काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 726, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३६६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ] |
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पादाश्चिकित्सितस्योपपद्यन्ते । ते यदा गुणवन्त उपपद्यन्ते तदा साध्यो व्याधिर्नातिवर्तते । तद्यथा—भिषक्, भेषजम्, आतुरः, परिचारक इति । इसी प्रकार च. सू. अ. ९ में भी कहा है—भिषक् द्रव्याण्युपस्थाता रोगी पादचतुष्टयम् । गुणवत्कारणं ज्ञेयं विकारव्युपशान्तये ॥
ओसो नाम रसः सोऽस्यां धीयते यत्तदोषधिः । ओसादारोग्यमाधत्ते तस्मादोषधिरोषधः ॥ २७ ॥
भिषग्विज्ञाननेयत्वाद्भेषजं भिषजो विदुः । भिषग्जिते हितत्वाच्च भेषज्यं परिचक्षते ॥ २८ ॥
अगदत्वं च युक्तस्य गदानामपुनर्भवात् । कण्ठस्य कषणात् प्रायो रोगाणां वाऽपि कर्षणात् ॥ २९ ॥
कषायशब्दः प्राधान्यात् सर्वयोगेषु कल्प्यते ।
ओस रस को कहते हैं । यह (रस) जिसमें धारण किया जाता है वह ओषधि होती है । रस के द्वारा क्योंकि आरोग्य का आधान होता है इसलिये रस को धारण करनेवाला द्रव्य ओषधि कहाता है । भिषग् (चिकित्सकों) के जानने योग्य होने के कारण वैद्य लोग इसे भेषज कहते हैं । चिकित्सा में हितकारी होने के कारण इसे भैषज्य कहते हैं । इसका युक्तिपूर्वक प्रयोग होने से रोग पुनः नहीं होते हैं इसलिये इसे अगद कहते हैं । कण्ठ में लगने के कारण अथवा रोगों का कर्षण करने के कारण सम्पूर्ण योगों में प्रधान रूप से कषाय शब्द का प्रयोग होता है ॥२७-२९॥
शब्दरूपरसस्पर्शगन्धवद्देशजं नवम् ॥ ३० ॥
अजग्धमविदग्धं च द्रव्यं गुणवदुच्यते ।
शब्द, रूप, रस, स्पर्श तथा गन्ध की तरह उत्कृष्ट देश (स्थान) में उत्पन्न हुआ, नवीन, कीट आदियों द्वारा अदूषित तथा विदग्ध न हुआ द्रव्य गुणकारी कहलाता है ॥३०॥
मात्रावल्लघुपाकं च हृद्यं दोषप्रवाहणम् ॥ ३१ ॥
अल्पपेयं महावीर्यं प्रीणनं बलरक्षणम् । व्यापत्तावल्पदोषं च मन्दग्लापनमेव च ॥ ३२ ॥
संस्कारगुणसंपन्नं राजार्हं भेषजं मतम् ।
उत्तम ओषधि के लक्षण—जो मात्रा में प्रयोग की जाती हो, जिसका पाक लघु हो, जो हृदय को अच्छी लगती हो (रोचक हो), जो दोषों को निकालती हो, जो अल्पमात्रा में ही सेवन की जाती हो, जो प्रबल वीर्य (शक्ति) वाली, प्रसन्न करनेवाली तथा बल की रक्षा करनेवाली हो, विपरीत प्रयोग करने पर जो अल्प दोष वाली हो, जो ग्लानि कम करती हो, तथा जो संस्कार एवं गुणों से सम्पन्न हो वह ओषधि राजाओं के योग्य मानी जाती है अर्थात् वह उत्तम औषध मानी जाती है ॥३१-३२॥
तद्धि सिद्धमसिद्धं च शीतमूष्णं द्रवं घनम् ॥ ३३ ॥
कोष्णं सस्नेहमस्नेहमिति भिन्नमनेकधा । तदामयवयोभेदात् सप्तधैव विभज्यते ॥ ३४ ॥
वह ओषधि सिद्ध, असिद्ध, शीत, उष्ण, द्रव (Liquid), घन, (Solid), ईषदुष्ण, स्नेहयुक्त तथा स्नेह रहित इत्यादि अनेक भेदों वाली होती है । रोग एवं अवस्था के अनुसार यह निम्न सात प्रकार से विभक्त की जा सकती है ॥३३-३४॥
चूर्णं शीतकषायश्च स्वरसोऽभिषवस्तथा ।
फाण्टः कल्कस्तथा क्वाथो यथावत्तं निबोध मे ॥ ३५ ॥