भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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विषमज्वरनिर्दंशीयाध्याय ? ]खिलस्थानम्३५९

यदि दोषों की अधिकता के कारण दोषों का शमन करने पर भी पक्वाशय में भारीपन, स्तिमितता, स्वेद, मल एवं मूत्र का रागयुक्त होना तथा भोजन में अरुचि हो तो स्निग्ध तथा दुर्बल शरीर वाले रोगी को विरेचन देना चाहिये ॥४३-४४॥

शूले पक्वाशयगते पार्श्वपृष्ठकटिग्रहे ॥४५॥
वातविण्मूत्रसङ्गे च निरूहः सानुवासनः । बहिर्मार्गगते चापि ज्वरेऽभ्यङ्गादिरिष्यते ॥४६॥

पक्वाशय में शूल होने पर तथा पार्श्वग्रह, पृष्ठग्रह, कटिग्रह तथा वायु, मल एवं मूत्र की रुकावट में अनुवासन और निरूहबस्ति देनी चाहिये । तथा यदि ज्वर बहिर्मार्गगत (बहिर्वेग) हो तो अभ्यङ्ग (मालिश) आदि करनी चाहिये ॥

नरस्य वातप्रकृतेर्यदि स्याद्वातिको ज्वरः । ऋतौ च वातप्रकृतौ स दुःसाध्यस्त्रिसंकरः ॥४७॥
तथैव पित्तप्रकृतेः श्लैष्मिकस्य च देहिनः । विपरीतप्रकृतयः सुखसाध्या ज्वरादयः ॥४८॥

यदि वात प्रकृति वाले मनुष्य को वातिक ज्वर हो अथवा वात प्रकृति वाली ऋतु (वर्षा) में ज्वर हो तो वह तीनों दोषों के मिल जाने से कष्ट साध्य होता है। इसी प्रकार पित्त एवं श्लेष्म प्रकृति वाले मनुष्य को यदि पैत्तिक अथवा श्लैष्मिक ज्वर हो या पित्त और श्लेष्म प्रकोपक (शरद् तथा वसन्त) ऋतु में ज्वर हो तो वे कष्टसाध्य होते हैं । ज्वर आदि विपरीत प्रकृति वाले सुखसाध्य होते हैं । चरक में प्राकृत ज्वर को यद्यपि सुखसाध्य कहा है तथापि वर्षा ऋतु में होने वाला वातिक ज्वर प्राकृत होता हुआ भी कष्ट साध्य माना गया है । इसीलिये चि. अ. ३ में कहा है—प्रायेणानिलजं दुःखं कालेष्वन्येषु वैकृतम् ॥४७-४८॥

एकद्वित्रिप्रकृतयो व्याधयः सर्व एव हि । सुखदुःखश्चिकित्स्याः स्युः प्रायशस्ते यथाक्रमम् ॥४९॥

एक, दो अथवा तीन प्रकृति वाली सम्पूर्ण व्याधियां प्रायः क्रमशः सुखसाध्य अथवा दुःखसाध्य होती हैं ॥४९॥

समुत्क्लिष्टेषु दोषेषु त्रिविधं कर्म निश्चितम् । शोधनं शमनं चैव तथा शमनशोधनम् ॥५०॥

दोषों का उत्क्लेश होने पर तीन प्रकार का कर्म किया जाता है—१. शोधन, २. शमन, ३. शमन-शोधन ॥५०॥

तत्र पुंसां बलवतां (मन्द) वह्निमतां सताम् । तीव्रवेगामयानां न हितं शोधनमौषधम् ॥५१॥

शोधन ओषधि किन्हें देनी चाहिये—बलवान् तथा मन्द अग्नि वाले पुरुषों को यदि रोग तीव्र वेग वाले हों तो उन्हें शोधन ओषधि देनी चाहिये ॥५१॥

बलिनामल्पदोषाणां नातिवृद्धविकारिणाम् । नातिक्लेशसहानां च शमनं हितमुच्यते ॥५२॥

शमन ओषधि—बलवान्, अल्प दोष वाले तथा अधिक क्लेश न सह सकने वाले व्यक्तियों में यदि विकार अत्यधिक बढ़े हुए नहीं हैं तो शमन ओषधि का प्रयोग हितकर होता है ॥५२॥

तथैव मध्यदोषाणां दुर्बलानां शरीरिणाम् । बलवद्व्याधिजुष्टानां हितं शमनशोधनम् ॥५३॥

शमन शोधन ओषधि—इसी प्रकार यदि मध्य दोष वाला दुर्बल व्यक्ति बलवान् व्याधि से पीड़ित हो तो उसे शमन शोधन ओषधि देनी चाहिये अर्थात् ऐसी ओषधि का प्रयोग करना चाहिये जो दोषों का शमन भी करे तथा उनका शोधन भी करे ॥५३॥

ऊर्ध्वं हरति यद्दोषानधश्चोभयतश्च यत् । द्रव्यं विविधवीर्यत्वात्तद्धि संशोधनं स्मृतम् ॥५४॥

(इति ताडपत्रपुस्तके २०३ तमं पत्रम्)