काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
३५८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विषमज्वरनिर्दशीयाध्याय ? ]
तथा चरक के वचनों में परस्पर विरोध नहीं है केवल थोड़ा सा शब्दों का ही अन्तर है । इसी लिये कहा है—आसप्तरात्रं तरूणं ज्वरमाहुर्मनीषिणः । इसी लिये पहले इसी अध्याय में सात दिन के बाद दोषों के पक जाने पर ज्वर की निरामता बताते हुए भी आठवें दिन का परिगणन किया गया है—लघुत्वं चाष्टरात्रे च निरामज्वरमादिशेत् । इसलिये तरुण ज्वर में साधारणतया आठवें दिन ही कषायरूप मुख्य औषध का सेवन कराना चाहिये, इसके बाद अवस्थानुसार शमन तथा स्त्रंसन कषाय का प्रयोग करना चाहिये ॥३५॥
मन्दोष्मत्वात् स्थिरत्वाच्च गुरुत्वाच्च कफज्वरः ।। ३६ ।। परिपाकं चिरादेति तस्मादस्यौषधक्रमः । अष्टाहात् परतो वाऽपि यथापाकं विधीयते ।। ३७ ।।
ऊष्मा (उष्णता) के कम होने से, स्थिर होने से तथा गुरु होने से कफ ज्वर का देर में पाक होता है अतः पाक के अनुसार आठवें दिन के बाद उसके कषाय रूप मुख्य ओषधि का क्रम प्रारंभ किया जाता है ॥३६-३७॥
पक्वावशेषस्तेनाशु पच्यतेऽग्निश्च दीप्यते । दोषपक्त्याऽग्निदीप्त्या च ज्वरस्यापचयो ध्रुवम् ।। ३८ ।।
इससे पचने से बचे हुए दोषों का शीघ्र ही पाक हो जाता है तथा जाठराग्नि प्रदीप्त होती है । इसी प्रकार दोषों के पाक तथा अग्नि के प्रदीप्त होने से ज्वर निश्चित रूप से शान्त हो जाता है ॥३८॥
तद्युक्तस्नेहसंस्कारान् रसानत्रावचारयेत् । ततः संशमनं कुर्याद्व्याधिशेषोपशान्तये ।। ३९ ।।
फिर बचे हुए रोग की शान्ति के लिये उचित स्नेह के संस्कारों से युक्त रसों का प्रयोग करे तथा उसके बाद दोषों का शमन करे ॥३९॥
प्रसादनार्थं धातूनां बलस्याप्यायनाय च । देशदोषाग्निसात्म्यर्तुयुक्तं चात्र प्रशोषणम् ।। ४० ।। त्र्यहं चतुरहं वाऽपि नातिमात्रमतः परम् । रूक्षत्वाज्ज्वर्यमाणाय देयं सर्पिर्ज्वरापहम् ।। ४१ ।। ज्वरितोऽनेन निर्वाति प्रदीप्तं चाम्बुना गृहम् ।
धातुओं के प्रसाद तथा बल की प्राप्ति के लिये देश, दोष, जाठराग्नि, सात्म्य तथा ऋतु के अनुसार तीन या चार दिन दोषों का शोषण करना चाहिये, इससे अधिक नहीं । तथा इसके बाद रूक्ष होने के कारण ज्वर रोगी को स्वल्प मात्रा में ज्वरनाशक घृत का प्रयोग कराना चाहिये । जिस प्रकार जलता हुआ घर जल के द्वारा बुझ जाता है उसी प्रकार ज्वर का रोगी घृत के प्रयोग से शान्ति को प्राप्त करता है । चरक चि. अ. ३ में घृतपान का निम्न अवस्था में प्रयोग करने का विधान दिया है—अत ऊर्ध्वं कफे मन्दे वातपित्तोत्तरे ज्वरे । परिपक्वेषु दोषेषु सर्पिष्पानं यथाऽमृतम् ॥ अर्थात् दोषों के पूर्णतया पक जाने पर घृत का पान कराना चाहिये ॥४०-४१॥
सर्पिः पित्तं शमयति शैत्यात् स्नेहाच्च मारुतम् ।। ४२ ।। समानगुणमप्येतत् संस्काराज्जीयते कफम् ।
शीतल गुण वाला होने के कारण घृत पित्ता का तथा स्निग्ध होने के कारण वायु का शमन करता है । तथा समान गुण वाला होते हुए भी यह संस्कार के द्वारा कफ को शान्त करता है । चरक नि. अ. १ में भी कहा है—जीर्णज्वरेषु तु सर्वेष्वेव सर्पिषः पानं प्रशस्यते यथास्वौषधसिद्धस्य, सर्पिर्हि स्नेहाद्वातं शमयति संस्कारात्कफं, शैत्यात्पित्तमूष्माणं च । स्नेहाद्वातं शमयति शैत्यात्पित्तं नियच्छति । घृतं तुल्यगुणं दोषं संस्कारात्तु जयेत्कफम् ॥४२॥
अथ चेद्बहुदोषत्वात् कृतेऽपि शमने सति ।। ४३ ।। पक्वाशयगुरुत्वं च स्तिमितत्वं च लक्ष्यते । स्वेदो विण्मूत्ररागश्च भक्तस्यानभिनन्दनम् ।। ४४ ।। स्निग्धाय क्षामदेहाय दद्यात्तत्र विरेचनम् ।
| विषमज्वरनिर्दंशीयाध्याय ? ] | खिलस्थानम् | ३५९ |
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यदि दोषों की अधिकता के कारण दोषों का शमन करने पर भी पक्वाशय में भारीपन, स्तिमितता, स्वेद, मल एवं मूत्र का रागयुक्त होना तथा भोजन में अरुचि हो तो स्निग्ध तथा दुर्बल शरीर वाले रोगी को विरेचन देना चाहिये ॥४३-४४॥
शूले पक्वाशयगते पार्श्वपृष्ठकटिग्रहे ॥४५॥
वातविण्मूत्रसङ्गे च निरूहः सानुवासनः । बहिर्मार्गगते चापि ज्वरेऽभ्यङ्गादिरिष्यते ॥४६॥
पक्वाशय में शूल होने पर तथा पार्श्वग्रह, पृष्ठग्रह, कटिग्रह तथा वायु, मल एवं मूत्र की रुकावट में अनुवासन और निरूहबस्ति देनी चाहिये । तथा यदि ज्वर बहिर्मार्गगत (बहिर्वेग) हो तो अभ्यङ्ग (मालिश) आदि करनी चाहिये ॥
नरस्य वातप्रकृतेर्यदि स्याद्वातिको ज्वरः । ऋतौ च वातप्रकृतौ स दुःसाध्यस्त्रिसंकरः ॥४७॥
तथैव पित्तप्रकृतेः श्लैष्मिकस्य च देहिनः । विपरीतप्रकृतयः सुखसाध्या ज्वरादयः ॥४८॥
यदि वात प्रकृति वाले मनुष्य को वातिक ज्वर हो अथवा वात प्रकृति वाली ऋतु (वर्षा) में ज्वर हो तो वह तीनों दोषों के मिल जाने से कष्ट साध्य होता है। इसी प्रकार पित्त एवं श्लेष्म प्रकृति वाले मनुष्य को यदि पैत्तिक अथवा श्लैष्मिक ज्वर हो या पित्त और श्लेष्म प्रकोपक (शरद् तथा वसन्त) ऋतु में ज्वर हो तो वे कष्टसाध्य होते हैं । ज्वर आदि विपरीत प्रकृति वाले सुखसाध्य होते हैं । चरक में प्राकृत ज्वर को यद्यपि सुखसाध्य कहा है तथापि वर्षा ऋतु में होने वाला वातिक ज्वर प्राकृत होता हुआ भी कष्ट साध्य माना गया है । इसीलिये चि. अ. ३ में कहा है—प्रायेणानिलजं दुःखं कालेष्वन्येषु वैकृतम् ॥४७-४८॥
एकद्वित्रिप्रकृतयो व्याधयः सर्व एव हि । सुखदुःखश्चिकित्स्याः स्युः प्रायशस्ते यथाक्रमम् ॥४९॥
एक, दो अथवा तीन प्रकृति वाली सम्पूर्ण व्याधियां प्रायः क्रमशः सुखसाध्य अथवा दुःखसाध्य होती हैं ॥४९॥
समुत्क्लिष्टेषु दोषेषु त्रिविधं कर्म निश्चितम् । शोधनं शमनं चैव तथा शमनशोधनम् ॥५०॥
दोषों का उत्क्लेश होने पर तीन प्रकार का कर्म किया जाता है—१. शोधन, २. शमन, ३. शमन-शोधन ॥५०॥
तत्र पुंसां बलवतां (मन्द) वह्निमतां सताम् । तीव्रवेगामयानां न हितं शोधनमौषधम् ॥५१॥
शोधन ओषधि किन्हें देनी चाहिये—बलवान् तथा मन्द अग्नि वाले पुरुषों को यदि रोग तीव्र वेग वाले हों तो उन्हें शोधन ओषधि देनी चाहिये ॥५१॥
बलिनामल्पदोषाणां नातिवृद्धविकारिणाम् । नातिक्लेशसहानां च शमनं हितमुच्यते ॥५२॥
शमन ओषधि—बलवान्, अल्प दोष वाले तथा अधिक क्लेश न सह सकने वाले व्यक्तियों में यदि विकार अत्यधिक बढ़े हुए नहीं हैं तो शमन ओषधि का प्रयोग हितकर होता है ॥५२॥
तथैव मध्यदोषाणां दुर्बलानां शरीरिणाम् । बलवद्व्याधिजुष्टानां हितं शमनशोधनम् ॥५३॥
शमन शोधन ओषधि—इसी प्रकार यदि मध्य दोष वाला दुर्बल व्यक्ति बलवान् व्याधि से पीड़ित हो तो उसे शमन शोधन ओषधि देनी चाहिये अर्थात् ऐसी ओषधि का प्रयोग करना चाहिये जो दोषों का शमन भी करे तथा उनका शोधन भी करे ॥५३॥
ऊर्ध्वं हरति यद्दोषानधश्चोभयतश्च यत् । द्रव्यं विविधवीर्यत्वात्तद्धि संशोधनं स्मृतम् ॥५४॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २०३ तमं पत्रम्)
| ३६० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | विषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ] |
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जो द्रव्य ऊर्ध्व, अधः अथवा दोनों मार्गों के द्वारा दोषों को निकालता हो उसे विविध प्रकार के वीर्य वाला होने से संशोधन द्रव्य कहते हैं। अष्टाङ्गसंग्रह सू. अ. २४ में इसका निम्न लक्षण दिया है—यदिरेयेद्वहिर्दोषान् पञ्चधा शोधनं च यत्। निरूहो वमनं कायशिरोरेकोऽस्रविस्रुतिः॥ अर्थात् यह बाह्य एवं आभ्यन्तर दो प्रकार का होता है ॥५४॥
नाधो न चोर्ध्वं हरति यद्दोषाञ्छमयत्यपि। न चोग्रगुणवीर्यं तद् द्रव्यं संशमनं विदुः ॥५५॥
जो द्रव्य ऊर्ध्व अथवा अधोमार्ग से दोषों को निकालता नहीं है परन्तु उनका शमन करता है तथा जिसका गुण एवं वीर्य उग्र नहीं है उसे संशमन कहते हैं। अष्टाङ्गसंग्रह सू. अ. २४ में कहा है—न शोधयति यद्दोषान् समान्नोदीरयत्यपि। समीकरोति विषमान् शमनं तत्॥ यह तीन प्रकार का होता है १. दैवव्यपाश्रय-मन्त्रौषधि, मंगल, बलि उपहार आदि द्वारा। २. बाह्य लेप, परिषेक आदि द्वारा तथा ३. आभ्यन्तर पाचन, लेखन, बृंहण आदि द्वारा ॥५५॥
नात्यर्थं शोधयति यद्दोषान् संशमयत्यपि। तत्र मध्यबलोपेतं द्रव्यं शमनशोधनम् ॥५६॥
जो द्रव्य दोषों का अत्यधिक शोधन न करता हो तथा शमन करता हो उस मध्य बल वाले द्रव्य को शमन-शोधन कहते हैं ॥५६॥
दशमूलशटीरास्नावयस्थापञ्चकोल कम् ।
शार्ङ्गेष्टा रोहिणी पाठा सरलो देवदारु च। मुस्ताऽमृता वृश्चिकाली कर्कटाख्या दुरालभा ॥५७॥
त्रायन्तीत्येवमादीनि शमनीयानि निर्दिशेत्।
शमनीय द्रव्य—दशमूल, कपूरकचरी, रास्ना, वयस्था (हरड़), पञ्चकोल (पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक तथा सोंठ), शार्ङ्गेष्टा (काकजंघा अथवा काकमाची), रोहिणी, पाठा, सरल (चीड़), देवदारु, नागरमोथा, गिलोय, वृश्चिकाली (बिछवा घास), काकड़ाशृंगी, दुरालभा तथा त्रायन्ती (त्रायमाणा)-इत्यादि शमनीय ओषधियां हैं ॥५७॥
वचाकोशातकीनिम्बपिप्पल्यः कौटजं फलम् ॥५८॥
क्षारद्वयं सगोमूत्रं मदनं लवणानि च। त्रिफलाऽऽरग्वधो दन्ती नीलिनी सप्तला त्रिवृत् ॥५९॥
एवमादि तु यच्चान्यद् द्रव्यं शोधनमुच्यते।
शोधन द्रव्य—बच, कोशातकी (कटुतम्बी), नीम, पिप्पली, कुटज का फल (इन्द्रजौ), दोनों क्षार (सर्ज क्षार तथा यवक्षार), गोमूत्र, मैनफल, पांचो नमक, त्रिफला, अमलतास, दन्ती (जमालगोटा), नीलिनी, सातला, त्रिवृत्-इत्यादि तथा इसी प्रकार के अन्य भी शोधन द्रव्य कहलाते हैं ॥५८-५९॥
काश्मर्यमलकं द्राक्षा शीतपाकी परूषकम् ॥६०॥
मधुकं पिप्पलीमूलं विडङ्गं हिङ्गु सैन्धवम्। पाठाऽजगन्धाऽतिविषा पथ्या मुस्ता कटुत्रिकम् ॥६१॥
रोहिणीत्येवमादि स्याद् द्रव्यं शमनशोधनम्।
शमन-शोधन द्रव्य—काश्मरी (गंभारी), आंवला, द्राक्षा, शीतपाकी (काकोली), फालसा, मुलहठी, पिप्पलीमूल, विड़ङ्ग, हींग, सैन्धा नमक, पाठा, अजगन्धा, अतीस, हरड़, नागरमोथा, त्रिकटु तथा रोहिणी इत्यादि-शमनशोधन द्रव्य हैं ॥६०-६१॥
त्रिविधं कर्म निर्दिष्टमित्येतद्दोषशान्तये ॥६२॥
इस प्रकार दोषों को शान्त करने के लिये यह तीन प्रकार का कर्म कहा गया है ॥६२॥
दोषशान्तौ च धातूनां प्रसाद उपजायते। मलायनानां सर्वेषामव्याघातक्रियासु च ॥६३॥
विषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ] खिलस्थानम् ३६१
दोषधातुमलैस्तस्मात् स्वे स्वे कर्मण्यवस्थितैः । स्वास्थ्यमुत्पद्यते नृणामस्वास्थ्यं तद्विपर्यये ॥६४॥
दोषों के शान्त हो जाने पर तथा सम्पूर्ण मल स्थानों के व्याघात (उपद्रव) रहित हो जाने पर धातुओं में प्रसन्नता उत्पन्न होती है अर्थात् प्रसाद गुण की अधिकता हो जाती है। इस प्रकार दोष, धातु एवं मलों के अपने २ कार्य में स्थित होने पर मनुष्य स्वस्थ रहते हैं तथा इसके विपरीत अर्थात् दोष, धातु एवं मलों के अपने २ कार्य में स्थित न होने पर मनुष्य अस्वस्थ हो जाता है ॥६३-६४॥
सम्यगाहारचेष्टाभ्यां यदा सात्म्यं यथेरितम् । समानां रक्षणं कुर्याद्दोषादीनां विचक्षणः ॥६५॥
कुपितानां प्रशमनं क्षीणानामभिवर्धनम् । क्षपणं चैव वृद्धानामेतावद्वि चिकित्सितम् ॥६६॥
जब सम्यक् प्रकार के आहार एवं चेष्टाओं के द्वारा सात्म्य हो जाता है तब बुद्धिमान् व्यक्ति को समान अवस्था में स्थित दोष आदियों का रक्षण करना चाहिये। तथा कुपित दोषों का शमन, क्षीण हुए दोषों की वृद्धि और बढ़े हुए दोषों की कमी करनी चाहिये। इसे ही चिकित्सा कहते हैं ॥६५-६६॥
तदेकत्वमनेकत्वमवस्थामुदयव्ययम् । दोषाणामातुराणां च संप्रधार्य बलाबलम् ॥६७॥
यथावदौषधानां च भिन्नानां नामरूपतः । रसान् गुणांश्च वीर्यं च विपाकं च यथातथम् ॥६८॥
देशं कालमुपायं च प्रमाणं व्याधिमेव च । ज्ञात्वा चिकित्सा भिषजा प्रणेतव्याऽप्रमादतः ॥६९॥
चिकित्सक को दोष तथा रोगी के एकत्व, अनेकत्व, उदय (उद्भव-प्रकट होना), व्यय (नाश) तथा बल एवं अबल को देखकर तथा नाम एवं रूप के अनुसार भिन्न २ ओषधियों के यथावत् रस, गुण, वीर्य, विपाक, देश, काल, उपाय, प्रमाण तथा व्याधि को जानकर प्रमादरहित होकर चिकित्सा करनी चाहिये ॥६७-६९॥
ये यथा च समुद्दिष्टा योगाः स्वे स्वे चिकित्सिते ।
ते तथैव प्रयोक्तव्या न तेष्वस्ति विचारणा ॥७०॥
अपनी २ चिकित्सा में जो योग जिस २ रूप में दिये हैं उनका उसी २ रूप में प्रयोग करना चाहिये, इसमें विशेष विचार की आवश्यकता नहीं है अर्थात् उनमें तर्क नहीं करना चाहिये ॥७०॥
को हि नाम प्रणीतानां द्रव्याणां तत्त्वदर्शिभिः । नानाविधानामेकत्वे तत्कर्म ज्ञातुमर्हति ॥७१॥
तत्त्वदर्शी ऋषियों के द्वारा प्रणीत नाना प्रकार के द्रव्यों के एकत्व (एकत्र) हो जाने पर उनके कर्मों को कौन जान सकता है अर्थात् उनके कर्मों को जानना अत्यन्त कठिन है ॥७१॥
किञ्चिदन्यरसं द्रव्यं गुणतः किञ्चिदन्यथा । वीर्यतश्चान्यथा किञ्चिद्विद्यादत्र विपाकतः ॥७२॥
अथ चैकत्वमागम्य प्रयोगे न विरुध्यते । उत्पद्यते यथार्थं च समवायगुणान्तरम् ॥७३॥
पृथक्पृथक्प्रसिद्धेऽपि गन्धे गन्धान्तरं यथा । गन्धाङ्गानां मनोल्हादि प्रत्यक्षं सामवायिकम् ॥७४॥
कुछ द्रव्य रस के द्वारा भिन्न होते हैं, कुछ गुण तथा वीर्य, एवं कुछ विपाक के द्वारा भिन्न होते हैं। इनकी परस्पर एकता हो जाने पर ये प्रयोग में विरुद्ध नहीं होते। समवाय में अर्थात् उनके परस्पर मिल जाने पर यथार्थ गुणान्तर की उत्पत्ति होती है। जिस प्रकार पृथक् २ प्रसिद्ध गन्ध वाले द्रव्यों की गन्ध के परस्पर मिल जाने से प्रत्यक्ष रूप से मन को आह्लादित करने वाली भिन्न ही गन्ध उत्पन्न होती है। अर्थात् भिन्न २ रस, वीर्य एवं विपाक वाले द्रव्यों के परस्पर संयुक्त हो जाने पर एक नया ही द्रव्य बन जाता है जो गुणों में उन सबसे भिन्न ही होता है ॥७२-७४॥
तस्मादार्षप्रयोगेषु प्रक्षेपापचयं प्रति । न प्रमाद्येद्विज्ञाय दोषौषधबलाबलम् ॥७५॥
३६२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | भेषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ]
इसलिये आर्षयोगों के प्रक्षेप तथा अपचय (वृद्धि तथा ह्रास) में दोष तथा औषध के बलाबल को जाने बना प्रमाद नहीं करना चाहिये ।।७५।।
वयः शरीराग्निबलं त्ववेक्ष्य मतिमान् भिषक् । मात्रां विकल्पयेदत्र प्रधानावरमध्यतः ।।७६।।
बुद्धिमान चिकित्सक रोगी के शरीर तथा अग्निबल को देख कर प्रधान, अवर तथा मध्य के अनुसार मात्रा का निश्चय करे ।।
इति ज्वराणामुद्दिष्टो विशेषोऽयमुपक्रमे । यं विदित्वा तु कार्येषु विविधेषु न संभ्रमेत् ।।७७।।
इस प्रकार ज्वरों की चिकित्सा में यह विशेष क्रम कहा गया है । जिसे जानकर विविध कार्यों में मतिभ्रम उत्पन्न नहीं होता ।।७७।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।७८।।
चू¹ ह ७५
(इति खिलेषु) विशेषनिर्देशीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २०४ तमं पत्रम्)
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।७८।।
चू² ह ७५
(इति खिलेषु) विशेषनिर्देशीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः ।।
भैषज्योपक्रमणीयस्तृतीयाध्यायः ।
अथातो भैषज्योपक्रमणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम भैषज्योपक्रमणीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।१-२।।
ब्राह्म्या श्रिया प्रज्वलन्तं ब्रह्मर्षिममितद्युतिम् । कश्यपं लोककर्तारं भार्गवः परिपृच्छति ।।३।।
१. 'चू' इति सप्ततेः, ह इति पञ्चकस्य अक्षराङ्कनिर्देशरीतिः प्राचीनपुस्तकेषु, तथैवात्रापि मूलताडपत्रपुस्तके एतदध्यायान्ते श्लोकमानमादाय अक्षराङ्कसङ्केतनिर्देशोऽयम्, आद्यन्तगद्यवाक्यवर्जमध्यगतश्लोकानामत्र ७५ संख्याऽस्ति, एवमेवाग्रेऽपि क्वचित् क्वचिदेवंविधाः संख्यासङ्केता दृश्यन्ते ।
२. प्राचीन पुस्तकों में 'चू' द्वारा ७० तथा 'ह' द्वारा ५ अक्षर के निर्देश की रीति है । उसी प्रकार यहां मूल ताडपत्र पुस्तक में भी इस अध्याय के अन्त में श्लोकों की संख्या के अनुसार यह अक्षरों का संकेत दिया गया है । आदि तथा अन्त के गद्य वाक्यों को छोड़कर बीच के श्लोकों की संख्या यहां ७५ है । इसी प्रकार आगे भी-कहीं २ ऐसी संख्याओं के सङ्केत दिये गये हैं ।
| भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ] | खिलस्थानम् | ३६३ |
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ब्राह्मतेज के द्वारा प्रज्वलित, अत्यन्त कान्ति वाले तथा लोकगुरु ब्रह्मर्षि कश्यप से भार्गव (वृद्धजीवक) ने प्रश्न किया।
आबाधकारणं व्याधिर्भेषजं सुखकारणम्। सम्यग्युक्तं तदमृतं स्यात्तदन्यद्विषवद्भवेत् ।।४।।
व्याधि (कष्ट) रोगों का कारण है तथा औषध सुख (स्वास्थ्य) का कारण है। सम्यक् प्रकार से प्रयुक्त की गई ओषधि अमृत के समान तथा अन्यथा प्रयुक्त की हुई विष के समान होती है ।।४।।
भेषजोपक्रमं तस्माद्भगवन्! वक्तुमर्हसि ।
औषधं किमधिष्ठानं कथं चास्योपदिश्यते । औषधज्ञौषधत्वं च भेषजत्वमथापि च ।।५।।
भैषज्यत्वागदत्वं च कषायत्वं तथैव च । यथा च गौण्येन रसा द्रव्ये द्रव्ये व्यवस्थिताः ।।६।।
प्राधान्येन यथा दृष्टो मधुके मधुरो रसः ।
अम्लः कपित्थे, लवणः सैन्धवे, नागरे कटुः ।।७।।
तिक्तस्तिक्तकरोहिण्यां, कषायश्चाभयां प्रति । सत्येवं रसनानात्वे संयोगः सर्व एव हि ।।८।।
कषायत्वेन निर्दिष्टः कुतः किं चात्र कारणम् ।
कति के चौषधगुणा भेदाश्चास्य कति स्मृताः ।।९।।
कति चौषधकालाश्च काले काले च को विधिः ।
कस्यां कस्यामवस्थायां पातव्यं भेषजं न वा ।।१०।।
कथं च पेयं पीतस्य परिहार्यं च किं भवेत् ।
जीर्यमाणस्य किं रूपं किं च जीर्णस्य लक्षणम् ।।११।।
विभज्य वयसस्त्रित्वं कथं मात्रा विधीयते । अधोभागोध्र्वभागानां दोषसंशमनी च या ।।१२।।
जीवनीया च या मात्रा दीपनीया च या स्मृता ।
मात्रा संशोधनी या च स्नेहमात्रा च या भवेत् ।।१३।।
सर्वमेतद्यथातत्त्वं कीर्तयस्व महामुने ! । जातमात्रमुपादाय यावद्वर्षशतं परम् ।।१४।।
इसलिये हे भगवन् ! आप ओषधियों के उपक्रम का व्याख्यान कीजिये । ओषधि का क्या अधिष्ठान होता है ? ओषधि का ज्ञान, ओषधि, भेषज, भैषज्य, अगद तथा कषाय का किस प्रकार उपदेश किया जाता है ? भिन्न २ द्रव्यों में गौणरूप से भिन्न २ रस विद्यमान होते हैं परन्तु प्रधानता के कारण मुलहठी में मधुर रस, कपित्थ (कैथ) में अम्ल रस, सैन्धव में लवण रस, सोंठ में कटुरस, तिक्तरोहिणी में तिक्त रस तथा हरीतकी में कषाय रस माना जाता है । इस प्रकार रसों के नाना प्रकार होने पर भी उनके संयोग अथवा समुदाय को कषायरूप से क्यों कहा गया है—इसका क्या कारण है ? औषध के कितने क्या कौन २ से गुण होते हैं ? इसके भेद कौन २ से होते हैं ? औषध के कितने काल होते हैं ? भिन्न २ काल में औषध सेवन की क्या विधि है ? किस अवस्था में औषध का प्रयोग करना चाहिये तथा किस में नहीं ? ओषधि किस प्रकार पीनी चाहिये ? ओषधि पीने बाद क्या परहेज होना चाहिये ? ओषधि के जीर्ण होते हुए तथा जीर्ण हो जाने के बाद क्या लक्षण होते हैं ? बालक के उत्पन्न होने से लेकर १०० वर्ष तक आयु को तीन भागों में विभक्त करके अधोभाग तथा ऊर्ध्वभाग द्वारा दोषों का संशमन करने वाली, जीवनीया, दीपनीय, संशोधनी तथा स्नेहमात्रा का किस प्रकार विभाग किया जाता है ? इन सबका आप सम्यक् प्रकार से उपदेश कीजिये ॥५-१४॥
इति शुश्रूषमाणाय शिष्याय वदतांवरः । आचचक्षे यथान्यायं भैषज्योपक्रमं प्रति ।।१५।।
३६४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ]
इस प्रकार सुनने की इच्छा वाले शिष्य को ज्ञानी महर्षि कश्यप ने यथायोग्य भैषज्योपक्रम का उपदेश किया ॥१५॥
अयं हेतुरिदं लिङ्गमस्य चायमुपक्रमः । इति तावत् परं सूक्ष्मं व्याधिज्ञानं प्रचक्षते ॥१६॥
रोग का अमुक हेतु, अमुक लिङ्ग (लक्षण) तथा अमुक चिकित्सा है। इस प्रकार रोग का ज्ञान अत्यन्त सूक्ष्म होता है ॥
अस्मादप्यौषधज्ञानमाहुः सूक्ष्मतरं बुधाः । तदहं तेऽभिधास्यामि कार्त्स्न्यैनैव निबोध मे ॥१७॥
ज्ञानी लोग रोग की अपेक्षा भी ओषधि के ज्ञान को अधिक सूक्ष्म बतलाते हैं। इसलिये मैं सम्पूर्ण रूप से तुझे ओषधि के ज्ञान का उपदेश करूंगा। वह तू मेरे से सुन ॥१७॥
पथ्यसेविनमारोग्यं गुणेन भजते नरम् । अपथ्यसेविनं क्षिप्रं रोगः समभिमर्दति ॥१८॥
पथ्य का सेवन करने वाले व्यक्ति को स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है तथा कुपथ्य का सेवन करने वाले को सदा रोग घेरे रहते हैं ॥१८॥
स रोगो द्विविधश्चोक्तः शारीरो मानसस्तथा ।
आधयो मानसास्तत्र शारीरा व्याधयः स्मृताः ॥१९॥
साध्योऽसाध्यश्च याप्यश्च त्रिविधं रोगलक्षणम् ।
वह रोग दो प्रकार का होता है—१. शारीरिक, २. मानसिक। मानसिक रोगों को आधि तथा शारीरिक रोगों को व्याधि कहते हैं। साध्य, असाध्य तथा याप्य भेद से रोगों के तीन प्रकार के लक्षण होते हैं।
वक्तव्य—चरक सू. अ. १ में भी कहा है—'शरीरं सत्वसंज्ञं च व्याधीनामाश्रयो मतः' अर्थात् ये दो ही रोगों के आश्रय माने जाते हैं। कई रोग केवल शरीर का आश्रय लेकर होते हैं जैसे–कुष्ठ। कई रोग केवल मन का आश्रय लेते हैं जैसे–काम तथा कुछ रोग ऐसे होते हैं जो शरीर तथा मन दोनों का आश्रय लेकर होते हैं जैसे—उन्माद। शारीरिक रोग का मन पर तथा मानसिक रोग का शरीर पर थोड़ा बहुत प्रभाव अवश्य पड़ता है। चरक में शरीर, मन तथा आत्मा–इन तीन पर ही लोक स्थिति बतलाई है अर्थात् ये तीनों आधारस्तम्भ माने गये हैं। इन तीनों के संयोग से ही प्राणी स्थिर रहते हैं। इन तीनों में से शरीर तथा मन में तो विकार उत्पन्न होते हैं परन्तु निर्विकार होने से आत्मा में विकार उत्पन्न नहीं होते। इसीलिये दो प्रकार के ही रोग माने गये हैं। चरक सू. अ. १ में कहा भी है—निर्विकारः परस्त्वात्मा सत्वभूतगुणेन्द्रियैः ॥१९॥
वातपित्तकफा दोषाः शारीरव्याधिहेतवः ॥२०॥
सत्त्वेतरं च द्वन्द्वं च मानसामायहेतवः ।
वात, पित्त तथा कफ दोष शारीरिक रोगों के कारण होते हैं। तथा सत्व गुण को छोड़कर शेष रज और तम मानसिक रोगों के कारण माने जाते हैं।
वक्तव्य—चरक सू. अ. १ में भी कहा है—वायुः पित्तं कफश्चोक्तः शारीरो दोषसंग्रहः। मानसः पुनरुद्दिष्टो रजश्च तम एव च ॥ अर्थात् वात, पित्त तथा कफ शारीरिक रोगों को उत्पन्न करते हैं। ये तीनों जब तक समावस्था में रहते हैं तब तक शरीर स्वस्थ रहता है उस अवस्था में ये शरीर को धारण करते हैं इसलिये उसका नाम धातु भी है। परन्तु जब ये दूषित हो जाते हैं तब रोगों को उत्पन्न करते हैं उस अवस्था में इन्हें दोष कहते हैं। मानसिक दोष रज एवं तम ये दो ही माने जाते हैं। यद्यपि सत्त्व, रज और तम ये तीन गुण होते है तथापि इनमें सत्त्व के शुद्ध एवं अविकारी होने से इसे
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दोष नहीं माना जाता है। वृद्ध वाग्भट की टीका में कहा भी हैं—'मनः शुद्धं सत्त्वम्। रजस्तमसो दोषौ तयोपप्लवावविद्यासम्भूतौ'। यदि सत्त्व को शुद्ध एवं अविकारी न माना जाय तो मोक्ष सम्भव नहीं है। क्योंकि सत्त्व के बिना यथार्थज्ञान नहीं होता तथा जब तक यथार्थ ज्ञान न हो तब तक मुक्ति नहीं होती। इसीलिये कहा भी है—'ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः' इसलिये सत्त्व को दोष नहीं माना जाता। केवल रज और तम ही मन को दूषित करने के कारण मानसिक रोगों के कारण माने गये हैं। अष्टाङ्ग हृदय में भी कहा है—'वायुः पित्तं कफश्चेति त्रयो दोषाः समासतः' तथा—'रजस्तमश्च मनसो द्वौ च दोषावुदाहृतौ ॥२०॥
धृतिवीर्यस्मृतिज्ञानविज्ञानैर्मानसं जयेत् ॥२१॥
शारीरं भेषजैः कालयुक्तिदैवव्यपाश्रयैः ।
मानसिक रोगों को धृति, वीर्य, स्मृति, ज्ञान तथा विज्ञान के द्वारा तथा शारीरिक रोगों को कालव्यपाश्रय, युक्तिव्यपाश्रय तथा दैवव्यपाश्रय ओषधियों के द्वारा जीते।
**वक्तव्य—**चरक सू. अ. १ में कहा है—प्रशाम्यत्यौषधैः पूर्वो दैवयुक्तिव्यपाश्रयैः ।। मानसो ज्ञानविज्ञानधैर्यस्मृतिसमाधिभिः ।। अर्थात् शारीर दोष, दैवव्यपाश्रय तथा युक्तिव्यापश्रय ओषधियों से शान्त होते हैं और मानस दोष ज्ञान-विज्ञान आदि द्वारा शान्त होते हैं। दैवव्यपाश्रय से बलि, मन्त्र, मङ्गल तथा सदाचार आदि का ग्रहण होता है तथा युक्तिव्यपाश्रय से दोष आदि की विवेचनापूर्वक यथावत् औषध प्रयोग का ग्रहण होता है। अर्थात् पूर्वकर्मज शारीर व्याधियों की दैवव्यपाश्रय तथा दोषज व्याधियों की युक्तिव्यपाश्रय चिकित्सा करनी चाहिये ॥२१॥
स पुनर्द्विविधो व्याधिरागन्तुर्निज एव च ॥२२॥
आगन्तुर्बाधते पूर्वं पश्चाद्दोषान् प्रपद्यते । निजस्तु चीयते पूर्वं पश्चाद्वृद्धः प्रबाधते ॥२३॥
व्याधि आगन्तु तथा निज के भेद से पुनः दो प्रकार की है। आगन्तु व्याधि पहले शरीर को कष्ट (व्यथा) पहुंचाती है तथा बाद में वातादि दोषों को प्रकुपित करती है। निज रोग में पहले से ही दोषों का संचय एवं प्रकोप होता है तथा बाद में वे शरीर को कष्ट देते हैं। चरक सू. अ. २० में भी कहा है—आगन्तुर्हि व्यथापूर्वसमुत्पन्नो जघन्यं वातपित्तश्लेष्मणां वैषम्यमापादयति, निजे तु वातपित्तश्लेष्माणः पूर्वं वैषम्यमापाद्य ते, जघन्यं व्यथामभिनिर्वर्तयन्ति ॥२२-२३॥
तस्मादागन्तुरोगाणां पश्यन्ति निजवत् क्रियाः ।
निजानां पूर्वरूपाणि दृष्ट्वा संशोधनं हितम् ॥२४॥
इसलिये आगन्तु रोगों को भी निज रोगों की तरह ही चिकित्सा की जाती है। आगन्तु रोगों में निज रोगों के पूर्वरूपों को देखकर संशोधन कराना चाहिये। अर्थात् आगन्तु रोगों में निज रोगों के पूर्वरूप दिखाई देते ही अर्थात् लक्षण उत्पन्न होने से पूर्व ही यथायोग्य संशोधन आदि देना चाहिये ॥
संशोधनं सप्तविधं तदायत्तं चिकित्सितम् । तच्चायतं चतुष्पादे पादश्चौषधमुच्यते ॥२५॥
ओषधं युक्त्यधिष्ठानं दैवाधिष्ठानमेव च । युक्तिर्वमनकर्मादि दैवं यागादि कीर्त्यते ॥२६॥
संशोधन सात प्रकार का होता है तथा उसी पर चिकित्सा निर्भरर होती है। चिकित्सा चतुष्पाद पर निर्भर है तथा चतुष्पाद ही ओषधि कहलाता है। ओषधि युक्ति तथा दैव के आधीन होती है। वमन आदि क्रियाओं को युक्ति कहते हैं तथा यज्ञ आदि को दैव कहते हैं।
**वक्तव्य—**चतुष्पाद से अभिप्राय वैद्य, ओषधि, परिचारक तथा रोगी से है। इन चारों के गुण युक्त होने पर ही सम्यक् प्रकार से चिकित्सा हो सकती है। इसी संहिता के सूत्रस्थान अ. २६ में पहले कहा गया है—चत्वारः खलु
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पादाश्चिकित्सितस्योपपद्यन्ते । ते यदा गुणवन्त उपपद्यन्ते तदा साध्यो व्याधिर्नातिवर्तते । तद्यथा—भिषक्, भेषजम्, आतुरः, परिचारक इति । इसी प्रकार च. सू. अ. ९ में भी कहा है—भिषक् द्रव्याण्युपस्थाता रोगी पादचतुष्टयम् । गुणवत्कारणं ज्ञेयं विकारव्युपशान्तये ॥
ओसो नाम रसः सोऽस्यां धीयते यत्तदोषधिः । ओसादारोग्यमाधत्ते तस्मादोषधिरोषधः ॥ २७ ॥
भिषग्विज्ञाननेयत्वाद्भेषजं भिषजो विदुः । भिषग्जिते हितत्वाच्च भेषज्यं परिचक्षते ॥ २८ ॥
अगदत्वं च युक्तस्य गदानामपुनर्भवात् । कण्ठस्य कषणात् प्रायो रोगाणां वाऽपि कर्षणात् ॥ २९ ॥
कषायशब्दः प्राधान्यात् सर्वयोगेषु कल्प्यते ।
ओस रस को कहते हैं । यह (रस) जिसमें धारण किया जाता है वह ओषधि होती है । रस के द्वारा क्योंकि आरोग्य का आधान होता है इसलिये रस को धारण करनेवाला द्रव्य ओषधि कहाता है । भिषग् (चिकित्सकों) के जानने योग्य होने के कारण वैद्य लोग इसे भेषज कहते हैं । चिकित्सा में हितकारी होने के कारण इसे भैषज्य कहते हैं । इसका युक्तिपूर्वक प्रयोग होने से रोग पुनः नहीं होते हैं इसलिये इसे अगद कहते हैं । कण्ठ में लगने के कारण अथवा रोगों का कर्षण करने के कारण सम्पूर्ण योगों में प्रधान रूप से कषाय शब्द का प्रयोग होता है ॥२७-२९॥
शब्दरूपरसस्पर्शगन्धवद्देशजं नवम् ॥ ३० ॥
अजग्धमविदग्धं च द्रव्यं गुणवदुच्यते ।
शब्द, रूप, रस, स्पर्श तथा गन्ध की तरह उत्कृष्ट देश (स्थान) में उत्पन्न हुआ, नवीन, कीट आदियों द्वारा अदूषित तथा विदग्ध न हुआ द्रव्य गुणकारी कहलाता है ॥३०॥
मात्रावल्लघुपाकं च हृद्यं दोषप्रवाहणम् ॥ ३१ ॥
अल्पपेयं महावीर्यं प्रीणनं बलरक्षणम् । व्यापत्तावल्पदोषं च मन्दग्लापनमेव च ॥ ३२ ॥
संस्कारगुणसंपन्नं राजार्हं भेषजं मतम् ।
उत्तम ओषधि के लक्षण—जो मात्रा में प्रयोग की जाती हो, जिसका पाक लघु हो, जो हृदय को अच्छी लगती हो (रोचक हो), जो दोषों को निकालती हो, जो अल्पमात्रा में ही सेवन की जाती हो, जो प्रबल वीर्य (शक्ति) वाली, प्रसन्न करनेवाली तथा बल की रक्षा करनेवाली हो, विपरीत प्रयोग करने पर जो अल्प दोष वाली हो, जो ग्लानि कम करती हो, तथा जो संस्कार एवं गुणों से सम्पन्न हो वह ओषधि राजाओं के योग्य मानी जाती है अर्थात् वह उत्तम औषध मानी जाती है ॥३१-३२॥
तद्धि सिद्धमसिद्धं च शीतमूष्णं द्रवं घनम् ॥ ३३ ॥
कोष्णं सस्नेहमस्नेहमिति भिन्नमनेकधा । तदामयवयोभेदात् सप्तधैव विभज्यते ॥ ३४ ॥
वह ओषधि सिद्ध, असिद्ध, शीत, उष्ण, द्रव (Liquid), घन, (Solid), ईषदुष्ण, स्नेहयुक्त तथा स्नेह रहित इत्यादि अनेक भेदों वाली होती है । रोग एवं अवस्था के अनुसार यह निम्न सात प्रकार से विभक्त की जा सकती है ॥३३-३४॥
चूर्णं शीतकषायश्च स्वरसोऽभिषवस्तथा ।
फाण्टः कल्कस्तथा क्वाथो यथावत्तं निबोध मे ॥ ३५ ॥
भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ] खिलस्थानम् ३६७
ओषधियों के भेद—१. चूर्ण (Powder) २. शीतकषाय (Infusion) ३. स्वरस (Juice) ४. अभिषव (मद्य) ५. फाण्ट (Infusion) ६. कल्क (Bruised coarsely powdered drugs or Paste) तथा ७. क्वाथ (Decoction)—इन्हें तू मेरे से यथावत् सुन।
वक्तव्य—चरक सू. अ. १ में केवल ५ कल्पनाएं दी हैं। कहा है—पञ्चविधं कषायकल्पनमिति तद्यथा-स्वरसः कल्कः शृतः शीतः फाण्टः कषाय इति। अर्थात् वहां चूर्ण और अभिषव का उल्लेख नहीं किया गया है। चूर्ण का उसने कल्क तथा अभिषव का शीतकषाय में अन्तर्भाव कर दिया है॥३५॥
सूक्ष्मचूर्णीकृतं चूर्णं नानाकर्मसु युज्यते। ग्रहण्यामविकारेषु व्रणवत्यञ्जनादिषु ॥३६॥
शीतः शीतकषायः स्यादन्तरिक्षाम्बुसंप्लुतः। स पित्तज्वरदाहासृग्विषमूर्च्छामदापहः ॥३७॥
तद्वदेवं निशाव्युष्टोऽभिषवः साधु साधितः। प्रशान्ताग्निबलक्षोभः सौम्यः स्वरससङ्गतः ॥३८॥
द्राक्षेक्ष्वामलकादीनां पीडनात् स्वरसः स्मृतः। स संशमनसंयोगे नानारोगेषु कल्पते ॥३९॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २०५ तमं पत्रम्)।
क्वथितस्त्वान्तरिक्षेण वारिणाऽर्धावशेषितः। सकृद्धा फाणितः फेनं कषायः फाण्ट उच्यते ॥४०॥
सोऽल्पदोषबले बाले लघुव्याधौ च शस्यते। कल्कः कल्कीकृतो योज्यः पानलेपावलेहने ॥४१॥
केवलद्रव्यपेयत्वाद्विकार्षी दुर्जरश्च सः। पादस्थितो भवेत् क्वाथो युक्तोऽबह्वग्नितेजसा ॥४२॥
स वयोबलसंपन्ने गुरुव्याधौ च शस्यते।
सूक्ष्म चूर्ण (Powder) किये हुए द्रव्य को चूर्ण कहते हैं। यह ग्रहणी रोग, आमविकार, व्रण तथा अञ्जन आदि नाना कर्मों में प्रयुक्त किया जाता है। अन्तरिक्ष जल के साथ मिलाये हुए शीत द्रव्य को शीतकषाय कहते हैं। यह पित्तज्वर दाह, रक्त, विष, मूर्च्छा तथा मद को नष्ट करने वाला है। पूर्वोक्त द्रव्य को ही यदि रात्रि भर पानी में रखकर अच्छी प्रकार सिद्ध किया जाय तो वह अभिषव कहलाता है। जिसका अग्निबल तथा क्षोभ शान्त हो गया है तथा जो सौम्य है ऐसे व्यक्ति को स्वरस के साथ अभिषव का प्रयोग करना चाहिये। द्राक्षा, इक्षु (गन्ना) तथा आंवले आदि का निष्पीडन करके जो रस निकाला जाता है उसे स्वरस कहते हैं। यह अन्य संशमन ओषधियों के साथ मिला कर नाना रोगों में प्रयुक्त किया जाता है। द्रव्य को अन्तरिक्ष जल के साथ पका कर आधा जल शेष रहने पर अथवा एक बार उबाला आकर झाग आने पर उस क्वाथ को फाण्ट कहते हैं। यह अल्प दोष एवं अल्प बल वाले बालक तथा मृदु व्याधि में प्रशस्त माना गया है। द्रव्य को पानी के साथ पीसकर कल्क बनाकर पान, लेप तथा अवलेह के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसमें शुद्ध द्रव्य का पान के रूप में प्रयोग होने से वह कर्षण करने वाला तथा दुर्जर (कठिनता) से जीर्ण होने वाला—दुष्पच) होता है। तीव्र अग्नि पर पकाकर चतुर्थांश शेष रखने पर क्वाथ कहलाता है। इसका अवस्था एवं बल से सम्पन्न एवं गुरुव्याधि में प्रयोग किया जाता है। चरक सू. अ. ४ में पञ्चविध कषाय कल्पना की निम्न परिभाषायें दी हैं—यन्त्रप्रपीडनाद् द्रव्याद्रसः स्वरस उच्यते। यत्पिण्डं रसपिष्टानां तत्कल्कं परिकीर्तितम्॥ वह्नौ तु क्वथितं द्रव्यं श्रुतमाहुश्चिकित्सकाः। द्रव्यादापोथितात्तोये तत्पुनर्निशि संस्थितात् ॥ कषायो योऽभिनिर्याति स शीतः समुदाहृतः। क्षिप्तोष्णतोये मृदितं तत्फाण्टं परिकीर्तितम् ॥३६-४२॥
सप्तधैव विभज्यैतद्दशधा प्रविचारयेत् । पूर्वं भक्तस्य मध्येऽधः समुद्गं समुहुर्मुहुः ॥४३॥
सभक्तं भक्तयोर्मध्ये ग्रासग्रासान्तरे परः।
इस प्रकार ओषधियों की कल्पना को सात प्रकार से विभक्त करके फिर १० प्रकार से पुनः विभक्त करे—१. भोजन के पूर्व, २. भोजन के मध्य में, ३. भोजन के अन्त में, ४. समुद्ग, ५. बार-बार, ६. सभक्त (भोजन के साथ), ७. दो
४६ का.सं.
३६८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् भेषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ]
भोजनों के बीच में, ८. ग्रास के साथ, ९. दो ग्रासों के बीच में, १०. भोजन किये बिना। सुश्रुत उ. अ. ६४ में भी कहा है—अत ऊर्ध्वं दशौषधकालान् वक्ष्यामः। तत्राभक्तं प्राग्भक्तमधोभक्तं मध्ये भक्तमन्तराभक्तं सभक्तं सामुद्गं मुहुर्मुहुः ग्रासं ग्रासान्तरं चेति दशौषधकालाः ॥४३॥
पूर्वं भक्तस्य भैषज्यं न करोति बलक्षयम् ॥४४॥
आमाशयगतान् दोषान्निहन्त्याशु च पच्यते। अन्नसंस्तम्भिते देहे च्छर्द्युद्गारव्यथादयः ॥४५॥
न भवन्ति यतस्तस्माद्देयं दुर्बलीयसे।
१. भोजन से पूर्व ली गई औषध बल का क्षय नहीं करती तथा आमाशयगत दोषों को नष्ट करती है और शीघ्र ही पच जाती है। अन्न के द्वारा शरीर में ओषधि का स्तम्भन किया जाने पर वमन, उद्गार (डकार) तथा व्यथा आदि नहीं होते हैं। इसलिये इसका दुर्बल मनुष्यों में प्रयोग कराना चाहिये। सुश्रुत उ. अ. ६४ में कहा है—प्राग्भक्तं नाम यत् प्राग्भक्तस्योपयुज्यते। शीघ्रं विपाकमुपयाति बलं न हिंस्यादन्नावृतं च मुहुर्वदनान्निरेति। प्राग्भक्तसेवितमथौषधमेतदेव दद्याश्च वृद्धशिशुभीरुकृशाङ्गनाभ्यः ॥४४-४५॥
मध्येभक्तं ह्युभयतो रुद्धमन्नेन भेषजम् ॥४६॥
तदन्तराशये दोषान् सुखेनैव नियच्छति। शमयत्याश्वधो भक्तमुरःकण्ठशिरोगदान् ॥४७॥
२. भोजन के बीच में ली गई ओषधि दोनों ओर से अन्न के द्वारा रुकी होने के कारण शरीर के अन्दर के आशयों (कोष्ठों) में स्थित दोषों को सुखपूर्वक निकाल देती है। ३. भोजन के बाद सेवन की गई औषध छाती, कण्ठ तथा शिर में स्थित दोषों को शीघ्र ही शान्त कर देती है। सुश्रुत उ. अ. ६४ में इन दोनों के गुण निम्न प्रकार कहे हैं—अधो भक्तं नाम–यदधो भक्तस्येति। मध्ये भक्तं नाम–यन्मध्ये भक्तस्य पीयते। पीतं यदन्नमुपयुज्य तदूर्ध्वकाये हन्याद् गदान् बहुविधांश्च बलं ददाति। मध्ये तु पीतमपहन्त्यविसारिभांवाद्ये मध्यदेहमभिभूय भवन्ति रोगाः ॥४६-४७॥
व्यत्यासेन च सामुद्गं दोषे तूर्ध्वमधोगते। मुहुर्मुहुः श्वासकासहिक्कातृट्छर्दिशान्तये ॥४८॥
४. जब दोष ऊर्ध्व तथा अधोमार्ग दोनों में फैले हुए हों तब परस्पर क्षेपण के द्वारा सामुद्ग का प्रयोग करना चाहिये। सुश्रुत उ. अ. ६४ में कहा है—समुद्ग नाम यद्भक्तस्यादावन्ते च पीयते। दोषे द्विधा प्रविस्सृते तु समुद्गसंज्ञमाद्यन्तयोर्यदशनस्य निषेव्यते तु।। अर्थात् जब भोजन के आदि तथा अन्त दोनों समय औषध ली जाती है तब उसे सामुद्ग कहते हैं। ५. श्वास, कास, हिक्का, तृषा तथा छर्दि (वमन) की शान्ति के लिये मुहुर्मुहुः (बारबार) ओषधि का प्रयोग करना चाहिये ॥४८॥
हितं बलाग्निरक्षार्थं सभक्तं दुर्बलात्मनाम्। स्त्रीबालवृद्धललितक्षतक्षीणौषधद्विषाम् ॥४९॥
६. दुर्बल, स्त्री, बालक, वृद्ध, ललित (नाजुक व्यक्ति), क्षत, क्षीण तथा ओषधि से जिसे द्वेष है—ऐसे व्यक्तियों को बल तथा अग्नि की रक्षा के लिये सभक्त (भोजन के साथ) ओषधि का प्रयोग करना चाहिये। सुश्रुत उ. अ. ६४ में कहा है—सभक्तं नाम-यत् सह भक्तेन। पथ्यं सभक्तमबलाऽबलयोर्हि नित्यं तद्द्वेषिणामपि तथा शिशुवृद्धयोश्च ॥ अर्थात् शिशु, वृद्ध तथा दुर्बल व्यक्तियों को जो भोजन के साथ ओषधि का प्रयोग किया जाता है उसे सभक्त कहते हैं ॥४९॥
व्याधौ मन्देऽनले तीक्ष्णे भक्तयोर्मध्य इष्यते।
७. व्याधि के मन्द तथा अग्नि के तीक्ष्ण होने पर दो भोजनों के बीच में ओषधि देनी चाहिये। सुश्रुत उ. अ. ६४ में कहा है—अन्तराभक्तं नाम-यदन्तरा पीयते पूर्वापरयोर्भक्तयोः। हृद्यं मनोबलकरं त्वथ दीपनं च-पथ्यं सदा भवति चान्तराभक्तकं यत् ॥५०॥
भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ] खिलस्थानम् ३६१
क्षीणक्षीणाल्पशुक्राणां वाजीकरणमौषधम् ।।५०।। ग्रासे विधेयं चूर्णं च यदग्निबलवर्धनम् ।
८. दुर्बल तथा क्षीण और अल्प शुक्र वाले व्यक्तियों में बाजीकरण औषध तथा अग्नि और बल को बढ़ाने वाले चूर्ण का ग्रास के साथ प्रयोग करना चाहिये। सुश्रुत उ. अ. ६४ में कहा है—ग्रासं तु-यत्पिण्डव्यामिश्रम्। ग्रासेषु चूर्णमबलाग्निषु दीपनीयं-वाजीकरणान्यपि तु योजयितुं यतेत ।।५०।।
ग्रासान्तरे च्छर्दनीयं धूमपानं च शस्यते ।।५१।।
९. दो ग्रासों के बीच में छर्दनीय (वमनीय) धूम्रपान का प्रयोग करना चाहिये। सुश्रुत उ. अ. ६४ में कहा है—ग्रासान्तरं तु यद् ग्रासान्तरेषु। ग्रासान्तरेषु वितरेद्वमनीयधूमान् श्वासादिषु प्रथितहृद्गुणांश्च लेहान् ।। इसकी व्याख्या में डल्लण ने लिखा है—‘वमनीयधूमानिति स्नायुचर्मशुरप्रभृतिभिः कृतान्’ । अर्थात् दो ग्रासों के बीच में स्नायु, चर्म, खुर आदियों के द्वारा तैयार किये हुए वमनीय धूमों का प्रयोग करना चाहिये ।।५१।।
अभक्तमौषधं पीतं व्याधिमाशु बलीयसाम् । हन्यात्तद्देवेह बलं बलवद्वर्बलीयसाम् ।।५२।।
१०. बिना भोजन किये हुए प्रयुक्त की हुई ओषधि शीघ्र ही बलवान् व्यक्तियों के रोगों को नष्ट कर देती है। जिस प्रकार बलवान् व्यक्ति दुर्बल मनुष्यों के बलों को नष्ट कर देता है। सुश्रुत उ. अ. ६४ में कहा है—तत्राभक्तं तु यत् केवलमेवौषधमुयुज्यते’ । अर्थात् जो केवल अन्नरहित ओषधि का प्रयोग किया जाता है उसे अभक्त कहते हैं उसके गुण निम्न कहे हैं—वीर्याधिकं भवति भेषजमन्नहीनं हन्यात्तथाऽमयमसंशयमाशु चै। तद्बालवृद्धवनिनामृदवस्तु पीत्वा ग्लानिं परां समुपयान्ति बलक्षयं च ।। अर्थात् केवल अन्न रहित प्रयुक्त की हुई ओषधि अधिक वीर्य वाली होती है तथा शीघ्र ही रोगों को नष्ट कर देती है ।।५२।।
एतानौषधकालांस्तु विभजेद्दशधा दश । क्षीणधात्विन्द्रिये शान्ते क्लान्ते तान्ते बुभुक्षिते ।।५३।। भैषज्यदग्धकोष्ठे च भेषजं नावचारयेत् । क्रुद्धे विषण्णे शोकार्ते रात्रौ जागरिते तथा ।।५४।। विदग्धाजीर्णभक्ते च भेषजं नावचारयेत् । कर्मातिभाराभिहते निरूढे सानुवासिते ।।५५।। उपोषिते विरिक्ते च भेषजं नावचारयेत् । यत्किञ्चिदप्युपात्तान्ने मूच्छिते घर्मतापिते ।।५६।। सद्यः पीतोदके चैव भेषजं नावचारयेत् । अवस्थाविपरीतं च भेषजं नावचारयेत् ।।५७।।
इन दस औषधों के कालों को दस प्रकार से विभक्त करे । कहां २ ओषधि का प्रयोग नहीं करना चाहिये—जिसकी धातु तथा इन्द्रियां क्षीण हो गई हैं, जो शान्त, क्लान्त (थका हुआ), खिन्न तथा भूखा हो, भैषज्य के द्वारा जिसका कोष्ठ दग्ध हो चुका हो, जो क्रुद्ध, दुःखी, एवं शोक से पीड़ित हो तथा जो रात्रि में जागा हुआ हो, जिसका खाया हुआ भोजन विदग्ध हो गया हो, जिसे अजीर्ण हो, अधिक कार्य तथा भार से जो पीड़ित हो, जिसे निरूह एवं अनुवासन दिया हो, जिसने उपवास किया हो, जिसे विरेचन दिया गया हो, जो व्यक्ति जो भी अन्न मिल जाय उसका (अर्थात् प्रत्येक अन्न का) सेवन करता हो, जो मूर्च्छित हो तथा जो गर्मी से पीड़ित हो, जिसने कुछ समय पूर्व ही पानी पिया हो ऐसे व्यक्तियों को तथा अवस्था से विपरीत ओषधि का प्रयोग नहीं करना चाहिये ।।५३-५७।।
ऊनद्वादशवर्षाणां नैकान्तेनावचारयेत् । अवचारितमेकान्तेनाहन्यहनि चौषधम् ।।५८।। असमत्वागतप्राणदोषधातुबलौजसाम् । अत्यन्तसुकुमाराणां कुमाराणां बलायुषी ।।५९।।
१२ वर्ष से कम अवस्था वालों में ओषधि का एकान्त रूप से अर्थात् निरन्तर प्रयोग नहीं करना चाहिये। प्रतिदिन निरन्तर प्रयोग कराई गई ओषधि—जिनके शरीर में प्राण दोष, धातु, बल तथा ओज समरूप में विद्यमान नहीं हैं तथा जो अत्यन्त सुकुमार हैं—ऐसे बालकों के बल और आयु को नष्ट कर देती है ।।५८-५९।।
३७० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ]
क्षीणातिवृद्धक्रुद्धानां क्षीणधात्विन्द्रियौजसाम् । एकान्तेनौषधं पीतं सूर्यस्तोयमिवाल्पकम् ।। ६० ।।
जो व्यक्ति क्षीण, अत्यन्त वृद्ध एवं क्रुद्ध है, जिसके धातु, इन्द्रियां एवं ओज क्षीण हो चुके हैं—उनमें यदि ओषधि का निरन्तर रूप से प्रयोग किया जायगा तो वह उन्हें उस प्रकार नष्ट कर देती है जिस प्रकार थोड़े जल को सूर्य नष्ट कर देता है ।।
व्याधिदोषबलाग्निभ्यो हीनं तेभ्योऽधिकं च यत् । अजिज्ञासितपूर्वं च गुणैश्चोक्तैर्विवर्जितम् ।। ६१ ।।
अरोगसात्म्यं दुर्युक्तमनिष्टं मनसश्च यत् । यस्य पीतस्य पाकान्ते दोषः सूक्ष्मोऽपि लक्ष्यते ।। ६२ ।।
व्याधेश्च प्रशमो न स्यात्तच्च वर्ज्यं विजानता ।
त्याज्य ओषधि—जो ओषधि-व्याधि, दोष, बल एवं अग्नि से हीन अथवा अधिक हो, जिसका पहले से ज्ञान न हो, जो यथोक्त गुणों से रहित हो, जो रोग के अनुसार न हो, ठीक प्रकार से प्रयुक्त न की गई हो, जो मन के अनुकूल न हो, जिस ओषधि के पीने के बाद पाक के अनन्तर भी थोड़ा बहुत दोष अवशिष्ट दिखाई देता हो तथा व्याधि शान्ति न हो-बुद्धिमान् व्यक्ति को उस ओषधि का त्याग कर देना चाहिये ।।६१-६२।।
यन्नात्तुरबलं हन्ति व्याधिवीर्यं निहन्ति च ।। ६३ ।।
तदेवास्यावचार्यं स्यादाव्याध्युच्छेददर्शनात् ।
प्रयोज्य ओषधि—जो ओषधि रोगी के बल को नष्ट नहीं करती परन्तु रोग के बल को नष्ट करती है उसी ओषधि का व्याधि के नष्ट होने पर्यन्त प्रयोग करना चाहिये ।।६३।।
कामं व्याधौ प्रशान्तेऽपि शमदानाच्छमौषधम् ।। ६४ ।।
तदेवाल्पं विधातव्यं सकृद् द्विस्त्रिर्यथाबलम् ।
व्याधि के शान्त हो जाने पर भी व्याधि को शान्त करने के कारण उस शामक ओषधि का अल्पमात्रा में बल के अनुसार एक, दो अथवा तीन बार प्रयोग करना चाहिये ।।६४।।
पुण्येऽहनि नमस्यादौ देवद्विजभिषग्गुरून् ।। ६५ ।।
पूर्वाह्णे प्राङ्मुखायास्मै सुखासीनाय साधवे । बुभूषमाणाय भिषङ्मन्त्रवद्द्वेषजं शुचिः ।। ६६ ।।
इदं $^१$हन्त पिब चेति संप्रयच्छेदुदङ्मुखः ।
औषध प्रयोग विधि—पुण्य दिन में सर्वप्रथम देव, ब्राह्मण, वैद्य तथा गुरुओं को नमस्कार करके पूर्वाह्न (प्रातःकाल) के समय पूर्व की ओर मुख किये हुए, सुखपूर्वक बैठे हुए, सज्जन तथा ओषधि का सेवन करने की इच्छा वाले रोगी को पवित्र हुआ तथा उत्तर दिशा की ओर मुख किया हुआ वैद्य कहे कि हन्त$^२$ ! (सम्बोधन) तू इस मन्त्रयुक्त ओषधि को पी ।।६५-६६।।
अतिचङ्क्रमणस्थानशयनासनभाषणम् ।। ६७ ।।
क्रोधशोकदिवास्वप्नविरुद्धान्नहिमातपान् । पीतौषधो न सेवेत तथा स्त्रीवेगधारणम् ।। ६८ ।।
१. पञ्चयज्ञान्तर्गते मनुष्ययज्ञे मनुष्येभ्यो हन्तशब्देन दानविधानवदत्रापि मनुष्येष्वेष्वौषधदाने आर्यसम्प्रदायसम्भवो हन्तशब्दप्रयोगः, नत्वत्र खेदवाचको हर्षवाचको वाऽयं शब्दः, किन्तु त्यागविशेषवाचक इति ध्येयम् ।
२. पञ्चयज्ञ के अन्तर्गत मनुष्य यज्ञ में मनुष्यों के लिये हन्त शब्द के द्वारा दान विधान की तरह यहां भी मनुष्यो के लिये औषध का प्रयोग करते हुए आर्य सम्प्रदाय वाले हन्त शब्द का प्रयोग किया गया प्रतीत होता है । यह हन्त शब्द खेद अथवा हर्ष वाचक नहीं है, अपितु त्याग विशेष वाचक ही है ।
भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ] खिलस्थानम् ३७१
औषध सेवन के बाद त्याज्य भाव—ओषधिका सेवन करने के बाद अतिचङ्क्रमण (अधिक चलना), अधिक बैठना, अधिक सोना, अधिक बोलना, क्रोध, शोक, दिवास्वप्नविरुद्ध भोजन, हिम (बरफ), धूप तथा स्त्रीसम्बन्धी वेग के धारण आदि का सेवन नहीं करना चाहिये ॥६७-६८॥
विजृम्भाः शब्दविद्वेषो मुखशोषोऽरतिः क्लमः।
तन्द्रीरुद्वेष्टनं सादो लिङ्गं जीर्यति भेषजे ॥६९॥
ओषधि के जीर्ण होने के लक्षण—औषध के जीर्ण होने पर जंभाई, शब्दों से विद्वेष, मुख का सूखना, अरुचि, थकावट, तन्द्रा, उद्वेष्टन (हाथ-पैर में अकड़ाहट) तथा आलस्य आदि लक्षण होते हैं ॥६९॥
सृष्टिविण्मूत्रवातानां शरीरस्य च लाघवम्। उद्गारशुद्धिर्वैशद्यं वैमल्यं हृदयस्य च ॥७०॥
प्रकाङ्क्षा कुक्षिशैथिल्यमन्नकालस्य लक्षणम्।
अन्नकाल के लक्षण—मल, मूत्र तथा वायु का निकलना, शरीर का हलकापन, डकार का साफ आना, विशदता, हृदय की विमलता, भोजन में रुचि, कुक्षिकी शिथिलता इत्यादि—अन्नकाल (भोजन के समय) के लक्षण होते हैं ॥७०॥
वयस्त्रिधा विभज्यादौ मात्रा वक्ष्याम्यतः परम् ॥७१॥
पहले अवस्था (आयु-Age) को तीन प्रकार से विभक्त करके तदुपरान्त मैं औषध की मात्रा का निर्देश करूंगा ॥७१॥
गर्भबालकुमाराख्यमित्येतत्त्रिविधं वयः। यौवनं मध्यमं वृद्धमेतच्च त्रिविधं पुनः ॥७२॥
गर्भ, बाल तथा कुमार—यह तीन प्रकार की अवस्था होती है। यह यौवन, मध्यम तथा वृद्ध के भेद से पुनः तीन प्रकार की होती है ॥७२॥
वर्षावरः क्षीरपः स्याद्यावत् पिबति वा पयः। वयस्तद्बालसस्माच्च यावत् षोडशवार्षिकः ॥७३॥
अन्नादः सर्व एव स्यात् कौमारे वयसि स्थितः। अतः परं धातुसत्त्वबलवीर्यपराक्रमैः ॥७४॥
वर्धमानैश्चतुस्त्रिंशद्युवा वर्षाण्युदर्कतः। धात्वादिभिः स्थिरीभूतैर्यावदासप्ततिर्नरः ॥७५॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २०६ तमं पत्रम्।)
मध्यो धात्वादिभिः पश्चात् क्षीयमाणैर्यथाक्रमम्। वृद्धो भवति मन्दात्मा प्रवृत्तिर्यावदायुषः ॥७६॥
एक वर्ष की अवस्था तक अथवा जब तक बालक दूध पीता है तब तक उसे क्षीरप कहते हैं। यह बाल अवस्था कहलाती है। इस एक वर्ष की अवस्था से लेकर १६ वर्ष की अवस्था तक सम्पूर्ण अन्नाद (अन्न का सेवन करनेवाले) बालक कौमारावस्था में होते हैं। इसके बाद धातु, सत्त्व, बल, वीर्य एवं पराक्रम के द्वारा बढ़ता हुआ व्यक्ति उत्तर परिणाम के अनुसार ३४ वर्ष की अवस्था तक युवा कहलाता है। धातु आदियों के स्थिर हो जाने पर सत्तर वर्ष की अवस्था तक मनुष्य की मध्यम अवस्था समझी जाती है। इसके बाद धातु आदियों के क्रमशः क्षीण हो जाने पर मन्द आत्मावाला व्यक्ति आयु पर्यन्त वृद्ध कहलाता है। अर्थात् यहां आयु को पहले मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा गया है—१. यौवन (३४ वर्ष तक) २. मध्यम अवस्था (३४ से ७० वर्ष तक) तथा ३. वृद्धावस्था (७० से आयु पर्यन्त) यौवन अवस्था के भी तीन भाग किये गये हैं १. बालावस्था (१ वर्ष तक अथवा दूध पीने की अवस्था तक) २. कौमारावस्था (१ से १६ वर्ष की आयु तक) ३. युवा (१६ से ३४ वर्ष की अवस्था तक) सुश्रुत सू. अ. ३५ में भी अवस्था के ये ही भेद दिये हैं—वयस्तु त्रिविधं-बाल्यं, मध्यं, वृद्धमिति। तत्रोनषोडशवर्षिया बालाः। तेऽपि त्रिविधाः-क्षीरपाः, क्षीरान्नादाः, अन्नादा इति।
| ३७२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | भेषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ] |
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तेषु संवत्सरपराः क्षीरपाः, द्विसंवत्सरपराः क्षीरान्नादाः, परतोऽन्नादा इति । षोडशसप्तत्योरन्तरे मध्यं वयः । तस्य विकल्पो वृद्धियौवनं संपूर्णता परिहाणिरिति । तत्र, आविंशतेर्वृद्धिः, आत्रिंशतो यौवनम्, आचत्वारिंशतः सर्वधात्विन्द्रियबलवीर्यसंपूर्णता, अत ऊर्ध्वमीषत्परिहाणिर्यावत् सप्त तिरिति । सप्ततेरूर्ध्वं क्षीयमाणधात्विन्द्रियबलवीर्योत्साहमहन्यहनि बलीपलितखालित्यजुष्ट कासश्वासप्रभृतिभिरुपद्रवैरभिभूयमानं सर्वक्रियास्वसमर्थं जीर्णागारमिवाभिवृष्टमवसोदन्तं वृद्धमाचक्षते । यहां भी वर्णन करने के ढंग में थोड़ा बहुत अवश्य अन्तर है अन्यथा वे ही भेद दिये गये हैं। मुख्यरूप से यहां भी तीन भेद दिये गये हैं। १. बाल्यावस्था (१६ वर्ष तक) २. मध्यमावस्था (६० वर्ष तक) तथा ३. वृद्धावस्था (६० वर्ष के बाद आयुपर्यन्त)। इन्हीं के अवान्तर भेद भी पृथक् २ दिये हैं जिनका प्रकृत ग्रन्थोक्त भेदों में ही अन्तर्भाव किया जा सकता है। इसी प्रकार चरक वि. अ. ८ में भी आयु के लगभग ये ही भेद दिये गये हैं ॥७३-७६॥
विकल्पनाऽन्या वृद्धस्य तस्य षोडशवार्षिकी । भवेद्भेषजमात्रा तु क्षीयमाणोत्तरोत्तरा ।।७७।।
शतिके शताधिके वाऽपि क्षीरान्नादवदिष्यते ।
वृद्ध व्यक्ति की ओषधि की मात्रा १६ वर्ष के व्यक्ति (Adult) की अपेक्षा उत्तरोत्तर क्षीण होती जाती है। तथा अन्त में जाकर १०० वर्ष अथवा इससे अधिक अवस्था में क्षीरान्नाद बालक के समान होती है। अर्थात् १०० वर्ष अथवा उसके बाद की अवस्था में व्यक्ति की औषध की मात्रा उतनी ही होनी चाहिये जितने क्षीरान्नाद (२ वर्ष के) बालक की होती है ॥७७॥
जातमात्रस्य मात्रा स्यात् सर्पिष्कोलास्थिसंमिता ।।७८।।
पञ्चरात्रं भवेद्यावद्दशाहमधिकं ततः । कोलार्धसंमितं यावद्विंशद्रात्रमतः परम् ।।७९।।
उत्पन्न हुए बालक के लिए घृत की मात्रा छोटे बेर की गुठली के प्रमाण के बराबर होनी चाहिये। उसके बाद ५ दिन तथा १० दिन की अवस्था तक उससे कुछ अधिक मात्रा देनी चाहिये। इसके बाद २० दिन तक की अवस्था में आधे कोल (बेर) के प्रमाण की मात्रा होनी चाहिये ॥७८-७९॥
कोलमात्रं भवेद्यावन्मासं मासद्वयेऽधिकम् । द्विकोलसंमितं सर्पिस्तृतीये मासि शस्यते ।।८०।।
एक मास की अवस्था तक एक कोल (बेर) के बराबर तथा दो मास तक उससे कुछ अधिक मात्रा होनी चाहिये। तीसरे मास में घृत की मात्रा दो कोल के बराबर होनी चाहिये ॥
शुष्कामलकमात्रं तु चतुर्थे मास्युदाहृतम् । पञ्चमे मासि षष्ठे च ह्याद्रामलकसंमितम् ।।८१।।
तदेवाभ्यधिकं किञ्चिद्विहितं सप्तमाष्टमे ।
चौथे मास में शुष्क आंवले के समान मात्रा होनी चाहिये। तथा पांचवें और छठे मास में घृत की मात्रा गीले आंवले के बराबर होनी चाहिये। सातवें तथा आठवें मास में इससे कुछ अधिक मात्रा होनी चाहिये ॥८१॥
क्षीरान्नादस्य बालस्य प्रायेणाहारसंकरात् ।।८२।।
भवत्यनियतो वह्निः पक्तौ बह्वनिलात्मनः । तस्याऽग्न्यावेक्षिकी तस्मात् स्नेहमात्रा विधीयते ।।८३।।
वातप्रधान क्षीरान्नाद (दूध तथा अन्न दोनों का सेवन करनेवाले) बालक की जाठराग्नि प्रायः मिश्रित भोजन के खाने से भोजन के पचाने में अनिश्चित होती है अर्थात् जाठराग्नि सम नहीं होती। इसलिये उसके लिये स्नेह की मात्रा उसकी अग्नि के अनुसार होनी चाहिये ॥८२-८३॥
अन्नादस्य तु भूयिष्ठं समो भवति पावकः । तस्यामलकमात्रस्य सर्पिषः पानमिष्यते ।।८४।।
भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ] खिलस्थानम् ३७३
अन्नाद (अन्न का सेवन करने वाले) बालक की जाठराग्नि अपेक्षाकृत अधिक सम होती है। उसे आंवले के प्रमाण के बराबर घृत का पान कराना चाहिये ॥८४॥
तदेवाग्निबलं वीक्ष्य वर्धमानस्य वर्धयेत् । क्षीरपस्य कुमारस्य क्षीरान्नादस्य चोभयोः ॥८५॥
ज्यों २ वह वृद्धि को प्राप्त होता जाय त्यों २ क्षीरप (दूध पीने वाले) तथा क्षीरान्नाद (दूध और अन्न दोनों का सेवन करने वाले) दोनों की मात्रा अग्निबल को देखकर बढ़ानी चाहिये ॥८५॥
देयं स्नेहचतुर्भागं भेषजस्य यथामयम् । घृतेन पाययेद्बालं यावत् स्यादष्टमासिकः ॥८६॥
मासादतोऽष्टमाज्जन्तोज्जलपिष्टं प्रदापयेत् ।
आठ मास की अवस्था तक बालक को रोग के अनुसार स्नेह की चतुर्थांश औषध घृत के साथ पिलानी चाहिये। आठ मास के बाद बालक को जल में धुली हुई ओषधि देनी चाहिये ॥८६॥
अतः परं यथाशास्त्रं कुमारस्यान्नसेविनः ॥८७॥
वक्ष्यामि विविधां मात्रां भेषजानां विभागशः ।
इसके बाद अन्न का सेवन करने वाले बालक के लिये मैं शास्त्र के अनुसार विभागपूर्वक ओषधियों की विविध प्रकार की मात्रा का उपदेश करूंगा ॥८७॥
मुचूटिं^१ वा प्रकुञ्चं वा प्रसृतं वाऽथवाऽञ्जलिम् ॥८८॥
आतुरस्य प्रमाणेन समेतव्यं चिकित्सिते ।
चिकित्सा में रोगी के रोग अथवा बल के प्रमाण के अनुसार एक मुष्टि, पल, प्रसृत अथवा अञ्जलि प्रमाण ओषधि देनी चाहिये ॥८८॥
अग्रपर्वाङ्गुलिग्राह्या चूर्णमात्रा तु पाणिना ॥८९॥
चूर्णानां दीपनीयानामेषा मात्रा विधीयते । द्विगुणा जीवनीयानां तथा संशमनस्य च ॥९०॥
ऊर्ध्वभागे त्वर्धमात्रा तथैवं च विरेचने ।
हाथ की अंगुली के अगले पर्व (पोर—Phalynx) के समान चूर्ण की मात्रा ग्रहण करनी चाहिये। यह दीपनीय चूर्णों की मात्रा कही गई है। जीवनीय तथा संशमनीय चूर्णों की मात्रा इससे दुगुनी होनी चाहिये। वमन तथा विरेचन के लिये चूर्णों की मात्रा उससे आधी होनी चाहिये ॥
वातपित्तकफघ्नानां कषाये तु प्रदापयेत् ॥९१॥
द्वौ दापयेत प्रसूतौ शर्करामधुसंयुतौ ।
वात पित्त तथा कफ नाशक कषायों में शर्करा तथा मधु के साथ मिलाकर चूर्ण की मात्रा दो प्रसृत लेनी चाहिये ॥९१॥
प्रसृतं छर्दनीयस्य निष्क्वाथस्य प्रदापयेत् ॥९२॥
तथा वैरेचनीयस्य प्रसृतं नात्र संशयः ।
द्विगुणां जीवनीयस्य तथा संशमनस्य च ।
१. मुचूटिर्मुष्टिः प्रकुञ्चः पलम् ।
३७४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ]
वामक तथा विरेचक क्वाथ की मात्रा निश्चित रूप से एक प्रसृत होनी चाहिये तथा दीपनीय और संशमनीय क्वाथ की मात्रा इससे दुगुनी होनी चाहिये ॥९२॥
दीपनीयस्य कल्कं तु अक्षमात्रं प्रदापयेत् ॥९३॥ द्विगुणं जीवनीयस्य तथा संशमनस्य च । अक्षार्धं छर्द्दनीयस्य तथा वैरेचिकस्य च ॥९४॥ दीपनीय कल्क की मात्रा एक अक्ष (कर्ष), जीवनीय तथा संशमनीय की इससे दुगुनी तथा वामक और विरेचक कल्क की मात्रा इससे आधी होनी चाहिये ॥९३-९४॥
स्नेहमात्रामतो वक्ष्ये वमने सविरेचने । वमने वमनीयाभिरोषधीभिः सुसंस्कृते ॥९५॥ मात्रावत्तु घृतं दद्याद्धमने कफसंभवे । अर्धमात्रा भवेद्धेया विरेके सर्पिषस्तथा ॥९६॥ वैरेचनैर्विपक्वस्य पित्ते प्रकुपिते सति ।
वमन तथा विरेचन के लिये अब मैं स्नेह (घृत) की मात्रा का उपदेश करूंगा। श्लैष्मिक वमन में वमनीय ओषधियों से सुसंस्कृत घृत मात्रा में देना चाहिये। तथा पित्त के प्रकुपित होने से उत्पन्न विरेचन में विरेचन द्रव्यों से पकाये हुए स्नेह की मात्रा इससे आधी देनी चाहिये ॥९५-९६॥
मात्राऽधश्चोर्ध्वभागा च श्लैष्मिकस्य प्रशस्यते ॥९७॥ दीपनैः शमनीयैश्च जीवनीयैश्च साधितम् । श्लैष्मिक वमन तथा विरेचन में भी दीपक, शामक एवं जीवनीय द्रव्यों से साधित स्नेह की इतनी ही मात्रा देनी चाहिये ॥९७॥
तथाऽपि कुपिते वाते दोषे पक्वाशये स्थिते ॥९८॥ कुक्षिग्रन्थिषु पार्श्वे च सक्ते देयं विरेचनम् । शमनैर्दीपनीयैश्च पाचनीयैश्च साधितम् ॥९९॥ वायु के प्रकुपित होने पर और दोष के पक्वाशय, कुक्षिग्रन्थि तथा पार्श्वों में स्थित होने पर शामक, दीपक एवं पाचक द्रव्यों से सिद्ध विरेचन देना चाहिये ॥९८-९९॥
चतुर्भागगुणं दद्यान्मात्रायाः कुम्भसर्पिषः । पादार्धहीनं पादोनमर्धं वाऽपि यथाक्रमम् ॥१००॥ सर्पिर्विदद्याद्बालेषु संप्रधार्य वयोबले । एतदर्थ बालकों की अवस्था तथा बल के अनुसार क्रमशः कुम्भसर्पि की मात्रा चौगुनी, पादार्धहीन, तीन चौथाई (३/४) अथवा आधी होनी चाहिये।
वक्तव्य—कुम्भसर्पि—कुछ लोक १० वर्ष तथा कुछ १०० वर्ष पुराने घृत को कुम्भसर्पि कहते हैं। यथा—कौम्भं दशाब्दिकम् (चक्रपाणि) तथा शतवर्षस्थितं यत्तु कुम्भसर्पिस्तदुच्यते (योगरत्नाकर) ॥१००॥
निष्क्वाथानां सकल्कानां चूर्णानां सर्पिषस्तथा ॥१०१॥ इत्युक्ता विविधा मात्रा मात्रामूलं चिकित्सितम् । इस प्रकार क्वाथ, कल्क, चूर्ण तथा घृत की अनेक प्रकार की मात्रायें कही हैं क्योंकि मात्रा पर ही चिकित्सा निर्भर है ॥
तस्मादग्निमृतुं सात्म्यं देहं कोष्ठं वयो बलम् ॥१०२॥ प्रकृतिं भेषजं चैव दोषाणामुदयं व्ययम् । विज्ञायैतद्यथोद्दिष्टं मात्रां सम्यक् प्रयोजयेत् ॥१०३॥
भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ] खिलस्थानम् ३७५
इसलिये अग्नि, ऋतु, सात्म्य, देह, कोष्ठ, वय (अवस्था), बल, प्रकृति, ओषधि तथा दोषों के प्रकोप और शान्ति को जानकर ही ठीक प्रकार से मात्रा का प्रयोग करे ॥१०२-१०३॥
अप्रमत्तः सदा च स्याद्भेषजानां प्रयोजने । ओषधीर्नामरूपाभ्यां जानन्ति वनगोचराः ।।१०४।।
अजपालाश्च गोपाश्च न तु कर्मगुणं विदुः ।
ओषधियों के प्रयोग में सदा सावधान रहना चाहिये । वनों में घूमने वाले बकरियों तथा गायों के चरवाहे ओषधियों के नाम तथा रूप को जानते हैं परन्तु वे उनके कर्म तथा गुणों को नहीं जानते हैं । इसी प्रकार चरक सू. अ. १ में भी कहा है ॥१०४॥
योगं त तासां योगज्ञा भिषजः शास्त्रकोविदाः ।।१०५।।
मात्राबलविधानज्ञा जानते गुणकर्म च ।
ओषधियों के योग को जानने वाले, शास्त्रों के पण्डित तथा उनके मात्रा, बल और विधान को जानने वाले वैद्य ओषधियों के योग तथा गुण और कर्म को जानते हैं ॥१०५॥
कर्मज्ञो वाऽप्यरूपज्ञस्तासां तत्त्वविदुच्यते ।।१०६।।
किं पुनर्ये विजानीयादोषधीः सर्वथा भिषक् ।
ओषधियों के कर्म को जानने वाला वैद्य उनके रूप को न जानने पर भी तत्त्ववित् (तत्त्वज्ञ) कहलाता है । और जो वैद्य ओषधियों को सर्वथा जानता है अर्थात् उनके रूप, गुण, कर्म आदि सब कुछ जानता है उसका तो कहना ही क्या है ॥
यथा विषं यथा शस्त्रं यथाऽग्निरशनिर्यथा ।।१०७।।
तथौषधमविज्ञातं विज्ञातममृतोपमम् ।
जिस औषध को वैद्य नाम, रूप, गुण अथवा सम्यकयोग द्वारा नहीं जानता है उस औषध को विष, शस्त्र, अग्नि तथा वज्र के समान जानना चाहिये अर्थात् अविज्ञात औषध विष आदि के समान प्राणनाशक है । तथा सम्यक् प्रकार से जानी हुई ओषधि को अमृत के समान जानना चाहिये । चरक सू. अ. १ में भी यह श्लोक लगभग इसी रूप में मिलता है ॥१०७॥
औषधं चापि दुर्युक्तं तीक्ष्णं संपद्यते विषम् ।।१०८।।
विषं च विधिना युक्तं भैषज्यायोपकल्पते ।
ठीक प्रकार से प्रयुक्त न की गई औषध तीक्ष्ण विष के समान हो जाती है । तथा विधिपूर्वक प्रयुक्त किया गया विष भी उत्तम ओषधि हो जाता है इसी प्रकार चरक सू. अ. १ में भी कहा है ॥१०८॥
अग्निर्यथा प्रज्वलितः क्रुद्धश्चाशीविषो यथा ।।१०९।।
असिधारा यथा तीक्ष्णा प्रभिन्नो वाऽपि कुञ्जरः । तथौषधमसंयुक्तमवैद्येनावचारितम् ।।११०।।
विपर्ययेण मात्राणा निरुणद्ध्वस्य जीवितम् ।
प्रज्वलित हुई अग्नि, क्रुद्ध हुए सर्प, तीक्ष्ण तलवार तथा मदमस्त हाथी के समान सम्यक् प्रकार से प्रयुक्त न की हुई तथा मूर्ख वैद्य द्वारा व्यवहृत ओषधि मात्रा के विपर्यय के कारण रोगी के जीवन को नष्ट कर देती है । इसी प्रकार चरक सू. अ. १ में भी कहा है अर्थात् इन्द्र के वज्र के सिर पर गिरने से भी शायद मनुष्य बच जाय परन्तु मूर्ख वैद्य द्वारा प्रयुक्त की गई औषध से रोगी नहीं बचता अर्थात् उसकी मृत्यु हो जाती है ॥१०९-११०॥
३७६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ]
दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा तथा पृष्ट्वा कार्यकार्याक्रियां ततः ।। १९१ ।।
औषधानि प्रसिद्धानि यानि स्युर्बहुशो भिषक् । रसतो वीर्यतश्चैव तानि तत्रावचारयेत् ।। १९२ ।।
अतोऽन्यथा ह्यमात्रज्ञो युक्त्यागमबहिष्कृतः ।
(इति ताडपत्रपुस्तके २०७ तमं पत्रम्।)
जो भी प्रसिद्ध ओषधियां हैं उन्हें देखकर स्पर्श करके तथा उनके कार्य और अकार्य को अच्छी प्रकार पूंछ करके वैद्य को उनके रस तथा वीर्य के अनुसार प्रयोग करना चाहिये। मात्रा को न जानने वाला तथा युक्ति और शास्त्र से बहिष्कृत वैद्य इससे विपरीत प्रयोग करता है ।।१९१-१९२।।
कृशं रोगपरिव्ध्वस्तं सुकुमारं समात्वि(धि१)कम् ।। १९३ ।।
तीक्ष्णौषधप्रयोगेण हन्ति चाप्यतिमात्रया । महारोगं महाहारं महासत्त्वं महाबलम् ।। १९४ ।।
मृद्वल्पौषधयोगेन क्लेशयत्यातुरं भिषक् ।
कमजोर, रोग से घिरे हुए, सुकुमार तथा आधि (मानसिक रोग) से युक्त रोगी को वैद्य तीक्ष्ण औषध के प्रयोग तथा अधिक मात्रा के द्वारा मार देता है। इसके विपरीत महान् रोग, अधिक आहार, महान् सत्त्व तथा अधिक बल वाले रोगी को वैद्य मृदु एवं अल्प औषध के प्रयोग से क्लेश पहुंचाता है। अर्थात् कमजोर एवं सुकुमार रोगी को तीक्ष्ण औषध के प्रयोग से हानि होती है तथा महान् रोग और महान् बल वाले रोगी को अल्प एवं मृदु ओषधि का यदि प्रयोग कराया जाय तो उसका कोई लाभ नहीं होता है। इसलिये रोगी एवं रोग के बल को सम्यक् प्रकार से देखकर ही ओषधि का प्रयोग कराना चाहिये ।।१९३-१९४।।
उपक्रम्यो बली तस्माद् दुर्बलो निरुपक्रमः ।। १९५ ।।
मध्यं युक्तैरुपक्रम्य न चाहारान्निवर्तयेत् ।
इसलिये बलवान् रोगी की चिकित्सा करनी चाहिये और दुर्बल की चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। तथा मध्य बलवाले रोगी की योग्य उपक्रमों के द्वारा चिकित्सा करे तथा उसका आहार बन्द न करे ।।१९५।।
कृशं विश्राम्य विश्राम्य पथ्यैरौषधसाधनैः ।। १९६ ।।
धारयेद्वर्धयेदग्निमग्नौ वृद्धे हि जीवति ।
कमजोर रोगी को बार २ विश्राम देकर औषध के द्वारा सिद्ध पथ्यों से उसका धारण करे तथा अग्नि को बढ़ाये। क्योंकि अग्नि के बढ़ने पर रोगी जीवित रहता है ।।१९६।।
यथाऽनिलः पित्तकफासृजश्च नित्याः शरीरे निहिता नराणाम् ।
तथैव बालेष्वपि सर्वमेतद्द्द्वयोस्तु रूपं तु तदल्पमल्पम् ।। १९७ ।।
जिस प्रकार मनुष्यों के शरीर में वायु, पित्त, कफ और रक्त सदा विद्यमान रहते हैं उसी प्रकार बालकों के शरीर में भी ये सब विद्यमान रहते हैं। दोनों में अन्तर इतना ही होता है कि बालकों में ये सब अल्प मात्रा में होते हैं ।।१९७।।
यथाऽल्पदेहस्य तदल्पमल्पं तथाऽन्नपानौषधमल्पमल्पम् ।
बुद्ध्या विमृश्येह भिषग्विद्ध्यात् मात्रा हि देहाग्निवयः प्रधानाः ।। १९८ ।।
१. आधिग्रस्तमित्यर्थः सम्भवति ।
यूषनिर्देशीयाध्यायः ४] खिलस्थानम् ३७७
जिस प्रकार अल्प देह वाले व्यक्ति में ये वात पित्त आदि अल्प मात्रा में होते हैं उसी प्रकार वैद्य को बुद्धि के द्वारा विचार करके उसके लिये अन्न, पान तथा औषध आदि भी अल्प मात्रा में प्रयुक्त करने चाहिये क्योंकि मात्रा मुख्यरूप से देहाग्नि तथा अवस्था के अनुसार होती है ॥११८॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
अलष्फ (१३४$^१$)
(इति) खिलेषु भेषज्योपक्रमणीयाध्यायस्तृतीयः ॥३॥
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। अलष्फ (१३४)
(इति) खिलेषु भेषज्योपक्रमणीयाध्यायस्तृतीयः ॥३॥
अथ यूषनिर्देशीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः ।
अथातो यूषनिर्देशीयं नामाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम यूष निर्देशीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
**वक्तव्य—**यूष सिद्ध करने के लिये मूंग आदि को कुछ भून करके १४ या १८ गुना जल में पकाकर आधा जल शेष रहने पर उतार लिया जाता है। कहा भी है—चतुर्दशगुणे तोये अष्टादशगुणेऽथवा। ईषदभ्रष्टं तु विदलं पक्त्वा यूषोऽर्धशेषितः ॥ यूष तथा सूप में यह अन्तर है कि यूष में केवल मात्र द्रव भाग लिया जाता है जब कि सूप में दाल के दाने तथा जल दोनों ही रहते हैं तथा जल भी चतुर्थांश रहता है ॥१-२॥
यूषादिव्यञ्जनोपेतं भोज्यं पथ्यतरं भवेत् । स्वस्थानामातुराणां च विशेषारोग्यकारकम् ॥३॥
यूष आदि व्यञ्जनों से युक्त भोज्य पदार्थ स्वस्थ तथा रोगी दोनों के लिये पथ्य होता है तथा विशेषरूप से आरोग्य को देने वाला होता है ॥३॥
अतश्च सर्वभूतानामाहारः स्थितिकारणम् । न त्वाहारादृतेऽस्त्यन्यत् प्राणिनां प्राणधारणम् ॥४॥
इसलिये आहार सब प्राणियों की स्थिति का कारण कहा गया है। आहार के अतिरिक्त और कोई वस्तु ऐसी नहीं है जो प्राणियों के प्राणों को धारण कराये। सुश्रुत सू. अ. ४६ में कहा भी है—प्रागभिहितः प्राणिनामित्यादि, Sir Robert Me Carrison ने भी अपनी पुस्तक Food में आहार प्रयोजन बतलाया है ॥४॥
१. अत्र अलष्फ इत्यक्षराङ्कोल्लेखेन १३४ श्लोकमानमायाति, परमत्र ११६ श्लोका एव भवन्ति, तेन कतिपये एतत्प्रकरणमध्यगताः श्लोकाः पूर्वमेव विलुप्ताः किमु।
यहां 'अलष्फ' शब्द द्वारा अक्षरों का उल्लेख होने से १३४ श्लोकों की प्रतीति होती है परन्तु यहां ११६ श्लोक ही हैं। इससे अनुमान किया जा सकता है कि इस प्रकरण के बीच के कुछ श्लोक लुप्त हो गये हैं। इस अध्याय में श्लोकों की संख्या ११६ नहीं अपितु ११८ हैं। बीच में संख्या की गड़बड़ी के कारण ११६ संख्या आती है। हमने उस संख्या को ठीक करके ११८ कर दिया है। (अनुवादक)।