काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 717, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| विषमज्वरनिदर्शनीयाध्याय ? ] | खिलस्थानम् | ३५७ |
|---|
दोषा बद्धाः कषायेण स्तम्भित्वात्तरुणे ज्वरे ।। अर्थात् कषाय रस प्रधान ओषधि नवज्वर में निषिद्ध है क्योंकि कषाय के स्तम्भक (Astringent) होने से दोष देह में स्तब्ध हो जाते हैं—उनका पाक नहीं हो पाता ॥२८॥
यथा शरत्सु महतोः क्रुद्धयोर्भिषक्तयोः। न धत्ते दुर्बला वेगं हस्तिनोरग्रवारणी ॥२९॥ तथा बलं बलवतोस्तद्दोषौषधयोर्द्वयोः। संक्षुब्धयोर्न सहते संतप्ता देहिनस्त¹तः ॥३०॥
जिस प्रकार शरद् ऋतु में मद से मस्त हुए महान् एवं क्रुद्ध हाथियों के वेग को दुर्बल हथिनी सहन नहीं कर सकती उसी प्रकार बलवान् तथा क्षुभित दोष और औषध दोनों के वेग को पीडित प्राणी सहन नहीं कर सकते हैं ॥२९-३०॥
पुष्णाति दुर्बलं दोषाः कषायः स्तम्भयत्यतः। भूयोऽभिवृद्धास्ते प्राणाञ्छिनन्त्याशु शरीरिणः ॥३१॥ कषायेणाकुलीभूताश्चिरं संक्लेशयन्ति वा।
दोष दुर्बल रोगी को पुष्ट करते हैं तथा कषाय उन दोषों का स्तम्भन करता है अर्थात् कषाय के द्वारा दोष शरीर में जड़वत् स्तब्ध हो जाते हैं। तथा फिर बढ़े हुए वे दोष शीघ्र ही मनुष्य के प्राणों को नष्ट कर देते हैं अथवा कषाय के द्वारा व्याकुल हुए दोष बहुत देर तक क्लेश पहुंचाते हैं। चरक में भी कहा है—न कषायं प्रयुञ्जीत नराणां तरुणे ज्वरे। कषायेणाकुलीभूता दोषा जेतुं सुदुष्कराः ॥३१॥
भग्नवेगेषु दोषेषु विधिना लङ्घनादिना ॥३२॥ काले प्रयुक्तं भेषज्यं स्याद्विकारोपशान्तये ।
दोषों का वेग नष्ट हो जाने पर लङ्घन आदि विधि के द्वारा उचितकाल में प्रयुक्त की हुई औषध विकारों को शान्त करती है ॥३२॥
लङ्घनं स्वेदनं पेया त्रिविधा दीपमान्विता। ओदनस्त्रिविधो यूषः कषायस्त्रिविधो रसः ॥३३॥ सर्पिरभ्यञ्जनं बस्तिः प्रदेहः सावगाहनः। ज्वरापहः समुद्दिष्टो लङ्घनादिरयं क्रमः ॥३४॥
लङ्घन आदि क्रम—लङ्घन, स्वेदन, तीन प्रकार की दीपन पेया, ओदन, तीन प्रकार का यूष, कषाय, तीन प्रकार का रस, घृत, अभ्यङ्ग, बस्ति, प्रदेह, अवगाहन—यह ज्वर को नष्ट करने वाला लङ्घन आदि क्रम कहा गया है ॥३३-३४॥
पच्यन्ते सप्तरात्रेण दोषाः सप्तसु धातुषु । तस्मात् कषायं सप्ताहे पाचनीयं विधापयेत् ॥३५॥ शमनं स्त्रंसनीयं वा यथावस्थमतः परम् ।
सात दिन में सातों धातुओं में स्थित दोषों का पाचन हो जाता है। इसलिये सात दिन के बाद अर्थात् आठवें दिन पाचन कषाय पिलाना चाहिये। पाचन से अभिप्राय अपक्व आहार, रस तथा दोषों के परिपाक से है। च. चि. अ. ३ में भी कहा है—प्राचनं शमनीयं वा कषायं पाययेत्तु तम्। ज्वरितं षडहेऽतीते लघ्वन्नप्रतिभोजितम् ॥ छठे दिन के व्यतीत हो जाने पर अर्थात् सातवें दिन जिसने लघु अन्न खाया हो उसे पाचन तथा शमनीय कषाय देना चाहिये। ज्वर की तरुणता नष्ट होने के बाद ही कषाय के देने का विधान है। यह तरुणता प्रायः ७ दिन होती है। यहां ज्वर के प्रारंभ होने के दिन का परिगणन न करते हुए ही कहा गया है इसी लिये सामान्य रूप से ही छठे दिन के व्यतीत होने पर कहा गया है। यदि ज्वर का प्रारंभ दिन गिना जाय तो सातवें दिन के व्यतीत होने पर अर्थात् आठवें दिन होगा। इसलिये इस संहिता
१. शरदि मदेन मिथो व्यतिषक्तयोः क्रुद्धयोर्हस्तिनोर्वेगं दुर्बला हस्तिनी न सहते तथैव बलवतोर्दोषौषधयोर्वेगं पीडिता देहिनः सोढुं न शक्नुवन्ति, तेन दोषवृद्धयवस्थायां दुर्बले रोगिणि प्रबलं कषायमपि न प्रयुञ्जीतेत्यर्थः ।