काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 724, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें३६४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ]
इस प्रकार सुनने की इच्छा वाले शिष्य को ज्ञानी महर्षि कश्यप ने यथायोग्य भैषज्योपक्रम का उपदेश किया ॥१५॥
अयं हेतुरिदं लिङ्गमस्य चायमुपक्रमः । इति तावत् परं सूक्ष्मं व्याधिज्ञानं प्रचक्षते ॥१६॥
रोग का अमुक हेतु, अमुक लिङ्ग (लक्षण) तथा अमुक चिकित्सा है। इस प्रकार रोग का ज्ञान अत्यन्त सूक्ष्म होता है ॥
अस्मादप्यौषधज्ञानमाहुः सूक्ष्मतरं बुधाः । तदहं तेऽभिधास्यामि कार्त्स्न्यैनैव निबोध मे ॥१७॥
ज्ञानी लोग रोग की अपेक्षा भी ओषधि के ज्ञान को अधिक सूक्ष्म बतलाते हैं। इसलिये मैं सम्पूर्ण रूप से तुझे ओषधि के ज्ञान का उपदेश करूंगा। वह तू मेरे से सुन ॥१७॥
पथ्यसेविनमारोग्यं गुणेन भजते नरम् । अपथ्यसेविनं क्षिप्रं रोगः समभिमर्दति ॥१८॥
पथ्य का सेवन करने वाले व्यक्ति को स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है तथा कुपथ्य का सेवन करने वाले को सदा रोग घेरे रहते हैं ॥१८॥
स रोगो द्विविधश्चोक्तः शारीरो मानसस्तथा ।
आधयो मानसास्तत्र शारीरा व्याधयः स्मृताः ॥१९॥
साध्योऽसाध्यश्च याप्यश्च त्रिविधं रोगलक्षणम् ।
वह रोग दो प्रकार का होता है—१. शारीरिक, २. मानसिक। मानसिक रोगों को आधि तथा शारीरिक रोगों को व्याधि कहते हैं। साध्य, असाध्य तथा याप्य भेद से रोगों के तीन प्रकार के लक्षण होते हैं।
वक्तव्य—चरक सू. अ. १ में भी कहा है—'शरीरं सत्वसंज्ञं च व्याधीनामाश्रयो मतः' अर्थात् ये दो ही रोगों के आश्रय माने जाते हैं। कई रोग केवल शरीर का आश्रय लेकर होते हैं जैसे–कुष्ठ। कई रोग केवल मन का आश्रय लेते हैं जैसे–काम तथा कुछ रोग ऐसे होते हैं जो शरीर तथा मन दोनों का आश्रय लेकर होते हैं जैसे—उन्माद। शारीरिक रोग का मन पर तथा मानसिक रोग का शरीर पर थोड़ा बहुत प्रभाव अवश्य पड़ता है। चरक में शरीर, मन तथा आत्मा–इन तीन पर ही लोक स्थिति बतलाई है अर्थात् ये तीनों आधारस्तम्भ माने गये हैं। इन तीनों के संयोग से ही प्राणी स्थिर रहते हैं। इन तीनों में से शरीर तथा मन में तो विकार उत्पन्न होते हैं परन्तु निर्विकार होने से आत्मा में विकार उत्पन्न नहीं होते। इसीलिये दो प्रकार के ही रोग माने गये हैं। चरक सू. अ. १ में कहा भी है—निर्विकारः परस्त्वात्मा सत्वभूतगुणेन्द्रियैः ॥१९॥
वातपित्तकफा दोषाः शारीरव्याधिहेतवः ॥२०॥
सत्त्वेतरं च द्वन्द्वं च मानसामायहेतवः ।
वात, पित्त तथा कफ दोष शारीरिक रोगों के कारण होते हैं। तथा सत्व गुण को छोड़कर शेष रज और तम मानसिक रोगों के कारण माने जाते हैं।
वक्तव्य—चरक सू. अ. १ में भी कहा है—वायुः पित्तं कफश्चोक्तः शारीरो दोषसंग्रहः। मानसः पुनरुद्दिष्टो रजश्च तम एव च ॥ अर्थात् वात, पित्त तथा कफ शारीरिक रोगों को उत्पन्न करते हैं। ये तीनों जब तक समावस्था में रहते हैं तब तक शरीर स्वस्थ रहता है उस अवस्था में ये शरीर को धारण करते हैं इसलिये उसका नाम धातु भी है। परन्तु जब ये दूषित हो जाते हैं तब रोगों को उत्पन्न करते हैं उस अवस्था में इन्हें दोष कहते हैं। मानसिक दोष रज एवं तम ये दो ही माने जाते हैं। यद्यपि सत्त्व, रज और तम ये तीन गुण होते है तथापि इनमें सत्त्व के शुद्ध एवं अविकारी होने से इसे