भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 725
भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ]खिलस्थानम्३६५

दोष नहीं माना जाता है। वृद्ध वाग्भट की टीका में कहा भी हैं—'मनः शुद्धं सत्त्वम्। रजस्तमसो दोषौ तयोपप्लवावविद्यासम्भूतौ'। यदि सत्त्व को शुद्ध एवं अविकारी न माना जाय तो मोक्ष सम्भव नहीं है। क्योंकि सत्त्व के बिना यथार्थज्ञान नहीं होता तथा जब तक यथार्थ ज्ञान न हो तब तक मुक्ति नहीं होती। इसीलिये कहा भी है—'ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः' इसलिये सत्त्व को दोष नहीं माना जाता। केवल रज और तम ही मन को दूषित करने के कारण मानसिक रोगों के कारण माने गये हैं। अष्टाङ्ग हृदय में भी कहा है—'वायुः पित्तं कफश्चेति त्रयो दोषाः समासतः' तथा—'रजस्तमश्च मनसो द्वौ च दोषावुदाहृतौ ॥२०॥

धृतिवीर्यस्मृतिज्ञानविज्ञानैर्मानसं जयेत् ॥२१॥
शारीरं भेषजैः कालयुक्तिदैवव्यपाश्रयैः ।

मानसिक रोगों को धृति, वीर्य, स्मृति, ज्ञान तथा विज्ञान के द्वारा तथा शारीरिक रोगों को कालव्यपाश्रय, युक्तिव्यपाश्रय तथा दैवव्यपाश्रय ओषधियों के द्वारा जीते।

**वक्तव्य—**चरक सू. अ. १ में कहा है—प्रशाम्यत्यौषधैः पूर्वो दैवयुक्तिव्यपाश्रयैः ।। मानसो ज्ञानविज्ञानधैर्यस्मृतिसमाधिभिः ।। अर्थात् शारीर दोष, दैवव्यपाश्रय तथा युक्तिव्यापश्रय ओषधियों से शान्त होते हैं और मानस दोष ज्ञान-विज्ञान आदि द्वारा शान्त होते हैं। दैवव्यपाश्रय से बलि, मन्त्र, मङ्गल तथा सदाचार आदि का ग्रहण होता है तथा युक्तिव्यपाश्रय से दोष आदि की विवेचनापूर्वक यथावत् औषध प्रयोग का ग्रहण होता है। अर्थात् पूर्वकर्मज शारीर व्याधियों की दैवव्यपाश्रय तथा दोषज व्याधियों की युक्तिव्यपाश्रय चिकित्सा करनी चाहिये ॥२१॥

स पुनर्द्विविधो व्याधिरागन्तुर्निज एव च ॥२२॥
आगन्तुर्बाधते पूर्वं पश्चाद्दोषान् प्रपद्यते । निजस्तु चीयते पूर्वं पश्चाद्वृद्धः प्रबाधते ॥२३॥

व्याधि आगन्तु तथा निज के भेद से पुनः दो प्रकार की है। आगन्तु व्याधि पहले शरीर को कष्ट (व्यथा) पहुंचाती है तथा बाद में वातादि दोषों को प्रकुपित करती है। निज रोग में पहले से ही दोषों का संचय एवं प्रकोप होता है तथा बाद में वे शरीर को कष्ट देते हैं। चरक सू. अ. २० में भी कहा है—आगन्तुर्हि व्यथापूर्वसमुत्पन्नो जघन्यं वातपित्तश्लेष्मणां वैषम्यमापादयति, निजे तु वातपित्तश्लेष्माणः पूर्वं वैषम्यमापाद्य ते, जघन्यं व्यथामभिनिर्वर्तयन्ति ॥२२-२३॥

तस्मादागन्तुरोगाणां पश्यन्ति निजवत् क्रियाः ।
निजानां पूर्वरूपाणि दृष्ट्वा संशोधनं हितम् ॥२४॥

इसलिये आगन्तु रोगों को भी निज रोगों की तरह ही चिकित्सा की जाती है। आगन्तु रोगों में निज रोगों के पूर्वरूपों को देखकर संशोधन कराना चाहिये। अर्थात् आगन्तु रोगों में निज रोगों के पूर्वरूप दिखाई देते ही अर्थात् लक्षण उत्पन्न होने से पूर्व ही यथायोग्य संशोधन आदि देना चाहिये ॥

संशोधनं सप्तविधं तदायत्तं चिकित्सितम् । तच्चायतं चतुष्पादे पादश्चौषधमुच्यते ॥२५॥
ओषधं युक्त्यधिष्ठानं दैवाधिष्ठानमेव च । युक्तिर्वमनकर्मादि दैवं यागादि कीर्त्यते ॥२६॥

संशोधन सात प्रकार का होता है तथा उसी पर चिकित्सा निर्भरर होती है। चिकित्सा चतुष्पाद पर निर्भर है तथा चतुष्पाद ही ओषधि कहलाता है। ओषधि युक्ति तथा दैव के आधीन होती है। वमन आदि क्रियाओं को युक्ति कहते हैं तथा यज्ञ आदि को दैव कहते हैं।

**वक्तव्य—**चतुष्पाद से अभिप्राय वैद्य, ओषधि, परिचारक तथा रोगी से है। इन चारों के गुण युक्त होने पर ही सम्यक् प्रकार से चिकित्सा हो सकती है। इसी संहिता के सूत्रस्थान अ. २६ में पहले कहा गया है—चत्वारः खलु