भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 720, कुल 942 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 720
३६०काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्विषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ]

जो द्रव्य ऊर्ध्व, अधः अथवा दोनों मार्गों के द्वारा दोषों को निकालता हो उसे विविध प्रकार के वीर्य वाला होने से संशोधन द्रव्य कहते हैं। अष्टाङ्गसंग्रह सू. अ. २४ में इसका निम्न लक्षण दिया है—यदिरेयेद्वहिर्दोषान् पञ्चधा शोधनं च यत्। निरूहो वमनं कायशिरोरेकोऽस्रविस्रुतिः॥ अर्थात् यह बाह्य एवं आभ्यन्तर दो प्रकार का होता है ॥५४॥

नाधो न चोर्ध्वं हरति यद्दोषाञ्छमयत्यपि। न चोग्रगुणवीर्यं तद् द्रव्यं संशमनं विदुः ॥५५॥

जो द्रव्य ऊर्ध्व अथवा अधोमार्ग से दोषों को निकालता नहीं है परन्तु उनका शमन करता है तथा जिसका गुण एवं वीर्य उग्र नहीं है उसे संशमन कहते हैं। अष्टाङ्गसंग्रह सू. अ. २४ में कहा है—न शोधयति यद्दोषान् समान्नोदीरयत्यपि। समीकरोति विषमान् शमनं तत्॥ यह तीन प्रकार का होता है १. दैवव्यपाश्रय-मन्त्रौषधि, मंगल, बलि उपहार आदि द्वारा। २. बाह्य लेप, परिषेक आदि द्वारा तथा ३. आभ्यन्तर पाचन, लेखन, बृंहण आदि द्वारा ॥५५॥

नात्यर्थं शोधयति यद्दोषान् संशमयत्यपि। तत्र मध्यबलोपेतं द्रव्यं शमनशोधनम् ॥५६॥

जो द्रव्य दोषों का अत्यधिक शोधन न करता हो तथा शमन करता हो उस मध्य बल वाले द्रव्य को शमन-शोधन कहते हैं ॥५६॥

दशमूलशटीरास्नावयस्थापञ्चकोल कम् ।
शार्ङ्गेष्टा रोहिणी पाठा सरलो देवदारु च। मुस्ताऽमृता वृश्चिकाली कर्कटाख्या दुरालभा ॥५७॥
त्रायन्तीत्येवमादीनि शमनीयानि निर्दिशेत्।

शमनीय द्रव्य—दशमूल, कपूरकचरी, रास्ना, वयस्था (हरड़), पञ्चकोल (पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक तथा सोंठ), शार्ङ्गेष्टा (काकजंघा अथवा काकमाची), रोहिणी, पाठा, सरल (चीड़), देवदारु, नागरमोथा, गिलोय, वृश्चिकाली (बिछवा घास), काकड़ाशृंगी, दुरालभा तथा त्रायन्ती (त्रायमाणा)-इत्यादि शमनीय ओषधियां हैं ॥५७॥

वचाकोशातकीनिम्बपिप्पल्यः कौटजं फलम् ॥५८॥
क्षारद्वयं सगोमूत्रं मदनं लवणानि च। त्रिफलाऽऽरग्वधो दन्ती नीलिनी सप्तला त्रिवृत् ॥५९॥
एवमादि तु यच्चान्यद् द्रव्यं शोधनमुच्यते।

शोधन द्रव्य—बच, कोशातकी (कटुतम्बी), नीम, पिप्पली, कुटज का फल (इन्द्रजौ), दोनों क्षार (सर्ज क्षार तथा यवक्षार), गोमूत्र, मैनफल, पांचो नमक, त्रिफला, अमलतास, दन्ती (जमालगोटा), नीलिनी, सातला, त्रिवृत्-इत्यादि तथा इसी प्रकार के अन्य भी शोधन द्रव्य कहलाते हैं ॥५८-५९॥

काश्मर्यमलकं द्राक्षा शीतपाकी परूषकम् ॥६०॥
मधुकं पिप्पलीमूलं विडङ्गं हिङ्गु सैन्धवम्। पाठाऽजगन्धाऽतिविषा पथ्या मुस्ता कटुत्रिकम् ॥६१॥
रोहिणीत्येवमादि स्याद् द्रव्यं शमनशोधनम्।

शमन-शोधन द्रव्य—काश्मरी (गंभारी), आंवला, द्राक्षा, शीतपाकी (काकोली), फालसा, मुलहठी, पिप्पलीमूल, विड़ङ्ग, हींग, सैन्धा नमक, पाठा, अजगन्धा, अतीस, हरड़, नागरमोथा, त्रिकटु तथा रोहिणी इत्यादि-शमनशोधन द्रव्य हैं ॥६०-६१॥

त्रिविधं कर्म निर्दिष्टमित्येतद्दोषशान्तये ॥६२॥

इस प्रकार दोषों को शान्त करने के लिये यह तीन प्रकार का कर्म कहा गया है ॥६२॥

दोषशान्तौ च धातूनां प्रसाद उपजायते। मलायनानां सर्वेषामव्याघातक्रियासु च ॥६३॥