काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ] खिलस्थानम् ३५५
संतर्पणजन्य ज्वर में अल्पमात्रा में वमन का प्रयोग करे। दोषों की वृद्धि तथा उत्क्लेश होने पर सन्निपात ज्वर का भय होने से रोगी को शीघ्र ही अधिक मात्रा में वमन कराना चाहिये। वमन कराने के बाद रोगी की लङ्घन आदि के क्रम से चिकित्सा करे। अष्टाङ्ग हृदय चि. अ. १ में कहा है—तत्रोत्क्लिष्टे समुत्क्लिष्टे कफप्रायेचले मले। सहल्लासप्रसेकान्नद्वषकासविषूचिके ।। सद्योभुक्तस्य सञ्जाते ज्वरे सामे विशेषतः। वमनं वमनार्हस्य शस्तम् ।।११-१२।।
वमनानन्तरं चास्य कुर्याच्छीर्षविरेचनम् ।।१३।।
तथाऽऽशु शिरसः शूलं गौरवं चोपशाम्यति । विबन्धश्चक्षुरादीनामरुचिश्च निवर्तते ।।१४।।
वमन के बाद उसे शिरोविरेचन (नस्य) देवे। इससे उसके सिर का शूल तथा भारीपन शीघ्र ही शान्त हो जाता है। तथा विबन्ध और चक्षु आदियों की अरुचि दूर हो जाती है ।।१३-१४।।
जीर्णज्वरेऽप्यथैतेषु विकारेषु प्रदापयेत् । बहुदोषे बलवती मध्यदोषेषु मध्यमा ।।१५।।
अल्पदोषे ज्वरे मृद्वी क्रिया कार्या विजानता।
जीर्ण ज्वर में भी इन विकारों के होने पर शिरोविरेचन देना चाहिये। बुद्धिमान् व्यक्ति को ज्वर में दोषों के अधिक होने पर बलवान्, दोषों के मध्य होने पर मध्यम तथा दोषों के अल्प होने पर मृदु क्रिया करनी चाहिये ।।१५।।
स्वानि रूपाणि कार्त्स्न्येन यदा व्याधौ विशेषतः ।।१६।।
तीव्राणि व्यथितत्वं च शरीरस्योपलक्षयेत् । बहुदोषं तदा विद्यादल्पदोषमतोऽन्यथा ।।१७।।
तथा मध्यबलेष्वेषु मध्यदोषं विभावयेत् ।
जब रोग में अपने २ सम्पूर्ण लक्षण तीव्र अवस्था में दिखाई दें तथा शरीर व्यथित मालूम पड़े तब दोष अधिक मात्रा में जानने चाहिये। इसके विपरीत दोष अल्प समझने चाहिये। जब रोगों का बल मध्यम हो तब दोष मध्यम समझने चाहिये ।।१६-१७।।
विबन्धारुचितृण्मूर्च्छा गात्रभेदः शिरोरुजा ।।१८।।
प्रलापालस्यहल्लासतन्द्रीदाहश्रमभ्रमाः । मूत्रप्रचुरता ग्लानिः पुरीषस्याविपक्वता ।।१९।।
उत्क्लेशो गुरुकोष्ठत्वं लिङ्गान्यामज्वरे वदेत् ।
आमज्वर के लक्षण—विबन्ध, अरुचि, तृष्णा, मूर्च्छा, गात्रभेद (शरीर का टूटना), शिर की पीडा, प्रलाप, आलस्य, हल्लास (जी मचलाना), तन्द्रा, दाह, श्रम (थकावट), भ्रम, मूत्र की अधिकता, ग्लानि, मल का अपक्व होना, उत्क्लेश (दोषों की ऊर्ध्वगति होना) तथा कोष्ठ का भारी होना—ये आमज्वर के लक्षण होते हैं। चरक चि.अ. ३ में कहा है—अरुचिश्चाविपाकश्च गुरुत्वमुदरस्य च । हृदयस्याविशुद्धिश्च तन्द्रा चालस्यमेव च ।। ज्वरोऽविसर्गी बलवान् दोषाणामप्रवर्तनम्। लालाप्रसेको हल्लासो क्षुन्नाशो विरसं मुखम् ।। स्तब्धसुप्तगुरुत्वं च गात्राणां बहुमूत्रता । न विड्जीर्णा न च ग्लानिर्ज्वरस्यामस्य लक्षणम् ।।
निवृत्तौ प्रायशश्चैषां संजाते ज्वरमार्दवे ।।२०।।
लघुत्वं चाप्तरात्रे च निरामज्वरमादिशेत् ।
निराम ज्वर के लक्षण—उपर्युक्त लक्षणों के प्रायः दूर हो जाने पर, ज्वर के मृदु हो जाने पर तथा आठ दिन में शरीर के लघु हो जाने पर निरामज्वर कहलाता है। चरक चि. अ. ३ में कहा है—क्षुत्क्षामता लघुत्वं च गात्राणां ज्वरमार्दवम् । दोषप्रवृत्ति ष्टाहो निरामज्वरलक्षणम् ।। अन्यत्र भी कहा है—सप्ताहेनैव पच्यन्ते सप्तधातुगता मलाः । निरामश्चाप्यतः प्रोक्तो ज्वरः प्रायोऽष्टमेऽहनि ।। यहां आठवां दिन उपलक्षण मात्र है—इससे पूर्व अथवा पश्चात् भी निरामता