काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ] खिलस्थानम् ३६७
ओषधियों के भेद—१. चूर्ण (Powder) २. शीतकषाय (Infusion) ३. स्वरस (Juice) ४. अभिषव (मद्य) ५. फाण्ट (Infusion) ६. कल्क (Bruised coarsely powdered drugs or Paste) तथा ७. क्वाथ (Decoction)—इन्हें तू मेरे से यथावत् सुन।
वक्तव्य—चरक सू. अ. १ में केवल ५ कल्पनाएं दी हैं। कहा है—पञ्चविधं कषायकल्पनमिति तद्यथा-स्वरसः कल्कः शृतः शीतः फाण्टः कषाय इति। अर्थात् वहां चूर्ण और अभिषव का उल्लेख नहीं किया गया है। चूर्ण का उसने कल्क तथा अभिषव का शीतकषाय में अन्तर्भाव कर दिया है॥३५॥
सूक्ष्मचूर्णीकृतं चूर्णं नानाकर्मसु युज्यते। ग्रहण्यामविकारेषु व्रणवत्यञ्जनादिषु ॥३६॥
शीतः शीतकषायः स्यादन्तरिक्षाम्बुसंप्लुतः। स पित्तज्वरदाहासृग्विषमूर्च्छामदापहः ॥३७॥
तद्वदेवं निशाव्युष्टोऽभिषवः साधु साधितः। प्रशान्ताग्निबलक्षोभः सौम्यः स्वरससङ्गतः ॥३८॥
द्राक्षेक्ष्वामलकादीनां पीडनात् स्वरसः स्मृतः। स संशमनसंयोगे नानारोगेषु कल्पते ॥३९॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २०५ तमं पत्रम्)।
क्वथितस्त्वान्तरिक्षेण वारिणाऽर्धावशेषितः। सकृद्धा फाणितः फेनं कषायः फाण्ट उच्यते ॥४०॥
सोऽल्पदोषबले बाले लघुव्याधौ च शस्यते। कल्कः कल्कीकृतो योज्यः पानलेपावलेहने ॥४१॥
केवलद्रव्यपेयत्वाद्विकार्षी दुर्जरश्च सः। पादस्थितो भवेत् क्वाथो युक्तोऽबह्वग्नितेजसा ॥४२॥
स वयोबलसंपन्ने गुरुव्याधौ च शस्यते।
सूक्ष्म चूर्ण (Powder) किये हुए द्रव्य को चूर्ण कहते हैं। यह ग्रहणी रोग, आमविकार, व्रण तथा अञ्जन आदि नाना कर्मों में प्रयुक्त किया जाता है। अन्तरिक्ष जल के साथ मिलाये हुए शीत द्रव्य को शीतकषाय कहते हैं। यह पित्तज्वर दाह, रक्त, विष, मूर्च्छा तथा मद को नष्ट करने वाला है। पूर्वोक्त द्रव्य को ही यदि रात्रि भर पानी में रखकर अच्छी प्रकार सिद्ध किया जाय तो वह अभिषव कहलाता है। जिसका अग्निबल तथा क्षोभ शान्त हो गया है तथा जो सौम्य है ऐसे व्यक्ति को स्वरस के साथ अभिषव का प्रयोग करना चाहिये। द्राक्षा, इक्षु (गन्ना) तथा आंवले आदि का निष्पीडन करके जो रस निकाला जाता है उसे स्वरस कहते हैं। यह अन्य संशमन ओषधियों के साथ मिला कर नाना रोगों में प्रयुक्त किया जाता है। द्रव्य को अन्तरिक्ष जल के साथ पका कर आधा जल शेष रहने पर अथवा एक बार उबाला आकर झाग आने पर उस क्वाथ को फाण्ट कहते हैं। यह अल्प दोष एवं अल्प बल वाले बालक तथा मृदु व्याधि में प्रशस्त माना गया है। द्रव्य को पानी के साथ पीसकर कल्क बनाकर पान, लेप तथा अवलेह के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसमें शुद्ध द्रव्य का पान के रूप में प्रयोग होने से वह कर्षण करने वाला तथा दुर्जर (कठिनता) से जीर्ण होने वाला—दुष्पच) होता है। तीव्र अग्नि पर पकाकर चतुर्थांश शेष रखने पर क्वाथ कहलाता है। इसका अवस्था एवं बल से सम्पन्न एवं गुरुव्याधि में प्रयोग किया जाता है। चरक सू. अ. ४ में पञ्चविध कषाय कल्पना की निम्न परिभाषायें दी हैं—यन्त्रप्रपीडनाद् द्रव्याद्रसः स्वरस उच्यते। यत्पिण्डं रसपिष्टानां तत्कल्कं परिकीर्तितम्॥ वह्नौ तु क्वथितं द्रव्यं श्रुतमाहुश्चिकित्सकाः। द्रव्यादापोथितात्तोये तत्पुनर्निशि संस्थितात् ॥ कषायो योऽभिनिर्याति स शीतः समुदाहृतः। क्षिप्तोष्णतोये मृदितं तत्फाण्टं परिकीर्तितम् ॥३६-४२॥
सप्तधैव विभज्यैतद्दशधा प्रविचारयेत् । पूर्वं भक्तस्य मध्येऽधः समुद्गं समुहुर्मुहुः ॥४३॥
सभक्तं भक्तयोर्मध्ये ग्रासग्रासान्तरे परः।
इस प्रकार ओषधियों की कल्पना को सात प्रकार से विभक्त करके फिर १० प्रकार से पुनः विभक्त करे—१. भोजन के पूर्व, २. भोजन के मध्य में, ३. भोजन के अन्त में, ४. समुद्ग, ५. बार-बार, ६. सभक्त (भोजन के साथ), ७. दो
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