्याद्विधानवित् ॥९७॥
तथा स्निग्ध एवं स्विन्न (जिसे स्नेहन एवं स्वेदन दिया गया हो) रोगी को त्रिभण्डी (त्रिवृत्), अजगन्धा, नीलिनी तथा कटुरोहिणी का क्वाथ पिलाना चाहिये । अथवा कटुरोहिणी का कल्क गोमूत्र के साथ मिलाकर पिलाना चाहिये । इसके अतिरिक्त विधान को जानने वाला वैद्य चिकित्सा में अन्य भी जो कुछ कहा है उसका प्रयोग करे ॥९६-९७॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
(इति) खिलेषु विषमज्वरनिर्देशीयो (नाम प्रथमोऽध्यायः) ॥
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।
(इति) खिलेषु विषमज्वरनिर्देशीयो (नाम प्रथमोऽध्यायः) ॥
| ३५४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | विशेषनिर्देशीयाध्यायः २ ] |
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विशेषनिर्देशीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः ।
अथातो विशेषनिर्देशीयं नामाध्यायं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम विशेषनिर्देशीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।१-२।।
महर्षिं कश्यपं वृद्धं वेदवेदाङ्गपारगम् । सुखोपविष्टमव्यग्रमपृच्छद् वृद्धजीवकः ।।३।।
वेद वेदाङ्ग के पण्डित, ज्ञान में वृद्ध, व्यग्रता से रहित तथा सुखपूर्वक बैठे हुए महर्षि कश्यप से वृद्धजीवक ने प्रश्न किया ।।३।।
विषमाणां ज्वराणां ते सविकल्पं सविस्तरम् । यद्यथावच्च यावच्च प्रोक्तं वक्तव्यमादितः ।।४।।
पहले आपने विषम ज्वरों के विषय में जो भी तथा जितना भी वक्तव्य है वह विकल्प (भेद) एवं विस्तार सहित सब कह दिया है ।।४।।
सामान्येनापि सर्वेषां ज्वराणां विगतज्वर ! । वक्तुमर्हसि कार्त्स्न्येन परिशेषमतः परम् ।।५।।
हे विगतज्वर ! (जिसका ज्वर-सन्ताप नष्ट हो गया है) अब आप सामान्य रूप से सब ज्वरों के विषय में जो कुछ वक्तव्य है उसका विस्तारपूर्वक उपदेश करें ।।५।।
इति संचोदितः प्राह प्रजापतिरिदं वचः । समासाभिहितं यच्च (यच्च) नाभिहितं हितम् ।।६।।
ज्वरितानां ज्वराणां च भूयो वक्ष्यामि तच्छृणु । अवस्था लक्षणोद्देशविशेषोपक्रमे क्रमात् ।।७।।
इस प्रकार प्रश्न किया जाने पर प्रजापति कश्यप ने निम्न वचन कहा—ज्वरयुक्त व्यक्तियों तथा ज्वरों के विषय में पहले जो संक्षेप से कहा है तथा जो बिलकुल नहीं कहा है वह मैं क्रमशः अवस्था, लक्षण, उद्देश तथा विशेष उपक्रम के अनुसार अब पुनः कहूँगा। उसे तू सुन ।।६-७।।
भैषज्यमनवस्थायां पथ्यमप्यवचारितम् । गुणं न किञ्चित् कुरुते दोषायैव तु कल्पते ।।८।।
विपरीत अवस्था में प्रयुक्त की हुई ओषधि तथा पथ्य कुछ भी गुण नहीं करते हैं इसके विपरीत वे दोषों को ही करते हैं। वे ही अनुकूल अवस्थाओं में प्रयुक्त करने पर अमृत के समान गुणकारी होते हैं ।।८।।
प्रयुक्तं तदवस्थायाममृतत्वाय कल्पते । वाताद्वाह्यादभिघातात् क्रोधाच्छोकाद्भयात् क्षयात् ।।९।।
श्रमाद् ग्रहाभिषङ्गाच्च वेगानां च विधारणात् । समुत्पन्ने ज्वरे जन्तोर्वमनं न प्रयोजयेत् ।।१०।।
प्रयुक्तं कुरुते क्षिप्रं तीव्रं सोपद्रवं ज्वरम् ।
वायु, बाह्य आघात (चोट आदि), क्रोध, शोक, भय, क्षय, परिश्रम, ग्रहों के आक्रमण तथा वेगों के धारण करने से उत्पन्न हुए ज्वर में रोगी को वमन नहीं कराना चाहिये। उस अवस्था में प्रयुक्त कराया गया वमन शीघ्र ही तीव्र उपद्रवयुक्त ज्वर को उत्पन्न कर देता है ।।९-१०।।
पूरणात्तु समुत्पन्ने ज्वरे ह्यामात्रया श्रयेत् ।।११।।
दोषे वृद्धेऽतिमात्रा च समुत्क्लिष्टे तथैव च । सन्निपातज्वरभयात्त्वरितं वामयेद्भिषक् ।।१२।।
वामितं लङ्घनाद्येन क्रमेणोपक्रमेत्ततः ।
विषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ] खिलस्थानम् ३५५
संतर्पणजन्य ज्वर में अल्पमात्रा में वमन का प्रयोग करे। दोषों की वृद्धि तथा उत्क्लेश होने पर सन्निपात ज्वर का भय होने से रोगी को शीघ्र ही अधिक मात्रा में वमन कराना चाहिये। वमन कराने के बाद रोगी की लङ्घन आदि के क्रम से चिकित्सा करे। अष्टाङ्ग हृदय चि. अ. १ में कहा है—तत्रोत्क्लिष्टे समुत्क्लिष्टे कफप्रायेचले मले। सहल्लासप्रसेकान्नद्वषकासविषूचिके ।। सद्योभुक्तस्य सञ्जाते ज्वरे सामे विशेषतः। वमनं वमनार्हस्य शस्तम् ।।११-१२।।
वमनानन्तरं चास्य कुर्याच्छीर्षविरेचनम् ।।१३।।
तथाऽऽशु शिरसः शूलं गौरवं चोपशाम्यति । विबन्धश्चक्षुरादीनामरुचिश्च निवर्तते ।।१४।।
वमन के बाद उसे शिरोविरेचन (नस्य) देवे। इससे उसके सिर का शूल तथा भारीपन शीघ्र ही शान्त हो जाता है। तथा विबन्ध और चक्षु आदियों की अरुचि दूर हो जाती है ।।१३-१४।।
जीर्णज्वरेऽप्यथैतेषु विकारेषु प्रदापयेत् । बहुदोषे बलवती मध्यदोषेषु मध्यमा ।।१५।।
अल्पदोषे ज्वरे मृद्वी क्रिया कार्या विजानता।
जीर्ण ज्वर में भी इन विकारों के होने पर शिरोविरेचन देना चाहिये। बुद्धिमान् व्यक्ति को ज्वर में दोषों के अधिक होने पर बलवान्, दोषों के मध्य होने पर मध्यम तथा दोषों के अल्प होने पर मृदु क्रिया करनी चाहिये ।।१५।।
स्वानि रूपाणि कार्त्स्न्येन यदा व्याधौ विशेषतः ।।१६।।
तीव्राणि व्यथितत्वं च शरीरस्योपलक्षयेत् । बहुदोषं तदा विद्यादल्पदोषमतोऽन्यथा ।।१७।।
तथा मध्यबलेष्वेषु मध्यदोषं विभावयेत् ।
जब रोग में अपने २ सम्पूर्ण लक्षण तीव्र अवस्था में दिखाई दें तथा शरीर व्यथित मालूम पड़े तब दोष अधिक मात्रा में जानने चाहिये। इसके विपरीत दोष अल्प समझने चाहिये। जब रोगों का बल मध्यम हो तब दोष मध्यम समझने चाहिये ।।१६-१७।।
विबन्धारुचितृण्मूर्च्छा गात्रभेदः शिरोरुजा ।।१८।।
प्रलापालस्यहल्लासतन्द्रीदाहश्रमभ्रमाः । मूत्रप्रचुरता ग्लानिः पुरीषस्याविपक्वता ।।१९।।
उत्क्लेशो गुरुकोष्ठत्वं लिङ्गान्यामज्वरे वदेत् ।
आमज्वर के लक्षण—विबन्ध, अरुचि, तृष्णा, मूर्च्छा, गात्रभेद (शरीर का टूटना), शिर की पीडा, प्रलाप, आलस्य, हल्लास (जी मचलाना), तन्द्रा, दाह, श्रम (थकावट), भ्रम, मूत्र की अधिकता, ग्लानि, मल का अपक्व होना, उत्क्लेश (दोषों की ऊर्ध्वगति होना) तथा कोष्ठ का भारी होना—ये आमज्वर के लक्षण होते हैं। चरक चि.अ. ३ में कहा है—अरुचिश्चाविपाकश्च गुरुत्वमुदरस्य च । हृदयस्याविशुद्धिश्च तन्द्रा चालस्यमेव च ।। ज्वरोऽविसर्गी बलवान् दोषाणामप्रवर्तनम्। लालाप्रसेको हल्लासो क्षुन्नाशो विरसं मुखम् ।। स्तब्धसुप्तगुरुत्वं च गात्राणां बहुमूत्रता । न विड्जीर्णा न च ग्लानिर्ज्वरस्यामस्य लक्षणम् ।।
निवृत्तौ प्रायशश्चैषां संजाते ज्वरमार्दवे ।।२०।।
लघुत्वं चाप्तरात्रे च निरामज्वरमादिशेत् ।
निराम ज्वर के लक्षण—उपर्युक्त लक्षणों के प्रायः दूर हो जाने पर, ज्वर के मृदु हो जाने पर तथा आठ दिन में शरीर के लघु हो जाने पर निरामज्वर कहलाता है। चरक चि. अ. ३ में कहा है—क्षुत्क्षामता लघुत्वं च गात्राणां ज्वरमार्दवम् । दोषप्रवृत्ति ष्टाहो निरामज्वरलक्षणम् ।। अन्यत्र भी कहा है—सप्ताहेनैव पच्यन्ते सप्तधातुगता मलाः । निरामश्चाप्यतः प्रोक्तो ज्वरः प्रायोऽष्टमेऽहनि ।। यहां आठवां दिन उपलक्षण मात्र है—इससे पूर्व अथवा पश्चात् भी निरामता
३५६ कश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विषमज्वरनिदेशीयोऽध्याय ? ]
हो सकती है। इसी लिये कहा है—न च निःसप्ततैवैका निरामज्वरलक्षणम्। चिरादपि हि पच्यन्ते सन्निपातज्वरे मलाः ॥ सप्तरात्रातिवृद्धिंश्च ह्यामतादिस्वलक्षणम्। तस्मादेतद् द्वयं दृष्ट्वा निरामज्वरमादिशेत् ॥ यहां आठवां दिन इसी लिये कहा गया है कि इस समय ज्वर में मुख्य ओषधि दी जा सकती है। यदि आठवां दिन होने पर भी भूख लगना आदि लक्षण उपस्थित न हों तो मुख्य ओषधि न देकर पाचन ओषधि का ही प्रयोग करना चाहिये। यदि आठवां दिन भी हो तथा भूख आदि भी लगे तो शमन ओषधि देनी चाहिये। यदि दोषों का पाचन आठ दिन से पूर्व ही हो जाय तो मुख्य ओषधि उससे पूर्व भी दी जा सकती है। दोषों का पाचन ही मुख्य उद्देश्य है। आठवां दिन तो सामान्यरूप से कह दिया गया है। इसी लिये सुश्रुत में कहा है—अचिरज्वरितस्यापि देयं स्याद्दोषपाकतः ॥२०॥
आपातलक्ष्यः स्यादूष्मा तत्क्षणादेति मार्दवम् ॥२१॥
अन्तर्लघुत्वमुत्साहो दोषपक्तिः प्रसन्नता । तृष्णादीनां मृदुत्वं च बहिर्मार्गगते ज्वरे ॥२२॥
तत्राभ्यङ्गान् प्रदेहांश्च परिषेकांश्च कारयेत्।
बहिर्मार्गगत ज्वर के लक्षण—सर्वशरीरसंचारी एवं प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाली ऊष्मा उसी क्षण मृदु हो जाती है, शरीर के अन्तः अवयव लघु हो जाते हैं, शरीर में उत्साह होता है, दोष पक जाते हैं, शरीर प्रसन्न रहता है तथा तृष्णा आदि मृदु हो जाती है—ये बहिर्मार्गगत ज्वर के लक्षण हैं। बहिर्मार्गगत से बहिर्वेग ज्वर का अभिप्राय है। इसके लक्षण चरक चि. अ. ३ में निम्न दिये हैं—सन्तापोऽभ्यधिको बाह्यस्तृष्णादीनां च मार्दवम्। बहिर्वेगस्य लिङ्गानि सुखसाध्यत्वमेव च ॥ इस बहिर्मार्गगत ज्वर में अभ्यङ्ग, प्रदेह तथा परिषेक आदि करे ॥२१-२२॥
अविपक्वा विपक्वा वा दोषा यस्य न निर्हृताः ॥२३॥
न च व्याधेरुपशमो न चोत्साहो न लाघवम्।
ग्लानिकाश्यें न चात्यर्थं न च्छन्दोऽशनं प्रति ॥२४॥
अप्रकृष्टे (प्रकृष्टे) वा स काले दोषदुर्बलः । अतो विपर्ययाद्देही भवेद्दौषधदुर्बलः ॥२५॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २०२ तमं पत्रम्)
जिसके अविपक्व तथा पक्व दोषों का निर्हरण नहीं हुआ हो, व्याधि की शान्ति न हुई हो, शरीर में उत्साह तथा लघुता न हो, ग्लानि तथा कृशता बहुत अधिक न हो तथा भोजन के प्रति रुचि न हो-अधिक अथवा थोड़े समय में उस व्यक्ति को दोषों से दुर्बल हुआ समझा जाता है। इससे विपरीत रोगी को औषध के कारण दुर्बल हुआ समझना चाहिये ॥२३-२५॥
पाचनैरविपक्वानां दोषाणां दोषदुर्बले। सम्यक्कुर्यादुपशमं पक्वानां च विरेचनैः ॥२६॥
दोषों से दुर्बल हुए व्यक्ति में अपक्व दोषों को पाचक द्रव्यों तथा पक्व दोषों को विरेचनों के द्वारा शान्त करना चाहिये ॥२६॥
इतरस्यामयावेक्षं बलाप्यायनमिष्यते । समुदीर्णेषु सहसा दोषेष्वभिनवेषु च ॥२७॥
इनमें से दूसरे अर्थात् औषध से दुर्बल हुए व्यक्ति में सहसा उदीर्ण हुए तथा नवीन दोषों में बल की वृद्धि करनी चाहिये ॥२७॥
बलवद् दुर्बले वाऽपि कषायं वाऽपि भेषजम् । संरक्षन् धर्मयशसी न प्रयुञ्ज्यात् कदाचन ॥२८॥
धर्म तथा यश की रक्षा करते हुए व्यक्ति को दुर्बल रोगी में बलवान् कषाय अथवा अन्य ओषधि का कभी प्रयोग नहीं करना चाहिये। चरक चि. अ. ३ में कषाय निषेध में निम्न हेतु दिया है—स्तभ्यन्ते न विपच्यन्ते कुर्वन्ति विषमज्वरम्।
| विषमज्वरनिदर्शनीयाध्याय ? ] | खिलस्थानम् | ३५७ |
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दोषा बद्धाः कषायेण स्तम्भित्वात्तरुणे ज्वरे ।। अर्थात् कषाय रस प्रधान ओषधि नवज्वर में निषिद्ध है क्योंकि कषाय के स्तम्भक (Astringent) होने से दोष देह में स्तब्ध हो जाते हैं—उनका पाक नहीं हो पाता ॥२८॥
यथा शरत्सु महतोः क्रुद्धयोर्भिषक्तयोः। न धत्ते दुर्बला वेगं हस्तिनोरग्रवारणी ॥२९॥ तथा बलं बलवतोस्तद्दोषौषधयोर्द्वयोः। संक्षुब्धयोर्न सहते संतप्ता देहिनस्त¹तः ॥३०॥
जिस प्रकार शरद् ऋतु में मद से मस्त हुए महान् एवं क्रुद्ध हाथियों के वेग को दुर्बल हथिनी सहन नहीं कर सकती उसी प्रकार बलवान् तथा क्षुभित दोष और औषध दोनों के वेग को पीडित प्राणी सहन नहीं कर सकते हैं ॥२९-३०॥
पुष्णाति दुर्बलं दोषाः कषायः स्तम्भयत्यतः। भूयोऽभिवृद्धास्ते प्राणाञ्छिनन्त्याशु शरीरिणः ॥३१॥ कषायेणाकुलीभूताश्चिरं संक्लेशयन्ति वा।
दोष दुर्बल रोगी को पुष्ट करते हैं तथा कषाय उन दोषों का स्तम्भन करता है अर्थात् कषाय के द्वारा दोष शरीर में जड़वत् स्तब्ध हो जाते हैं। तथा फिर बढ़े हुए वे दोष शीघ्र ही मनुष्य के प्राणों को नष्ट कर देते हैं अथवा कषाय के द्वारा व्याकुल हुए दोष बहुत देर तक क्लेश पहुंचाते हैं। चरक में भी कहा है—न कषायं प्रयुञ्जीत नराणां तरुणे ज्वरे। कषायेणाकुलीभूता दोषा जेतुं सुदुष्कराः ॥३१॥
भग्नवेगेषु दोषेषु विधिना लङ्घनादिना ॥३२॥ काले प्रयुक्तं भेषज्यं स्याद्विकारोपशान्तये ।
दोषों का वेग नष्ट हो जाने पर लङ्घन आदि विधि के द्वारा उचितकाल में प्रयुक्त की हुई औषध विकारों को शान्त करती है ॥३२॥
लङ्घनं स्वेदनं पेया त्रिविधा दीपमान्विता। ओदनस्त्रिविधो यूषः कषायस्त्रिविधो रसः ॥३३॥ सर्पिरभ्यञ्जनं बस्तिः प्रदेहः सावगाहनः। ज्वरापहः समुद्दिष्टो लङ्घनादिरयं क्रमः ॥३४॥
लङ्घन आदि क्रम—लङ्घन, स्वेदन, तीन प्रकार की दीपन पेया, ओदन, तीन प्रकार का यूष, कषाय, तीन प्रकार का रस, घृत, अभ्यङ्ग, बस्ति, प्रदेह, अवगाहन—यह ज्वर को नष्ट करने वाला लङ्घन आदि क्रम कहा गया है ॥३३-३४॥
पच्यन्ते सप्तरात्रेण दोषाः सप्तसु धातुषु । तस्मात् कषायं सप्ताहे पाचनीयं विधापयेत् ॥३५॥ शमनं स्त्रंसनीयं वा यथावस्थमतः परम् ।
सात दिन में सातों धातुओं में स्थित दोषों का पाचन हो जाता है। इसलिये सात दिन के बाद अर्थात् आठवें दिन पाचन कषाय पिलाना चाहिये। पाचन से अभिप्राय अपक्व आहार, रस तथा दोषों के परिपाक से है। च. चि. अ. ३ में भी कहा है—प्राचनं शमनीयं वा कषायं पाययेत्तु तम्। ज्वरितं षडहेऽतीते लघ्वन्नप्रतिभोजितम् ॥ छठे दिन के व्यतीत हो जाने पर अर्थात् सातवें दिन जिसने लघु अन्न खाया हो उसे पाचन तथा शमनीय कषाय देना चाहिये। ज्वर की तरुणता नष्ट होने के बाद ही कषाय के देने का विधान है। यह तरुणता प्रायः ७ दिन होती है। यहां ज्वर के प्रारंभ होने के दिन का परिगणन न करते हुए ही कहा गया है इसी लिये सामान्य रूप से ही छठे दिन के व्यतीत होने पर कहा गया है। यदि ज्वर का प्रारंभ दिन गिना जाय तो सातवें दिन के व्यतीत होने पर अर्थात् आठवें दिन होगा। इसलिये इस संहिता
१. शरदि मदेन मिथो व्यतिषक्तयोः क्रुद्धयोर्हस्तिनोर्वेगं दुर्बला हस्तिनी न सहते तथैव बलवतोर्दोषौषधयोर्वेगं पीडिता देहिनः सोढुं न शक्नुवन्ति, तेन दोषवृद्धयवस्थायां दुर्बले रोगिणि प्रबलं कषायमपि न प्रयुञ्जीतेत्यर्थः ।
३५८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विषमज्वरनिर्दशीयाध्याय ? ]
तथा चरक के वचनों में परस्पर विरोध नहीं है केवल थोड़ा सा शब्दों का ही अन्तर है । इसी लिये कहा है—आसप्तरात्रं तरूणं ज्वरमाहुर्मनीषिणः । इसी लिये पहले इसी अध्याय में सात दिन के बाद दोषों के पक जाने पर ज्वर की निरामता बताते हुए भी आठवें दिन का परिगणन किया गया है—लघुत्वं चाष्टरात्रे च निरामज्वरमादिशेत् । इसलिये तरुण ज्वर में साधारणतया आठवें दिन ही कषायरूप मुख्य औषध का सेवन कराना चाहिये, इसके बाद अवस्थानुसार शमन तथा स्त्रंसन कषाय का प्रयोग करना चाहिये ॥३५॥
मन्दोष्मत्वात् स्थिरत्वाच्च गुरुत्वाच्च कफज्वरः ।। ३६ ।। परिपाकं चिरादेति तस्मादस्यौषधक्रमः । अष्टाहात् परतो वाऽपि यथापाकं विधीयते ।। ३७ ।।
ऊष्मा (उष्णता) के कम होने से, स्थिर होने से तथा गुरु होने से कफ ज्वर का देर में पाक होता है अतः पाक के अनुसार आठवें दिन के बाद उसके कषाय रूप मुख्य ओषधि का क्रम प्रारंभ किया जाता है ॥३६-३७॥
पक्वावशेषस्तेनाशु पच्यतेऽग्निश्च दीप्यते । दोषपक्त्याऽग्निदीप्त्या च ज्वरस्यापचयो ध्रुवम् ।। ३८ ।।
इससे पचने से बचे हुए दोषों का शीघ्र ही पाक हो जाता है तथा जाठराग्नि प्रदीप्त होती है । इसी प्रकार दोषों के पाक तथा अग्नि के प्रदीप्त होने से ज्वर निश्चित रूप से शान्त हो जाता है ॥३८॥
तद्युक्तस्नेहसंस्कारान् रसानत्रावचारयेत् । ततः संशमनं कुर्याद्व्याधिशेषोपशान्तये ।। ३९ ।।
फिर बचे हुए रोग की शान्ति के लिये उचित स्नेह के संस्कारों से युक्त रसों का प्रयोग करे तथा उसके बाद दोषों का शमन करे ॥३९॥
प्रसादनार्थं धातूनां बलस्याप्यायनाय च । देशदोषाग्निसात्म्यर्तुयुक्तं चात्र प्रशोषणम् ।। ४० ।। त्र्यहं चतुरहं वाऽपि नातिमात्रमतः परम् । रूक्षत्वाज्ज्वर्यमाणाय देयं सर्पिर्ज्वरापहम् ।। ४१ ।। ज्वरितोऽनेन निर्वाति प्रदीप्तं चाम्बुना गृहम् ।
धातुओं के प्रसाद तथा बल की प्राप्ति के लिये देश, दोष, जाठराग्नि, सात्म्य तथा ऋतु के अनुसार तीन या चार दिन दोषों का शोषण करना चाहिये, इससे अधिक नहीं । तथा इसके बाद रूक्ष होने के कारण ज्वर रोगी को स्वल्प मात्रा में ज्वरनाशक घृत का प्रयोग कराना चाहिये । जिस प्रकार जलता हुआ घर जल के द्वारा बुझ जाता है उसी प्रकार ज्वर का रोगी घृत के प्रयोग से शान्ति को प्राप्त करता है । चरक चि. अ. ३ में घृतपान का निम्न अवस्था में प्रयोग करने का विधान दिया है—अत ऊर्ध्वं कफे मन्दे वातपित्तोत्तरे ज्वरे । परिपक्वेषु दोषेषु सर्पिष्पानं यथाऽमृतम् ॥ अर्थात् दोषों के पूर्णतया पक जाने पर घृत का पान कराना चाहिये ॥४०-४१॥
सर्पिः पित्तं शमयति शैत्यात् स्नेहाच्च मारुतम् ।। ४२ ।। समानगुणमप्येतत् संस्काराज्जीयते कफम् ।
शीतल गुण वाला होने के कारण घृत पित्ता का तथा स्निग्ध होने के कारण वायु का शमन करता है । तथा समान गुण वाला होते हुए भी यह संस्कार के द्वारा कफ को शान्त करता है । चरक नि. अ. १ में भी कहा है—जीर्णज्वरेषु तु सर्वेष्वेव सर्पिषः पानं प्रशस्यते यथास्वौषधसिद्धस्य, सर्पिर्हि स्नेहाद्वातं शमयति संस्कारात्कफं, शैत्यात्पित्तमूष्माणं च । स्नेहाद्वातं शमयति शैत्यात्पित्तं नियच्छति । घृतं तुल्यगुणं दोषं संस्कारात्तु जयेत्कफम् ॥४२॥
अथ चेद्बहुदोषत्वात् कृतेऽपि शमने सति ।। ४३ ।। पक्वाशयगुरुत्वं च स्तिमितत्वं च लक्ष्यते । स्वेदो विण्मूत्ररागश्च भक्तस्यानभिनन्दनम् ।। ४४ ।। स्निग्धाय क्षामदेहाय दद्यात्तत्र विरेचनम् ।
| विषमज्वरनिर्दंशीयाध्याय ? ] | खिलस्थानम् | ३५९ |
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यदि दोषों की अधिकता के कारण दोषों का शमन करने पर भी पक्वाशय में भारीपन, स्तिमितता, स्वेद, मल एवं मूत्र का रागयुक्त होना तथा भोजन में अरुचि हो तो स्निग्ध तथा दुर्बल शरीर वाले रोगी को विरेचन देना चाहिये ॥४३-४४॥
शूले पक्वाशयगते पार्श्वपृष्ठकटिग्रहे ॥४५॥
वातविण्मूत्रसङ्गे च निरूहः सानुवासनः । बहिर्मार्गगते चापि ज्वरेऽभ्यङ्गादिरिष्यते ॥४६॥
पक्वाशय में शूल होने पर तथा पार्श्वग्रह, पृष्ठग्रह, कटिग्रह तथा वायु, मल एवं मूत्र की रुकावट में अनुवासन और निरूहबस्ति देनी चाहिये । तथा यदि ज्वर बहिर्मार्गगत (बहिर्वेग) हो तो अभ्यङ्ग (मालिश) आदि करनी चाहिये ॥
नरस्य वातप्रकृतेर्यदि स्याद्वातिको ज्वरः । ऋतौ च वातप्रकृतौ स दुःसाध्यस्त्रिसंकरः ॥४७॥
तथैव पित्तप्रकृतेः श्लैष्मिकस्य च देहिनः । विपरीतप्रकृतयः सुखसाध्या ज्वरादयः ॥४८॥
यदि वात प्रकृति वाले मनुष्य को वातिक ज्वर हो अथवा वात प्रकृति वाली ऋतु (वर्षा) में ज्वर हो तो वह तीनों दोषों के मिल जाने से कष्ट साध्य होता है। इसी प्रकार पित्त एवं श्लेष्म प्रकृति वाले मनुष्य को यदि पैत्तिक अथवा श्लैष्मिक ज्वर हो या पित्त और श्लेष्म प्रकोपक (शरद् तथा वसन्त) ऋतु में ज्वर हो तो वे कष्टसाध्य होते हैं । ज्वर आदि विपरीत प्रकृति वाले सुखसाध्य होते हैं । चरक में प्राकृत ज्वर को यद्यपि सुखसाध्य कहा है तथापि वर्षा ऋतु में होने वाला वातिक ज्वर प्राकृत होता हुआ भी कष्ट साध्य माना गया है । इसीलिये चि. अ. ३ में कहा है—प्रायेणानिलजं दुःखं कालेष्वन्येषु वैकृतम् ॥४७-४८॥
एकद्वित्रिप्रकृतयो व्याधयः सर्व एव हि । सुखदुःखश्चिकित्स्याः स्युः प्रायशस्ते यथाक्रमम् ॥४९॥
एक, दो अथवा तीन प्रकृति वाली सम्पूर्ण व्याधियां प्रायः क्रमशः सुखसाध्य अथवा दुःखसाध्य होती हैं ॥४९॥
समुत्क्लिष्टेषु दोषेषु त्रिविधं कर्म निश्चितम् । शोधनं शमनं चैव तथा शमनशोधनम् ॥५०॥
दोषों का उत्क्लेश होने पर तीन प्रकार का कर्म किया जाता है—१. शोधन, २. शमन, ३. शमन-शोधन ॥५०॥
तत्र पुंसां बलवतां (मन्द) वह्निमतां सताम् । तीव्रवेगामयानां न हितं शोधनमौषधम् ॥५१॥
शोधन ओषधि किन्हें देनी चाहिये—बलवान् तथा मन्द अग्नि वाले पुरुषों को यदि रोग तीव्र वेग वाले हों तो उन्हें शोधन ओषधि देनी चाहिये ॥५१॥
बलिनामल्पदोषाणां नातिवृद्धविकारिणाम् । नातिक्लेशसहानां च शमनं हितमुच्यते ॥५२॥
शमन ओषधि—बलवान्, अल्प दोष वाले तथा अधिक क्लेश न सह सकने वाले व्यक्तियों में यदि विकार अत्यधिक बढ़े हुए नहीं हैं तो शमन ओषधि का प्रयोग हितकर होता है ॥५२॥
तथैव मध्यदोषाणां दुर्बलानां शरीरिणाम् । बलवद्व्याधिजुष्टानां हितं शमनशोधनम् ॥५३॥
शमन शोधन ओषधि—इसी प्रकार यदि मध्य दोष वाला दुर्बल व्यक्ति बलवान् व्याधि से पीड़ित हो तो उसे शमन शोधन ओषधि देनी चाहिये अर्थात् ऐसी ओषधि का प्रयोग करना चाहिये जो दोषों का शमन भी करे तथा उनका शोधन भी करे ॥५३॥
ऊर्ध्वं हरति यद्दोषानधश्चोभयतश्च यत् । द्रव्यं विविधवीर्यत्वात्तद्धि संशोधनं स्मृतम् ॥५४॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २०३ तमं पत्रम्)
| ३६० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | विषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ] |
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जो द्रव्य ऊर्ध्व, अधः अथवा दोनों मार्गों के द्वारा दोषों को निकालता हो उसे विविध प्रकार के वीर्य वाला होने से संशोधन द्रव्य कहते हैं। अष्टाङ्गसंग्रह सू. अ. २४ में इसका निम्न लक्षण दिया है—यदिरेयेद्वहिर्दोषान् पञ्चधा शोधनं च यत्। निरूहो वमनं कायशिरोरेकोऽस्रविस्रुतिः॥ अर्थात् यह बाह्य एवं आभ्यन्तर दो प्रकार का होता है ॥५४॥
नाधो न चोर्ध्वं हरति यद्दोषाञ्छमयत्यपि। न चोग्रगुणवीर्यं तद् द्रव्यं संशमनं विदुः ॥५५॥
जो द्रव्य ऊर्ध्व अथवा अधोमार्ग से दोषों को निकालता नहीं है परन्तु उनका शमन करता है तथा जिसका गुण एवं वीर्य उग्र नहीं है उसे संशमन कहते हैं। अष्टाङ्गसंग्रह सू. अ. २४ में कहा है—न शोधयति यद्दोषान् समान्नोदीरयत्यपि। समीकरोति विषमान् शमनं तत्॥ यह तीन प्रकार का होता है १. दैवव्यपाश्रय-मन्त्रौषधि, मंगल, बलि उपहार आदि द्वारा। २. बाह्य लेप, परिषेक आदि द्वारा तथा ३. आभ्यन्तर पाचन, लेखन, बृंहण आदि द्वारा ॥५५॥
नात्यर्थं शोधयति यद्दोषान् संशमयत्यपि। तत्र मध्यबलोपेतं द्रव्यं शमनशोधनम् ॥५६॥
जो द्रव्य दोषों का अत्यधिक शोधन न करता हो तथा शमन करता हो उस मध्य बल वाले द्रव्य को शमन-शोधन कहते हैं ॥५६॥
दशमूलशटीरास्नावयस्थापञ्चकोल कम् ।
शार्ङ्गेष्टा रोहिणी पाठा सरलो देवदारु च। मुस्ताऽमृता वृश्चिकाली कर्कटाख्या दुरालभा ॥५७॥
त्रायन्तीत्येवमादीनि शमनीयानि निर्दिशेत्।
शमनीय द्रव्य—दशमूल, कपूरकचरी, रास्ना, वयस्था (हरड़), पञ्चकोल (पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक तथा सोंठ), शार्ङ्गेष्टा (काकजंघा अथवा काकमाची), रोहिणी, पाठा, सरल (चीड़), देवदारु, नागरमोथा, गिलोय, वृश्चिकाली (बिछवा घास), काकड़ाशृंगी, दुरालभा तथा त्रायन्ती (त्रायमाणा)-इत्यादि शमनीय ओषधियां हैं ॥५७॥
वचाकोशातकीनिम्बपिप्पल्यः कौटजं फलम् ॥५८॥
क्षारद्वयं सगोमूत्रं मदनं लवणानि च। त्रिफलाऽऽरग्वधो दन्ती नीलिनी सप्तला त्रिवृत् ॥५९॥
एवमादि तु यच्चान्यद् द्रव्यं शोधनमुच्यते।
शोधन द्रव्य—बच, कोशातकी (कटुतम्बी), नीम, पिप्पली, कुटज का फल (इन्द्रजौ), दोनों क्षार (सर्ज क्षार तथा यवक्षार), गोमूत्र, मैनफल, पांचो नमक, त्रिफला, अमलतास, दन्ती (जमालगोटा), नीलिनी, सातला, त्रिवृत्-इत्यादि तथा इसी प्रकार के अन्य भी शोधन द्रव्य कहलाते हैं ॥५८-५९॥
काश्मर्यमलकं द्राक्षा शीतपाकी परूषकम् ॥६०॥
मधुकं पिप्पलीमूलं विडङ्गं हिङ्गु सैन्धवम्। पाठाऽजगन्धाऽतिविषा पथ्या मुस्ता कटुत्रिकम् ॥६१॥
रोहिणीत्येवमादि स्याद् द्रव्यं शमनशोधनम्।
शमन-शोधन द्रव्य—काश्मरी (गंभारी), आंवला, द्राक्षा, शीतपाकी (काकोली), फालसा, मुलहठी, पिप्पलीमूल, विड़ङ्ग, हींग, सैन्धा नमक, पाठा, अजगन्धा, अतीस, हरड़, नागरमोथा, त्रिकटु तथा रोहिणी इत्यादि-शमनशोधन द्रव्य हैं ॥६०-६१॥
त्रिविधं कर्म निर्दिष्टमित्येतद्दोषशान्तये ॥६२॥
इस प्रकार दोषों को शान्त करने के लिये यह तीन प्रकार का कर्म कहा गया है ॥६२॥
दोषशान्तौ च धातूनां प्रसाद उपजायते। मलायनानां सर्वेषामव्याघातक्रियासु च ॥६३॥
विषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ] खिलस्थानम् ३६१
दोषधातुमलैस्तस्मात् स्वे स्वे कर्मण्यवस्थितैः । स्वास्थ्यमुत्पद्यते नृणामस्वास्थ्यं तद्विपर्यये ॥६४॥
दोषों के शान्त हो जाने पर तथा सम्पूर्ण मल स्थानों के व्याघात (उपद्रव) रहित हो जाने पर धातुओं में प्रसन्नता उत्पन्न होती है अर्थात् प्रसाद गुण की अधिकता हो जाती है। इस प्रकार दोष, धातु एवं मलों के अपने २ कार्य में स्थित होने पर मनुष्य स्वस्थ रहते हैं तथा इसके विपरीत अर्थात् दोष, धातु एवं मलों के अपने २ कार्य में स्थित न होने पर मनुष्य अस्वस्थ हो जाता है ॥६३-६४॥
सम्यगाहारचेष्टाभ्यां यदा सात्म्यं यथेरितम् । समानां रक्षणं कुर्याद्दोषादीनां विचक्षणः ॥६५॥
कुपितानां प्रशमनं क्षीणानामभिवर्धनम् । क्षपणं चैव वृद्धानामेतावद्वि चिकित्सितम् ॥६६॥
जब सम्यक् प्रकार के आहार एवं चेष्टाओं के द्वारा सात्म्य हो जाता है तब बुद्धिमान् व्यक्ति को समान अवस्था में स्थित दोष आदियों का रक्षण करना चाहिये। तथा कुपित दोषों का शमन, क्षीण हुए दोषों की वृद्धि और बढ़े हुए दोषों की कमी करनी चाहिये। इसे ही चिकित्सा कहते हैं ॥६५-६६॥
तदेकत्वमनेकत्वमवस्थामुदयव्ययम् । दोषाणामातुराणां च संप्रधार्य बलाबलम् ॥६७॥
यथावदौषधानां च भिन्नानां नामरूपतः । रसान् गुणांश्च वीर्यं च विपाकं च यथातथम् ॥६८॥
देशं कालमुपायं च प्रमाणं व्याधिमेव च । ज्ञात्वा चिकित्सा भिषजा प्रणेतव्याऽप्रमादतः ॥६९॥
चिकित्सक को दोष तथा रोगी के एकत्व, अनेकत्व, उदय (उद्भव-प्रकट होना), व्यय (नाश) तथा बल एवं अबल को देखकर तथा नाम एवं रूप के अनुसार भिन्न २ ओषधियों के यथावत् रस, गुण, वीर्य, विपाक, देश, काल, उपाय, प्रमाण तथा व्याधि को जानकर प्रमादरहित होकर चिकित्सा करनी चाहिये ॥६७-६९॥
ये यथा च समुद्दिष्टा योगाः स्वे स्वे चिकित्सिते ।
ते तथैव प्रयोक्तव्या न तेष्वस्ति विचारणा ॥७०॥
अपनी २ चिकित्सा में जो योग जिस २ रूप में दिये हैं उनका उसी २ रूप में प्रयोग करना चाहिये, इसमें विशेष विचार की आवश्यकता नहीं है अर्थात् उनमें तर्क नहीं करना चाहिये ॥७०॥
को हि नाम प्रणीतानां द्रव्याणां तत्त्वदर्शिभिः । नानाविधानामेकत्वे तत्कर्म ज्ञातुमर्हति ॥७१॥
तत्त्वदर्शी ऋषियों के द्वारा प्रणीत नाना प्रकार के द्रव्यों के एकत्व (एकत्र) हो जाने पर उनके कर्मों को कौन जान सकता है अर्थात् उनके कर्मों को जानना अत्यन्त कठिन है ॥७१॥
किञ्चिदन्यरसं द्रव्यं गुणतः किञ्चिदन्यथा । वीर्यतश्चान्यथा किञ्चिद्विद्यादत्र विपाकतः ॥७२॥
अथ चैकत्वमागम्य प्रयोगे न विरुध्यते । उत्पद्यते यथार्थं च समवायगुणान्तरम् ॥७३॥
पृथक्पृथक्प्रसिद्धेऽपि गन्धे गन्धान्तरं यथा । गन्धाङ्गानां मनोल्हादि प्रत्यक्षं सामवायिकम् ॥७४॥
कुछ द्रव्य रस के द्वारा भिन्न होते हैं, कुछ गुण तथा वीर्य, एवं कुछ विपाक के द्वारा भिन्न होते हैं। इनकी परस्पर एकता हो जाने पर ये प्रयोग में विरुद्ध नहीं होते। समवाय में अर्थात् उनके परस्पर मिल जाने पर यथार्थ गुणान्तर की उत्पत्ति होती है। जिस प्रकार पृथक् २ प्रसिद्ध गन्ध वाले द्रव्यों की गन्ध के परस्पर मिल जाने से प्रत्यक्ष रूप से मन को आह्लादित करने वाली भिन्न ही गन्ध उत्पन्न होती है। अर्थात् भिन्न २ रस, वीर्य एवं विपाक वाले द्रव्यों के परस्पर संयुक्त हो जाने पर एक नया ही द्रव्य बन जाता है जो गुणों में उन सबसे भिन्न ही होता है ॥७२-७४॥
तस्मादार्षप्रयोगेषु प्रक्षेपापचयं प्रति । न प्रमाद्येद्विज्ञाय दोषौषधबलाबलम् ॥७५॥
३६२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | भेषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ]
इसलिये आर्षयोगों के प्रक्षेप तथा अपचय (वृद्धि तथा ह्रास) में दोष तथा औषध के बलाबल को जाने बना प्रमाद नहीं करना चाहिये ।।७५।।
वयः शरीराग्निबलं त्ववेक्ष्य मतिमान् भिषक् । मात्रां विकल्पयेदत्र प्रधानावरमध्यतः ।।७६।।
बुद्धिमान चिकित्सक रोगी के शरीर तथा अग्निबल को देख कर प्रधान, अवर तथा मध्य के अनुसार मात्रा का निश्चय करे ।।
इति ज्वराणामुद्दिष्टो विशेषोऽयमुपक्रमे । यं विदित्वा तु कार्येषु विविधेषु न संभ्रमेत् ।।७७।।
इस प्रकार ज्वरों की चिकित्सा में यह विशेष क्रम कहा गया है । जिसे जानकर विविध कार्यों में मतिभ्रम उत्पन्न नहीं होता ।।७७।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।७८।।
चू¹ ह ७५
(इति खिलेषु) विशेषनिर्देशीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २०४ तमं पत्रम्)
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।७८।।
चू² ह ७५
(इति खिलेषु) विशेषनिर्देशीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः ।।
भैषज्योपक्रमणीयस्तृतीयाध्यायः ।
अथातो भैषज्योपक्रमणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम भैषज्योपक्रमणीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।१-२।।
ब्राह्म्या श्रिया प्रज्वलन्तं ब्रह्मर्षिममितद्युतिम् । कश्यपं लोककर्तारं भार्गवः परिपृच्छति ।।३।।
१. 'चू' इति सप्ततेः, ह इति पञ्चकस्य अक्षराङ्कनिर्देशरीतिः प्राचीनपुस्तकेषु, तथैवात्रापि मूलताडपत्रपुस्तके एतदध्यायान्ते श्लोकमानमादाय अक्षराङ्कसङ्केतनिर्देशोऽयम्, आद्यन्तगद्यवाक्यवर्जमध्यगतश्लोकानामत्र ७५ संख्याऽस्ति, एवमेवाग्रेऽपि क्वचित् क्वचिदेवंविधाः संख्यासङ्केता दृश्यन्ते ।
२. प्राचीन पुस्तकों में 'चू' द्वारा ७० तथा 'ह' द्वारा ५ अक्षर के निर्देश की रीति है । उसी प्रकार यहां मूल ताडपत्र पुस्तक में भी इस अध्याय के अन्त में श्लोकों की संख्या के अनुसार यह अक्षरों का संकेत दिया गया है । आदि तथा अन्त के गद्य वाक्यों को छोड़कर बीच के श्लोकों की संख्या यहां ७५ है । इसी प्रकार आगे भी-कहीं २ ऐसी संख्याओं के सङ्केत दिये गये हैं ।
| भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ] | खिलस्थानम् | ३६३ |
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ब्राह्मतेज के द्वारा प्रज्वलित, अत्यन्त कान्ति वाले तथा लोकगुरु ब्रह्मर्षि कश्यप से भार्गव (वृद्धजीवक) ने प्रश्न किया।
आबाधकारणं व्याधिर्भेषजं सुखकारणम्। सम्यग्युक्तं तदमृतं स्यात्तदन्यद्विषवद्भवेत् ।।४।।
व्याधि (कष्ट) रोगों का कारण है तथा औषध सुख (स्वास्थ्य) का कारण है। सम्यक् प्रकार से प्रयुक्त की गई ओषधि अमृत के समान तथा अन्यथा प्रयुक्त की हुई विष के समान होती है ।।४।।
भेषजोपक्रमं तस्माद्भगवन्! वक्तुमर्हसि ।
औषधं किमधिष्ठानं कथं चास्योपदिश्यते । औषधज्ञौषधत्वं च भेषजत्वमथापि च ।।५।।
भैषज्यत्वागदत्वं च कषायत्वं तथैव च । यथा च गौण्येन रसा द्रव्ये द्रव्ये व्यवस्थिताः ।।६।।
प्राधान्येन यथा दृष्टो मधुके मधुरो रसः ।
अम्लः कपित्थे, लवणः सैन्धवे, नागरे कटुः ।।७।।
तिक्तस्तिक्तकरोहिण्यां, कषायश्चाभयां प्रति । सत्येवं रसनानात्वे संयोगः सर्व एव हि ।।८।।
कषायत्वेन निर्दिष्टः कुतः किं चात्र कारणम् ।
कति के चौषधगुणा भेदाश्चास्य कति स्मृताः ।।९।।
कति चौषधकालाश्च काले काले च को विधिः ।
कस्यां कस्यामवस्थायां पातव्यं भेषजं न वा ।।१०।।
कथं च पेयं पीतस्य परिहार्यं च किं भवेत् ।
जीर्यमाणस्य किं रूपं किं च जीर्णस्य लक्षणम् ।।११।।
विभज्य वयसस्त्रित्वं कथं मात्रा विधीयते । अधोभागोध्र्वभागानां दोषसंशमनी च या ।।१२।।
जीवनीया च या मात्रा दीपनीया च या स्मृता ।
मात्रा संशोधनी या च स्नेहमात्रा च या भवेत् ।।१३।।
सर्वमेतद्यथातत्त्वं कीर्तयस्व महामुने ! । जातमात्रमुपादाय यावद्वर्षशतं परम् ।।१४।।
इसलिये हे भगवन् ! आप ओषधियों के उपक्रम का व्याख्यान कीजिये । ओषधि का क्या अधिष्ठान होता है ? ओषधि का ज्ञान, ओषधि, भेषज, भैषज्य, अगद तथा कषाय का किस प्रकार उपदेश किया जाता है ? भिन्न २ द्रव्यों में गौणरूप से भिन्न २ रस विद्यमान होते हैं परन्तु प्रधानता के कारण मुलहठी में मधुर रस, कपित्थ (कैथ) में अम्ल रस, सैन्धव में लवण रस, सोंठ में कटुरस, तिक्तरोहिणी में तिक्त रस तथा हरीतकी में कषाय रस माना जाता है । इस प्रकार रसों के नाना प्रकार होने पर भी उनके संयोग अथवा समुदाय को कषायरूप से क्यों कहा गया है—इसका क्या कारण है ? औषध के कितने क्या कौन २ से गुण होते हैं ? इसके भेद कौन २ से होते हैं ? औषध के कितने काल होते हैं ? भिन्न २ काल में औषध सेवन की क्या विधि है ? किस अवस्था में औषध का प्रयोग करना चाहिये तथा किस में नहीं ? ओषधि किस प्रकार पीनी चाहिये ? ओषधि पीने बाद क्या परहेज होना चाहिये ? ओषधि के जीर्ण होते हुए तथा जीर्ण हो जाने के बाद क्या लक्षण होते हैं ? बालक के उत्पन्न होने से लेकर १०० वर्ष तक आयु को तीन भागों में विभक्त करके अधोभाग तथा ऊर्ध्वभाग द्वारा दोषों का संशमन करने वाली, जीवनीया, दीपनीय, संशोधनी तथा स्नेहमात्रा का किस प्रकार विभाग किया जाता है ? इन सबका आप सम्यक् प्रकार से उपदेश कीजिये ॥५-१४॥
इति शुश्रूषमाणाय शिष्याय वदतांवरः । आचचक्षे यथान्यायं भैषज्योपक्रमं प्रति ।।१५।।
३६४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ]
इस प्रकार सुनने की इच्छा वाले शिष्य को ज्ञानी महर्षि कश्यप ने यथायोग्य भैषज्योपक्रम का उपदेश किया ॥१५॥
अयं हेतुरिदं लिङ्गमस्य चायमुपक्रमः । इति तावत् परं सूक्ष्मं व्याधिज्ञानं प्रचक्षते ॥१६॥
रोग का अमुक हेतु, अमुक लिङ्ग (लक्षण) तथा अमुक चिकित्सा है। इस प्रकार रोग का ज्ञान अत्यन्त सूक्ष्म होता है ॥
अस्मादप्यौषधज्ञानमाहुः सूक्ष्मतरं बुधाः । तदहं तेऽभिधास्यामि कार्त्स्न्यैनैव निबोध मे ॥१७॥
ज्ञानी लोग रोग की अपेक्षा भी ओषधि के ज्ञान को अधिक सूक्ष्म बतलाते हैं। इसलिये मैं सम्पूर्ण रूप से तुझे ओषधि के ज्ञान का उपदेश करूंगा। वह तू मेरे से सुन ॥१७॥
पथ्यसेविनमारोग्यं गुणेन भजते नरम् । अपथ्यसेविनं क्षिप्रं रोगः समभिमर्दति ॥१८॥
पथ्य का सेवन करने वाले व्यक्ति को स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है तथा कुपथ्य का सेवन करने वाले को सदा रोग घेरे रहते हैं ॥१८॥
स रोगो द्विविधश्चोक्तः शारीरो मानसस्तथा ।
आधयो मानसास्तत्र शारीरा व्याधयः स्मृताः ॥१९॥
साध्योऽसाध्यश्च याप्यश्च त्रिविधं रोगलक्षणम् ।
वह रोग दो प्रकार का होता है—१. शारीरिक, २. मानसिक। मानसिक रोगों को आधि तथा शारीरिक रोगों को व्याधि कहते हैं। साध्य, असाध्य तथा याप्य भेद से रोगों के तीन प्रकार के लक्षण होते हैं।
वक्तव्य—चरक सू. अ. १ में भी कहा है—'शरीरं सत्वसंज्ञं च व्याधीनामाश्रयो मतः' अर्थात् ये दो ही रोगों के आश्रय माने जाते हैं। कई रोग केवल शरीर का आश्रय लेकर होते हैं जैसे–कुष्ठ। कई रोग केवल मन का आश्रय लेते हैं जैसे–काम तथा कुछ रोग ऐसे होते हैं जो शरीर तथा मन दोनों का आश्रय लेकर होते हैं जैसे—उन्माद। शारीरिक रोग का मन पर तथा मानसिक रोग का शरीर पर थोड़ा बहुत प्रभाव अवश्य पड़ता है। चरक में शरीर, मन तथा आत्मा–इन तीन पर ही लोक स्थिति बतलाई है अर्थात् ये तीनों आधारस्तम्भ माने गये हैं। इन तीनों के संयोग से ही प्राणी स्थिर रहते हैं। इन तीनों में से शरीर तथा मन में तो विकार उत्पन्न होते हैं परन्तु निर्विकार होने से आत्मा में विकार उत्पन्न नहीं होते। इसीलिये दो प्रकार के ही रोग माने गये हैं। चरक सू. अ. १ में कहा भी है—निर्विकारः परस्त्वात्मा सत्वभूतगुणेन्द्रियैः ॥१९॥
वातपित्तकफा दोषाः शारीरव्याधिहेतवः ॥२०॥
सत्त्वेतरं च द्वन्द्वं च मानसामायहेतवः ।
वात, पित्त तथा कफ दोष शारीरिक रोगों के कारण होते हैं। तथा सत्व गुण को छोड़कर शेष रज और तम मानसिक रोगों के कारण माने जाते हैं।
वक्तव्य—चरक सू. अ. १ में भी कहा है—वायुः पित्तं कफश्चोक्तः शारीरो दोषसंग्रहः। मानसः पुनरुद्दिष्टो रजश्च तम एव च ॥ अर्थात् वात, पित्त तथा कफ शारीरिक रोगों को उत्पन्न करते हैं। ये तीनों जब तक समावस्था में रहते हैं तब तक शरीर स्वस्थ रहता है उस अवस्था में ये शरीर को धारण करते हैं इसलिये उसका नाम धातु भी है। परन्तु जब ये दूषित हो जाते हैं तब रोगों को उत्पन्न करते हैं उस अवस्था में इन्हें दोष कहते हैं। मानसिक दोष रज एवं तम ये दो ही माने जाते हैं। यद्यपि सत्त्व, रज और तम ये तीन गुण होते है तथापि इनमें सत्त्व के शुद्ध एवं अविकारी होने से इसे
| भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ] | खिलस्थानम् | ३६५ |
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दोष नहीं माना जाता है। वृद्ध वाग्भट की टीका में कहा भी हैं—'मनः शुद्धं सत्त्वम्। रजस्तमसो दोषौ तयोपप्लवावविद्यासम्भूतौ'। यदि सत्त्व को शुद्ध एवं अविकारी न माना जाय तो मोक्ष सम्भव नहीं है। क्योंकि सत्त्व के बिना यथार्थज्ञान नहीं होता तथा जब तक यथार्थ ज्ञान न हो तब तक मुक्ति नहीं होती। इसीलिये कहा भी है—'ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः' इसलिये सत्त्व को दोष नहीं माना जाता। केवल रज और तम ही मन को दूषित करने के कारण मानसिक रोगों के कारण माने गये हैं। अष्टाङ्ग हृदय में भी कहा है—'वायुः पित्तं कफश्चेति त्रयो दोषाः समासतः' तथा—'रजस्तमश्च मनसो द्वौ च दोषावुदाहृतौ ॥२०॥
धृतिवीर्यस्मृतिज्ञानविज्ञानैर्मानसं जयेत् ॥२१॥
शारीरं भेषजैः कालयुक्तिदैवव्यपाश्रयैः ।
मानसिक रोगों को धृति, वीर्य, स्मृति, ज्ञान तथा विज्ञान के द्वारा तथा शारीरिक रोगों को कालव्यपाश्रय, युक्तिव्यपाश्रय तथा दैवव्यपाश्रय ओषधियों के द्वारा जीते।
**वक्तव्य—**चरक सू. अ. १ में कहा है—प्रशाम्यत्यौषधैः पूर्वो दैवयुक्तिव्यपाश्रयैः ।। मानसो ज्ञानविज्ञानधैर्यस्मृतिसमाधिभिः ।। अर्थात् शारीर दोष, दैवव्यपाश्रय तथा युक्तिव्यापश्रय ओषधियों से शान्त होते हैं और मानस दोष ज्ञान-विज्ञान आदि द्वारा शान्त होते हैं। दैवव्यपाश्रय से बलि, मन्त्र, मङ्गल तथा सदाचार आदि का ग्रहण होता है तथा युक्तिव्यपाश्रय से दोष आदि की विवेचनापूर्वक यथावत् औषध प्रयोग का ग्रहण होता है। अर्थात् पूर्वकर्मज शारीर व्याधियों की दैवव्यपाश्रय तथा दोषज व्याधियों की युक्तिव्यपाश्रय चिकित्सा करनी चाहिये ॥२१॥
स पुनर्द्विविधो व्याधिरागन्तुर्निज एव च ॥२२॥
आगन्तुर्बाधते पूर्वं पश्चाद्दोषान् प्रपद्यते । निजस्तु चीयते पूर्वं पश्चाद्वृद्धः प्रबाधते ॥२३॥
व्याधि आगन्तु तथा निज के भेद से पुनः दो प्रकार की है। आगन्तु व्याधि पहले शरीर को कष्ट (व्यथा) पहुंचाती है तथा बाद में वातादि दोषों को प्रकुपित करती है। निज रोग में पहले से ही दोषों का संचय एवं प्रकोप होता है तथा बाद में वे शरीर को कष्ट देते हैं। चरक सू. अ. २० में भी कहा है—आगन्तुर्हि व्यथापूर्वसमुत्पन्नो जघन्यं वातपित्तश्लेष्मणां वैषम्यमापादयति, निजे तु वातपित्तश्लेष्माणः पूर्वं वैषम्यमापाद्य ते, जघन्यं व्यथामभिनिर्वर्तयन्ति ॥२२-२३॥
तस्मादागन्तुरोगाणां पश्यन्ति निजवत् क्रियाः ।
निजानां पूर्वरूपाणि दृष्ट्वा संशोधनं हितम् ॥२४॥
इसलिये आगन्तु रोगों को भी निज रोगों की तरह ही चिकित्सा की जाती है। आगन्तु रोगों में निज रोगों के पूर्वरूपों को देखकर संशोधन कराना चाहिये। अर्थात् आगन्तु रोगों में निज रोगों के पूर्वरूप दिखाई देते ही अर्थात् लक्षण उत्पन्न होने से पूर्व ही यथायोग्य संशोधन आदि देना चाहिये ॥
संशोधनं सप्तविधं तदायत्तं चिकित्सितम् । तच्चायतं चतुष्पादे पादश्चौषधमुच्यते ॥२५॥
ओषधं युक्त्यधिष्ठानं दैवाधिष्ठानमेव च । युक्तिर्वमनकर्मादि दैवं यागादि कीर्त्यते ॥२६॥
संशोधन सात प्रकार का होता है तथा उसी पर चिकित्सा निर्भरर होती है। चिकित्सा चतुष्पाद पर निर्भर है तथा चतुष्पाद ही ओषधि कहलाता है। ओषधि युक्ति तथा दैव के आधीन होती है। वमन आदि क्रियाओं को युक्ति कहते हैं तथा यज्ञ आदि को दैव कहते हैं।
**वक्तव्य—**चतुष्पाद से अभिप्राय वैद्य, ओषधि, परिचारक तथा रोगी से है। इन चारों के गुण युक्त होने पर ही सम्यक् प्रकार से चिकित्सा हो सकती है। इसी संहिता के सूत्रस्थान अ. २६ में पहले कहा गया है—चत्वारः खलु