भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 716

३५६ कश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विषमज्वरनिदेशीयोऽध्याय ? ]

हो सकती है। इसी लिये कहा है—न च निःसप्ततैवैका निरामज्वरलक्षणम्। चिरादपि हि पच्यन्ते सन्निपातज्वरे मलाः ॥ सप्तरात्रातिवृद्धिंश्च ह्यामतादिस्वलक्षणम्। तस्मादेतद् द्वयं दृष्ट्वा निरामज्वरमादिशेत् ॥ यहां आठवां दिन इसी लिये कहा गया है कि इस समय ज्वर में मुख्य ओषधि दी जा सकती है। यदि आठवां दिन होने पर भी भूख लगना आदि लक्षण उपस्थित न हों तो मुख्य ओषधि न देकर पाचन ओषधि का ही प्रयोग करना चाहिये। यदि आठवां दिन भी हो तथा भूख आदि भी लगे तो शमन ओषधि देनी चाहिये। यदि दोषों का पाचन आठ दिन से पूर्व ही हो जाय तो मुख्य ओषधि उससे पूर्व भी दी जा सकती है। दोषों का पाचन ही मुख्य उद्देश्य है। आठवां दिन तो सामान्यरूप से कह दिया गया है। इसी लिये सुश्रुत में कहा है—अचिरज्वरितस्यापि देयं स्याद्दोषपाकतः ॥२०॥

आपातलक्ष्यः स्यादूष्मा तत्क्षणादेति मार्दवम् ॥२१॥
अन्तर्लघुत्वमुत्साहो दोषपक्तिः प्रसन्नता । तृष्णादीनां मृदुत्वं च बहिर्मार्गगते ज्वरे ॥२२॥
तत्राभ्यङ्गान् प्रदेहांश्च परिषेकांश्च कारयेत्।

बहिर्मार्गगत ज्वर के लक्षण—सर्वशरीरसंचारी एवं प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाली ऊष्मा उसी क्षण मृदु हो जाती है, शरीर के अन्तः अवयव लघु हो जाते हैं, शरीर में उत्साह होता है, दोष पक जाते हैं, शरीर प्रसन्न रहता है तथा तृष्णा आदि मृदु हो जाती है—ये बहिर्मार्गगत ज्वर के लक्षण हैं। बहिर्मार्गगत से बहिर्वेग ज्वर का अभिप्राय है। इसके लक्षण चरक चि. अ. ३ में निम्न दिये हैं—सन्तापोऽभ्यधिको बाह्यस्तृष्णादीनां च मार्दवम्। बहिर्वेगस्य लिङ्गानि सुखसाध्यत्वमेव च ॥ इस बहिर्मार्गगत ज्वर में अभ्यङ्ग, प्रदेह तथा परिषेक आदि करे ॥२१-२२॥

अविपक्वा विपक्वा वा दोषा यस्य न निर्हृताः ॥२३॥
न च व्याधेरुपशमो न चोत्साहो न लाघवम्।
ग्लानिकाश्यें न चात्यर्थं न च्छन्दोऽशनं प्रति ॥२४॥
अप्रकृष्टे (प्रकृष्टे) वा स काले दोषदुर्बलः । अतो विपर्ययाद्देही भवेद्दौषधदुर्बलः ॥२५॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २०२ तमं पत्रम्)

जिसके अविपक्व तथा पक्व दोषों का निर्हरण नहीं हुआ हो, व्याधि की शान्ति न हुई हो, शरीर में उत्साह तथा लघुता न हो, ग्लानि तथा कृशता बहुत अधिक न हो तथा भोजन के प्रति रुचि न हो-अधिक अथवा थोड़े समय में उस व्यक्ति को दोषों से दुर्बल हुआ समझा जाता है। इससे विपरीत रोगी को औषध के कारण दुर्बल हुआ समझना चाहिये ॥२३-२५॥

पाचनैरविपक्वानां दोषाणां दोषदुर्बले। सम्यक्कुर्यादुपशमं पक्वानां च विरेचनैः ॥२६॥

दोषों से दुर्बल हुए व्यक्ति में अपक्व दोषों को पाचक द्रव्यों तथा पक्व दोषों को विरेचनों के द्वारा शान्त करना चाहिये ॥२६॥

इतरस्यामयावेक्षं बलाप्यायनमिष्यते । समुदीर्णेषु सहसा दोषेष्वभिनवेषु च ॥२७॥

इनमें से दूसरे अर्थात् औषध से दुर्बल हुए व्यक्ति में सहसा उदीर्ण हुए तथा नवीन दोषों में बल की वृद्धि करनी चाहिये ॥२७॥

बलवद् दुर्बले वाऽपि कषायं वाऽपि भेषजम् । संरक्षन् धर्मयशसी न प्रयुञ्ज्यात् कदाचन ॥२८॥

धर्म तथा यश की रक्षा करते हुए व्यक्ति को दुर्बल रोगी में बलवान् कषाय अथवा अन्य ओषधि का कभी प्रयोग नहीं करना चाहिये। चरक चि. अ. ३ में कषाय निषेध में निम्न हेतु दिया है—स्तभ्यन्ते न विपच्यन्ते कुर्वन्ति विषमज्वरम्।