काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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तथा चरक के वचनों में परस्पर विरोध नहीं है केवल थोड़ा सा शब्दों का ही अन्तर है । इसी लिये कहा है—आसप्तरात्रं तरूणं ज्वरमाहुर्मनीषिणः । इसी लिये पहले इसी अध्याय में सात दिन के बाद दोषों के पक जाने पर ज्वर की निरामता बताते हुए भी आठवें दिन का परिगणन किया गया है—लघुत्वं चाष्टरात्रे च निरामज्वरमादिशेत् । इसलिये तरुण ज्वर में साधारणतया आठवें दिन ही कषायरूप मुख्य औषध का सेवन कराना चाहिये, इसके बाद अवस्थानुसार शमन तथा स्त्रंसन कषाय का प्रयोग करना चाहिये ॥३५॥
मन्दोष्मत्वात् स्थिरत्वाच्च गुरुत्वाच्च कफज्वरः ।। ३६ ।। परिपाकं चिरादेति तस्मादस्यौषधक्रमः । अष्टाहात् परतो वाऽपि यथापाकं विधीयते ।। ३७ ।।
ऊष्मा (उष्णता) के कम होने से, स्थिर होने से तथा गुरु होने से कफ ज्वर का देर में पाक होता है अतः पाक के अनुसार आठवें दिन के बाद उसके कषाय रूप मुख्य ओषधि का क्रम प्रारंभ किया जाता है ॥३६-३७॥
पक्वावशेषस्तेनाशु पच्यतेऽग्निश्च दीप्यते । दोषपक्त्याऽग्निदीप्त्या च ज्वरस्यापचयो ध्रुवम् ।। ३८ ।।
इससे पचने से बचे हुए दोषों का शीघ्र ही पाक हो जाता है तथा जाठराग्नि प्रदीप्त होती है । इसी प्रकार दोषों के पाक तथा अग्नि के प्रदीप्त होने से ज्वर निश्चित रूप से शान्त हो जाता है ॥३८॥
तद्युक्तस्नेहसंस्कारान् रसानत्रावचारयेत् । ततः संशमनं कुर्याद्व्याधिशेषोपशान्तये ।। ३९ ।।
फिर बचे हुए रोग की शान्ति के लिये उचित स्नेह के संस्कारों से युक्त रसों का प्रयोग करे तथा उसके बाद दोषों का शमन करे ॥३९॥
प्रसादनार्थं धातूनां बलस्याप्यायनाय च । देशदोषाग्निसात्म्यर्तुयुक्तं चात्र प्रशोषणम् ।। ४० ।। त्र्यहं चतुरहं वाऽपि नातिमात्रमतः परम् । रूक्षत्वाज्ज्वर्यमाणाय देयं सर्पिर्ज्वरापहम् ।। ४१ ।। ज्वरितोऽनेन निर्वाति प्रदीप्तं चाम्बुना गृहम् ।
धातुओं के प्रसाद तथा बल की प्राप्ति के लिये देश, दोष, जाठराग्नि, सात्म्य तथा ऋतु के अनुसार तीन या चार दिन दोषों का शोषण करना चाहिये, इससे अधिक नहीं । तथा इसके बाद रूक्ष होने के कारण ज्वर रोगी को स्वल्प मात्रा में ज्वरनाशक घृत का प्रयोग कराना चाहिये । जिस प्रकार जलता हुआ घर जल के द्वारा बुझ जाता है उसी प्रकार ज्वर का रोगी घृत के प्रयोग से शान्ति को प्राप्त करता है । चरक चि. अ. ३ में घृतपान का निम्न अवस्था में प्रयोग करने का विधान दिया है—अत ऊर्ध्वं कफे मन्दे वातपित्तोत्तरे ज्वरे । परिपक्वेषु दोषेषु सर्पिष्पानं यथाऽमृतम् ॥ अर्थात् दोषों के पूर्णतया पक जाने पर घृत का पान कराना चाहिये ॥४०-४१॥
सर्पिः पित्तं शमयति शैत्यात् स्नेहाच्च मारुतम् ।। ४२ ।। समानगुणमप्येतत् संस्काराज्जीयते कफम् ।
शीतल गुण वाला होने के कारण घृत पित्ता का तथा स्निग्ध होने के कारण वायु का शमन करता है । तथा समान गुण वाला होते हुए भी यह संस्कार के द्वारा कफ को शान्त करता है । चरक नि. अ. १ में भी कहा है—जीर्णज्वरेषु तु सर्वेष्वेव सर्पिषः पानं प्रशस्यते यथास्वौषधसिद्धस्य, सर्पिर्हि स्नेहाद्वातं शमयति संस्कारात्कफं, शैत्यात्पित्तमूष्माणं च । स्नेहाद्वातं शमयति शैत्यात्पित्तं नियच्छति । घृतं तुल्यगुणं दोषं संस्कारात्तु जयेत्कफम् ॥४२॥
अथ चेद्बहुदोषत्वात् कृतेऽपि शमने सति ।। ४३ ।। पक्वाशयगुरुत्वं च स्तिमितत्वं च लक्ष्यते । स्वेदो विण्मूत्ररागश्च भक्तस्यानभिनन्दनम् ।। ४४ ।। स्निग्धाय क्षामदेहाय दद्यात्तत्र विरेचनम् ।