काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ] खिलस्थानम् ३६१
दोषधातुमलैस्तस्मात् स्वे स्वे कर्मण्यवस्थितैः । स्वास्थ्यमुत्पद्यते नृणामस्वास्थ्यं तद्विपर्यये ॥६४॥
दोषों के शान्त हो जाने पर तथा सम्पूर्ण मल स्थानों के व्याघात (उपद्रव) रहित हो जाने पर धातुओं में प्रसन्नता उत्पन्न होती है अर्थात् प्रसाद गुण की अधिकता हो जाती है। इस प्रकार दोष, धातु एवं मलों के अपने २ कार्य में स्थित होने पर मनुष्य स्वस्थ रहते हैं तथा इसके विपरीत अर्थात् दोष, धातु एवं मलों के अपने २ कार्य में स्थित न होने पर मनुष्य अस्वस्थ हो जाता है ॥६३-६४॥
सम्यगाहारचेष्टाभ्यां यदा सात्म्यं यथेरितम् । समानां रक्षणं कुर्याद्दोषादीनां विचक्षणः ॥६५॥
कुपितानां प्रशमनं क्षीणानामभिवर्धनम् । क्षपणं चैव वृद्धानामेतावद्वि चिकित्सितम् ॥६६॥
जब सम्यक् प्रकार के आहार एवं चेष्टाओं के द्वारा सात्म्य हो जाता है तब बुद्धिमान् व्यक्ति को समान अवस्था में स्थित दोष आदियों का रक्षण करना चाहिये। तथा कुपित दोषों का शमन, क्षीण हुए दोषों की वृद्धि और बढ़े हुए दोषों की कमी करनी चाहिये। इसे ही चिकित्सा कहते हैं ॥६५-६६॥
तदेकत्वमनेकत्वमवस्थामुदयव्ययम् । दोषाणामातुराणां च संप्रधार्य बलाबलम् ॥६७॥
यथावदौषधानां च भिन्नानां नामरूपतः । रसान् गुणांश्च वीर्यं च विपाकं च यथातथम् ॥६८॥
देशं कालमुपायं च प्रमाणं व्याधिमेव च । ज्ञात्वा चिकित्सा भिषजा प्रणेतव्याऽप्रमादतः ॥६९॥
चिकित्सक को दोष तथा रोगी के एकत्व, अनेकत्व, उदय (उद्भव-प्रकट होना), व्यय (नाश) तथा बल एवं अबल को देखकर तथा नाम एवं रूप के अनुसार भिन्न २ ओषधियों के यथावत् रस, गुण, वीर्य, विपाक, देश, काल, उपाय, प्रमाण तथा व्याधि को जानकर प्रमादरहित होकर चिकित्सा करनी चाहिये ॥६७-६९॥
ये यथा च समुद्दिष्टा योगाः स्वे स्वे चिकित्सिते ।
ते तथैव प्रयोक्तव्या न तेष्वस्ति विचारणा ॥७०॥
अपनी २ चिकित्सा में जो योग जिस २ रूप में दिये हैं उनका उसी २ रूप में प्रयोग करना चाहिये, इसमें विशेष विचार की आवश्यकता नहीं है अर्थात् उनमें तर्क नहीं करना चाहिये ॥७०॥
को हि नाम प्रणीतानां द्रव्याणां तत्त्वदर्शिभिः । नानाविधानामेकत्वे तत्कर्म ज्ञातुमर्हति ॥७१॥
तत्त्वदर्शी ऋषियों के द्वारा प्रणीत नाना प्रकार के द्रव्यों के एकत्व (एकत्र) हो जाने पर उनके कर्मों को कौन जान सकता है अर्थात् उनके कर्मों को जानना अत्यन्त कठिन है ॥७१॥
किञ्चिदन्यरसं द्रव्यं गुणतः किञ्चिदन्यथा । वीर्यतश्चान्यथा किञ्चिद्विद्यादत्र विपाकतः ॥७२॥
अथ चैकत्वमागम्य प्रयोगे न विरुध्यते । उत्पद्यते यथार्थं च समवायगुणान्तरम् ॥७३॥
पृथक्पृथक्प्रसिद्धेऽपि गन्धे गन्धान्तरं यथा । गन्धाङ्गानां मनोल्हादि प्रत्यक्षं सामवायिकम् ॥७४॥
कुछ द्रव्य रस के द्वारा भिन्न होते हैं, कुछ गुण तथा वीर्य, एवं कुछ विपाक के द्वारा भिन्न होते हैं। इनकी परस्पर एकता हो जाने पर ये प्रयोग में विरुद्ध नहीं होते। समवाय में अर्थात् उनके परस्पर मिल जाने पर यथार्थ गुणान्तर की उत्पत्ति होती है। जिस प्रकार पृथक् २ प्रसिद्ध गन्ध वाले द्रव्यों की गन्ध के परस्पर मिल जाने से प्रत्यक्ष रूप से मन को आह्लादित करने वाली भिन्न ही गन्ध उत्पन्न होती है। अर्थात् भिन्न २ रस, वीर्य एवं विपाक वाले द्रव्यों के परस्पर संयुक्त हो जाने पर एक नया ही द्रव्य बन जाता है जो गुणों में उन सबसे भिन्न ही होता है ॥७२-७४॥
तस्मादार्षप्रयोगेषु प्रक्षेपापचयं प्रति । न प्रमाद्येद्विज्ञाय दोषौषधबलाबलम् ॥७५॥